Editorial

एक कुप्रथा का अंत

अंततः मुस्लिम समाज में दोयम दर्जे का जीवन जीने को अभिशप्त महिलाओं के लिए ‘तलाक-ए -बिद्दत’ से तलाक कुछ राहत लेकर आया है। अक्टूबर, 2015 में एक हिन्दू महिला फूलवती पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। फूलवती का भाई प्रकाश उसे हिन्दू उत्तराधिकार कानून के तहत पैतृक संपत्ति में जायज हिस्सा देने को तैयार न था। मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो कोर्ट ने हिन्दू धर्म की कुरीतियों को लेकर कुछ टिप्पणी की। प्रकाश के वकील ने तब मुस्लिम पर्सनल लॉ का जिक्र करते हुए कहा कि मुस्लिम महिलाओं का जमकर शोषण होता है। सुप्रीम कोर्ट में तब इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अनिल दवे और न्यायमूर्ति एसके गोयल कर रहे थे। उन्होंने प्रकाश के वकील का तर्क सुन निर्णय लिया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में मौजूद खामियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। इसी दौरान फरवरी, 2016 में उत्तराखण्ड की रहने वाली शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि उसके शौहर ने उसे तीन दफा तलाक देकर सड़क पर ला खड़ा किया है इसलिए इस प्रथा को समाप्त किया जाए। इसके बाद एक के बाद एक मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक के खिलाफ मुखर होना शुरू कर दिया। जाहिर है शोषण के खिलाफ बुलंद स्वरों को दबाने का खेल भी शुरू होना ही था। धर्म के स्वयंभू ठेकेदार जागृत हो गए। मुस्लिम संस्था जमीअत-उलेमा-ए- हिंद, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड इत्यादि सभी ने इस मामले में अपने दावे पेश करने शुरू कर डाले। 11 मई, 2017 से इस पर सुप्रीम कोर्ट में बहस शुरू हुई। मुस्लिम महिला संगठनों ने अपना पक्ष रखते हुए तीन तलाक, हलाला और मुस्लिम मर्द के एक से ज्यादा शादी करने जैसी कुप्रथाओं पर रोक लगाने की बात कही। इन महिलाओं का तर्क था कि संविधान की धारा 14 और 15 के अंतर्गत बराबरी के अधिकार का इन कुप्रथाओं के चलते हनन हो रहा है। मुस्लिम धर्म गुरुओं और पर्सनल लॉ बोर्ड ने संविधान की धारा 25 का हवाला देते हुए गुहार लगाई कि उन्हें संविधान के तहत अपने धर्म के अनुसार ऐसा करने की छूट मिली है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड न होने के चलते ऐसी कुप्रथाओं के जारी रहने की बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जानना चाहता कि अभी तक यूनिफॉर्म सिविल कोड क्यों नहीं बनाया गया है। इस पर सरकार संकट में फंस गई। लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार यूनिफॉर्म सिविल कोड का मामला केंद्र सरकार ने लॉ कमीशन के पास भेज दिया। कमीशन ने इस पर 16 सवालों को तैयार कर जनता से राय मांगी है। लाखों की संख्या में मिले जवाबों का अभी लॉ कमीशन अध्ययन कर रहा है। इस बीच 22 अगस्त, 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने शायरा बानो मामले पर अपना निर्णय सुनाते हुए ट्रिपल तलाक को गैर संवैधानिक करार दे दिया। मामला लेकिन यहीं पर समाप्त नहीं हुआ। अपने पिछले शासनकाल में मोदी सरकार ने तीन तलाक को आपराधिक कृत्य मानते हुए एक कठोर कानून लोकसभा से पारित कराया जिसके अंतर्गत तीन तलाक कह पत्नी को त्यागने वाले व्यक्ति को तीन साल की कड़ी सजा का प्रावधान था। राज्यसभा में बहुमत न होने के चलते यह मामला अधर में लटक गया। अपने दूसरे कार्यकाल में लेकिन सरकार ने राज्यसभा में बहुमत न होने के बावजूद बेहतरीन फ्लोर मैनेजमेंट कर इसे पारित करा डाला है। अब राष्ट्रपति के दस्खत होते ही इसे कानून का दर्जा मिल जाएगा।
अपने मुल्क में हर कुछ राजनीति की भेंट चढ़ जाता है। इस मुद्दे पर भी ऐसा ही हुआ है। कांग्रेस, सपा, बसपा, वामपंथी समेत भाजपा विरोधी दलों ने इस बिल का पुरजोर विरोध किया। मैं लोकसभा और राज्यसभा में इस मुद्दे पर चल रही बहस को लगातार सुनता रहा। असदुद्दीन ओवैसी बेहतरीन वक्ता और विद्वान राजनेता हैं, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते उन्होंने बेहूदे तर्क देकर इस बिल का विरोध किया। कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, आजम खां, अधीर रंजन चौधरी, सभी को लगभग मैंने सुना। लचर तर्क दे इसलिए बिल का विरोध मात्र विरोध करने की मंशा से किया गया। तर्क दिया गया कि 60 प्रतिशत से ज्यादा मुस्लिम महिलाएं गरीबी रेखा से नीचे हैं। ऐसे में यदि उनके शौहर को इस कानून के तहत जेल हो जाती है तो उनका क्या होगा? वे बच्चों सहित भुखमरी का शिकार हो जाएंगी, इत्यादि-इत्यादि। ये तर्क ठीक वेसे ही कुतर्क हैं जैसे दिसंबर 1829 में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा हिन्दू समाज में प्रचलित सती प्रथा पर प्रतिबंध लगाते समय दिए गए थे। