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Editorial

संपादकीय │ बजट माने मुंगेरीलाल के हसीन सपने

संपादकीय │ बजट माने मुंगेरीलाल के हसीन सपने
किसी भी देश का वार्षिक बजट वर्तमान से कहीं अधिक उसके भविष्य को समझने वाला होता है, बशर्ते बजट को ठीक तरीके से पढ़ा और समझा जाए। यह ठीक वैसा ही गणित है जैसा हमारे-आपके घर का बजट है। कुल आमदानी को आधार बना कुल खर्च तय करना और खर्च में किफायत करते हुए कुछ धन संचय करने का लक्ष्य रखना। घर का बजट बनाते समय, भविष्य की योजनाओं को बनाते समय, हम हमेशा तय आमदानी से इत्तर उस आमदानी को भी जोड़ते हैं जिसके साथ अनिश्चतता का फैक्टर जुड़ा रहता है। उदाहरण के लिए वेतन में संभावित वृद्धि, बोनस, शेयरों के जरिए आमदानी इत्यादि। अब यदि एक भी फैक्टर गड़बड़ाया तो बजट का बंटाधार होना तय है। हमारे मुल्क के बजट का भी यही हाल है। आज नहीं पिछले कई दशकों से। सरकारें जिस विकास दर को आधार बना अपना गणित बैठाती हैं, अमूमन वह विकास दर हासिल नहीं होती। नागरिकों पर कर के जरिए राजस्व का जो लक्ष्य रखा जाता है, वह लक्ष्य यदि पूरा नहीं होता तो गणित गड़बड़ाना तय है। विकास दर, सकल घरेलू उत्पाद, निर्यात-आयात, टैक्स के जरिए राजस्व आदि सभी एक-दूसरे से जुड़े हैं। ऐसे में आर्थिक मंदी के दौर में बजट लक्ष्यों का पूरा नहीं हो पाना तय है। तो चलिए समझने का प्रयास करें मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला बजट कैसा है। मोदी सरकार के पिछले पांच सालों यानी 2014 से 2019 तक सरकारी खजाने में विभिन्न प्रकार के टैक्सों के जरिए जमकर वृद्धि हुई।

2014 में सरकार को कुल टैक्स 10.4 लाख करोड़ मिला था तो 2019 में 73 प्रतिशत बढ़कर 16.1 लाख करोड़ जा पहुंचा। यहां आगे बढ़ने से पहले यह समझना जरूरी है कि सरकार के पास टैक्स यानी कर ही एकमात्र कमाई का साधन होता है। सरकारी कंपनियां जरूर अपनी कमाई का एक हिस्सा सरकार को डिविडेंट के रूप में अलग से देती हैं। दूसरी तरफ सरकार के पास वेतन जैसे तय खर्चे होते हैं, साथ ही इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ, शिक्षा आदि बुनियादी विकास की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी भी। 2014 में कुल सरकारी खर्च 15.5 लाख करोड़ का था जो 2019 में 24.4 लाख करोड़ जा पहुंचा। कमाई थी 18.1 लाख करोड़। यानी 6.30 हजार करोड़ रुपयों का भारी अंतर। सरकार ने इस तरह अपनी कमाई से 35 प्रतिशत ज्यादा खर्च किया। जाहिर है यह रकम उधारी से जुटाई गई। इसे ही फिस्कल डिफेसिट यानी बजटीय घाटा कहा जाता है। दशकों से हमारा केंद्रीय बजट घाटे का रहा है। घाटे की पूर्ति करने के लिए सरकार लक्ष्य बनाती है जो अमूमन प्राप्त नहीं होता।

2019 में सरकार का टारगेट 20 लाख करोड़ की कमाई का था जो वह पा नहीं सकी। वर्तमान वित्त वर्ष 2019-20 में भी यह लक्ष्य पूरा होता नजर नहीं आ रहा। नवंबर 2019 में जारी आंकड़ों के अनुसार सरकार 18.2 लाख करोड़ खर्च कर चुकी है, जबकि राजस्व कुल 10 लाख करोड़ ही मिल पाया है। इसका सीधा अर्थ यह कि बजट घाटा बढ़ने वाला है। बजट की गणित को समझने के लिए जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद और महंगई दर  को समझना जरूरी है। सरल शब्दों में जीडीपी में से महंगाई दर को घटाने पर असल विकास दर का पता चलता है। वर्तमान में हमारी जीडीपी में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है। केंद्र सरकार के संस्थान सीएसओ का अनुमान है कि जीडीपी साढ़े सात फीसद रहेगी। इसमें से महंगाई दर घटा दी जाए तो असल विकास दर की रफ्तार चार प्रतिशत तक आ गिरेगी। ऐसे में सबसे स्वाभाविक प्रश्न चिन्ह सरकार के देश की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डालर करने की बात पर लग रहा है। एक तरफ हार्डकोर सच है, भयावह सच कि हमारी आर्थिकी लगातार लुढ़क रही है।

