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Editorial

गांधी का उत्कर्ष काल

पिचहत्तर बरस का भारत-भाग-8
 

जलियांवाला बाग कांड ने पूरे पराधीन भारत को झकझोर कर रख दिया था। रॉलेट एक्ट और इस कांड के चलते ब्रिटिश हुकूमत 1919 के अंत में ‘भारत सरकार अधिनियम’ के जरिए एडविन मांटेग्यू और लॉर्ड चैम्सफोर्ड के सुझाए सुधारों को लागू करके भी भारतीयों का दिल जीत पाने में पूरी तरह विफल रही। महात्मा गांधी  कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन (दिसंबर, 1920) में ‘असहयोग आंदोलन’ को लेकर अपना प्रस्ताव पारित कराने में सफल हुए। इस आंदोलन ने पहली बार अहिंसक तरीकों के जरिए ब्रिटिश सत्ता की चूलें हिलाने का काम कर डाला था। पूरे देश में इस आंदोलन की गूंज सुनाई देने लगी थी। जगह- जगह हड़तालें, विदेशी समान का बहिष्कार, सरकारी नौकरियों से भारतीयों का इस्तीफा, सरकारी टैक्स न दिया जाना इत्यादि कार्यक्रमों चलते ब्रिटिश सरकार बौखला उठी।

 
 
गांधी ने वक्त की नजाकत भांपते हुए और मुस्लिम लीग की तरफ आकर्षित हो रहे मुसलमानों को कांग्रेस संग जोड़ने की नीयत से मास्टर स्ट्रोक चल दिया। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ ही तुर्की का आटोमन साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया था। विश्व भर के मुसलमानों में इसको लेकर भारी चिंता और मलाल था कि उनके खलीफा की हुकूमत, उसका विशाल साम्राज्य तबाह हो चुका है। युद्ध समाप्ति के तुरंत बाद ही खलीफा संस्था को बचाने के प्रयास तेज होने लगे थे। भारत में विशेषकर एक राजनीतिक आंदोलन इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शुरू किया गया। इसका नाम रखा गया ‘खिलाफत आंदोलन’ (Caliphate movement)। इस आंदोलन की नींव राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं, जिन्हें जौहर बंधुओं के नाम से जाना जाता है, ने रखी। ऑक्सफोर्ड से उच्च शिक्षा पाए पत्रकार मौलाना मोहम्मद अली जौहर और उनके भाई मौलाना शौकत अली जौहर की इस मुहिम में मौलाना अब्दुल कलाम आजाद जैसे बड़े मुस्लिम नेताओं ने शिरकत की। गांधी ने ‘खिलाफत आंदोलन’ के पक्ष में कांग्रेस को खड़ा कर एक ऐसा दांव चला जिससे भारतीय मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के संग हो लिया। ‘खिलाफत’ के नेताओं ने भी ‘असहयोग आंदोलन’ को सफल बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। हिंदू-मुस्लिम एकता का यह सुनहरा दौर था। मौलाना अब्दुल कलाम आजाद सरीखे बुद्धिजीवी इस दौर में महात्मा के अत्याधिक विश्वस्त बन गए। 1920 में ही मौलाना आजाद, हाकिम अफजल खान और डॉ ़ मुख्तार अहमद अंसारी ने दिल्ली में मुस्लिमों के लिए एक उच्च स्तरीय शिक्षण संस्था की नींव रखी। आज यह संस्था ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’ एक उत्कृष्ट विश्वविद्यालय है।
 
