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Editorial

सबको सन्मति दे भगवान

वर्ष 2021 अंततः विदा होने की कगार पर है और हम इसे विदा होते देखने के लिए जीवित हैं। इसे इस जा रहे वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि कहा-माना जा सकता है। 2020 में आई कोविड-19 महामारी का विकराल रूप 2021 में देखने को मिला। अब तक आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 4.8 लाख मौतें इस महामारी के चलते हुई हैं। मात्र एक करोड़ बीस लाख के करीब की जनसंख्या वाले उत्तराखण्ड में 7,416 मौतें सरकारी रिकार्ड में दर्ज हैं। चैबीस करोड़ के करीब आबादी वाले उत्तर प्रदेश में 22,915 मौतें इस महामारी के नाम दर्ज हैं। सबसे अधिक मृत्यु 12.47 करोड़ आबादी वाले महाराष्ट्र के नाम हैं जहां 1.41 लाख इस महामारी के चलते समय पूर्व ही दुनिया से विदा हो गए। यह सभी सरकारी आंकड़े हैं। इन आंकड़ों पर भरोसा करना संभव नहीं। गंगा समेत देश की नदियों में बहाए गए, रेत में दफन किए गए शव इन आंकड़ों का हिस्सा नहीं हैं। इसलिए जा रहे वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि मैं स्वयं के जिंदा रहने को मानता हूं। सकारात्मक इस वर्ष क्या हुआ यह लिख पाना खासा कठिन है। सरकारें जिसे ‘पाॅजिटिव’ कहती हैं, उस पर भरोसा करें तो कह सकते हैं कि वर्ष की शुरुआत में, 2 जनवरी, 2021 को भारत सरकार द्वारा दो कोविड वैक्सीन की मंजूरी दिया जाना, इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि है। हालांकि मेरी दृष्टि में सुप्रीम कोर्ट का एक निर्णय 2021 की शुरूआत में मिला बड़ा तोहफा, बड़ी उपलब्धि है। 12 जनवरी, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार द्वारा संसद में पारित कराए गए तीन कृषि कानूनों पर रोक लगा दी थी। लड़खड़ाते लोकतंत्र के लिए निश्चित ही सबसे बड़ी न्यायपीठ का यह आदेश खासा सुकुन भरा था। 16 जनवरी से भारत में शुरू हुआ कोविड वैक्सिनेशन अभियान भी एक बड़ी उलपब्धि इस वर्ष की रही। 16 जनवरी के दिन ही एक और घटना घटी जिसने एक ‘कथित’ बड़े पत्रकार का सच सामने ला दिया। मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तंभ मानने वालों के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि समान है। मैं हमेशा से कहता-मानता आया हूं कि आपाधापी के इस दौर में ‘हम शार्ट टर्म मैमोरी लाॅस’ के शिकार हो चले हैं। जल्दी भूल जाने की यह आदत एक घातक बीमारी में तब्दील हो चली है। इस 16 जनवरी, 2021 को ‘राष्ट्रवादी’ पत्रकार अर्नब गोस्वामी की एक वर्टसअप चैट मीडिया में लीक हुई थी। इस चैट में अर्नब गोस्वामी ‘ब्राॅडकास्ट आडियंस रिसर्च काउंसिल’ (बार्क) के मुखिया पार्थो दास गुप्ता संग अपने चैनल
‘रिपब्लिक टीवी’ की ‘टीआरपी’ बढ़ाने का ‘खेला’ रच रहे हैं। यह इतना महत्वपूर्ण नहीं। महत्वपूर्ण है इस चैट से निकला एक ऐसा सच जिस पर यकीन करें तो फिर यही कहने को बचता है कि ‘ईश्वर हमारी, हमारे लोकतंत्र की लाज अब तुम ही बचा सकते हो।’ मैं यकीं के साथ कह सकता हूं कि आप इस चैट को भुला चुके होंगे। ताकि सनद् रहे इसलिए इसे याद दिलाने का दुस्साहस मैं कर रहा हूं, अपने जनप्रतिनिधियों का चुनाव करते समय इसे याद रखने का साहस आप करना। इस चैट से पता चलता है कि ‘महान’, ‘राष्ट्रवादी’ पत्रकार अर्नब गोस्वामी साहब को न जाने कैसे पता था, न जाने कैसे, पर पता था कि 25 फरवरी, 2019 के दिन भारतीय वायुसेना पाकिस्तान के बालाकोट में सर्जिकल एयर स्ट्राइक करने जा रही है। इतना ही नहीं, पता नहीं कैसे अर्नब को पता था, न जाने कैसे, पर पता था कि 14 फरवरी, 2019 के दिन कुछ बड़ा होने जा रहा है। यह बड़ा था पुलवामा में आतंकी हमला जिसमें 40 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। 14 फरवरी, 2021 के दिन ही दिल्ली पुलिस द्वारा राष्ट्रद्रोह के आरोप में एक 22 बरस की ‘आंदोलनजीवी’ छात्रा दिशा रवि को गिरफ्तार किया जाना इस जाते वर्ष की एक ऐसी घटना है जिसके खिलाफ जनता का आक्रोश लोकतंत्र को जिंदा रखने वाली ताकतों के लिए खासा राहत भरा रहा। यह आक्रोश ही था जिसके चलते 23 फरवरी को इस छात्रा की रिहाई कोर्ट के आदेश पर हो सकी। 24 फरवरी, 2021 भी मुझे याद रहेगा क्योंकि इसी दिन विश्व के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम का उद्घाटन अहमदाबाद में प्रधानमंत्री ने किया। क्रिकेट में, मेरी कोई रूचि नहीं है। मुझे यह दिन याद अन्यत्र कारण से रहता है। इस स्टेडियम का नाम नरेंद्र मोदी जी के नाम पर रखा गया है। विश्व भर के तानाशाहों ने अपने शासनकाल में अपने नाम पर स्टेडियम बनाए। मोदी जी के नाम पर इस क्रिकेट स्टेडियम का नामकरण मुझे भयभीत करता है। भयभीत इसलिए कि इसी सरकार के राज में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश प्रेसवार्ता कर ‘लोकतंत्र खतरे में है’ कह डालते हैं। कहीं भविष्य के लिए यह नामकरण कोई संकेत तो नहीं? इस वर्ष पहली अप्रैल को गुजरात विधानसभा धर्म की स्वतंत्रता के संविधान प्रदत्त अधिकार पर कटौती करने वाला संशोधन पास करती है। इस संशोधन चलते शादी के बाद धर्म परिवर्तन करने की स्वतंत्रता समाप्त होने का खतरा है। 2020 में भाजपा शासित मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश कुछ इसी प्रकार के कानून बना चुकी है। मार्च, अप्रैल, मई 2021, देश भर में कोविड से हो रही मौतों, आॅक्सीजन की भारी किल्लत के चलते जीवन पर्यंत याद रहेंगे। भूलियेगा मत 10 मई 2021 के दिन ही लगभग डेढ़ सौ शव गंगा नदी में बहते पाए गए थे। चैसा, जिला बक्सर, बिहार में देखे गए इन शवों की बाबत आशंका जताई गई थी कि ये शव उत्तर प्रदेश से बहकर बिहार पहुंचे थे। ‘सोच दमदार, काम ईमानदार’ नारे का एक रूप यह भी है जिसे याद रखा जाना जरूरी है।

