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मे­­­घालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक मूलतः समाजवादी प्रवृत्ति के हैं। चौधरी चरण सिंह के शागिर्द रहे सत्यपाल मलिक ने वक्त की नजाकत को पहचानते हुए 2004 में भाजपा का दामन थाम लिया था। भगवा रंग में रंगने के बाद उन्होंने अपने राजनीतिक गुरु चौधरी चरण सिंह के वारिस अजीत सिंह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़ने में जरा भी संकोच नहीं किया। यह दीगर बात है कि उनकी जाट बिरादरी को यह बात जंची नहीं। नतीजा रहा 2004 के लोकसभा चुनाव में उनकी अजीत सिंह के हाथों करारी हार होना। मलिक इस हार से भले ही विचलित हुए हों, भाजपा संग वे बने रहे। उन्हें भाजपा में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गईं। भाजपा के वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए गए। पार्टी के किसान मोर्चा विभाग का प्रमुख भी उन्हें बनाया गया। नरेंद्र मोदी काल में अक्टूबर, 2017 में उन्हें बिहार के राजभवन की जिम्मेदारी दी गई। यहां तक कि उनकी राजनीतिक यात्रा को एक सामान्य यात्रा कहा जा सकता है। देश के सैकड़ों राजनेताओं सरीखी इस यात्रा में कुछ खास उल्लेखनीय नजर नहीं आता है। उन जैसे कई राजपुरुषों ने समय, काल और परिस्थिति अनुसार अपनी वैचारिकता के साथ समझौते किए हैं। मलिक कहते हैं कि वे समाजवादी विचारक डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रेरित हो राजनीति में आए। लोहिया ताउम्र ‘मजबूत हड्डी’ और ‘विचार समर्पित’ राजनीति की वकालत करते रहे थे। मलिक ने लेकिन अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा में ‘मजबूत हड्डी’ होने का कोई संकेत नहीं दिया। वे सुविधा अनुसार ‘आयाराम- गयाराम’ की राजनीति करते रहे। चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल ने उन्हें उत्तर प्रदेश विधानसभा तक पहुंचाया था। मलिक ने अगला पड़ाव कांग्रेस के सहारे पार किया। वे राज्यसभा सदस्य बने। फिर जनता दल के टिकट पर उन्होंने लोकसभा के दर्शन किए। 1996 में वे समाजवादी पार्टी का हिस्सा बन बैठे। कुछ अर्सा मुलायम सिंह की संगत में बिताने के बाद वे 2004 में भगवा की शरण में चले गए। हाल-फिलहाल तक भगवामय ही हैं। मलिक सुर्खियों में पहली बार तब आए जब धारा 370 को जम्मू-कश्मीर से हटाने और राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों में विभक्त करने  बाद बतौर राज्यपाल कश्मीर के राजभवन में बैठे मलिक को वहां से हटा गोवा भेज दिया गया। जम्मू-कश्मीर के पहले उप राज्यपाल पद पर तब केंद्र सरकार ने अपने एक बेहद विश्वस्त आईएएस अफसर गिरीश चन्द्र मुरमु की तैनाती की थी। शायद यूं जम्मू-कश्मीर राजभवन से हटाया जाना मलिक को खल गया। इससे पहले भी बिहार के राज्यपाल पद से उन्हें यकायक ही हटा अगस्त, 2018 में जम्मू-कश्मीर भेज दिया गया था। गोवा में जाकर मलिक बागी हो गए। प्रमोद सावंत के नेतृत्व वाली राज्य सरकार से उनकी तकरार होने लगी तो 2021 में एक बार फिर से उनका ‘तबादला’ केंद्र ने कर डाला। इस बार अपेक्षाकृत कम महत्व के राज्य मेघालय में उनकी तैनाती कर दी गई। सत्यपाल मलिक को यहां पहुंच ‘सच’ बोलने की तीव्र इच्छा जाग गई। वे संवैधानिक पद में पहुंच सही अर्थो में संविधान परक आचरण करने लगे हैं। किसान आंदोलन के पक्ष में उन्होंने खुलकर बोलना शुरू किया तो मीडिया की सुर्खियों में वे आने-छाने लगे। बागी तेवरों को कतई बर्दाश्त नहीं करने वाले वर्तमान भाजपा आलाकमान राजनीतिक मजबूरीवश सत्यपाल मलिक के खिलाफ कदम उठाने से परहेज करता रहा है। शायद एक मजबूरी पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट मतदाता रहा हो। 