Editorial

मेरा प्रतिरोध दर्ज हो!

दोहरी सदस्यता पर उठे सवालों से किनारा करने का प्रयास जब जनसंघ के कुछ नेताओं का सफल नहीं हुआ तब 1980 में इन नेताओं ने जनता पार्टी से किनारा कर भारतीय जनता पार्टी की नींव रखी थी। जनता पार्टी अलग- अलग विचारधाराओं वाले राजनेताओं का एक ऐसा समूह था जो मात्र ‘इंदिरा गांधी विरोध’ के चलते एकजुट हुए थे। 1977 में सरकार गठन के साथ ही इनकी विचारधाराएं आपस में टकराने लगी थी। तभी जनसंघ से ताल्लुक रखने वाले नेताओं, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर शामिल थे, और सरकार में मंत्री भी थे, की दोहरी सदस्यता का मसला जोरों से उठा। जनता पार्टी का एक बड़ा वर्ग यह डिमांड करने लगा था कि जनसंघ परिवार से आए लोग राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से किनारा कर लें। इसी मुद्दे पर रार बढ़ने के बाद जनसंघ, जनता पार्टी से अलग हो गया। दिल्ली के फिरोज शाह कोटला मैदान में पांच अप्रैल, 1980 को इन नेताओं ने नई पार्टी, भाजपा का गठन कर डाला। इतिहास के इस अध्याय का जिक्र इसलिए क्योंकि वर्तमान भाजपा नेतृत्व अपने संस्थापकों की घोषित विचारधारा से एकदम विपरीत कार्य करता नजर आ रहा है। दिसंबर, 1980 में मुंबई के बांद्रा में नव गठित पार्टी भाजपा का पहला राष्ट्रीय अधिवेशन आयोजित किया गया। इस अधिवेशन में नवगठित पार्टी के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी का ओजपूर्ण भाषण जयप्रकाश नारायण की राजनीतिक विचारधारा को भाजपा का पथप्रदर्शक बनाने पर केंद्रित था। भाजपा के सबसे पूज्य – श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का कोई जिक्र अटल जी ने अपने भाषण में नहीं किया था। उन्होंने अपने पहले अध्यक्षीय संबोधन में ‘इदन्नमम’ का उल्लेख किया (यह मेरा नहीं है, यह जीवन, सारे कर्म, कुछ भी मेरा नहीं। मेरा जीवन ब्रह्माण्ड का है)। उन्होंने धर्म आधारित राजनीति को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा ‘एकम् सत् व्रिप्राः बहुधा वदन्ति’ अर्थात सत्य एक है, विद्वान उसकी अलग- अलग व्याख्या करते हैं। यही हमारी भारतीय संस्कृति है। यदि पूरे संसार में एक ही धर्म, एक ही भगवान, एक ही विचारधारा रह जाए तो पूरा विश्व रंगहीन हो उठेगा।

