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Editorial

गांधी की हताशा का चरम् दौर

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-36

गांधी विभाजन की आशंका से किस कदर हताश और निराश थे और कांग्रेस ने उन्हें कितना अकेला छोड़ दिया था इसे उस दौर में गांधी की मानसिक स्थिति से समझा जा सकता है। 1946 के अंत में एक बार फिर से बंगाल प्रांत को भीषण साम्प्रदायिक दंगों ने अपनी चपेट में ले लिया था। पूर्वी बंगाल मुस्लिम बाहुल्य इलाका था जहां हजारों की तादात में हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया गया। उनके घरों को आग लगा दी गई और उनकी औरतों संग सामूहिक बलात्कार किया जाने लगा। इस हिंसा के जवाब में हिंदू बाहुल्य बिहार में मुसलमानों का कत्ले आम शुरू हो गया। गांधी नवंबर, 1946 में दिल्ली की गहमागहमी छोड़ बंगाल में शांति स्थापित करने में जुट गए। रॉबर्ट पायने ने अपनी पुस्तक ‘द लाइफ एंड डेथ ऑफ महात्मा गांधी’ में इन दिनों का मार्मिक चित्रण किया है। गांधी इस पूरे दौर में हताशा के चरम पर पहुंच चुके थे। दिसंबर के मध्य में गांधी की पोती मनुबेन उनके पास रहने चली आई थी। गांधी उन दिनों नोआखाली जिले के श्रीरामपुर गांव में रह रहे थे। वे अपनी पोती के आगमन से प्रसन्न नजर आए। उन दिनों प्रोफेसर निर्मल कुमार बोस गांधी के साथ रह दुभाषिए के बतौर उनकी सहायता कर रहे थे। निर्मल बोस महात्मा के प्रशंसक तो थे लेकिन उनकी कई नीतियों के खिलाफ वे मुखर भी रहा करते थे। निर्मल बोस के हवाले से रॉबर्ट पायने लिखते हैं कि कई बार गांधी स्वयं से बाते करते हुए  बड़बड़ाते थे कि ‘अब मैं क्या करूं?’ ‘मेरे जीवन में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।’, ‘मैं असफल हो नहीं मरना चाहता’ इत्यादि। गांधी इन दिनों अपनी हत्या की बात भी करने लगे थे। उनका मानना था कि उन्हें कोई हिंदू ही मारेगा। गांधी अब मोक्ष प्राप्ति के लिए एक बार फिर से अनुठे प्रयोग करने लगे। यरवदा जेल में कैद रहते समय उन्होंने सर वुडरोफ की किताब ‘तांत्रिक बुद्धिज्म’ (‘Tantric Buddism by Sir John Wood Roffe’s’) का अध्ययन किया था। अब वे इस पुस्तक को आधार बना ‘इच्छाओं का दमन इच्छाओं के जरिए’ करने के प्रयोग में उतर आए थे। बकौल पायने प्रोफेसर निर्मल बोस ने कई बार गांधी और मनुबेन को एक ही बिस्तर में पाया था। गांधी वासनाओं को खुले तौर पर स्वीकार उनके दमन का रास्ता तलाश रहे थे। कांग्रेस में उनकी कमजोर होती पकड़ को रविन्द्र नाथ ठाकुर के एक गीत से समझा जा सकता है जिसे गांधी इन दिनों गुनगुनाने लगे थेः

