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Editorial

जिन्ना और उनकी राष्ट्रवादी सोच

पिचहत्तर बरस का भारत भाग-3

उन्नीस सौ सैंतालीस के विभाजन की भूमिका तो दशकों पहले से ही लिखी जानी और बनाई जाने लगी थी, 1937 से 1947 का दशक इस भूमिका को पुख्ता करने वाला दशक रहा लेकिन इस दशक की घटनाओं का पुनर्पाठ करने से पहले एक व्यक्ति विशेष को समझा जाना बेहद जरूरी है ताकि न केवल इस व्यक्ति के बारे में फैली-फैलाई गई नाना प्रकार की भ्रांतियां से कोहरा छंट सके, साथ ही एक समय में हिंदू-मुस्लिम एकता के कट्टर प्रवर्तक रहे इस व्यक्ति के धर्म आधारित विभाजन का पैरोकार बनने की परिस्थितियों को भी समझ अपनी समझ विकसित की जा सके। ये व्यक्ति हैं पाकिस्तान के पहले ‘क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना।

पेशे से वकील और राजनीतिज्ञ मोहम्मद अली जिन्ना का पैतृक गांव गुजरात की राजकोट रियासत में था। इसे अजब संयोग कहा जायेगा कि भारत के राष्ट्रपिता कहलाए गए मोहन दास करम चंद्र गांधी और पाकिस्तान के क़ायद-ए-आज़म (महान नेता) और बाबा-ए-क्यूम (राष्ट्रपिता) कहलाए गए जिन्ना न केवल एक ही इलाके राजकोट रियासत से थे बल्कि दोनों के माता-पिता एक ही भाषा गुजराती बोलते थे। यह भी इत्तेफाक है कि गांधी और जिन्ना के कभी भी गुजराती को अपनी बोल चाल की भाषा नहीं बनाया। जिन्ना के पिता ने राजकोट के बजाए कराची में बसना पसंद किया तो इसका प्रमुख कारण उन दिनों कराची का अंग्रेजी साम्राज्य वाले भारत में एक बंदरगाही शहर के रूप में तेजी से उभरना रहा। जिन्ना का जन्म 1976 के आस-पास हुआ था। 16 बरस की आयु में उनके धनवान पिता ने उन्हें इंग्लैंड पढ़ने के लिए भेज दिया था। अपनी वकालत की पढ़ाई के दौरान ही जिन्ना राजनीति की तरफ आकर्षित हुए। 1892 में ब्रिटिश संसद में ‘काउंसिल ऑफ इंडिया एक्ट’ पारित हुआ था। जिन्ना की जीवनी ‘Jinnah of Pakistan’ (जिन्ना ऑफ पाकिस्तान) के लेखक स्टेनली वोलपर्ट के अनुसार जिन्ना ब्रिटिश संसद के ‘हाउस ऑफ कॉमंस’ में इस बहस को सुनने नियमित जाया करते थे। 1892 में ही दादा भाई नौरोजी को ब्रिटिश संसद का सदस्य चुना गया था। ‘हाउस ऑफ कॉमंस’ में दादा भाई के ओजस्वी भाषणों से जिन्ना खासे प्रभावित रहते थे। 1896 में अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद जिन्ना ने कराची के बजाए बंबई में बसना पसंद किया और बंबई हाईकोर्ट में वकालत करनी शुरू की। जिन्ना के बंबई में जा बसने से दो दशक पूर्व यानी 1867 के आस-पास मुस्लिम नेताओं के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले सर सैय्यद अहमद ने कांग्रेस का विरोध करने की राजनीति शुरू कर दी थी। ब्रिटिश हुकूमत के बेहद करीबी बन चुके सैय्यद अहमद की उपयोगिता पहचान ब्रिटेन की सरकार ने 1870 में ही उन्हें ‘नाइट’ की उपाधि दे डाली थी और 1883 में उन्हें भारत के तत्कालीन वाइसराय (ब्रिटिश प्रशासक) ने अपनी सभा का सदस्य नियुक्त कर दिया था। सर सैय्यद ने 1893 में खुलकर कांग्रेस की खिलाफत कर ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ की नींव रखनी चालू कर दी। बकौल सर सैय्यद ‘कांग्रेस इतिहास और वर्तमान की सच्चाई से अंजान है। वह यह नहीं स्वीकारती है कि भारत में अलग-अलग राष्ट्रीयता रहती हैं। उसका मानना है कि मुसलमानों के साथ मराठे, ब्राह्मण, क्षत्रिय सरीखा ही एक समान व्यवहार किया जा सकता है क्योंकि सभी एक राष्ट्र का हिस्सा हैं।’ जब सर सैय्यद मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था बनाने की बात उठा रहे थे, जिन्ना लंदन में अपनी वकालत की पढ़ाई करते हुए कट्टर राष्ट्रवादी दादाभाई नौरोजी के करीब आ रहे थे। जिन्ना इसी दौरान एक अन्य राष्ट्रवादी नेता फिरोज शाह मेहता से भी खासे प्रभावित होने लगे थे। 1890 में मेहता कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए­­­। