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Editorial

इंदिरा हटाओ-इंदरी बचाओ

 पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-89
 

सरकारी कर्मचारियों, डॉक्टर, नर्सों, स्कूल और कॉलेज के अध्यापकों, पुलिस के अफसरों के नसबन्दी लक्ष्य तय कर दिए गए थे। जो कोई भी अपने लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाता था उसके वेतन को रोका जाने लगा। नतीजा जबरन नसबंदी कराए जाने के रूप में सामने आया। संजय गांधी की इस क्रूरता का शिकार गरीब तबका हुआ जिसके लोकतांत्रिक अधिकारों को दरकिनार कर बड़े पैमाने पर जबरदस्ती नसबंदी करा दी गई। सत्तर बरस या उससे अधिक उम्र के बुजुर्गों तक को नहीं बख्शा गया। देश के महानगरों में फुटपाथ पर रहने वाले भिखारियों और दिहाड़ी मजदूरों पर तो सरकारी तंत्र का कहर टूट पड़ा था। ऐसों को  गिरफ्तार कर नसबंदी केंद्रों में भेज जबरन नसबन्दी का शिकार बना दिया गया था।

सरकारी तंत्र की क्रूरता ने जनाक्रोश को हवा देने का काम जल्द ही कर दिखाया। देश के कई जगहों पर नसबंदी के खिलाफ जनता और पुलिस के मध्य झड़प होने लगी थी। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में जनता की नाराजगी दंगों में बदल गई थी। संजय गांधी के निर्देश पर आंख मूंदकर अमल करने वाले मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी (जिन्हें नई दिल्ली तिवारी कह पुकारा जाने लगा था।) ने प्रदेश में नसबंदी का लक्ष्य 15 लाख प्रति वर्ष तय कर पुलिस-प्रशासन की मदद से जबरन इस अभियान को युद्ध स्तर पर लागू करना शुरू कर दिया था। 16 अक्टूबर, 1976 को मुजफ्फरनगर के जिलाधिकारी मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में इस अभियान का नेतृत्व कर रहे थे। उन्होंने विरोध कर रही भीड़ पर लाठी चार्ज करा माहौल को भड़काने का काम कर दिया। लाठी चार्ज के बाद गिरफ्तार किए गए लोगों को छुड़ाने की मांग को लेकर जनता ने स्थानीय थाने को घेर लिया। जिलाधिकारी ने संयम से काम लेने के बजाय भीड़ पर गालियों की बौछार करते हुए बेहद अभद्र शब्दों का इस्तेमाल तक कर डाला। बकौल विनोद मेहता डीएम ने कहा ‘मैं इन सबकी मां… दूंगा।’भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले दागे जिनका जवाब भीड़ ने पत्थरबाजी कर दिया। डीएम ने पुलिस को गोली चलाने के आदेश दे दिए। करीब 30 लोग घटनास्थल पर ही मारे गए और दर्जनों घायल हुए थे। प्रेस सेंसरशिप के चलते इस घटना की बाबत कोई समाचार प्रकाशित नहीं होने दिया गया। विदेशी समाचार एजेंसी ‘रियूटर्स’ और ‘बीबीसी’ ने जब 100 लोगों के मारे जाने का समाचार प्रकाशित किया तो बवाल मच गया। प्रधानमंत्री ने संसद में केवल इतना स्वीकारा कि ‘मुजफ्फरनगर में दंगा हुआ था जिसमें कई दर्जन पुलिसकर्मी घायल हो गए थे। उन्होंने किसी भी नागरिक के मारे जाने की बात से इनकार कर दिया था। जल्द ही उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों से भी दंगों की खबरें आने लगी थी। सुलतानपुर में 8 के मारे जाने, मेरठ और गोरखपुर में भी दंगें भड़कने के साथ-साथ अन्य प्रदेशों हरियाणा, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, पंजाब और महाराष्ट्र में भी हालात खराब होने लगे। इन प्रदेशों में 50 से अधिक के मारे जाने की बात बाद में सामने आई थी।’

