Editorial

हाउ डू यू डू दिस आॅल सर!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अमेरिकी प्रांत टैक्सास के ह्यूस्टन शहर में आयोजित ‘हाउडी मोदी’ कार्यक्रम बेहद सफल रहा। ‘हाउडी’ यानी हाउ डू यू डू मोदी, मोदी आप कैसे हैं या फिर मोदी आप ऐसा कैसे कर लेते हैं। इस कार्यक्रम की सफलता से पूरा भारत और विदेशों में रह रहे अप्रवासी भारतीय और भारतवंशी, सभी मुग्ध हैं, चमत्कृत हैं। मैं खुले मन से स्वीकारना चाहता हूं कि मोदी जी का प्रशंसक न होते हुए भी, मैं स्वयं चमत्कृत हूं। सही में, यदि कभी प्रधानमंत्री जी से मिलने का मौका मिले तो पूछना चाहूंगा ‘हाउ डू यू डू मोदी जी’? हालांकि बजरिए भाजपा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और राज्यसभा सांसद अनिल बलूनी गत् वर्ष दीपावली के बाद पत्रकारों, संपादकों को भाजपा कार्यालय में दिए भोज के अवसर पर मोदी जी संग मुलाकात का मौका मिला था, लेकिन तब यह प्रश्न जेहन में नहीं था। अब यदि कभी मौका मिला तो अवश्य पूछने का प्रयास करूंगा कि आप ऐसा सब कैसे कर लेते हैं मोदी जी? ‘हाउडी मोदी’ के आलोचक चाहे कुछ भी कहें, लाख बार कहें, हमारे प्रधानमंत्री ने अमेरिकी राष्ट्रपति को इस कार्यक्रम में बुलाकर यह तो साबित कर ही दिया कि घोर नस्लवादी ट्रंप भी भारतीय मूल के अमेरिकी वोटरों को लुभाने के लिए मोदी की लोकप्रियता पर निर्भर हैं। ‘हाउडी मोदी’ से पहले भी, दशकों पहले, जब भारत की गिनती एक गरीब एशियाई मुल्क के तौर पर होती थी, इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान को दो टुकड़ों में बांट अमेरिका की स्पष्ट संदेश दे दिया था कि उनका दबाव इंदिरा का दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे बौना है। सोशल मीडिया के दौर वाला युवा भले ही इससे परिचित न हो लेकिन जो जानते हैं, वे मोदी युग में भी इंदिरा गांधी की इस कूटनीतिक सफलता और दबंगई को भूल नहीं सकते। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन इस हद तक इंदिरा गांधी से बांग्लादेश गठन के चलते क्रोधित थे कि उन्होंने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से कहा “This is just a point when she is such a bitch”. निक्सन किसी भी कीमत पर पाकिस्तान को बंटते देखने को राजी न थे। पाकिस्तान के तत्कालीन तानाशाह याहिया खान को अमेरिका अपना खास मित्र मानता था। बांग्लादेश गठन से ठीक पहले निक्सन ने इंदिरा गांधी को इस बाबत चेताया था कि कि वे कुछ ऐसा न करें जिससे पाकिस्तान का बंटवारा हो। इंदिरा गांधी ने ठीक इसके विपरीत कर दिखा दिया। इतना ही नहीं अमेरिकी तेवरों का जवाब भी इंदिरा गांधी ने विश्व का भ्रमण कर बांग्लादेश की स्वतंत्रता को विश्व समुदाय का समर्थन हासिल कर दिया। 24 अक्टूबर 1971 को इंदिरा गांधी ने अमेरिका की यात्रा से अपने मिशन की शुरुआत की। वे इसके बाद बेल्जियम, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन आदि भी गईं और ईस्ट पाकिस्तान के हालात से विश्व नेताओं को अवगत करा उनका समर्थन मांगा। इंदिरा गांधी ने अमेरिका के रुख को पहले ही भांपते हुए 9 अगस्त 1971 के दिन सोवियत संघ के साथ बीस साल के लिए एक सुरक्षा संधि कर डाली थी। अमेरिका इस संधि से बौखलाया हुआ था। सोवियत नेता लियोनार्ड बृजनेव ने स्पष्ट कह डाला था कि यदि अमेरिका अथवा चीन भारत पर आक्रमण करेगा तो सोवियत सेना उसका कड़ा प्रतिरोध करेगी। यह इंदिरा का ‘हाउडी’ था जिसके चलते न तो चीन, न ही वियतनाम में अपनी फौज तैनात कर चुका और अरब सागर में