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Editorial

कसौटी पर गंगा-जमुनी संस्कृति

एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर, एनपीआर यानी राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर और सीएए यानी नागरिकता संशोधन कानून, इस वर्ष 2020 के तीन ऐसे मुद्दे हैं जिन पर जमकर राजनीति होनी तय है। गत वर्ष का आखिरी माह यानी दिसंबर, 2019 इन्हीं तीन मुद्दों की भेंट रहा। नए वर्ष का आगाज भी इन्हीं तीन मुद्दों के साथ हुईं है। चूंकि दिल्ली के बाद बिहार में चुनाव होने हैं, साथ ही 2021 में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और पुडुचेरी विधानसभा में चुनाव होने हैं इसलिए ये सभी मुद्दे छाए रहेंगे। तो चलिए सरल भाषा में, आम आदमी को समझ आने वाली भाषा में प्रयास किया जाए एनआरसी और सीएए को समझने का ताकि यह स्पष्ट हो सके कि क्योंकर चारों दिशाओं में इन तीन मुद्दों को लेकर जन सामान्य सड़कों पर है। और क्यों और कैसे राजनीतिक दल इनका सहारा लेकर अपनी राजनीतिक गोटियां सेंकने का काम कर रहे हैं।

पहले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की बात करते हैं। संविधान के अनुसार हर वह व्यक्ति जो संविधान के लागू होने के समय से पांच वर्ष पूर्व भारत में रह रहे थे यानी 26 नवंबर 1949 से पांच बरस पहले से जो लोग भारतीय भूभाग में रहे थे, वे भारतीय नागरिक कहलाए गए। स्पष्ट है इसमें वे विदेशी मूल के लोग भी शामिल किए गए जो संविधान बनने से पांच वर्ष पूर्व से भारत में रह रहे थे। भारतीय नागरिकता कानून 1955 में लागू किया गया जिसमें अब तक छह बार संशोधन किया जा चुका है। पहला महत्वपूर्ण संशोधन 1986 में हुआ जिसमें भारत का नागरिक होने के लिए मां अथवा पिता में से एक का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य कर दिया गया। 2003 में हुए संशोधन के बाद अवैध रूप से भारत में रह रहे शरणाआर्थियों के लिए नागरिकता में रोक लगा दी गई। इस संशोधन में यह स्पष्ट कर दिया गया कि यदि मां-बाप में से कोई एक भी अवैध शरणार्थी होगा तो उसकी संतान को भारतीय नागरिकता जन्म के आधार पर नहीं मिलेगी। 2003 में हुए इस संशोधन के जरिए ही राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने की बात कही गई। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की जरूरत अवैध रूप से पड़ोसी मुल्कों के नागरिकों को चिन्हित करने के लिए सबसे पहले असम में महसूसी गई थी। 1951 में असम के लिए राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर की शुरुआत हुई। सरकारी तंत्र की काहिली और कुछ हद तक वोट बैंक राजनीति के चलते इसे सही तरीके से बनाया और समय- समय पर अपडेट नहीं किया गया। 1984 का असम छात्र आंदोलन इसी मुद्दे पर केंद्रित था।

1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से भागकर असम में आ बसे अवैध शरणार्थियों को लेकर असमी मूल के लोगों में भारी असंतोष रहता आया है। इस मुद्दे के चलते असम में हालात हमेशा तनावपूर्ण रहे हैं। केंद्र की सरकारां ने जब लंबे अर्से तक एनआरसी को असम में ठीक तरीके से लागू नहीं किया तब 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी देख-रेख में इसका अनुपालन शुरू करवा दिया। नतीजा रहा 31 अगस्त, 2019 को एनआरसी का पूरा होना और असम की 3.3 करोड़ जनता में से 19 लाख का अवैध नागरिक के तौर पर चिन्हीकरण। संसद में संविधान संशोधन बिल के बाद सबसे ज्यादा उसका विरोध असम में देखने को मिल रहा है जहां भाजपा की सरकार है। असम के मूल निवासियों को ठगे जाने का एहसास हो रहा है। उनकी लड़ाई मुस्लिम शरणार्थियों से नहीं, बल्कि बांग्लादेश से असम आ बसे हरेक उस शरणाआर्थी से है जो उनकी संस्कृति, उनके रोजगार, उनके व्यवसाय, जल, जंगल जमीन यानी सभी पर हिस्सेदारी मांगने लगा है। 2019 का नागरिकता संशोधन कानून असम के मूल निवासियों के लिए स्तब्धकारी रहा क्योंकि केंद्र सरकार ने मुस्लिमों को छोड़कर असम में रह रहे अन्य धर्मों के शरणार्थियों या अवैध नागरिकों को नागरिकता देने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है।