2017 के विधानसभा चुनाव में इस वोट बैंक के सहारे भाजपा ने चौधरी चरण सिंह के गढ़ को जीता था। चौधरी चरण सिंह के प्रति समर्पित रहे इस समाज को भी हिंदू-मुस्लिम के रंग गजब चढ़ा। ऐसा गजब कि चौधरी के वारिसान तक चुनाव हार गए। किसान आंदोलन ने लेकिन भाजपा की चूलें इस क्षेत्र में हिला डाली हैं। हिंदू-मुस्लिम में गहरा बंट चुका किसान इस आंदोलन के चलते फिर से एकजुट हो चला है। ऐसे माहौल में सत्यपाल मलिक के खिलाफ किसी भी प्रकार की कार्यवाही करना भाजपा के लिए घातक हो सकता है। इसी चलते गवर्नर साहब के लगातार बिगड़ रहे बोलों को अनसुना करने का काम भाजपा नेतृत्व करता आ रहा है। अब लेकिन ऐसा लगता है कि या तो स्वयं मलिक राज्यपाल पद त्याग देंगे या फिर उन्हें बर्खास्त कर दिया जाएगा। इस ‘लगने’ की वजह गत दिनों दिया गया उनका वह बयान है जो ना केवल मोदी के खिलाफ तीखा हमला है बल्कि मोदी-शाह के मध्य विभाजक रेखा के ‘होने’ की पुष्टि भी कर देता है। बकौल मलिक प्रधानमंत्री से जब उन्होंने किसान आंदोलन का हल निकालने की बात कही थी तो पीएम का व्यवहार बेहद घमंड से भरा था। मलिक के शब्दों में ‘मैं जब किसानों के मामले में प्रधानमंत्री से मिलने गया तो मेरी पांच मिनट में लड़ाई हो गई। वह बहुत घमंड में थे। जब मैंने उन्हें कहा हमारे 500 लोग मर गए…तो उसने कहा ‘मेरे लिए मरे हैं?’ मैंने कहा आपके लिए तो मरे थे, आप राजा बने हुए हैं तो उनकी वजह से। खैर झगड़ा हो गया मेरा। उन्होंने कहा तुम अमित शाह से मिलो। मैं अमित शाह से मिला। उसने कहा सत्यपाल इसकी (प्रधानमंत्री की) अक्ल मार रखी है लोगों ने।’
यह स्टेटमेंट खासा गंभीर है। मलिक के पहले के बयानों की बनिस्पत यह भाजपा और भाजपा भीतर मोदी- शाह की सर्वशक्तिमान जोड़ी की धारणा को खण्डित करने वाला विस्फोटक बयान है। हालांकि विपक्षी दलों और गैर गोदी मीडिया द्वारा इसे प्रमुखता से लिए जाने बाद मलिक ने इस बाबत अपना स्पष्टीकरण जारी किया है लेकिन जो नुकसान होना था सो हो चुका। उनके इस बयान को इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ महत्वपूर्ण किरदारों संग जोड़ कर देखा जाए तो एक बात साफ नजर आती है। सत्ता के शीर्ष में ऐसा अनादिकाल से होता आया है। बादशाहों, महाराजाओं के सबसे करीब समझे जाने वाले वजीरों ने समय आने पर तख्ता पलट डाला था और खुद बादशाह- महाराजा बन बैठे थे। कन्नौज साम्राज्य के राजा जयचन्द्र ने अपने दामाद राजा पृथ्वीराज चौहान के साम्राज्य को हड़पने की नीयत से विदेशी आक्रमणकारी मोहम्मद गौरी का साथ दिया था। इस युद्ध में महाप्रतापी पृथ्वीराज चौहान की हार हुई और वे वीरगति को प्राप्त हुए। हालिया इतिहास में मीर जाफर का नाम ऐसों में शामिल है जिन्होंने सत्ता पाने के लालच में अपनों से द्रोह किया। पलासी के युद्ध में अपने नवाब सिराजउदौला को धोखा देकर मीर जाफर को बंगाल का नवाब बना पुरस्कृत किया। ऐसे किस्से केवल हमारे इतिहास में ही नहीं है। पूरे विश्व का इतिहास इनसे भरा पड़ा है। प्रसिद्ध नाटककार शेक्सपीयर के नाटक ‘हेमलेट’ का एक वाक्य ऐसे किस्सों को परिभाषित करने के खासा प्रयोग में लाया जाता है-‘यू टू ब्रूटस्!’
बहरहाल, मलिक का बयान लोकतंत्र के दौर में ऐसे ही तख्ता पलट की संभावना को जन्म देता है। लुटियन्स् दिल्ली पिछले कुछ समय से कहती-सुनती आ रही है कि सत्ता के शिखर पुरुषों का रिश्ता अब पहले समान नहीं है। ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ की मशहूर स्तंभकार कुमी कपूर ने कुछ अर्सा पहले ही इस तरफ इशारा करते हुए अपने कॉलम में लिखा कि भाजपा में नंबर दो कौन? बकौल कुमी ‘हू इज नंबर टू?’ (नंबर दो कौन?) वे लिखती हैं ‘2019 के आम चुनाव में भाजपा की शानदार विजय के बाद नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी अजेय बन उभरी थी। शाह ने एक शक्तिशाली गृह मंत्री बतौर संसद में धारा 370 को हटाने का प्रस्ताव रखा था। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोड़ने बाद भी पार्टी में उनका ही सिक्का चलता था। वे बगैर शंका नंबर दो की हैसियत पर थे। लेकिन 2021 आते-आते उनकी हैसियत पहले समान नहीं रही! मलिक का ताजा बयान एक स्थापित राजनीतिक पत्रकार की आशंका को तो कंफर्म करता ही है, भाजपा भीतर सब कुछ ठीक नहीं है वाले तमाम किस्सों की भी पुष्टि करता है जो इन दिनों लुटियन्स् दिल्ली में हॉट टापिक बने हुए हैं। इतिहास गवाह है, इतिहास हमें सिखाता भी है कि सत्ता क्रूर होती है। इसमें संवेदनाओं, मित्रता और वफादारी जैसे तत्व नहीं पाये जाते हैं। तो क्या भाजपा के शीर्ष में भी कुछ ऐसा चल रहा है जो इतिहास के दोहराए जाने की गवाह बनेगा? शायद हां, शायद नहीं। जो कुछ भी हो सत्यपाल मलिक पर यह बयान निश्चित ही भारी पड़ने वाला है।

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