अपना सातवां समुद्री जंगी बेड़ा उतार चुका, अमेरिका कुछ कर पाया। मोदी निश्चित ही अंतरराष्ट्रीय मंच में भारत की साख और दबदबा बढ़ाने का काम कर रहे हैं। पाकिस्तान, जो अपनी आजादी के बाद से ही अमेरिका का भरोसेमंद साथी रहा है, मोदी-ट्रंप की दोस्ती के चलते आज यह कहने को विवश हो गया है कि चीन ही उसका असल मित्र है और अमेरिका का साथ देकर उसने गलती की है। मोदी की विदेश नीति का एक जबर्दस्त पहलू यह है कि अमेरिका संग बढ़ती निकटता के बावजूद भारत और रूस की दोस्ती में गर्माहट बनी हुई है। दरअसल इस समय अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में आर्थिक आदान-प्रदान एक महत्वपूर्ण कारक बन चुका है। भारत की क्रय शक्ति ने अमेरिका और रूस को चेता दिया है कि भारतीय बाजार में उनकी उपस्थिति कितनी जरूरी है। नरेंद्र मोदी सरकार की सफल कूटनीति का एक उदाहरण अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत का रूस से अति आधुनिक 45-400 तक जमीन से आकाश में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली खरीदने का फैसला है। भारत रूस से रक्षा सौदे करने वाला सबसे बड़ा देश है। इस समय दोनों देशों के बीच कई बिलियन डाॅलर के करार चल रहे हैं। अमेरिकी दबाव को नजरअंदाज कर किया गया नवीनतम सौदा मोदी और भारत की अंतरराष्ट्रीय पटल में बढ़ती साख और दबदबे को दर्शाता है।
अब बात ‘हाउडी मोदी’ की। प्रधानमंत्री मोदी इस समय वैश्विक स्तर पर सबसे बड़े यानी ग्रेटस्ट शो मैन हैं। ह्यूस्टन में आयोजित समारोह इसकी बानगी भर है। लगभग पचपन हजार भारतीयों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि मोदी अप्रवासी भारतीयों में तो लोकप्रिय हैं ही, वे इस लोकप्रियता को भुनाना भी भलीभांति जानते हैं। मोदी के पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह ने भारत की शर्तों पर अमेरिका संग परमाणु डील की थी, लेकिन उसका राजनीतिक लाभ उठाने से वे चूक गए। कारण वे अपनी उपलब्धियों को भुनाना नहीं जानते थे। मोदी इस कला में माहिर हैं। वे परशेप्शन पैदा करने की कला में भी पारंगत हैं। मोदीजी के सम्मान में हुए इस कार्यक्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति का उपस्थित रहना अपने आप में अनूठी घटना है। शायद ही पहले कभी कोई अमेरिकी राष्ट्रपति किसी अन्य देश के राजनेता के लिए हो रहे निजी सम्मान समारोह में उपस्थित रहा हो। ट्रंप का वहां आना, मोदी की प्रशंसा करना और एक ऐसे कार्यक्रम में जहां संवाद का माध्यम हिंदी हो, तीन घंटे बैठे रहना दरअसल, राष्ट्रपति की मजबूरी या राजनीतिक कूटनीति है। ट्रंप का कार्यकाल अगले वर्ष जनवरी में समाप्त हो रहा है। वे दोबारा चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में जब उनके पास अपने चार बरस के कार्यकाल की उपलब्धियां गिनाने के नाम पर कुछ खास न हो, ट्रंप बजरिए मोदी, एशियाई मूल के, विशेषकर भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों को डेमोक्रेट पार्टी यानी अपने पक्ष में करना चाहते हैं। भारतीय मूल के अमेरिकी परंपरागत तौर पर रिपब्लिकन पार्टी के पक्षधर रहते आए हैं। प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि ‘अगली बार ट्रंप सरकार’ मात्र एक तात्कालिक कहा गया जुमला नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। कोई शक नहीं कि मोदी ने ऐसा कहकर स्थापित विदेश नीति का उल्लंघन किया है। मोदी लेकिन अपनी बैटिंग अपने तरीके से करने के लिए जाने जाते हैं। उन्हें ट्रंप के रूप में एक