आपातकाल के दौरान की गई नसबंदी की बाबत जयप्रकाश नारायण का दावा था कि ‘80 लाख से अधिक लोग जबरन नसबंदी के शिकार हुए थे। संजय का लक्ष्य तीन बरस के भीतर 2-3 करोड़ लोगों की नसबंदी का था जो कैथरीन फ्रैंक के अनुसार 21 महीनों के आपातकाल के दौरान ही हासिल कर लिया गया था।’
आपातकाल हटाए जाने के बाद इस अभियान के खिलाफ जनता की नाराजगी प्रधानमंत्री और कांग्रेस को महंगी पड़ी थी। उनके कोर वोट बैंक, जिनमें अल्पसंख्यक मुस्लिम, हरिजन एवं अन्य पिछड़ी जातियां शामिल थी, ने अपनी इस नाराजगी का जवाब कांग्रेस के खिलाफ मतदान कर दिया। 1977 में हुए आम (चुनाव) में नसबंदी को निशाने पर रखते हुए विपक्षी दलों द्वारा उछाला गया नारा खासा लोकप्रिय हुआ था-‘इंदिरा हटाओ-इंदरी बचाओ’ (इंदरी से तात्पर्य पुरुष लिंग से था)।

संजय गांधी के पांच सूत्रीय कार्यक्रमों में शहरों का सौंदर्यीकरण भी शामिल था। संजय गांधी देश को स्वच्छ और सुंदर देखना चाहते थे लेकिन किस कीमत पर? उन्हें झुग्गी-झोपड़ियों से खासी नफरत थी। विनोद मेहता के शब्दों में-‘सभी सभ्य और संवेदनशील मनुष्यों की तरह संजय को भी झुग्गी-झोपड़ियों से घृणा थी। बदसूरत और बीमारी तथा अपराध की जन्मस्थली बन चुके इन इलाकों को संजय एक स्वतंत्र और सम्प्रभु राष्ट्र के लिए अपमान मानते थे।’ उनका मानना था कि झुग्गी-झोपड़ियों में लोग आर्थिक तंगी के कारण नहीं, बल्कि अपने आपस चलते और शायद अपने मजे चलते रहते हैं। यदि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए तो ये लोग गंदगी में रहना ही जारी रखेंगे। संजय की दृष्टि में इनको ठीक करने का जरिया केवल सरकारी चाबुक था। संजय को झुग्गी-झोपड़ियों की समस्या से या उन्हें समाप्त करने से कोई सरोकार नहीं था, वह केवल उन्हें अपनी नजरों से दूर करना चाहते थे-इतनी दूर जहां कोई उन तक न पहुंच सके ताकि वे कह सकें कि मैंने दिल्ली का ‘सौंदर्यीकरण’ कर दिखाया है।

