Editorial

राष्ट्रवाद से ऊपर है आदमियत

‘‘अब्बा मैंने सुना है पुलिस ने दो लोगों को उठा लिया है। क्या मुझे भी पुलिस पकड़ लेगी?’’ असम के खारुपेरिया शहर (दारोग जिला) की सत्रह वर्षीय बालिका ने अपने पिता अब्दुल कलाम से यह प्रश्न किया। अब्दुल के पास कोई उत्तर था नहीं जिससे वह बेटी को दिलासा दे सके। नतीजा बेटी ने आत्महत्या कर ली। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का फाइनल ड्राफ्ट 31 अगस्त को जारी किया गया है। 1951 में पहला एनआरसी तैयार हुआ था। 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इसको अपडेट करने का काम शुरू हुआ। कोर्ट इस कार्यवाही की सीधी मॉनिटरिंग कर रहा है। फाइनल ड्राफ्ट से 19,06,657 लोगों की नागरिकता खतरे में आ गई है। अब अगले 120 दिनों में इन सबको अपनी नागरिकता के प्रमाण इस मामले के लिए गठित ट्रिब्यूनल को देने होंगे। अभी यह साफ नहीं है जो भारतीय नागरिकता प्रमाणित नहीं कर पाएंगे उनके साथ क्या सलूक किया जाएगा। अब्दुल कलाम की बेटी ने देश निकाले के भय से अपनी जान दे डाली। तो समझिए इन 19 लाख से अधिक लोगों की क्या मनोदशा होगी इस वक्त। भाजपा ने 2019 के अपने घोषणा पत्र में इस एनआरसी को पूरे देश में लागू करवाने की बात कही है। हाल-फिलहाल केवल असम में ही बांग्लादेश से आ बसे लोगों के चलते इसे लागू किया गया है। इसमें कोई शक नहीं कि तमाम मानवीय सरोकारों से इतर विदेशियों के यहां आ बसने के चलते मूल नागरिकों की परेशानियां और असहजता बढ़ी है। सामाजिक तनाव 1980 के दशक में असम के छात्रों द्वारा शुरू किए गए शरणार्थी भगाओ आंदोलन का कारण बना था। छह बरस चला यह आंदोलन 1985 में केंद्र सरकार, असम सरकार और ऑल असम स्टूडेंट यूनियन के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते के साथ समाप्त हुआ। कॉलेज से सीधे निकल प्रफुल्ल कुमार महंत मुख्यमंत्री, भृगु फुक्कन गृह मंत्री और उनके कई साथी छात्र नेता मंत्री बन गए थे। असम गण परिषद बना इन छात्र नेताओं ने बरसों से असम की सत्ता में काबिज कांग्रेस को उखाड़ फेंका था। यह समझौता, लेकिन अवैध रूप से असम में आ रहे बांग्लादेशियों को रोक सका, न ही वहां बस चुके बांग्लादेशियों के बाबत कोई फैसला लिया जा सका। 2010 में एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर असम के दो जिलों बारपेटा और कामरूप में एनआरसी के जरिए अवैध नागरिकों की पहचान का काम शुरू किया गया था, लेकिन जबरर्दस्त हिंसा के चलते उसे बंद करना पड़ा। 2013 में सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद इस पर फिर से काम शुरू हुआ जिसका नतीजा सामने है। 