Editorial

कथनी-करनी का अंतर समझना जरूरी

प्रधानमंत्री इस दौर के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। भले ही उनकी सरकार आर्थिक मोर्चे पर भारी असफलता की तरफ बढ़ रही हो, बेरोजगारों की फौज में लगातार वृद्धि हो रही है। अभी कल ही खबर आई कि मारुति कार ने तीन हजार की छंटनी कर डाली, सूरत का प्रसिद्ध डायमंड उद्योग भारी संकट में है, टैक्सटाइल इंड्रस्टी जार-जार आंसू बहा रही है और केंद्रीय बैंक को अपने संचित कोष से पौने दो लाख करोड़ सरकार को देना पड़ रहा है। इतना सब होने के बावजूद मोदी सर्वप्रिय नेता के पायदान में नंबर वन की पोजिशन पर डटकर टिके हैं। सत्तर के दशक में शुरू हुई ‘बिनाका गीत माला’, उसमें भी खास उसके उद्घोषक की रेडियो में गूंजती आवाज कई हफ्तों तक एक ही गाने के नंबर एक पर होने की घोषणा करती थी। याद है आपको अमीन सियानी साहब? फिर अचानक एक दिन वे कहते फंला गाना नंबर एक से लुढ़क कर फंला पायदान में पहुंच गया है। नंबर एक पायदान में बने रहना बेहद कठिन है। बहरहाल, हाल फिलहाल मोदी एक नंबर पायदान पर मजबूती से खड़े हैं। हालांकि मजबूती से इस देश में जमी ब्रिटिश हुकूमत भी थी जिसके साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं था। आज उन्हीं के तो बनाए लुटियन जोन में बैठ मोदी देश की सत्ता चला रहे हैं। सूरज, जैसा प्रकृति का नियम है, अटल सत्य है, ब्रिटिश हुकूमत में भी डूबा। बहरहाल अभी का सच यही कि मोदी लोकप्रिय नेता हैं, पीएम हैं, इसलिए उनके कहे का बहुत महत्व है। वे जब कहते हैं कि उनकी सरकार ‘सबका साथ सबका विकास’ के सिद्धांत पर काम कर रही है तो उनके कहे पर मुझे कोई शक नहीं। जब वे कहते हैं कि उनकी सरकार महात्मा गांधी का सम्मान करती है और वे खुद बापू के बताए उच्च आदर्शों पर चलने का प्रयास करते हैं, तो मुझे उनकी बात बहुत कर्णप्रिय लगती है। संकट लेकिन तब पैदा होने लगता है, जब संदेह जन्म लेता है। संदेह जन्म लेता है क्योंकि जो कहा जा रहा है, बताया जा रहा है, वैसे होता नजर नहीं आता। अब देखिए प्रधानमंत्री हमेशा महात्मा गांधी का जिक्र करते हैं। वे बापू के प्रति बेहद श्रद्धा रखते हैं। इतना कि महात्मा गांधी की 150वीं जयंती को बड़ी धूमधाम से मनाने का निर्णय केंद्र सरकार ने लिया है। इसके बावजूद उनका दल प्रज्ञा सिंह ठाकुर को लोकसभा भेजता है। प्रज्ञा ठाकुर खुलकर महात्मा के हत्यारे नाथुराम गोडसे का महिमा मंडन करती हैं। पीएम उनसे बेहद नाराज होते हैं, इतने कि कह डालते हैं ‘कभी माफ नहीं करुंगा।’ लेकिन कार्यवाही प्रज्ञा ठाकुर पर कुछ होती नहीं। इसका क्या अर्थ निकाला जाए? यह माना नहीं जा सकता कि पीएम की बात पार्टी सुनती नहीं। पीएम सरकार और पार्टी के सर्वेसर्वा हैं। उनका कहा आदेश होता है। इसलिए शंका होनी स्वभाविक है कि पीएम प्रज्ञा ठाकुर से इतने नाराज यदि वाकई में हैं तो फिर क्योंकर वे पार्टी अध्यक्ष से ठाकुर के खिलाफ कार्यवाही की बात नहीं करते। शंका इसलिए भी उठती है, जायज उठती है कयोंकि प्रधानमंत्री भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं को सत्ता के मद में मदहोश न होने की बात कहते हैं, वे ऐसे आचरण के दोषियों पर कठोर कार्यवाही का चाबुक भी फटकारते हैं, लेकिन उनकी करीबी नेता कैलाश विजयवर्गीय के मध्य प्रदेश में विधायक पुत्र जब सार्वजनिक रूप से सरकारी काम में बाधा पहुंचाते हैं, सरकारी अफसरों से मारपीट करते हैं तो भले ही पूरे देश भर में आलोचना होती हो, भाजपा कार्यवाही नहीं करती। तब क्या माना जाए कि पीएम के शब्द पार्टी के लिए मायने नहीं रखते? या फिर पीएम की कथनी-करनी में भारी भेद है? अब गत् वर्ष दिसंबर में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर की घटना को ले लीजिए। पुलिस को सूचना मिलती है कि एक इलाके में गाय के कंकाल मिलने के बाद दंगों के हालात बन गए हैं। इलाके के थाना प्रमुख इंसपेक्टर सुबोध कुमार वहां जाते तो हैं हालात संभालने, लेकिन खुद ही दंगाइयों के हाथों कत्ल कर दिए जाते हैं। सुबोध कुमार वही अफसर हैं जिन्होंने दादरी में हुए अखलाक हत्याकांड की जांच की थी। सुबोध कुमार की हत्या से योगी सरकार सकते में आ जाती है। एक स्पेशल टीम इस मामले की पड़ताल करती है। सात को गिरफ्तार भी किया जाता है। एक आरोपी हत्याकांड के समय भाजपा युवा मोर्चा का स्थानीय प्रधान था। अपने अफसर की हत्या से तिलमिलाई यूपी पुलिस 38 को मुजरिम बना कोर्ट में तय समय के भीतर चार्जशीट दाखिल कर देती है। गत् सप्ताह सात आरोपियों को कोर्ट ने सशर्त बेल दे दी। जब ये बुलंदशहर जेल से बाहर आए तो इनका जबरदस्त स्वागत किया गया। फूल मालाएं पहनाई गई। मानो कोई नायक जंग जीतकर घर वापस आए हों। अभी इन ‘नायकों’ को घर वापसी पर मिले ‘सम्मान’ की खबरें पची भी नहीं थी कि देश के पूर्व गृह राज्य मंत्री स्वामी चिन्मयानंद का मामला सामने आ गया। वे भाजपा के तीन बार के सांसद और अटल सरकार में गृह राज्य मंत्री रह चुके हैं। चिन्मयानंद राम मंदिर आंदोलन के दौरान खासे सक्रिय रहे हैं। उनका शाहजहांपुर में बड़ा आश्रम और कई शिक्षण कॉलेज हैं। उनके कॉलेज में पढ़ने वाली एक छात्रा ने यौन शोषण के गंभीर आरोप उन पर लगाए हैं। छात्रा फिलहाल लापता है। स्वामी के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। आठ साल पहले भी स्वामी चिन्मयानंद पर ऐसा ही आरोप एक महिला ने लगाया था। महिला स्वामी के आश्रम में संन्यास लेने के उद्देश्य से आई थी। भाजपा की सरकार राज्य में बनी तो स्वामी के खिलाफ इस मामले में दर्ज मुकदमा वापस ले लिया गया। मुकदमा सरकार ने वापस कराया इसलिए पीड़िता इस मामले को हाईकोर्ट लेकर गई। मामला अभी कोर्ट में लंबित है। ताजा प्रकरण में स्वामी ने मीडिया के समक्ष खुद को निर्दोष बताते हुए कह डाला ‘पहले कुलदीप सेंगर को फंसाया गया, अब मुझे फंसाया जा रहा है। भाजपा के दबंग विधायक सेंगर भी एक रेप केस में फिलहाल सीबीआई द्वारा गिरफ्तार कर जेल में हैं। घोर आश्चर्य और निराशाजनक भाजपा का इस मुद्दे पर स्टैंड का होना है। कुलदीप सेंगर पर गिरफ्तारी बाद भी पार्टी ने कोई कार्यवाही करना उचित नहीं समझा। उन्हें अब जाकर पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखाया जरूर लेकिन तब जबकि पीड़िता लड़की एक सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गई और उसके दो रिश्तेदार मर गए। कुलदीप सेंगर पर इस रोड एक्सिडेंट को कराने का आरोप जब मीडिया की सुर्खी बना, सुप्रीम कोर्ट पूरे मामले में सख्त हुआ, तब जाकर भाजपा नेतृत्व जागा। बहरहाल ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं जिन पर चिंतन-मंथन करा जाए तो एक बात स्पष्ट नजर आती है कि भारतीय जनता पार्टी बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को लागू कर रही है। उसका लक्ष्य कोई छिपा, हिडन एजेंडा, नहीं है। वह अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की पक्षधर है। इसके घोषणा पत्र में यह संकल्प दशकों से रहा है। इसलिए यदि वह केंद्र में सरकार के रहते इस दिशा में आगे बढ़ती है तो यह उसका अधिकार है। ठीक इसी प्रकार दशकों से ही भाजपा और उसकी पितृ संस्था आरएसएस देश में एक पंथ, एक विधान के पैरोकार रहे हैं। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाकर उन्होंने स्पष्ट संदेश देश को दिया कि वे प्रचंड जनादेश का मान रखने वाली पार्टी हैं। मोदी की लोकप्रियता सरकार के इस कदम से कई गुना बढ़ी है। बहुत संभव है कि आने वाले समय में केंद्र सरकार समान आचार संहिता को भी लागू कर दे। उसे इसका भी पूरा नैतिक अधिकार है। इन्हीं मुद्दों पर वह बरसों से सड़क से संसद तक संघर्ष करती आई है। लेकिन चिंता में डालने वाले कुछ ऐसे वादे हैं जिन पर न तो भाजपा और न ही केंद्र सरकार कुछ करती नजर आ रही है। उदाहरण के लिए नए रोजगार सृजन को ले लें। सरकार की नीतियों के चलते रोजगार के अवसर बढ़ना कोसों दूर, बेरोजगारी बढ़ी है। कारण है अव्यवहारिक आर्थिक नीतियां। नोटबंदी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। मोदी सरकार ने यह फैसला क्यों लिया इसको लेकर नाना प्रकार की कहानियां हैं। सच चाहे जो भी हो, फैसला अविवेकपूर्ण था, अव्यवहारिक था। कालाधन खत्म नहीं हुआ, हां सफेद जरूर हो गया। आम जनता को कुछ समय तक हुई असुविधा का प्रश्न छोड़ भी दें, तो भी नोटबंदी का असर आमजन में गहरा पड़ा है। समानांतर अर्थव्यवस्था के लिए जाना जाने वाले देश में एकाएक ही लिया गया यह निर्णय व्यापार-उद्योग के लिए भारी संकट बन गया है। अभी इस संकट से उबरने का मौका उद्योगजगत को मिला तक नहीं था कि आनन-फानन में जीएसटी लागू कर दी गई। नतीजा सबके सामने है। उद्योग का हर क्षेत्र, चाहे आईटी हो, रियल स्टेट हो, कपड़ा हो, डायमंड जगत हो, आटोमोबाइल सेक्टर हो, कहने का मतलब यह कि पूरा उद्योग जगत मंदी की मार से त्राहि-त्राहि कर रहा है। लाखों की तादात में रोजगार समाप्त हुए हैं। सरकार लेकिन ‘फील गुड’ का जबरन एहसास कराने में लगी है। स्मरण रहे अटल जी की सरकार ने भी ‘इंडिया शायनिंग’ का बहुत प्रचार किया था। हालांकि उनके 6 बरस आज की तरह खराब नहीं थे, बावजूद इसके जनता ने उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया था। दूसरी चिंता में डालने वाली बात हमारी उन संस्थाओं का लगातार कमजोर होते जाना है जो मजबूत लोकतंत्र की रीढ़ कही जाती हैं। आजाद भारत में ऐसा पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीश ‘लोकतंत्र खतरे में है’ कह प्रेस काफ्रेंस कर बैठे। इतना ही काफी नहीं था कि सींटिंग चीफ जस्टिस गोगोई ने दोबारा यही आशंका दोहरा दी। रिजर्व बैंक के हालात भी सामने हैं। दो गवर्नर, एक डिप्टी गवर्नर इस्तीफा दे चुके हैं। कारण सबके सामने है। केंद्र सरकार आरबीआई के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप करती नजर आ रही है। रघुराजन के बाद गवर्नर बने उर्जित पटेल मोदी के करीब माने जाते थे। अर्थशास्त्री होने के चलते वे सरकार की सोच संग ज्यादा समय टिक नहीं सके। नए आरबीआई के गवर्नर अर्थशास्त्री नहीं हैं। वे आईएएस अफसर रहे हैं। उनकी नियुक्ति के बाद ही केंद्रीय बैंक के रिजर्व फंड से पौने दो लाख करोड़ रुपया केंद्र सरकार को देने का निर्णय हो पाया है। अर्थशास्त्री इसे कमजोर हो रही अर्थव्यवस्था से जोड़ रहे हैं। एक बड़ी समस्या, जिसे सामाजिक समस्या भी कहा जा सकता है, मोदी समर्थकों के असहिक्षुण होने की है।

सोशल मीडिया में कोई पीएम की बुराई करे तो भक्तों की टोली आपके शिकार पर निकल पड़ती है। मेरी समझ से यह स्वस्थ समाज के लिए एक बेहद घातक प्रवृति है। जिसको समय रहते यदि नहीं रोका गया तो इसके परिणाम बेहद घातक होंगे। कुल मिलाकर भले ही अंध राष्ट्रवाद और उग्र हिन्दुत्व के सहारे भाजपा प्रचंड बहुमत से दोबारा केंद्र और अधिकतर राज्यों की सत्ता पा चुकी है, यदि बुनियादी समस्याओं का निराकरण नहीं किया गया तो देश में हालात बेहद खराब और हिंसक होने तय हैं। मोदी हैं तो सब ठीक हो जाएगा सोच वाले देशभक्तों की अंधभक्ति शायद तब जाकर टूटेगी। अफसोस देर बहुत हो चुकी होगी।

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