बेरोजगारी का बढ़ना, उद्योग धंधों का बंद होना इसी का प्रत्यक्ष प्रमाण है। ऐसे में यदि वर्तमान बजट को आंके तो स्थिति की भयावहता और सरकार के दावों का सच सामने आ जाता है। वित्त मंत्री के तौर पर निर्मला सीतारमण का यह दूसरा बजट भी पहले बजट की भांति भारी निराशाजनक है। मोदी सरकार देश को आर्थिक मंदी के जंजाल से उबारने के लिए इस बजट में कुछ भी ऐसा ठोस प्लान रख पाने में विफल रही है जिससे भविष्य के प्रति उत्साह पैदा हो। इस बजट में सरकार के पास विकास योजनाओं के लिए धन का न होना साफ नजर आता है। चूंकि पिछले बजट का ज्यादा राजस्व प्राप्ति का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका है और सरकार के खर्च में बढ़ोतरी है इसलिए बजटीय घाटा बढ़ा है। इसका सीधा असर आने वाले समय में पहले से चल रही जन कल्याणकारी योजनाओं पर पड़ेगा।

उदाहरण के लिए मनरेगा सामने है। 2019-20 में इस योजना के लिए आवंटित बजट को 2020- 21 में साढ़े नौ हजार करोड़ रुपया कम कर दिया गया है। हालांकि बेरोजगारी की विकराल समस्या से निपटने के लिए इस बजट में ‘स्किल डेवलपमेंट’ योजना लाई गई है और इसके लिए तीन हजार करोड़ का बजट तय किया गया है। इससे रोजगार के नए अवसर अवश्य खुलेंगे लेकिन बहुत सीमित मात्रा में। रक्षा बजट तक के लिए सरकार समुचित व्यवस्था कर पाने में विफल स्पष्ट नजर आ रही है जिसका सीधा असर हमारी सामरिक क्षमता में पड़ना तय है। दावे चाहे प्रधानमंत्री लाख करें, देश की आर्थिकी का सच 2020-21 के लिए सरकार की विकास दर का लक्ष्य स्पष्ट कर रहा है। सरकार ने पांच प्रतिशत वृद्धि दर का लक्ष्य रखा है जो पिछले दस बरसों में सबसे कम है।

वित्त मंत्री ने अपने पिछले बजट भाषण में ताल ठोककर 2022 तक ग्रामीण भारत में रसोई गैस, बिजली, सड़क आदि बुनियादी जरूरतों का लक्ष्य पाने की बात कही थी। कैग की ऑडिट रिपोर्ट ने उनके दावे की हवा निकाल दी है। मार्च 2018 के सरकारी आंकड़े प्रति परिवार 3.66 सिलेंडर गैस की खपत बताते हैं जो सितंबर 2019 में घटकर 3 .07 सिलेंडर रह गया है। जाहिर है प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी ‘उज्जवला योजना’ में भारी खामी है। बिजली की आपूर्ति अभी भी ग्रामीण इलाकों में सपना भर है। हालात की विकटता को बिजली कंपनियों की माली हालत से समझा जा सकता है जो गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही हैं। कैग की रिपोर्ट कहती है कि इस समय पावर सेक्टर की कपंनियों पर 80 हजार करोड़ का कर्जा है जिसे चुका पाने में ये कंपनियां नाकाम नजर आ रही हैं। हालात यदि ऐसे ही बने रहे तो इन कंपनियों के चलते बैंकिंग सिस्टम को बड़ा झटका लगना तय है।