19 लाख से अधिक पर अवैध नागरिक होने का खतरा मंडरा रहा है। एनआरसी का बड़े स्तर पर विरोध भी हुआ। बांग्लादेश से भारत आ बसे लोगों को अपनी नागरिकता छीनने के साथ-साथ वापस खदेड़ दिए जाने का भय है। हालांकि बांग्लादेश की सरकार ऐसे चिन्ह लोगों को वापस लेगी, इसे लेकर भी संशय है। बांग्लादेश कभी भी इस विषय पर स्पष्ट राय नहीं बना पाया है, न ही भारत संग अपने बॉर्डर पर ही अपने नागरिकों को भारत जाने से रोकने के उपाय वहां की सरकारों ने किए हैं। ऐसे शरणार्थियों के भारत आने के पीछे दो मुख्य कारण दशकों से रहे हैं। पहला बांग्लादेश का अत्यंत गरीब मुल्क होना तो दूसरा अल्पसंख्यकों का वहां उत्पीड़न। बड़ी तादाद में हिन्दू, सिख, बौद्ध धर्म के अनुयायियों, पारसी और जैनियों का भारत आ बसने के चलते इस समस्या का निदान और कठिन हो चला है। 2016 में केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन विधेयक लाकर एक प्रयास किया जो सफल नहीं हो सका। इस संशोधन के जरिए गैर मुस्लिम शरणार्थियों को केंद्र ने राहत पहुंचाने का प्रयास किया। उद्देश्य बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में उत्पीड़ित हिंदू धर्म के अनुयायियों को भारत की नागरिकता देने का था, लेकिन पूर्वात्तर के राज्यों में भारी विरोध के चलते उल्टे भाजपा संकट में आ गई। स्वयं भाजपा के इन राज्यों में सहयोगी दलों ने इस कानून का भारी विरोध करना शुरू कर दिया है। ऐसे सभी संगठन इस कानून के चलते एनआरसी के औचित्य पर ही प्रश्न उठाने लगे हैं। हालांकि एनआरसी के इस फाइनल ड्राफ्ट के बाद भी 19 लाख से अधिक ऐसे लोगों के पास 120 दिन का समय बचा है जिसमें वे अपनी नागरिकता की बाबत प्रमाण दे सकते हैं। प्रश्न लेकिन यह भी कि भारी तादाद में मौजूद ऐसे अवैध नागरिकों को वापस कैसे भेजा जाएगा? और क्या ऐसे अवैध नागरिकों को उनके देश में वापस लेने को वहां की सरकारें तैयार होंगी? प्रश्न मानवीय सरोकारों का भी है। हमारे सामने एक नहीं अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहां दूसरे मुल्कों में बेहतर भविष्य की आस में जा पहुंचे लोगों की जिंदगी बेहतर होने के बजाए बदतर हो गई। अमेरिका बाहरियों के वहां अवैध रूप से आ बसने का संकट झेल रहा है। बड़ी तादाद में अच्छे भविष्य की चाह लिए विश्वभर से लोग अमेरिका में गैरकानूनी तरीके से आ बसे हैं। एक अनुमान के मुताबिक दो करोड़ से ज्यादा लोग इस समय अवैध रूप से अमेरिका में रह रहे हैं। यह वहां की कुल जनसंख्या का लगभग 3 .5 प्रतिशत है। इनमें सबसे ज्यादा पड़ोसी देश मैक्सिको से भाग कर आने वाले हैं।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 के अपने इलेक्शन कैम्पेन में इन अवैध नागरिकों की वापसी और अमेरिका- मैक्सिको के बीच सीमा पर एक कंक्रीट की दीवार बनाए जाने का वादा किया था। उन्हें इस पर जबर्दस्त समर्थन खुद को मूल अमेरिकी मानने वालों का मिला था। दरअसल ऐसे अवैध रूप से वहां रह रहे लोग बड़ी तादाद में नौकरियों पर काबिज हैं। लगभग 75 लाख नौकरियां इन अवैध नागरिकों के पास हैं जिसके चलते वहां सामाजिक तनाव हिंसक तक हो चला है। पिछले कुछ अर्से से उन अमेरिकी शहरों में सबसे ज्यादा नस्ली हिंसा देखने को मिल रही है जहां ऐसे अवैध रूप से रह रहे शरणार्थियों की तादाद ज्यादा है। भारत में भी, विशेष रूप से पूर्वोत्तर के राज्यों में बांग्लादेश, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से आ बसे लोगों के चलते सामाजिक