मजबूत दोस्त मिला है जो अमेरिका में लगातार कश्मीरी मानवाधिकारों के स्वरों को नजरअंदाज कर मोदी की खुलकर प्रशंसा ही नहीं कर रहा, बल्कि अमेरिकी विदेश नीति को भी नजरअंदाज कर अपने विश्वस्त साथी पाकिस्तान से दूरी बढ़ा रहा है। बेचारे इमरान खान कश्मीर मुद्दे पर न तो इस्लामिक देशों का साथ जुटा पाए, न ही अपने अन्नदाता अमेरिका का। पाकिस्तान के पास अब एक ही सहारा चीन का बचा है। चीन अमेरिका के लिए बड़ा संकट है। विश्व की बड़ी आर्थिक शक्ति बन चुका चीन अब सीधे अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है। अमेरिका चीन के संबंध विशेषकर ट्रंप के शासनकाल में बेहद खराब हो चुके हैं। अमेरिका का बड़ा संकट चीन की बढ़ती आर्थिक ताकत के साथ-साथ उसकी साामरिक शक्ति भी है। ऐसे में भारत संग अमेरिकी प्रगाढ़ता उसकी मजबूरी भी है। दूसरा बड़ा कारण भारत का विशाल उपभोक्ता बाजार और उसकी क्रय शक्ति है। भारत इस समय हथियारों की खरीद करने वाला सबसे बड़ा देश है। अमेरिकी शस्त्र निर्माता कंपनियां और अमेरिकी वायु यान कंपनियों का भारत संग बड़ा कारोबार है। चूंकि अर्थ यानी धन इस समय विश्व की राजनीति को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा कारक है, इसलिए सत्तर बरस तक पाकिस्तान परस्त अमेरिकी विदेश नीति अब बदल रही है। भारत-अमेरिकी संबंधों में गर्माहट का एक अन्य कारण आतंकवाद भी है। एक दौर वह भी था जब भारत विश्व पटल पर पाकिस्तान की आतंकवाद परस्त नीतियों का रोना रोता था लेकिन अमेरिका का समर्थन हमेशा पाकिस्तान को होता था। 9/11 की घटना अमेरिका के लिए बड़ा सदमा साबित हुई। खुद के घर में आग लगी तो दूसरों का दर्द समझ आया। आज आतंकवाद के खिलाफ जंग में भारत के महत्व को अमेरिका समझ भी रहा है और स्वीकार भी रहा है। प्रधानमंत्री मोदी को इन बदली हुई परिस्थितियों का जबर्दस्त मौका मिला है। वे इस मौके पर छक्का लगाने से नहीं चूक रहे।
ट्रंप तीन घंटे तक यदि मोदी की प्रशंसा और उनके भाषण को सुनने बैठे रहे। पूरा माहौल हिंदीमय था। सोचिए, बगैर दम लिए चले इस कार्यक्रम में बेचारे ट्रंप क्या समझ पा रहे होंगे। लेकिन ट्रंप को यह स्पष्ट था कि मोदी के जरिए वे अपने देश के एक बड़े वोट बैंक को साध सकते हैं। मोदी को पता था कि अमेरिकी राष्ट्रपति की उपस्थिति उनके लिए अपने देश में क्या गुल खिला सकती है, यही हुआ भी। भारी आर्थिक मंदी, बेरोजगारी, कश्मीर में मानवाधिकारों का उल्लंघन आदि ज्वलंत मुद्दों से देश का ध्यान हटा पाने में वे सफल रहे हैं। अब हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार पर ‘हाउडी मोदी’ छाया रहेगा। तमाम जरूरी मुद्दे गौण हो जाएंगे। खट्टर की सरकार खटारा थी, इस तरह की चर्चा न होकर अमेरिकी राष्ट्रपति का मोदी समक्ष नतमस्तक होना भाजपा के प्रचार का हिस्सा होगा। हर जगह मोदी होंगे यानी ‘हर-हर मोदी, घर-घर मोदी’। महाराष्ट्र में फडनवीस सरकार की विफलताओं, किसानों की आत्महत्या, उनका बढ़ता रोष, सब बही-खाते में। भारत मुग्ध है, गौरवान्वित है कि अंततः वह विश्व शक्ति बन गया। भले ही घर में खाने को न हो, बच्चे बेरोजगार हों, इकोनांमी डूब रही हो, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चुनाव आयोग, सीबीआई, सीवीसी, आरबीआई की साख का संकट हो, सब पर भारी ‘हाउडी मोदी’। इसलिए दिली इच्छा है पीएम के यदि कभी दर्शन हों, जब वे विश्व भ्रमण में न होकर देश में हों तब उनसे पूछ सकूंः-
How do you do this sir!

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