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Editorial

इंदिरा पर निर्दयी और पाखंडी होने का आरोप

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-74

पत्रकार रोमेश थापर को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने अपने इस निर्णय की बाबत कहा ‘गरीबी अमूर्तता नहीं है। इसका अर्थ भौतिक वस्तुओं रोटी, कपड़ा और मकान से है जिसके लिए हमें ठोस कदम उठाने ही होंगे। साम्यवाद को रोकने के लिए बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना आवश्यक था। हमारे उद्योगपतियों को यह समझ नहीं आ रहा है कि हमारे पास इसके सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं था। भारत में अति दक्षिणपन्थ के लिए कोई जगह नहीं है। पूरे देश में माहौल मध्य वामपंथी है।’ गरीबी भले ही इस देश से आज इक्कीसवीं सदी तक समाप्त न हुई हो, इंदिरा गांधी अपने लक्ष्य को पाने में इस एक मास्टर स्ट्रोक के जरिए सफल हो गईं। आम जनता ने अमीरों द्वारा संचालित इन बैंकों के निजीकरण का भारी उत्सव मना स्वागत किया। अंग्र्रेजी दैनिक ‘द स्टेट्समैन’ के सम्पादक इंदर मल्होत्रा के हवाले से सागरिका घोष ने अपनी पुस्तक ‘इंदिरा, भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री’ में लिखा है- ‘इंदर मल्होत्रा दिल्ली की गलियों में बैंक राष्ट्रीयकरण की खुशी मना रही भीड़ के बीच इसके परिणाम की खबर करने गए थे। मल्होत्रा ने गलियों में खुशी से नाच रहे रिक्शा वालों और अन्य गरीबों से पूछा, भाई साहब आप कभी बैंक के अंदर गए हो? नहीं, हम नहीं गए हैं। मल्होत्रा का अगला सवाल था, ‘क्या आप आगे कभी बैंक के भीतर जाएंगे? उनका उत्तर मिला, ‘नहीं’। मल्होत्रा ने पड़ताल करनी चाही, ‘फिर आप खुशी से पागल क्यों हो रहे हैं? भीड़ चिल्लाई, ‘तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आता, आखिरकार अब जाकर ही सही गरीबों के लिए कुछ किया गया है और अमीरों को सबक सिखाया गया है।’ ठीक कुछ ऐसी ही दशकों बाद 8 नवंबर, 2016 की शाम काले धन को समाप्त करने के नाम पर की गई नोटबंदी के बाद आमजन की प्रतिक्रिया देखने को मिलती है। भले ही मोदी सरकार द्वारा लिया गया यह फैसला आर्थिक विशेषज्ञों की दृष्टि में अर्थव्यवस्था के लिए बेहद घातक और अपने लक्ष्य को पाने में पूरी तरह  असफल रहा हो, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि इस फैसले से गरीब-गुरबा के हिमायती बतौर जमकर निखरी। इस नोटबंदी के ठीक एक बरस बाद जब चौतरफा इसकी मार से आम से खास तक कराह रहा था और वर्तमान आर्थिक विश्लेषण इसे जल्दबाजी में लिया गया एक अदूरदर्शी कदम करार देने लगे थे। अंग्रेजी आर्थिक दैनिक ‘दि इकॉनोमिक टाइम्स’ द्वारा कराए एक सर्वेक्षण में 71 प्रतिशत ने माना कि प्रधानमंत्री का उद्देश्य काले धन का खात्मा करना था। 55 प्रतिशत ने सरकार की छवि इस कदम चलते चमकने की बात कही।

सिंडिकेट के करीबी उद्योगपतियों के साथ-साथ जनसंघ से सहानुभूति रखने वाले व्यापारी वर्ग के हितों पर इंदिरा गांधी के इस फैसले ने भारी चोट पहुंचा उन्हें सम्भलने का मौका ही नहीं दिया। राष्ट्रपति चुनाव के लिए कांग्रेस सांसदों को पार्टी अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में वोट डालने के लिए ‘व्हिप’ जारी करने से इंदिरा के इनकार ने सिंडिकेट को बौखला दिया। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष एस निजलिंगप्पा ने समर्थन के लिए जनसंघ व अन्य दक्षिणपंथी दलों से अपील कर इंदिरा गांधी की राह आसान करने का काम कर दिया। ‘अंतर आत्मा’ की आवाज पर हुए मतदान में कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी इंदिरा समर्पित प्रत्याशी के हाथों हार गए। सिंडिकेट संग इंदिरा की लड़ाई अब निर्णायक दौर पर पहुंचने लगी थी। पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी की हार के बाद सिंडिकेट नेताओं ने इंदिरा को कांग्रेस से निष्कासित करने का आदेश 12 नवंबर 1969 को सार्वजनिक कर दिया। देश के सबसे पुरानी राजनीतिक संगठन में इस तरह से दो फाड़ हो गया। इंदिरा समर्थक संगठन को कांग्रेस (आर) और सिंडिकेट वाले धड़े को कांग्रेस (ओ) के नाम से पुकारा जाने लगा।