संरचना प्रभावित हुई है। चूंकि ज्यादातर ऐसे अवैध शरणार्थी मुस्लिम हैं इसलिए पूरे मामले में सांप्रदायिक रंग भी चढ़ चुका है। भाजपा ने इसे चुनावी मुद्दा बना जमकर भुनाया। काफी हद तक उसका यह आरोप जायज भी है कि सत्ता में रहते कांग्रेस ने अपना वोट बैंक बढ़ाने की नीयत से ऐसे शरणार्थियों की आमद पर रोक नहीं लगाई। भाजपा ने नॉर्थ ईस्ट को फतह करने के लिए इस भावनात्मक मुद्दे को खासा भुनाया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अब गृहमंत्री अमित शाह इन शरणार्थियों को ‘दीमक’ कह पुकारते हैं। साथ ही वे इन्हेंं इनके मुल्कों में वापस खदेड़ने की बात भी करते हैं। अब एक बड़ी समस्या ऐसे अवैध रूप से रह रहे लोगों की बाबत सामने आ खड़ी हुई है। सरकार कैसे इन्हें वापस इनके देशों में भेज पाएगी जब तक बांग्लादेश व अन्य देशों के साथ कोई स्थाई समाधान इस बाबत न निकाला जा सके? यह सही है कि एनआरसी प्रक्रिया के जरिए भारत ने अपने यहां अवैध तरीकों से आ बसे लोगों को चिÐत कर दिया है, लेकिन जिन्हें हम बांग्लादेशी या किसी अन्य पड़ोसी देश का बता रहे हैं, उन देशों की सरकार किस आधार पर हमारे दावे को मानेगी? इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि दशकों से भारत में रह रहे ऐसे सभी 19 लाख लोग अब भारत की नागरिकता के चलते मिलने वाली सुविधाओं से वंचित कर दिए जाएंगे और बहुत संभव है कि उन्हें किसी कैंप में तब तक बसा दिया जाएगा, जब तक इसका कोई समाधान नहीं निकलता। यदि केंद्र सरकार ऐसा कुछ करती है तो इतनी बड़ी तादाद को कैसे रोटी, कपड़ा और मकान उपलब्ध कराया जाएगा? और कब तक?
क्या होगा, कैसे होगा और कब होगा, सभी भविष्य के गर्भ में है। अभी के लिए इतना तय है कि अवैध रूप से रह रहे लाखों लोगों को अंधकारमय भविष्य की त्रासदी स्पष्ट नजर आ रही है और इस घटाटोप अंधेरे का सामना न कर पाने के चलते भविष्य में कई अब्दुल कलाम अपने बच्चों को आत्महत्या करते देखने को अभिशप्त होने तय हैं। मैं समझता हूं मानवीय संवेदनाओं की बरक्स इस पूरे मामले को देखा जाना चाहिए। राष्ट्रवाद हो या फिर कोई अन्य वाद, सबसे ऊपर मनुष्य बने रहने का प्रश्न है। यदि हम आदमी ही न हो सकें, संवेदनाओं से हमारा नाता ही नहीं रहा तो फिर राम राज्य की परिकल्पना को यथार्थ पर लाने की बात करना बेमानी है। इतना अवश्य हमें ध्यान में रखना होगा कि हमारी प्राचीन सभ्यता, परंपरा और संस्कøति हमेशा मानवीय सरोकारों को निजी स्वार्थ से उपर रहने की शिक्षा देती आई है। इस सच से इंकार नहीं कि पूर्वोत्तर राज्यों समेत देश के विभिन्न इलाकों में गैरकानूनी रूप से आ बसे बांग्लादेशियों व अन्य देशों के अवैध शरणार्थियों के चलते हमारी सामाजिक, आर्थिक संरचना पर भारी दबाव पड़ रहा है। लेकिन कोई भी निर्णय लेने से पहले हमें उनकी पीड़ा को भी महसूसना चाहिए, उनके इस देश को दिए जा रहे योगदान को भी परखना चाहिए। साथ ही याद रखना चाहिए कि जलावतनी एक ऐसा दर्द है जो कोई भी खुशी से नहीं करता।

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