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में अल्पसंख्यकों के महत्व पर विशेष जोर दिया था। मेहता ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था कि ‘मेरे विचार से एक पारसी उतना ही बेहतर और सच्चा पारसी होगा, एक मुसलमान या हिंदू, उतना ही बेहतर और सच्चा मुसलमान और हिंदू होगा जितना वह उस धरती से प्यार करेगा जिसने उसे पैदा किया है।’ जिन्ना सर सैय्यद के अलगाववादी विचारों से कोसों दूर इन दो कट्टर राष्ट्रवादी नेताओं के करीब इस दौर में आ चुके थे। 1904 में पहली बार जिन्ना कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल हुए। यहीं से कांग्रेस में जिन्ना का उदय काल शुरू हुआ और आने वाले कुछ ही वर्षों में वे उसके बड़े नेताओं की कतार में शामिल हो गए। 1905 का बरस विश्व भर में उथल-पुथल की घटनाओं से भरा साल रहा। सोवियत रूस और जापान के मध्य अपने-अपने साम्राज्यों के विस्तार को लेकर 1904 में भारी युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी। रूस के सबसे घातक समुद्री जहाजों के बेड़े ‘बॉल्टिक फ्लीट’ को जापानी नौसेना ने पूरी तरह तबाह कर दिया था, चीन और ब्रिटेन के मध्य आर्थिक युद्ध शुरू हो चला था और विश्व भर की राजनीतिक घटनाओं, विशेषकर ब्रिटेन में कन्सरवेटिव पार्टी के अलोकप्रिय होने और लिबरल पार्टी के प्रति ब्रिटेन की जनता के बढ़ते झुकाव ने भारतीय उपमहाद्वीप में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा डाली थे। जुलाई, 1905 में भारत के तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल प्रांत को दो भागों में बांट डाला। अपनी ‘फूट डालो शासन करो’ नीति के अनुरूप लॉर्ड कर्जन ने ऐसा किया था। पूर्वी बंगाल और असम को मिलाकर एक मुस्लिम बाहुल्य पूर्वी बंगाल प्रांत बनाया गया जिसकी राजधानी ढाका रखी गई। दूसरी तरह हिंदू बाहुल्य पश्चिम बंगाल का गठन कर उसकी राजधानी कलकत्ता को रहने दिया गया। अंग्रेज हुकूमत का उद्देश्य स्पष्ट तौर पर हिंदू और मुस्लिम के मध्य दरार पैदा करना था। बंगाली मुसलमान आर्थिक दृष्टि से पिछड़े होने के चलते हिंदुओं से दबकर रहते थे और हिंदू साहुकारों और बड़े बंगाली जमीदारों की रहमोकरम पर आश्रित थे। इस बंटवारे ने ढाका को नए राजनीतिक और आर्थिक शक्ति बनने का अवसर दिया जिसका सीधा असर अविभाजित बंगाल की हिंदु बाहुल्य राजनीति पर पड़ा क्योंकि अब पूर्वी बंगाल का मुसलमान हिन्दू जमींदार और साहूकारों की पकड़ से बाहर हो गया था। सर सैय्यद अहमद खान सरीखी राजनीति के पैरोकारों को यह विभाजन लाभकारी नजर आया। मुसलमानों के मध्य नई राजनीतिक चेतना का उदय हुआ और वह अंग्रेज सत्ता के करीब चला गया। लेकिन इस विभाजन का भारी विरोध भी मुसलमानों के उस बड़े वर्ग ने किया जिसकी आस्था कांग्रेस की राष्ट्रवादी राजनीति संग जुड़ी थी। इस विभाजन का विरोध पूरे पांच बरस तक चला और गैर-राजनीतीक गुलाम भारत की जनता का इसी आंदोलन चलते राजनीतिकरण हुआ। कांग्रेस ने अपना नया राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ जारी किया जिसे गाते हुए लाखों भारतवासी वायसराय लॉर्ड कर्जन के खिलाफ प्रदर्शन करने के लिए सड़कों पर उतर आए। ब्रिटिश समान का सामाजिक बहिष्कार किया गया जिसके चलते 1911 में अंग्रेज हुकूमत को झुकना पड़ा और बंगाल विभाजन को वापस लेना पड़ा। इस पूरे दौर में जहां सर सैय्यद अहमद खान के नेतृत्व में धनाढ्य मुसलमानों ने अंग्रेज हुकूमत का साथ दिया तो वहीं युवा वकील मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस की राष्ट्रवादी विचारधारा का हिस्सा बने रहे। बंगाल विभाजन के चलते ही मुस्लिमों में भी राजनीतिक चेतना का उभार आया और द्विराष्ट्र सिद्धांत को मजबूती देने का बीज इसी दौर में अंकुरित तब हुआ जब ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई।