दूसरी तरफ असम के साथ-साथ देश भर में भी इस कानून का विरोध इस आशंका के चलते हो रहा है कि केंद्र सरकार आने वाले समय में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनपीआर के जरिए पूरे देश में एनआरसी यानी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर तैयार करेगी जो आगे चलकर सीएए यानी राष्ट्रीय नागरिकता संशोधन कानून, 2019 के अंतर्गत मुसलमानों की बड़ी जनसंख्या को अवैध नागरिक घोषित करने का काम करेगा। यह आशंका पूरी तरह निर्मूल भी नहीं है। कारण है सरकार द्वारा राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के डाटाबेस को तैयार करने की प्रणाली में कुछ बदलाव जो इशारा करते हैं कि आने वाले समय में इस डाटा का उपयोग एनआरसी के लिए किया जा सकता है। 2003 में वाजपेयी सरकार एनपीआर की बावत कानून लेकर आई थी जिसमें इस रजिस्टर को बनाने के लिए सामान्य जानकारियां पूछी जानी थी। उदाहरण के लिए नागरिकता कानून के अनुसार जो कोई भी 1 जुलाई, 1987 के बाद भारत में पैदा हुआ और उसके माता-पिता में से एक भारतीय है तो वह स्वतः ही भारत का नागरिक माना गया है। 2003 में इस कानून में संशोधन करते हुए एक शर्त लगा दी गई कि माता-पिता में से यदि एक भारतीय है और दूसरा अवैध रूप से भारत में रह रहा शरणार्थी तो उनकी संतान को भारतीय नागरिकता स्वतः नहीं मिलेगी।

अब जो जनसंख्या रजिस्टर बनने जा रहा है उसमें सामान्य जानकारियों के साथ- साथ मां- बाप की जन्म तिथि, जन्म स्थान, आधार नंबर, वोटर आईडी आदि कई जानकारियां देने की बात है। साथ ही केंद्रीय गृहमंत्री संसद में कह चुके हैं कि जनसंख्या रजिस्टर एनपीआर और एनआरसी आपस में जुड़े हैं। सीधा अर्थ यह कि एनआरसी का डाटा एनपीआर के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। केंद्र सरकार ने नागरिकता कानून में संशोधन के जरिए अनावश्यक ही विवाद, तनाव और नाना प्रकार की आशंकाओं को जन्म देने का काम किया है। केंद्रीय गृह मंत्री ने संसद में एनसीआर और एनपीआर को एक दूसरे से जुड़ा होने की बात कही लेकिन प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से इससे इंकार कर दिया। विपक्षी दलों ने इसे मुद्दा बनाने में देर नहीं की। अल्पसंख्यक समाज को यह भय सताने लगा है कि एनपीआर और उसके बाद एनआरसी के जरिए उनकी जमात में से एक बड़ी संख्या को अवैध नागरिक बता उन्हें डिटेंशन सेंटर्स में डाल दिया जाएगा। असम में पहली बार 2008 में डिटेंशन सेंटर यानी हिरासत केंद्र बनाया गया था। तब केंद्र और असम में कांग्रेस की सरकार थी। 2011 आने तक तीन ऐसे डिटेंशन् सेंटर असम बन चुके थे जिनमें अवैध नागरिकों को एक तरह से हिरासत में रखा गया है। हालांकि कांग्रेस अब इन डिटेंशन सेंटर के मामले में अपना बचाव करने का प्रयास कर रही है लेकिन पार्टी की ढुलमुल नीतियों के चलते ही आज ये सारे मुद्दे भाजपा को बैठे-बिठाए मिल गए हैं। जिस प्रकार उत्तर प्रदेश समेत देशभर के कई राज्यों में पुलिस कार्यवाही जिसे दमनचक्र कहा जाना उचित होगा, सीएए और एनआरसी का विरोध कर रहे प्रदर्शकारियों पर किया गया, उसने इस मुद्दे को 2020 में ज्यादा तेज, उग्र होने की संभावनाओं को जन्मा है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने आग में घी डालने का काम अपने ‘बदला लेने’ वाले विवादित बयान और उसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाये जाने के नाम पर तमाम प्रदर्शनकारियों को नोटिस भेजने, उन्हें गिरफ्तार करने, कई जिलों के पुलिस अफसरों द्वारा अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए प्रदर्शनकारियों को पाकिस्तान चले जाने, उन्हें देख लेने की धमकी आदि देकर माहौल को खराब करने में कोई कमी नहीं छोड़ी। सदफ जफर, एसआर दारापुरी, अनवर इलाही का जिक्र मैंने पिछली बार किया था। अनवर इलाही के संग जो घटा वह बेहद निंदनीय है, साथ ही हमारी पुलिस फोर्स के साम्प्रदायिक होने की तरफ इशारा कर ही नहीं रहा, बल्कि इसका प्रमाण है। स्मरण करें अप्रैल 1987 में हुए हाशिमपुरा कांड को जिसमें उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में हुए दंगों में उत्तर प्रदेश की पीएसी पुलिस बल पर 42 मुस्लिम नवयुवकों को जान से मारने के आरोप लगे थे। 19 पुलिसकर्मी लंबी जांच, जांच आयोगों की पड़ताल के बाद इसमें दोषी पाए गए थे। हमारी न्याय प्रणाली की तमाम खामियां अकेले इस केस से साफ हो जाती हैं। 13 साल तो जांच चली। सन् 2000 में 19 पुलिसकर्मी चिन्हित किए गए। 21 मार्च 2015 को दिल्ली की एक अदालत ने इन 19 में से 16 को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