अटल बिहारी ने धर्मनिरपेक्षता और लोकतन्त्र को एक दूसरे का पूरक बताया। वर्तमान भाजपा नेतृत्व इन सबसे दूरी बना चुका है। तात्कालिक संदर्भ है नागरिकता संशोधन विधेयक जिसे गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में पेश कर, उसे ‘ब्रूट मेजोरिटी’ के बल पर पास भी करा लिया है। असम व अन्य पूर्वोत्तर के राज्यों सहित देशभर में इस बिल का विरोध वे सब कर रहे हैं जो किसी भी सूरतेहाल में देश की गंगा- जमुनी संस्कृति को जिलाए रखना, बनाए रखना चाहते हैं। देश के बाहर, दूर-दूर के विदेशी मुल्कों में भी इन दिनों इस बिल की चर्चा है। चर्चा है इस बात को लेकर कि हौले-हौले कदमों से भरत को हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारी कहीं बड़े रक्तपात का कारण न बन जाए। मेरी चिंता भी कुछ ऐसी ही है। आजाद भारत में पहले कभी ऐसा देखने को नहीं मिला है जब सरकारी स्तर पर, धर्म को आधार बना, एक धर्म विशेष को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा हो। केंद्र में जब पहली बार भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार बनी थी, तब भी तत्कालीन शासकों ने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया था जिससे धार्मिक वैमनस्यता बढ़ी हो। कहा जा सकता है कि तब भाजपा के पास आज जैसा बहुमत नहीं था। मैं समझता हूं यदि अटल जी के पास आज समान ‘ब्रूट मेजोरिटी’ होती भी, तब भी वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाते। मेरा ऐसा सोचना इसलिए है कि क्योंकि ओरिजनल भाजपा भले ही राममंदिर को एक आंदोलन का रूप दे सत्ता के करीब आई हो, उसका नेतृत्व ‘सर्व धर्म सम्भाव’ को बहुत हद तक मान्यता देता था। भाजपा में ऐसा कभी नहीं देखा गया कि एक धर्म विशेष के लोगों को विधानसभा अथवा लोकसभा के लिए पार्टी टिकट ही नहीं दिए जाए। एक से बढ़कर एक मुस्लिम नेता भाजपा का हिस्सा रहे। उनका पार्टी में खासा सम्मान था। 2009 के बाद लेकिन भाजपा की चाल, उसका चरित्र और चेहरा बदलने लगा। लालकृष्ण आडवाणी के चेहरे को पीएम के बतौर प्रोजेक्ट करने की रणनीति तब विफल रही थी। इसके बाद से ही कट्टर हिंदुत्व की बात करने वालों का कद पार्टी में बढ़ने लगा। 2012 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 403 सीटों में से केवल एक मुस्लिम को टिकट देकर भविष्य की भाजपा का रंगरूप बदलने की तरफ इशारा कर दिया था। 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में 482 सीटों पर लड़ी भाजपा ने मात्र सात मुसलमानों को मैदान में उतारा था। सभी सात चुनाव हारे और 16वीं लोकसभा में भाजपा का एक भी मुस्लिम एमपी नहीं रहा। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव आते-आते पार्टी के नए नेतृत्व की सोच स्पष्ट नजर आने लगी। मुस्लिम बाहुल्य कही जाने वाली विधानसभा सीटों पर भी भाजपा ने हिंदू उम्मीदवारों का चयन कर यह स्पष्ट संकेत दिया कि वह केवल और केवल हिंदुओं की पार्टी बनना चाहती है। एक भी मुस्लिम उम्मीदवार न उतारने के लिए भाजपा को विपक्षी दलों ने निशाने पर भी रखा लेकिन चुनावी नतीजे भाजपा की रणनीति पर खरे उतरे और प्रचंड बहुमत के साथ भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सरकार बना डाली। जाहिर है एक धर्म विशेष के लिए खुली वैमनस्यता का कार्ड जमकर चला। 2019 के चुनाव में भी भाजपा का मुस्लिम विरोध स्पष्ट नजर आया। 17वीं लोकसभा में भाजपा का एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर भारी विवाद हुआ था। विपक्षी दलों, बुद्धिजीवियों और हलकी-फुलकी आवाज मीडिया की, इस बात को रेखांकित करने का प्रयास कर रही थी कि एनआरसी सीधे-सीधे मुस्लिम विरोधी है। भाजपा नेतृत्व लेकिन टस से मस नहीं हुआ। चुनावी नतीजों ने उसकी रणनीति की सफलता तो सिद्ध की ही, साथ ही खुलकर अपना कार्ड खेलने को भी प्रोत्साहित कर डाला। नतीजा सबके सामने है।