कोविड के चरमकाल में पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार के मध्य चला टकराव, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा द्वारा तमाम जनसरोकारों की ऐसी-तैसी कर जनसभाएं करना भी लड़खड़ाते लोकतंत्र की जनता को अवश्य स्मरण रखना चाहिए ताकि अपने रहनुमाओं की सूरत और सीरत को पहचानने में भूल न हो। 13 जून, 2021 को ही एक बड़ा सच भगवान राम के नाम पर राजनीति करने वालों को बेनकाब करता उजागर हुआ। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने इसी दिन राम मंदिर के लिए अयोध्या में ‘श्री राम जन्म भूमि तीरथ क्षेत्र ट्रस्ट’ द्वारा खरीदी जा रही जमीन की खरीद-फरोख्त में भारी भ्रष्टाचार को सामने रखा। इस भ्रष्टाचार की गूंज अभी तक थमी नहीं है। नित नए ‘चमत्कार’ सामने आ रहे हैं। मई 2020 से ही जेल में बंद ‘पिंजड़ा तोड़’ संस्था के कार्यकर्ताओं, नताशा नरवाल, इकबाल तन्हा और देवांगना कलिता की 17 जून को रिहाई का आदेश इस वर्ष की एक बड़ी उपलब्धि मेरी नजर में है। इस अदालती आदेश से हर उस शख्स को राहत पहुंची जिसकी आस्था अभी तक लोकतंत्र और लोकतंत्र की रक्षा करने वाली न्यायपालिका पर बची, बनी हुई है। 5 जुलाई 2021 का दिन लेकिन लोकतंत्र के नाम पर कालिख पौछने का दिन रहा। 2018 के भीमा कोरेगांव मामले में जेल में बंद आदिवासी अधिकारों की बुलंद आवाज फादर स्टेन स्वामी ने जेल में दम तोड़ दिया। उन्हें सही इलाज के लिए जमानत तक न मिल सकी। इससे बड़ी शर्म एक लोकतांत्रिक देश के लिए भला क्या हो सकती है? 18 जुलाई, 2021 को ‘पैगासेस स्पाई वेयर’ का सामना देश ने किया। ‘द वायर’ के जरिए आई इस खबर ने ‘लोकतंत्र खतरे में है’ की आशंका को गहराने का काम कर डाला। अभी इसके सच से पूरा पर्दा उठना बाकी है। 20 जुलाई, 2021 का दिन तो गजब का था। इस दिन राज्यसभा में केंद्रीय स्वास्थ्य राज्यमंत्री भारती पवार ने मानो झूठ का बम फोड़ दिया हो। बकौल मंत्री कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान देश भर में आक्सीजन की कमी से कोई मौत नहीं हुई। इस पर और ज्यादा क्या लिखूं? जिसे लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंदिर कह पुकारा जाता है, वहां इस प्रकार का कथन, वर्तमान सरकार की किस मानसिकता को दर्शाता है, जरा सोचिएगा जरूर। 24 जुलाई का दिन शुभ रहा, राहत भरी खबर लेकर आने के नाम रहा। हमारी अपनी मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक में देश को सिल्वर मैडल दिला तिरंगे की शान में इजाफा किया। अगस्त का पहला पखवाड़ा ओलंपिक में हमारे अच्छे प्रदर्शन के चलते लंबे अर्से तक याद किया जाएगा। दौड़, बाॅक्सिंग, हाॅकी, कुश्ती, जैवलीन थ्रो इत्यादि में हमारा शानदार प्रदर्शन रहा। माह के अंत में पैरा ओलंपिक में भी हमारे खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन करने का काम कर हमें ऊर्जा, राहत और उत्साह दिया। सितंबर में एक चैकाने वाली, फिर मीडिया की सुर्खियों में गायब होने वाली खबर आई। प्रवर्तन निदेशालय ने कई हजार करोड़ का मादक पदार्थ ‘हेरोइन’ की भारी खेप को अडानी समूह द्वारा संचालित गुजरात स्थित मुद्रा बंदरगाह से पकड़ा। आगे क्या हुआ इसकी कोई खास जानकारी नहीं। केवल इतना भर शर्तिया पता है कि दर-दर, घर-घर, तुरंत पहुंचने वाली ईडी और सीबीआई इस मामले में अडानी के घर पहुंचती नहीं देखी गई। हां इससे ‘शायद’ ताल्लुक रखती एक घटना 2 अक्टूबर, गांधी जयंती के दिन जरूर घटी।