पार्टी में हुए दो फाड़ चलते लोकसभा में इंदिरा सरकार अल्पमत में आ गई थी। कांग्रेस के पास दोनों सदनों को मिला कर 429 सदस्य थे जिनमें से 310 ने प्रधानमंत्री के साथ रहने का फैसला किया था। इन 310 सदस्यों में से 220 सदस्य लोकसभा और 100 सदस्य राज्यसभा से थे। इंदिरा सरकार वामपंथी दलों और निर्दलीय सदस्यों के सहारे संसद में अपना बहुमत साबित करने में सफल रही। कांग्रेस पार्टी में हुई टूट के साथ ही भारतीय राजनीति के व्यक्ति केंद्रित होने और सत्ता में बने रहने  के लिए, सत्ता हासिल करने के लिए नैतिक मूल्यों के परित्याग का नया दौर शुरू हुआ। नेहरू और उनके बाद प्रधानमंत्री बने शास्त्री ने राजनीति में गांधीवादी विचार को बनाए और जिलाए रखने का काम किया था। इंदिरा लेकिन ऐसी किसी भी वैचारिक प्रतिबद्धता से नहीं बंधी थीं। उनके भीतर एक जिद्दी और असुरक्षित बचपन जी रही बच्ची जिंदा थी जो किसी भी कीमत पर अपनी बात सही साबित करने की बेचैनी रखती थीं। नतीजा रहा उनका एक तानाशाह बतौर उभरना जिसकी भारी कीमत भारतीय लोक और लोकतंत्र को उठानी पड़ी। कांग्रेस विभाजन के बाद अंग्रेजी समाचार पत्र ‘संडे स्टेंर्डड’ में लिखे नयनतारा सहगल के आलेख से पुष्टि होती है कि इस विघटन ने भारत की राजनीति की दिशा और दशा को पूरी तरह बदलने की पटकथा लिख दी थी। नयनतारा ने लिखा- ‘During the months since the Working Committee last met as one body on August 25, the government has put on a performance worthy of the best gangster tradition in politics. With the throwing aside of its own party constitution…with the summoning of mass rallies… and with the full use of powers in its intraparty warfare, it has launched a new unprincipled era in Indian politics.. the ‘wonder leader’ has assumed  meancing proportion. Apparently it no longer requires answerability to a party…It denotes personal rule with all the dangers inherent therein.’ …what the Indian people have achieved in two decades of toil and aspiration may soon be blotted out in the interests neither of socialism nor revolution, but mearely of brazen power.’  (अविभाजित कांग्रेस कार्य समिति की 25 अगस्त को हुए बैठक के महीनों बाद पार्टी संविधान को तार-तार करते हुई सरकार ने राजनीति में गिरोहबंदी का ‘उत्कृष्ट’ उदाहरण पेश किया है…जन रैलियों का आयोजन… ़और पार्टी की आंतरिक कलह में सत्ता का दुरुपयोग कर भारतीय राजनीति में उसने एक नए सिद्धांतविहीन युग की शुरुआत कर दी है…‘चमत्कारी नेता’ ने खतरनाक स्तर पा लिया है। स्पष्ट तौर पर अब वे पार्टी के प्रति उत्तरदायी नहीं रह गई हैं…. ़भारतीयों के दो दशकों का कठिन श्रम और उनकी आकांक्षाओं को निर्लज्ज सत्ता की चाह खत्म करने का काम करेगी जो न तो समाजवाद और न ही किसी क्रांति के लिए, बल्कि ‘चमत्कारी नेता’ के निजी हितों को साधेगा।) इस तरह से भारत को स्वतंत्रता दिलाने वाली गांधीवादी कांग्रेस का और नेहरू के लोकतांत्रिक मूल्यों वाली कांग्रेस का अंत हो गया। अब कांग्रेस एक व्यक्ति विशेष के करिश्मे और उसकी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने वाला संगठन बन उभरने