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा प्रतिनिधि वायसराय कहलाता था। 1829 में भारत के वायसराय लार्ड विलियम बैंटिक थे। उनसे पहले लगभग बीस वर्षों तक ब्रिटिश हुकूमत इस प्रथा को बंद करने की मंशा तो बनाती, लेकिन बहुसंख्यक हिन्दुओं द्वारा धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न बर्दाश्त करने की आशंका के चलते एक्शन नहीं ले पा रही थी। लार्ड बैंटिक ने गद्दी संभालते ही इस पर कार्यवाही का मन बना लिया। उनसे असहमत ब्रिटिश हुकूमत के कई सलाहाकारों ने इसका जमकर विरोध किया। इनमें से एक थे लेफ्टिनेंट कर्नल प्लेफेयर। उन्होंने वायसराय को 1928 में लिखे अपने पत्र में कहा-…any order of government prohibiting the practice would create a most alarming sensation throughout the native army, they would consider it an interference with their customs and religion amounting to an |bandonment of those principles which have hitherto guided government in its conduct towards them. Such a feeling once excited, there is no possibility of predicting what might happen. It might break out in some parts of the army in open rebellion, certainly, in all it would produce distrust and disaffection.9 लार्ड बैंटिक को बहुत हतोउत्साहित किया गया, लेकिन उन्होंने गद्दी संभालने के एक बरस भीतर ही सती प्रथा पर रोक लगा डाली। आज जिन तेवरों के साथ औवेसी इस ट्रिपल तलाक कानून का विरोध कर रहे हैं, ठीक उसी प्रकार हिन्दू नेताओं ने भी सती (कु)प्रथा पर रोक का विरोध किया था। बकायदा एक ‘धर्मसभा’ का गठन कर जनता से धन इक्कट्ठा किया गया। 1832 में इस कानून के खिलाफ इस धर्मसभा ने ‘प्रिवी काउंसिल’ के समक्ष अपील दायर की। बंगाल के कई प्रतिष्ठत समाचार पत्रों ने तक इस कुप्रथा के समर्थन में और इस कानून के खिलाफ जहर उगला। ‘समाचार चंद्रिका’ ने इस पर 1832 में एक आलेख प्रकाशित किया जिसमें कहा गया कि ‘हिन्दू अपने हृदय में बगावत की आग लिए घूम रहा है। वह अपने धर्म के खिलाफ ब्रिटिश हस्तक्षेप को कतई नहीं सहेगा। इस कानून का खासा विरोध तो हुआ, लेकिन उनके द्वारा जो धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलाना चाहते थे। हालांकि अहमदनगर में जरूर इस कानून के बाद वहां के राजा कर्ण सिंह की मृत्यु पश्चात पांच रानियों को सती होने के लिए मजबूर किया गया था। चूंकि अहमदनगर तब तक एक स्वतंत्र राज्य था इसलिए ब्रिटिश कानून वहां लागू नहीं थे। इसके बावजूद वहां ब्रिटिश हुकूमत ने सैन्य हस्तक्षेप कर इन पांच रानियों की जान बचाई थी। इससे पहले अगस्त, 1830 में अवध प्रांत (वर्तमान उत्तर प्रदेश) के मुरादाबाद में एक महिला को सती होने से बचाते एक पुलिसकर्मी की मृत्यु हो गई थी। बहरहाल कानून बना, विरोध भी हुआ, लेकिन एक कुप्रथा से मुक्ति मिली। ठीक इसी प्रकार ट्रिपल तलाक कानून को देखे जाने की जरूरत है। बहुत संभव है कि भाजपा अपने उग्र हिन्दुत्व के एजेंडे के तहत मुस्लिम पसर्नल लॉ में हस्तक्षेप कर अपने हिन्दू वोट बैंक को रिझा रही हो, यदि ऐसा है भी तो यह कानून सर्वथा स्वागत योग्य है। जरूरत है कि ‘हलाला’ और मुस्लिम पुरुष के बहुविवाह पर भी रोक लगाई जानी चाहिए। कितनी बेहूदी रवायत है कि यदि कोई तलाक ले चुके पति-पत्नी दोबारा से एक होना चाहें, तो बेचारी पत्नी पहले किसी अन्य से शादी करके, उससे तलाक लेकर फिर अपने पहले पति से निकाह कर सकती है। इन सारी कुप्रथाओं पर रोक लगाई जानी बेहद जरूरी है। हालांकि मैं इस बात से इत्तेफाक रखता हूं कि कुप्रथाएं कानून से कम समाज में जागरूकता और जागृति लाने से खत्म होती हैं। दहेज प्रथा हमारे समय का ऐसा सच है जो कानून बनने के बाद भी समाप्त होने का नाम नहीं ले रही। सच तो यह है कि बेहूदी रस्म जिसे ‘कन्यादान’ कहा जाता है, 21वीं सदी में भी जारी है। यानी कन्या को दान की वस्तु हम मानते हैं, आज भी। हां, एक बात और जायरा वसीम पर मेरे पिछले संपादकीय और यूट्यूब पर जारी वीडियो के बाद काफी प्रतिक्रियाएं आईं, खासकर मुस्लिम मित्रों और पाठकों से। मेरे सहयोगी रह चुके हबीबउरहमान ने तंज किया कि चूंकि मैंने कुरान को नहीं पढ़ा है इसलिए मैं ऐसा लिख रहा हूं। उन्होंने बात तो सही कही थी, इसलिए इन दिनों कुरान का अध्ययन जारी है। जितना अभी तक पढ़ा हूं, दावे के साथ, ताल ठोक के कह सकता हूं मुस्लिम धर्म में औरत को दोयम दर्जा तक नहीं है। लेकिन इस पर फिर कभी। अभी केवल इतना ही कि चाहे इस्लाम हो, हिन्दू धर्म हो या फिर इसाई धर्म, औरत को हर जगह निम्नतर ही आंका गया है।

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