वर्तमान सत्र में पेश किया गया और दोनों सदनों से पारित हुआ नागरिकता संशोधन विधेयक पूरी तरह से भाजपा के वर्तमान नेतृत्व की मुस्लिम विरोधी नीति का परिचायक है। समझिए कितना विभाजनकारी है यह बिल। इसके जरिए सरकार विभिन्न कारणों से अपना देश छोड़ भारत आ बसे लोगों को नागरिकता तो देने को तैयार है, लेकिन अनिवार्य शर्त यह कि ऐसे में मुस्लिम शामिल नहीं हैं। सरकार का तर्क है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान देशों में हिंदू, सिख, बुद्ध, जैन, पारसी और ईसाई अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित जाता है, इन सभी को भारतीय नागरिकता दी जाएगी, लेकिन मुस्लिम धर्म के लोगों को, चाहे वे अपने देश में कितने भी शोषित क्यों न हों, भारतीय नागरिकता से वंचित रखा जाएगा। इसके बड़ा संविधान के साथ, लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ क्या मजाक हो सकता है? इससे बेहतर तो आप भारतीय संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द ही हटा डालें। आपके पास ‘ब्रूट मेजोरिटी’ है, आप जो चाहे करने के लिए स्वतंत्र हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता, मेरे अभिन्न मित्र राजा बुंदेला अभिभूत हैं कि उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष और देश के गृह मंत्री ने संसद में इस बिल को पेश करते समय क्या शानदार- जानदार भाषण दिया। राजा बुंदेला साहब क्या जोर से, चिल्ला कर बोल देने भर से झूठ सच बन जाता है? जिन बोलों को सुनकर राजा बुंदेला गद्गद् हो उठे, उन्हें आपने भी सुना होगा। हमारे गृह मंत्री सदन में दहाड़े कि ‘‘कोई अपना देश यूं ही नहीं छोड़ता। कितने दुखी हुए होंगे, कितने अपमानित हुए होंगे, कितने प्रताड़ित हुए होंगे। तब जाकर अपना देश छोड़कर यहां शरण में आए। उन्हें बरसों बाद भी न नौकरी का अधिकार है, न घर खरीदने का अधिकार है, न शिक्षा का अधिकार है, न स्वास्थ्य का अधिकार है। ये लाखों- करोड़ों लोग नर्क की यातना के अंदर जी रहे है। इस बिल के बाद उन्हें सम्मान मिलेगा। अधिकार मिलेगा।’’ यह कहते समय अमित शाह बहुत खूबसूरती से इस तथ्य को छिपा गए कि इन तीन मुल्कों में बहुसंख्यक नागरिकों के संग भी बड़ी ज्याददती होती है। पाकिस्तान का उदाहरण हमारे सामने है। वहां पूर्वी पाकिस्तान का इतना बुरा हाल था कि अंततः शस्त्र विरोध के जरिए वहां की जनता ने अपना अलग देश बना डाला। तब क्योंकर ऐसे लोगों को भारतीय नागरिकता देने से गृह मंत्री परहेज कर रहे हैं। स्पष्ट है कि वे हर कीमत पर मुस्लिम विरोध की अपनी-अपनी पार्टी की छवि को मजबूत करना चाहते हैं ताकि हिंदुत्व के नाम पर उनका कोर वोट बैंक उनके साथ चिपका रहे। यह विभाजन की नई नींव बनाने की तरफ उठाया जा रहा दुर्भाग्यपूर्ण कदम है। गृहमंत्री ने सदन में दावा किया कि ‘यह विधेयक किसी के अधिकार छीनने का बिल नहीं है बल्कि किसी को अधिकार दिए जाने का प्रयास है।’ उनका यह कथन पूरी तरह से भ्रामक है। इस बिल के द्वारा उन शरणर्थियों को चिन्हित करने का काम होगा जो मुस्लिम हैं, उन्हें वापस खदेड़ा जाएगा या फिर किसी ‘कैंप’ में रखा जायेगा। ऐसे भारत की कल्पना तो हमारे पूर्वजों ने कतई नहीं की थी। पिछले दिनों भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) से इस्तीफा दे चुके एल शशिकांत सैंथिल ने इस विषय में केंद्रीय गृह मंत्री को लिखे अपने पत्र में कहा है’’ Your vehement defence of the bill on the floor of the house revealed a lot about your core ideology of hatred that drives your government.I feel completely ashamed that as a Country we have let down our Muslim and Adivasi brothers and sisters and have not succeeded in assuaging their fears about the secular ethos of the Country ‘ये वही आईएएस अधिकारी हैं जिन्होंने सितंबर माह में केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाए जाने का विरोध करते हुए अपना इस्तीफा दे दिया था। जाहिर है कि हरेक वह जागरूक नागरिक जो भारतीय संविधान को देश की नींव मानता-समझता है, वह दुखी है, सशंकित है कि संविधान की मूल भावनाओं के संग वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान छेड़छाड़ कर रहा है। स्मरण रहे हमारा संविधान धर्म, जाति, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर किसी के भी संग किसी प्रकार का भेदभाव करने की इजाजत नहीं देता है। देश के गृहमंत्री देश की संस्कृति को बनाए रखने की बात करते हैं। संविधान के अनुसार कार्य करने का दावा करते हैं। वे हर नागरिक के साथ समान व्यवहार का दावा करते हैं, लेकिन नागरिकता का प्रश्न आते ही, वे धर्म को आधार बना भेदभाव कर डालते हैं। दामोदर सावरकर जिन्हें भाजपा अपना आदर्श मानती है, हिन्दू-मुस्लिम विभाजन रेखा को जन्मने वाले पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने ‘टू नेशन थ्यौरी’ के जरिए धर्म के आधार पर दो देश बनाने की बात कही थी। आगे चलकर उनकी इसी थ्यौरी को अपनाया मोहम्मद अली जिन्ना ने और अंततः देश का विभाजन धर्म के आधार पर हो गया। भाजपा का वर्तमान नेतृत्व सावरकर से भी दो कदम आगे निकल चुका है। इस बिल के जरिए, अपनी कई अन्य घोषित-अघोषित नीतियों के जरिए वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान देश के भीतर ही विभाजन रेखा खींचने में जुट गया है। इसका विरोध जरूरी है। इसलिए बजरिए अपनी ‘मेरी बात’ मैं अपना प्रतिरोध दर्ज करता हूं।

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