लगा। ‘गरीबों की मसीहा’ ने अब अपनी छवि निखारने की नीयत से राजा-नवाबों को मिलने वाले ‘प्रिवी पर्स’ को समाप्त कर डाला। प्रिवी पर्स आजादी उपरांत भारतीय गणराज्य में शामिल हुए राजाओं, नवाबों और जमींदारों को दिए जाने वाला राजभत्ता था जिसे संवैधानिक संरक्षण प्राप्त था। लगभग 565 राजे-रजवाड़ों को पांच हजार रुपयों से लेकर पचास लाख तक की धनराशि भारत सरकार द्वारा दी जाती थी। साथ ही ऐसे राजे-रजवाड़ों को अपने नाम के साथ महाराजा, राजा, नवाब इत्यादि संबोधन लगाए जाने की इजाजत दी गई थी। हैदराबाद के निजाम को सबसे अधिक 42 लाख रुपया प्रतिवर्ष राजकोष से दिया जाता था। मैसूर, त्रिवेंद्रम, बड़ौदा, जयपुर और पटियाला के राजपरिवारों को भी 10 लाख प्रति वर्ष की राशि बतौर राज भत्ता दी जाती थी। 1967 में ही इंदिरा गांधी ने कांग्रेस कार्य समिति के समक्ष इस व्यवस्था को समाप्त करने संबंधी सुझाव रखा था। अब एक कदम आगे बढ़कर उन्होंने मई 1970 में संसद में इस विषयक संविधान संशोधन विधेयक पेश कर दिया। इस विधेयक में प्रिवी पर्स समाप्त करने की बात कही गई थी। लोकसभा में तो यह विधेयक पारित हो गया लेकिन राज्यसभा में सरकार विफल हो गई। इंदिरा लेकिन हार मानने वालों में नहीं थीं। जन लोकप्रियता के शिखर में बैठी प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति के अध्यादेश जरिए सितम्बर, 1970 में प्रिवी पर्स समाप्त कर डाले। उनके इस कदम को आमजन ने हाथों-हाथ लिया और निजी बैंकों के राष्ट्रीयकरण बाद एक बार फिर से इंदिरा को गरीबों की रहनुमा कह पुकारा जाने लगा। इंदिरा सरकार के इस फैसले को लेकिन उच्चतम न्यायालय से तब भारी झटका लगा जब मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली कोर्ट की पूर्ण पीठ ने राष्ट्रपति के इस अध्यादेश को गैर संवैधानिक करार देते हुए 11 दिसंबर, 1970 को रद्द करने का आदेश सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इंदिरा को खासा नागवार गुजरा। इससे पहले भी बैंकों के राष्ट्रीयकरण के अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया था। इंदिरा सरकार ने कोर्ट के इस आदेश को खुली चुनौती देते हुए एक दूसरे अध्यादेश के जरिए अमलीजामा पहना दिया था और बाद में संसद से कानून भी पारित करा डाला था। प्रिवी पर्स को लेकर भी केंद्र सरकार का रुख कुछ ऐसा ही रहा। कैथरीन फ्रैंक के अनुसार इंदिरा अब यह मानने लगी थीं कि केवल वे ही देश का नेतृत्व कर सकती हैं- ‘साठ के दशक के पूर्वाध के इंदिरा गांधी पर उनके आलोचक निर्दयी और पाखंडी होने का आरोप लगाते थे। यह लेकिन असली खतरा नहीं था। असली संकट इंदिरा की मनःस्थिति थी जिसके मूल में उनका यह मानना था कि केवल वे ही देश का नेतृत्व कर सकती हैं…वे तेजी से अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन होती चली गईं। 1969 में पार्टी में हुए विभाजन से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति उनकी नासमझी सामने आती है। और चूंकि न तो वे लोकतांत्रिक मूल्यों को समझ पाईं और न ही उन्हें ऐसे मूल्यों पर विश्वास था, उनका यह मत मजबूत होता चला गया कि भारत उनके बगैर जीवित न तो रह सकता है और न ही रह पाएगा।’

क्रमशः

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