‘खिलाफत आंदोलन’ का उद्देश्य हर कीमत पर ओटोमन साम्राज्य को टूटने से और तुर्क सम्राट को मिली खलीफा की पदवी को बचाना था। गांधी ने कांगेस को इस आंदोलन से जोड़कर हिंदुओं और मुस्लिमों के मध्य के मतभेदों को पाटने और दोनों को एकजुट दमनकारी ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ लड़ने का रास्ता बनाया। हालांकि यह आंदोलन 1922 के अंत में तब स्वतः समाप्त हो गया जब तुर्की में राजशाही का अंत कर वहां के राष्ट्रवादियों ने लोकतंत्रिक सरकार बनाने में सफलता पा ली। इसी के साथ ओटोमन सम्राट को मिली खलीफा पदवी और खलीफा संस्था का भी अंत हो गया। आजादी की लड़ाई में ‘खिलाफत आंदोलन’ की भूमिका को लेकर इतिहासकारों के अपने-अपने मत हैं। बहुतों की राय में खिलाफत का उद्देश्य इस्लाम की सत्ता को बचाना भर था जिसके लिए उसने तात्कालिक तौर पर कांग्रेस के ‘असहयोग आंदोलन’ का समर्थन किया। ऐसों का मत है कि ‘खिलाफत’ से जुड़े नेताओं ने आगे चलकर पाकिस्तान की नींव रख यह साबित कर दिया कि वे उनका अंतिम लक्ष्य इस्लामिक राष्ट्र का निर्माण ही था। ‘खिलाफत’ के शीर्ष नेता जौहर बंधु आगे चलकर पाकिस्तान के सबसे सशक्त पैरोकार बन गए थे। हालांकि इसी आंदोलन से जुड़े मौलाना आजाद, हकीम अजमल खान और डॉ ़ मुख्तार अहमद अंसारी सरीखे मुस्लिम नेताओं ने भारत के संग अपनी निष्ठा बरकरार रखी। मौलाना आजाद देश के पहले शिक्षा मंत्री आजादी बाद बने। इतिहासकार मानते हैं कि इस आंदोलन के जरिए गांधी ने कांग्रेस पर अपनी ऐसी पकड़ बनाई जो मोतीलाल नेहरू और जिन्ना के रसातल में जाने और स्वयं गांधी के शीर्ष पर पहुंचने का कारण बनी।
 
गांधी के आह्नान पर शुरू हुए ‘असहयोग आंदोलन’ का धीरे-धीरे हिंसक होना महात्मा को भारी दुविधा और कष्ट में डालने का काम करने लगा था। नवंबर, 1921 में ब्रिटिश साम्राज्य के युवराज (प्रिंस ऑफ वेल्स) भारत यात्रा पर मुंबई पहुंचे। उनके आगमन का भारी विरोध देश भर में किया गया। बंबई में लेकिन पारसी, यहूदी और इसाई समाज के एक बड़े वर्ग ने राजकुमार के आगमन का स्वागत कर आंदोलनकारियों को नाराज कर डाला। इस आंदोलन में हिंसक घटनाएं अब तक छिटपुट और मामूली स्तर की हुई थी। मुंबई में पहली बार बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी। आंदोलनकारियों ने पारसी, यहूदी और इसाई धर्म के अनुयायियों को अपने निशाने पर ले लिया। लूटपाट और हिंसा की घटनाओं को अंजाम देते समय आंदोलनकारी ‘महात्मा गांधी की जय’ का नारा लगा रहे थे। हिंसाग्रस्त मुंबई का दौरा करते गांधी के सामने दो पुलिसवालों ने दम तोड़ दिया, बड़ी तादात में पारसी, यहूदी समाज के लोग गांधी के पास अपनी जान-माल की रक्षा की गुहार लगाते पहुंचे। हालांकि इस ‘असहयोग आंदोलन’ के चलते 1921 के अंत तक पूरे देश में हिंसा और लूटपाट की घटनाएं होने लगी थी, मुंबई में जो कुछ हुआ उससे गांधी खासे विचलित हो गए। 5, फरवरी, 1922 को मुंबई से कोसों दूर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के छोटे से कस्बे चौरी चौरा में बड़ी घटना हो गई। ‘असहयोग आंदोलन’ के दौरान घटी यह सबसे बड़ी हिंसक घटना थी जिसमें 22 पुलिसकर्मियों को आंदोलनकारियों की हिंसक भीड़ ने थाने के भीतर जिंदा जला डाला। इस घटना ने गांधी को कहीं भीतर तक हिला डाला। वे पांच दिन के प्रायश्चित उपवास पर बैठ गए। 12 फरवरी, 1922 को कांग्रेस ने गांधी की सलाह पर इस आंदोलन को वापस लेने की घोषणा कर डाली। गांधी के लिए चौरी चौरा कांड अकल्पनीय था। इससे कुछ माह पूर्व से ही महात्मा के मन में आंदोलन चलते भड़कती हिंसा को लेकर संशय पैदा होने लगा था। प्रसिद्ध इतिहासकार राबर्ट पायने (Robert Payne) अपनी पुस्तक ‘The life and death of mahatma Gandhi’ में लिखते हैं ‘गांधी प्रतीकों पर बहुत भरोसा करते थे। 1922 में नए वायसराय लॉर्ड रिडिंग के भारत पहुंचने के साथ गांधी ने भारतीय झंडे के बारे में सोचा और तय किया कि भारत का झंडा सफेद, हरा और लाल रंग का होना चाहिए। सफेद शांति और शुद्धता का प्रतीक, हरा मुसलमानों का और लाल हिंदुओं का प्रतीक और इन तीन रंगों में मध्य में चरखा।’ 25 बरस बाद 1947 में यही भारत का राष्ट्रीय ध्वज बना।
ठीक इसी प्रकार ‘असहयोग आंदोलन’ के हिंसक होने से व्यथित गांधी ने स्वयं को भी एक प्रतीक में बदलने का मन बनाया। ऐसा कुछ जो उनकी अहिंसा की नीति को विस्तार देने वाला हो। राबर्ट पायने लिखते हैं ‘Gandhi spent a good deal of time and thought on a deliberate search of symbols to illustrate and suggest the kind of revolution he desired… He was in a state of seething anger over the undisciplined behaviour of the crowds. How, he asked himself, could he possibly hope for a successful noncooperation movement if the masses behaves like mobs?.. on the evening of September 22, 1921, Gandhi made the decision that was to have an incalculable effect on his legend. He announced that he was merely following the example of his kathiawari kinsmen who went about bareheaded and bare-chested with a minimum of clothes at the time of mourning’ (असहयोग आंदोलन के दौरान हो रही हिंसक घटनाओं ने गांधी को यह सोचने पर विवश कर दिया कि कैसे एक शांतिपूर्ण आंदोलन को हिंसक भीड़ की गिरफ्त में जाने से रोका जाए। अपने अनुयायियों की अनुशासनहीनता से विचलित गांधी ऐसे उपाय और प्रतीकों की बाबत सोचने लगे जिनका जनमानस पर व्यापक प्रभाव पड़े। 22, सितंबर, 1921 को उन्होंने घोषणा कर डाली कि अपनी जन्मस्थली काठियावाड़ में शोक के दिनों में जिस प्रकार लोग न्यूनतम कपड़े पहनते हैं, वे भी अब जीवन भर केवल न्यूनतम कपड़े पहना करेंगे)।
गांधी ने अपने इस निर्णय का ताउम्र सम्मान भी किया। 12 फरवरी, 1922 को कांग्रेस ने चौरी चौरा में घटी हिंसा के बाद ‘असहयोग आंदोलन’ वापस लेने की घोषणा कर दी। चौरी चौरा कांड में शामिल 225 आंदोलनकारियों पर मुकदमा चला। 19 को मृत्यु दण्ड की सजा मिली तो 38 बरी कर दिए थे। 14 को आजन्म कारावास तो अन्य को दो से आठ वर्ष की जेल हुई। 9 जनवरी, 1923 को आए इस निर्णय का भारी विरोध पूरे देश भर में हुआ। हालांकि इस कांड के बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया था लेकिन ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। 18 मार्च, 1922 को गांधी को 6 बरस के कठोर करावास की सजा सुनाई गई।
 