1905 के अंत में लॉर्ड कर्जन के स्थान पर लॉर्ड मिंटो भारत के वायसराय बनाए गए। उन्होंने वायसराय बनने के साथ ही भारत में संसदीय शासन व्यवस्था लाने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया। इतिहासकारों की लॉर्ड मिंटो के इन सुधारों को लेकर अलग-अलग राय है। कुछ इसे मिंटो के नेक इरादों और अच्छी शासन प्रणाली विकसित करने की दिशा में उठाए गए सकारात्मक कदम की तरह देखते हैं तो कइयों का मत है कि राष्ट्रवादी चेतना के उभार से चिंतित ब्रिटिश हुकूमत ने गुलाम भारत में इस व्यवस्था को लागू कर एक तीर से दो निशाने साधने का काम किया। पहला उद्देश्य था शासन व्यवस्था में भारतीयों की सांकेतिक भागीदार करवा दिनों दिन तेज हो रहे राष्ट्रवाद के स्वरों को कमजोर करना और दूसरा इस व्यवस्था में अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली बना धर्म के आधार पर विभाजन कर राष्ट्रवादी आंदोलन में फूट डालना।

मिंटो ने वायसराय बनने के बाद कांग्रेस से इतर राजनीति कर रहे मुस्लिम नेताओं संग मेल-जोल बढ़ाना शुरू करा। अक्तूबर 1906 में अपने शिमला प्रवास के दौरान मिंटो ने देश भर से आए कुलीन मुसलमानों के एक प्रतिनिधि मंडल से अपने आवास पर मुलाकात की। इस मुलाकात का घोषित उद्देश्य हिंदू बाहुल्य भारत में अल्पसंख्यक मुस्लिम समाज के हितों की रक्षा के लिए वायसराय से चर्चा का था। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व आगा खान कर रहे थे। इस प्रतिनिधिमंडल ने वायसराय को एक लिखित ज्ञापन सौंपा। यहां यह उल्लेखनीय है कि सर सैय्यद अहमद खान द्वारा 1875 में अलीगढ़ में स्थापित ‘मोहम्मद एंग्लो ओरियन्टल कॉलेज’ (जो 1920 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवसिर्टी बना) 19वीं शताब्दी की शुरुआत में मुसलमानों की राजनीतिक चेतना का केंद्र बन उभर चुका था। इसके संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान की 1898 में मृत्यु पश्चात इस कॉलेज की राजनीतिक ताकत कमतर अवश्य हुई थी लेकिन उसके तार पूरी तरह से मुस्लिम राजनीतिक जनजागरण से जुड़ रहे थे और 1905 के आस-पास वह एक बार फिर से इस चेतना का केंद्र बिंदु बन उभरने लगा था। 1906 की शुरुआत में ब्रिटेन में सत्ता परिवर्तन हुआ और कंसरवेटिव पार्टी के स्थान पर लिबरल पार्टी सत्ता पर काबिज हो गई। लिबरल पार्टी से सांसद जान मोरले को भारत मामलों का मंत्री बनाया गया। मोरले ने जुलाई, 1906 में ब्रिटिश संसद में दिए अपने भाषण में भारत की प्रांतीय विधानसभाओं में भारतीयों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की बात कही। यहां यह समझ जाना जरूरी है कि 1857 के गदर बाद जब ईस्ट इंडिया कंपनी से भारत की सत्ता सीधे ब्रिटिश सरकार ने अपने हाथों में ली थी तभी से उसने अपनी हुकूमत को बनाए रखने के लिए ऐसे सुधार लागू करने शुरू कर दिए थे जिससे अंग्रेज सत्ता के खिलाफ उभर रही चेतना की धार को कुंद किया जा सके। 1861 में ब्रिटिश संसद ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए ‘इंडियन काउंसिल एक्ट’ बनाया। इस एक्ट में यह व्यवस्था की गई कि भारत के हर राज्य में एक उप राज्यपाल होगा जिसे 12 सदस्यों वाली परिषद के साथ मिलकर उस राज्य के लिए सुधार कार्यक्रम बनाने होंगे। इस परिषद में सदस्यों को उप राज्यपाल द्वारा चुना जाता था और ज्यादातर सदस्य ब्रिटेन के अथवा ‘एंग्लो इंडियन’ समुदाय से होते हैं। इन परिषदों का कार्य केवल सलाह देना भर था, उसे कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं थे। 1892 में ‘इंडियन काउंसिल एक्ट’ में संशोधन कर हर प्रांत में 20 सदस्यों वाली परिषद का गठन किए जाने और इस परिषद को नौकरशाही से सवाल पूछने और राज्य का बजट तैयार करने में उप राज्यपालों की मदद से करने का अधिकार दे दिया गया लेकिन इस परिषद के पास भी किसी भी मुद्दे पर वोट डाल उप राज्यपाल के बनाए कानून को बदलने का अधिकार नहीं था।

क्रमशः

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