पीएम की एक अन्य योजना ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’ भी आर्थिक मंदी के चलते घिसट रही है। इस योजना का लक्ष्य 2022 तक सबके लिए घर उपलब्ध कराना है। इस लक्ष्य को पाने के लिए 2021-22 तक सरकार को लगभग दो करोड़ घर बनाने होंगे। अभी तक इसमें से मात्र 12 लाख के करीब घर बन पाएं हैं। निजी रियल स्टेट की कंपनियों का हाल तो सबसे ज्यादा खराब है। जेपी समूह, आम्रपाली, यूनीटेक जैसी सैकड़ों कंपनियां पूरी तरह बंद हो चुकी हैं और घर खरीददारों और बैंकों का खरबों रुपया डूब चुका है। इस बजट में इस संकट से उबरने की कोई बात नहीं नजर आ रही है। एक सौ पच्चीस करोड़ की आबादी वाले मुल्क के लिए प्रधानमंत्री ने रोजगार की उपलब्धता कराने का वायदा तो किया, लेकिन उसे पूरा करने में वे असमर्थ रहे हैं। उन्होंने स्वरोजगार का जुमला उछाला और ‘मुद्रा योजना’, ‘स्टैंडअप इंडिया’, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ जैसी योजनाएं शुरू की। इन योजनाओं के लिए लेकिन उनकी वित्त मंत्री समुचित बजट उपलब्ध कराने में विफल रही हैं। इन तीनों योजनाओं के लिए बमुश्किल से 515 करोड़ आवंटित कर पाई हैं।

जाहिर है कमाई से भारी कमी के चलते सरकार का खजाना खाली है और सरकार के हाथ बंधे हैं। ऐसे में बुरी तरह फंस चुकी वित्त मंत्री के पास सरकारी कंपनियों को बेचने या फिर उनका विनिवेश कर धन जुटाने का ही विकल्प बचा है। भारतीय जीवन बीमा निगम तक में अपनी हिस्सेदारी बेचने को सरकार हरी झंडी दिखा चुकी है। जाहिर है सरकार के पास आय के साधन सीमित होते जा रहे हैं। बजटीय घाटा बढ़ रहा है और आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। ऐसे में प्रतिष्ठित सरकारी कंपनियों को बेचने के सिवा वित्त मंत्री को कोई मार्ग मिल नहीं रहा है। जीवन बीमा निगम में अपनी हिस्सेदारी बेचने का निर्णय सरकार की हताशा को और उसकी मंशा को साफ कर देता है। बजट भाषण 2 घंटे, 41 मिनट का था। इस दौरान वित्तमंत्री ने कश्मीरी कवि दीनानाथ कौल से लेकर तमिल कवि तिरुवल्लुवर और कालीदास तक को सुना डाला, लेकिन जो जनता जनार्दन सुनना चाहती थी कि क्या रोजगार बढ़ेंगे, महंगाई थमेगी और उद्योग-धंधों में छाई सुस्ती छंटेगी, वित्त मंत्री कुछ न कह सकीं।

अर्थशास्त्री सुनना चाहते थे कि सरकार लगातार गिरावट दर्ज कर रही अर्थव्यवस्था को थामने के लिए क्या कदम उठाने जा रही है? उनके हाथ भी कुछ आया नहीं। केवल यह ‘अद्भुत’ जानकारी वित्त मंत्री ने दी कि सिंधु झाटी की सभ्यता को समझ अर्थव्यवस्था मजबूत की जा सकती है। वित्त मंत्री ने 2020-21 के लिए 24.1 लाख करोड़ का राजस्व लक्ष्य रहा है जिसको कैसे पाया जाएगा, कम से कम मुझ जैसे आम भारतीय को समझ नहीं आ रहा है। सरकार यदि अपनी कंपनियों की हिस्सेदारी बेच पाई तो भी मात्र 1.4 लाख करोड़ अतिरिक्त जुटा पाएगी। 2019-20 का राजस्व लक्ष्य था 20 लाख करोड़ जिसमें से मात्र 10 लाख करोड़ ही नवंबर 2019 तक सरकारी खजाने में आया था। मार्च 2020 तक बचे 10 लाख करोड़ पाना असंभव है। ऐसे में 2020-21 का लक्ष्य भी मुंगेरी लाल का हसीन सपना लगता है। कुल मिलाकर जो मैं समझा उसका लब्बो- लुआब यह कि पांच ट्रिलियन इकॉनामी मात्र जुमलेबाजी है। सरकार आर्थिक स्थिति को सुधार पाने में पूरी तरह असफल तो रही ही है, भविष्य के लिए भी उसके पास कोई ठोस उपाय हैं नहीं। तो तैयार रहिए नए सपनों की बौछार के लिए। पांच ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी का सपना और कुछ नहीं तो मन की तसल्ली का कारण बन आमजन के अवसाद को कुछ कम तो कर सकता है।

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