गांधी द्वारा आंदोलन वापसी का भारी विरोध कांग्रेस के एक बड़े वर्ग ने किया था। गांधी की दक्षिण अफ्रीका से वापसी बाद कांग्रेस में उनके लगातार बढ़ रहे कद ने कई नेताओं की चिंता बढ़ाने का काम कर दिया था। इन नेताओं में जिन्ना से लेकर ऐनी बेसेंट, बाल गंगाधर तिलक और चितरंजन दास सरीखे बड़े कांग्रेसी शामिल थे। लाल-बाल- पाल के नाम से विख्यात लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिन चंद्र पाल गांधी के विचारों से गहरी  असहमति रखने वाले वे नेता थे जिन्हें कांग्रेस भीतर ‘गरम दल’ के नाम से जाना जाता था। तिलक विशेषकर अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ सशस्त संघर्ष के हिमायती थे। उनके विचारों ने विनायक दामोदर सावरकर सरीखे युवाओं को गहरे प्रभावित करने का काम किया था। जिस दौर (1885-1907) में कांग्रेस ब्रिटिश सत्ता के साथ मिलकर भारतीयों के लिए छोटी-मोटी रियायतों को हासिल करने का प्रयास कर रही थी, बाल गंगाधर तिलक अपने दो अखबारों ‘केसरी’ और ‘मराठा’ के सहारे ब्रिटिश सत्ता को खुलकर चुनौती देने में जुटे हुए थे।

क्रमशः

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