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने इस दिन बाॅलीवुड सितारे शाहरूख खान के बेटे आर्यन खान समेत आठ लोगों को मादक पदार्थ रखने के आरोप में गिरफ्तार कर अडानी समूह के बंदरगाह से बरामद हजारों करोड़ की ‘हेरोइन’ का मुद्दा कहीं गहरे दफन कर डाला। 3 अक्टूबर को लखीमपुर -खीरी में आठ लोग मारे गए जिनमें से चार किसान आंदोलन से जुड़े थे। इन चार किसानों की निर्मम हत्या का आरोप केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्रा के बेटे पर लगा। बेटा हाल-फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के चलते जेल में है। मिश्रा जी मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा बने हुए हैं और अब चर्चा का मुद्दा उनको न हटाने के कारणों पर फोकस है। वे ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण उत्तर प्रदेश में भाजपा से नाराज चल रहा है। उत्तर प्रदेश में 2022 में चुनाव है। इसलिए मिश्रा जी पद पर बने हुए हैं। 19 अक्टूबर को उत्तराखण्ड में आई प्राकृतिक आपदा में चैसठ लोगों की मृत्यु ने मुझ सरीखे उत्तराखण्डियों को गहरे विषाद् में डालने का काम किया। यह सोचने पर मजबूर किया कि यह प्राकृतिक आपदा कहीं प्रकृति संग हमारे खिलवाड़ का दुष्परिणाम, प्रकृति का प्रतिकार तो नहीं? 27 अक्टूबर, 2021 का दिन सुनहरी धूप बन बरसा। सुप्रीम कोर्ट पर आस्था बनाए रखने के नाम रहा। कोर्ट ने ‘पैगासस स्पाई वेयर’ पर स्वतंत्र जांच कराने का निर्णय इसी दिन दिया। 19 नवंबर फिर सुनहरी धूप हम सब पर बरसी। लोकतंत्र के जिंदा होने, जन शक्ति की जीत के नाम यह दिन रहा। प्रधानमंत्री ने इस दिन तीनों कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान कर अपने ‘भक्तों’ को गहरे सदमें में डाला तो मुझ सरीखों को खासे उत्साह से भर डाला। ‘थैंक यू पीएम साहब।’ चार दिसंबर का दिन गहरी उदासी के नाम रहा। भारतीय सेना ने गलत निशानदेही के चलते 15 निर्दोष नागरिकों की नृशंस हत्या नागालैंड में कर डाली। यह घटना आने वाले समय में पूर्वोत्तर के राज्यों में पहले से गहरे पसरे असंतोष को बड़ी आग में बदलने का कारण बन सकती है। यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो इसके भारी दुष्परिणाम झेलने के लिए इस देश को तैयार रहना होगा। जाते वर्ष में अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणास्पद तकरीरों का बढ़ना आने वाले वर्ष में सामाजिक विद्वेष के बढ़ने की दस्तक है। महात्मा गांधी को एक भजन खासा प्रिय था। ‘रघुपति राघव राजा राम, पतित पावन सीताराम, ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सम्मति दे भगवान’। इस भजन के मूल लेखक थे श्री लक्ष्मण आचार्य। गांधी ने इस भजन में ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ पंक्ति अपनी तरफ से जोड़ी थी। आज इस भजन को ज्यादा शिद्दत से गाए जाने, अपनाने की जरूरत है। नववर्ष के लिए समस्त अशेष शुभकामनाएं, इस विश्वास के साथ कि सबको आने वाले वर्ष में सन्मति प्राप्त हो।

 

 

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