अकेले चलो
यदि कोई आपकी बात का जवाब नहीं देता तो
अकेले चलो।
अगर डरा हुआ है और दीवार की तरफ मुंह छिपाकर खड़ा है तो इसके लिए भाग्य को दोष न दो
अगर हर कोई आपसे दूर हो जाता है
अगर आपसे बात नहीं करता है तो
बिना झिझक अपने मन की बात खुद से करो
खून से सने रास्ते पर अकेले चलो
अगर कोई तुम्हारी पुकार नहीं सुनता तो अकेले चलो
अगर कोई प्रकाश नहीं नजर आता और
अंधेरी रात दरवाजे पर गरज और तूफान लाती है
तो इस चमकती बिजली से स्वयं को प्रज्वलित करो
यदि कोई आपकी पुकार नहीं सुनता तो अकेले चलो।
गांधी की मनोदशा इस गीत से साफ झलकती है। शायद अपने ही शिष्यों और अनुयायियों द्वारा हाशिए में डाल दिए जाने से महात्मा इन दिनों खासे व्यथित हो चले थे। इस दौरान उन्होंने अपने त्याग दिए गए पुत्र हीरा लाल गांधी को भी एक मार्मिक पत्र लिख कहा कि ‘मुझे कितनी खुशी होती यदि तुम बदल गए होते। उस स्नेह को याद करो जो मैंने तुम पर बरसाया था। मैं एक तीर्थ समान यात्रा पर हूं जिसमें तुम्हें शामिल होने के लिए आमंत्रण भेज रहा हूं।’ हीरा लाल ने इस पत्र का उत्तर तक देना उचित नहीं समझा। क्या अपनी हत्या की आशंका और अपने शिष्यों द्वारा त्याग दिए जाने की भावना ने गांधी को उनके अंतिम दिनों में कमजोर कर दिया था? फरवरी, 1947 में गांधी गांव-गांव घूमते नोआखाली के उस हिस्से जा पहुंचे थे जहां मुसलमानों की बाहुल्यता थी। हिंदू-मुस्लिम एकता के इस परम् हितैषी को यहां मुसलमानों का भारी विरोध झेलना पड़ा। एक उग्र मुसलमान ने महात्मा के चेहरे पर थूक दिया। स्तब्ध गांधी बगैर कोई प्रतिक्रिया दिए आगे बढ़ गए। फरवरी के अंतिम सप्ताह में उन्होंने बिहार जाने का निर्णय ले लिया जहां हिंदुओं द्वारा बड़े पैमाने पर मुसलमानों को मारा जा रहा था। जैसे-जैसे विभाजन का समय नजदीक आता गया, गांधी की मानसिक स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। उन्होंने घोषणा कर दी कि वे अपना अंतिम समय पाकिस्तान में बिताएंगे। उन्हें यकीं हो चला था कि आजाद भारत में उनके लिए कोई स्थान नहीं है। मार्च, 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन के वायसराय बनने पश्चात् उनके बुलावे पर गांधी दिल्ली कुछ अर्से के लिए आए। उन्होंने विभाजन बचाने के लिए अपना अंतिम प्रयास करते हुए माउंटबेटन को सलाह दी कि वे जिन्ना के नेतृत्व में आजाद भारत की सरकार बनाने का प्रयास करें ताकि बंटवारे को रोका जा सके। उनके इस प्रस्ताव को न तो कांग्रेस और न ही मुस्लिम लीग ने स्वीकारा। माउंटबेटन के आग्रह पर गांधी और जिन्ना ने एक संयुक्त बयान 15 अपै्ल, 1947 के दिन जारी कर शांति बनाए रखने की अपील देशवासियों से जरूर की। माउंटबेटन से मुलाकात के बाद अशांत गांधी कश्मीर की यात्रा पर चले गए। वे हर कीमत पर दिल्ली और दिल्ली की राजनीति से दूर रहना चाहते थे। पहली बार कश्मीर गए गांधी को लेकिन यहां भी शांति का अनुभव नहीं हुआ। उन्होंने वापस नोआखाली जाने का निर्णय लिया जहां साम्प्रदायिक तनाव एक बार फिर से बढ़ने लगा था। बनारस से पटना गांधी रेल मार्ग से गए। इस यात्रा के दौरान वे पूरी तरह अशांत और अस्थिर रहे। रॉबर्ट पायने अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि रेलवे स्टेशनों पर अपने अनुयायियों की भीड़ से वे खीजने लगे थे ‘…And when the train reached the village of Bakhtiyarpur late one evening and once more there were crowds on the plateform chanting slogans and waiting to receive his darshan, he went to the window and shouted. ”why are you harassing an old man?”. He was almost at the end of his resources and slapped one of the man who came hurrying up to see him’ (…और जब ट्रेन बख्तियारपुर गांव के करीब एक शाम पहुंची और एक बार फिर प्लेटफॉर्म पर गांधी के दर्शनों के लिए भारी भीड़ उमड़ आई तो खिन्न गांधी खिड़की से बाहर झांकते हुए जोर से चिल्लाए, ‘‘तुम लोग एक बूढ़े व्यक्ति को क्यों परेशान कर रहे हो?’’ उनकी ऊर्जा समाप्त होने लगी थी। अपने दर्शनों के लिए आतुर एक व्यक्ति को तो उन्होंने थप्पड़ तक मार दिया)।