पुरानी दिल्ली का तुर्कमान गेट कहलाया जाने वाला इलाका संजय गांधी के इस मिशन का पहला शिकार बना। मुस्लिम बाहुल्य इस इलाके के लोगों को जबरन हटाए जाने की शुरुआत 13 अप्रैल, 1976 से शुरू हुई और 13 मई तक जारी रही। इस दौरान डेढ़ लाख झुग्गियों को दिल्ली विकास प्राधिकरण के बुल्डोजरों ने ध्वस्त कर डाला। सत्तर हजार से ढाई लाख लोगों को दूर-दराज के इलाकों में अस्थाई राहत केंद्रों में भेज दिया गया था। 19 अप्रैल, 1976 के दिन हिंसा का नंगा नाच तुर्कमान गेट इलाके में देखने को मिला। जबरन उजाड़े जाने का विरोध कर रहे निहत्थे लोगों पर पुलिस और अर्ट्टासैनिक बलों ने गोलियां दागी जिसमें अलग-अलग आंकड़ों के अनुसार 6 से 150 लोगों तक की मौत हुई थी। मारे जाने वालों में एक तेरह साल का बच्चा भी शामिल था। आपातकाल हटाए जाने के बाद प्रकाशित पुस्तक ‘फॉर रिसन्स् ऑफ स्टेट : देहली अंडर दि इमरजेंसी’ के लेखक द्वय जॉन अब्राहम और अजय बोस के अनुसार इस ध्वस्तीकरण के दौरान पुलिस बलों द्वारा बड़े पैमाने पर हिंसा, लूटपाट और बलात्कार तक को अंजाम दिया गया था। इस पुस्तक के अध्याय ‘तुर्कमान गेट’ में पुलिस बर्बरता का खौफनाक जिक्र कुछ इस तरह से किया गया है- नन्हा उस्मान का भगदड़ में अपनी मां संग साथ छूट गया था, क्योंकि वह छोटा था इसलिए अब तक वह लाठियों और मार से बचा हुआ था। आंसू गैस चलते लेकिन उसकी आंखें अंधी हो चली थी। ‘अम्मा जान’ वह चिल्लाया। ‘कहां हो तुम? मुझे बचाओ।’ लेकिन उसकी अम्मा जान गैस की धूंध में घिरी हुई थी। यह गैस नन्हें उस्मान के जीवन को धीरे-धीरे लीजने लगी थी। कोई उसके ऊपर बेरहमी से चढ़ा लेकिन उस्मान को फर्क नहीं पड़ा। गैस ने उसकी जान ले ली थी।

शाम 5ः30 बजे इलाके में कर्फ्यू लगा दिया गया और उसके बाद शुरू हुआ सोची-समझी रणनीति के जरिए लूटपाट और बलात्कार का मंजर। रजिया बेगम अपने पति का इंतजार अपने घर में बीते एक घंटे से कर रही थी। दरवाजे में दस्तक हुई तो उसने दौड़कर दरवाजा खोला। अपने पति के बजाय उसके सामने एक पुलिस का सिपाही खड़ा था।

‘अपने कानों की बालियां उतार’ उसने आदेश दिया। रजिया ने बालियां उसे सौंप दी।’
‘और गहने कहां छुपा कर रखे हैं?’ हताश, रजिया ने अपने सारे जेवर और सारी जमा पूंजी का डिब्बा उसे सौंप दिया।’

‘और अब तुम्हारे कपड़े’ रजिया ने संदूक की तरफ इशारा किया।’

‘संदूक में रखे कपड़े नहीं। बदन के कपड़े।’ अपने पान से सने गंदे दांत दिखाते हुए सिपाही बोला। रजिया की आंखें भय से चौड़ी हो गईं। उसने एक छलांग लगा सिपाही के बढ़ते हाथों से खुद को बचाया और बरामदे की तरफ भागी। चालीस फुट नीचे जमीन थी। सिपाही चिल्लाया। ‘वापस आ जा औरत, क्या कर रही है।’ रजिया बेगम ने अपनी आंखें बंद की और कूद लगा दी। उसका शरीर एक भारी आवाज के साथ फर्श से जा टकराया।

संजय गांधी के इस ‘सौंदर्यीकरण’ अभियान के खनलायक थे दिल्ली विकास प्राधिकरण के तत्कालीन अध्यक्ष जगमोहन। उन्हें उनकी ‘उत्कृष्ट’ सेवाओं के लिए पद्मभूषण सम्मान दिया गया था। 1980 में कांग्रेस की सत्ता वापसी के बाद उन्हें दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया गया। 1984 में राजीव गांधी ने जगमोहन को जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया। यहां भी उनका कार्यकाल बेहद विवादित रहा था। पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो जगमोहन को ‘भागमोहन’ कह पुकारती थी। भागमोहन से उनका आशय जम्मू-कश्मीर से जगमोहन को आतंकित कर भगाने का था। 1994 में जगमोहन कांग्रेस से नाता तोड़ भाजपा में शामिल हो गए। नई दिल्ली संसदीय सीट से तीन बार संसद सदस्य रहे जगमोहन को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री भी बनाया गया था।