अक्टूबर 2018 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने हालांकि इन्हें दोषी मानते हुए आजीवन करावास की सजा सुनाई तब तक कुछ की मृत्यु हो चुकी थी बाकी अपनी पूरी सेवा पुलिस में देकर रिटायर हो चुके थे। सबसे दुखद और हैरतनाक बात यह कि जिस कांड ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था, उस कांड के खलनायकों को न केवल उत्तर प्रदेश की सरकारों ने पद पर बने रहने दिया, बल्कि उनकी सर्विस बुक में कहीं इन आरोपों का कोई जिक्र तक नहीं किया गया। स्पष्ट है कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा आदि के शासनकाल में इन अपराधियों को लगातार संरक्षण दिया गया। 1987 में हुए इन दंगों के दौरान कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में सरकार थी और वीरबहादुर सिंह राज्य के सीएम थे। इन दंगों के दौरान उनकी भूमिका खासी विवादित रही। आरोपी पुलिस बल पर कार्यवाही के बजाए उन्होंने पूरे मामले को रफा- दफा करने में ज्यादा रुचि दिखाई थी। यह हमारे मुल्क की राजनीति का बदनुमा चेहरा है। सत्ता में चाहे जो भी हो, हमेशा शक्तिशाली, पूंजीपति और शोषक को संरक्षण मिलता है। आम जनता को उज्जवल भविष्य के ढेर सारे सपने बेचे जाते हैं। ऐसे सपने जो सपने ही रह जाते हैं। जो भी सत्ता में आता है कुछ ही बरस में अरबपति हो जाता है। मायावती, मुलायम सिंह, रामविलास पासवान, लालू यादव समेत ढेरों ऐसे ‘जननायक’ हैं जिन्हें सत्ता पाते ही लक्ष्मी का आशीर्वाद बरसने लगा। साइकिल और हाथी के सवार लक्जरी गाड़ियों के मालिक हो गए।

बहरहाल बात सीएए, एनआरसी और एनपीआर की हो रही है तो वापस उन पर ही लौटा जाए। 2020 और 2021 में इन मुद्दों पर राजनीतिक पैंतराबाजी निश्चित ही देश का माहौल विषाक्त करने जा रही है। बड़े पैमाने पर राजनीति के जरिए पूरे मसले को धर्म से जोड़ा जाना तय है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम इन मुद्दों को समझें और इन मुद्दों के सहारे अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों को भी समझें। यदि एनपीआर का उद्देश्य केवल जनसंख्या रजिस्टर बनाए जाने तक सीमित है और एनआरसी का लक्ष्य देश के मूल नागरिकों की रिकॉर्ड कीपिंग तक सीमित है तो ऐसा करना तर्क संगत है। लेकिन इसके सहारे यदि किसी धर्म विशेष को डराना, आतंकित करना इत्यादि है, तो आने वाला समय विकास के बजाए विनाश का समय होगा। हर कीमत पर हमें याद रखना होगा कि यह मुल्क सबका है, किसी भी धर्म विशेष का नहीं। हम एक मुल्क के बतौर पर तभी जिंदा रह पाएंगे, प्रगति कर पायेंगे, शक्तिशाली राष्ट्र और समरस समाज बन पायेंगे यदि हम अपनी गंगा-जमुनी संस्कृति को बचाए रखेंगे। यदि हम ऐसा कर पाने में विफल रहते हैं तो भविष्य अंधकारमय होगा, यह तय है।

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