15 अगस्त, 1947 के दिन जब पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, साबरमती का संत साम्प्रदायिक दंगों से झुलस रहे कलकत्ता में उपवास पर बैठा था। कलकत्ता के मुस्लिम बाहुल्य इलाके में स्थित ‘हैदरी मंजिल’ में रह रहे गांधी ने अकेले अपने आत्मबल के दम पर शहर में शांति स्थापित कर डाली थी। आजाद भारत के पहले गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने गांधी को भेजे अपने पत्र में लिखा ‘In the Punjab we have 55,000 soldiers and large scale rioting on our hands. In Bengal our forces consits of one man and there is no rioting’ (पंजाब में हमारे पास पचपन हजार की सेना थी लेकिन वहां बड़े पैमाने पर दंगे हुए। बंगाल में केवल एक आदमी अकेला हमारी सेना था और वहां कोई दंगा नहीं हुआ)।
गांधी से, उनकी नीतियों से, उनकी राजनीतिक कलाबाजियों से भले ही कोई सहमत हो या न हो, इस तथ्य को नकार पाना किसी के बस में नहीं है कि गांधी ने स्वतंत्रता संग्राम को ‘एलीट’ कांग्रेसियों की जकड़ से मुक्त करा आमजन की उसमें हिस्सेदारी बढ़ाई। हितेंद्र पटेल अपनी पुस्तक ‘आधुनिक भारत का ऐतिहासिक यथार्थ’ में गांधी के इस सबसे प्रबल पक्ष को रेखांकित करते हुए लिखते हैं ‘भारतीय राजनीति में जनता का आगमन गांधी की देन है। उनके आगमन ने भारतीय राजनीति को बदल दिया। गांधी जन-शक्ति के जागरण के निर्माता थे और उन्होंने राजनीति की पूरी प्रक्रिया को रूपांतरित कर दिया। उनके प्रभाव से ही औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध जन आंदोलन शुरू हुए और तीन बड़े राष्ट्रीय आंदोलन उनके नेतृत्व में हुए-असहयोग आंदोलन (1920-22), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) और भारत छोड़ो आंदोलन (1942)। इन आंदोलनों ने भारतीय जनमानस को एकता के सूत्र में बांधा और एक राष्ट्रीय एकता, एक राष्ट्रीय स्वप्न को रूपाकार दिया। इस पूरी प्रक्रिया में जो सबसे बड़ी बात थी, वह थी इस आंदोलन की प्रकृति। गांधी ने एक ऐसे क्रांतिकारी राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व किया जो अहिंसात्मक था। गांधी सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों के सहारे एक राजनीतिक आंदोलन को चला रहे थे, और देश की जनता उनके साथ पूरे मन से त्याग और प्रेम की भावना से अपने को संगठित कर अंग्रेजों पर नैतिक दबाव बनाने के लिए प्रयासरत थी। विश्व इतिहास में यह अभिनव प्रयोग था।’
कुल मिलाकर 1940 के बाद महात्मा धीरे-धीरे कांग्रेस और कांग्रेस में मौजूद अपने करीबियों के लिए बोझ समान हो चले थे। इस दौर के इस इतिहास का ईमानदार अध्ययन यह साबित कर देता है कि उनके यानी राष्ट्रपिता के हाथों से निर्णय लेने की शक्ति धीरे-धीरे फिसल नेहरू और पटेल के हाथों में जा चुकी थी। नेहरू अब कांग्रेस और आजाद भारत के सबसे ताकतवर और सर्वमान्य नेता के रूप में न केवल स्थापित हो चुके थे बल्कि अब वे स्वतंत्र रूप से, बगैर ‘बापू’ से सलाह-मशविरा किए, अपने निर्णय स्वयं लेने लगे थे।

क्रमशः

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