आपातकाल की घोषणा होने के साथ ही ज्यादातर विपक्षी नेता, सरकार के खिलाफ लिखने वाले पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था। इंदिरा सरकार लेकिन तमाम प्रयास करने के बावजूद श्रमिक नेता जॉर्ज फर्नांर्डीस को पकड़ नहीं पाई थी। 1974 में देशव्यापी रेल हड़ताल के नेता जॉर्ज गिरफ्तारी से बचने के लिए भूमिगत हो गए थे। उन्होंने अपने साथियों को संगठित कर प्रधानमंत्री को सत्ता से बेदखल करने के लिए कुछ ऐसा करने का निश्चय किया जिससे केंद्र सरकार की चूलें हिल जाएं। जॉर्ज और उनके चुनिंदा साथियों ने बनारस के निकट मुगलसराय रेलवे स्टेशन समेत रेलवे नेटवर्क के कुछेक महत्वपूर्ण केंद्रों को डायनामाइट के जरिए उड़ाने की योजना बनाई। उनका लक्ष्य रेल व्यवस्था को ठप्प कर इंदिरा सरकार पर सत्ता छोड़ने के लिए दबाव बनाना था। बांग्लादेश के राष्ट्रपति शेख मुजीबुर्रहमान और उनके परिजनों की हत्या के बाद प्रधानमंत्री अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर खासी चिंतित और सतर्क रहने लगी थीं। जॉर्ज और उनके साथियों की योजना जल्द ही खुफिया एजेंसियों के कानों तक पहुंच गई। बॉम्बे, बिहार, कर्नाटक समेत कुछ एक जगहों पर धमाके जरूर हुए लेकिन रेल नेटवर्क बाधित कर पाने की योजना कारगर नहीं हो पाई। मई, 1976 से 10 जून (जॉर्ज की गिरफ्तारी का दिन) तक इस मामले से जुड़े सभी को गिरफ्तार कर लिया गया था। सीबीआई ने ‘बड़ौदा डायनामाइट केस’ के नाम से कुख्यात इस मामले की जांच उपरांत जॉर्ज और उनके साथियों पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया। कन्नड़ और तेलुगु रंगमंच और सिनेमा की जानी-पहचानी अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी को भी इस मामले में 2 मई, 1976 को गिरफ्तार किया गया था। हालांकि सीबीआई की चार्जशीट में बतौर अभियुक्त स्नेहलता का नाम शामिल नहीं किया गया, उन्हें आठ महीनों तक बैंगलोर सेंट्रल जेल में कैद रखा गया। जेल में उनके साथ बेहद अमानवीय बर्ताव हुआ जिसके चलते वे गम्भीर रूप से बीमार हो गई थीं। स्नेहलता का कसूर मात्र इतना था कि वे जॉर्ज की करीबी मित्र थी। गम्भीर बीमारी के चलते उन्हें 15 जनवरी, 1977 को जेल से रिहा कर दिया गया। 20 जनवरी को उनकी मृत्यु हो गई। स्नेहलता को आपातकाल के शहीदों के रूप में आज भी याद किया जाता है। आपातकाल हटने और जनता सरकार के सत्तारूढ़ होने के बाद जॉर्ज के साथ ‘बड़ौदा डायनामाइट केस’ में आरोपी बनाए गए सीजीके रेड्डी ने ‘बड़ौदा डायनामाइट कॉन्सपेरेंसी’ पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में रेड्डी ने स्वीकारा है कि जॉर्ज और उनके साथी जिनमें रेड्डी शामिल थे, इंदिरा गांधी को पद से हटाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे- ‘हत्या एक सरल और सीधा तरीका है। तानाशाही के हर शासन में इसका प्रयास किया जाता रहा है। एक कृतसंकल्पित समूह श्रीमती इंदिरा गांधी और उनके करीबी हर उस व्यक्ति को शारीरिक तौर पर हटा सकता था जो इस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए आवश्यक थे।’

क्रमशः

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