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Editorial

संपादकीय ┃ चेतने का समय आ गया-2

संपादकीय ┃ चेतने का समय आ गया-2

अष्टावक्र और राजा जनक का संवाद अद्भुत है। जनक महाप्रतापी, प्रजापालक और संवेदनशील राजा थे। ज्यादा संवेदनशीलता सांसारिक रूप से सब कुछ होने, पा लेने के बाद भी मनुष्य को कुछ सार्थक न कर पाने के बोध से ग्रसित रखती है। शायद इसीलिए कहा गया है ‘सबसे भले वे मूढ़ जिन्हें न प्यासे जगत गति’। जनक परमज्ञानी थे। उन्हें हमेशा यह लगता है कि कहीं कुछ चूक रहे हैं। पूरा समय जन परोपकारों की सोचते रहते, राजसभा में घंटों इसी पर मंथन चलता।

जनक की राजसभा में एक से बढ़कर एक विद्वान सभासद प्रजा को ज्यादा सुखी और संपन्न बनाने के उपायों पर मंथन करते रहते। राजा जनक को लेकिन हमेशा कुछ अभिनव न कर पाने का अवसाद रहता। जनक के एक मंत्री का बारह बरस का बालक अष्टावक्र जनक की मुक्ति का मार्ग बनता है। उसकी विद्वता से प्रभावित जनक बालक अष्टावक्र से सर्वप्रथम तीन प्रश्न पूछते हैं ‘कथम् ज्ञानम? किम् मुक्ति? वैराग्य च कथम्? ज्ञान की प्राप्ति कैसे होगी, मुक्ति का मार्ग कैसे मिलेगा और वैराग्य कैसे प्राप्त होगा।

अष्टावक्र और जनक का यही संवाद अष्टावक्र गीता है। राजा जनक यूं ही नहीं अष्टावक्र की तरफ आकर्षित हुए। बारह बरस का, आठ स्थानों से कूबड़ निकले शरीर का स्वामी अष्टावक्र जब जनक के दरबारियों को बंधी हुई दृष्टियों वाला करार देता है और जनक को आत्मवान बनने की सलाह देता है, तभी जनक समझ जाते हैं कि यह सामान्य बालक नहीं है। जो संकट जनक का था, मेरा भी वही संकट है। उम्र बढ़ने के साथ कुछ सार्थक न कर पाने का मलाल तो है ही, चारों तरफ बंधी हुई दृष्टियों वालों की जमात, ज्यादा परेशानी में डाल देती है।

उदाहरण के लिए उन विद्वानों की तरफ यदि खुली दृष्टि से देखें तो निश्चित ही निराशा हाथ लगेगी जिन्हें अपने से श्रेष्ठ, अपना पथ प्रदर्शक, अपना गुरु समझ रहे थे। पता चलेगा वे इतने दकियानूसी, इतने लकीर के फकीर हैं कि जानकारियों का खजाना जरूर अपने पास रखे हों, ज्ञान की खासी किल्लत वाले हैं। जीजस क्राइस्ट का कथन है कि सत्य ज्ञान वही जो मुक्त करे, बांधे नहीं। थोड़ा समय निकाल अपने चारों तरफ के माहौल पर विचार करिएगा तो समझ आएगा कि हम स्वयं, हमारे गुरु, हमारे मित्र यानी कुल मिलाकर हमारा निज संसार नाना प्रकार के आदर्शों, धर्मों, नीतियों आदि के बंधन में जकड़ा हुआ है इसलिए सत्य से कोसों दूर, मुक्ति से कोसों दूर, सार्थकता से कोसों दूर, व्यर्थ का जीवन यापन हम कर रहे हैं। इन दिनों धर्म के नाम पर देशभर में सुरसा की भांति फैल रही वैमनस्यता ने ऐसे बड़े-बड़ों को बेनकाब करने का काम किया है जो अपने सरोकारों के लिए समाज में आदर्श माने जाते हैं। मेरी व्यथा का सबसे बड़ा कारण इन दिनों यही धर्म है जो जोड़ने के बजाय तोड़ने का कारक बन चुका है।

धर्म भला है क्या? क्या किसी जाति की श्रेष्ठता स्थापित करने का औजार या फिर सार्थक, संयमित, मर्यादित जीवन जीने का सलीका? यदि कोई भी धर्म अन्य किसी धर्म पर अपनी श्रेष्ठता साबित करने का औजार है, तो ऐसे धर्म को मैं खारिज करता हूं। और धर्म यदि संयमित, मर्यादित जीवन जीने का माध्यम है, तो फिर उसके नाम पर चल रहा खूनी खेल क्या है? जीवन यदि बंधी हुई दृष्टियों का स्वांग नहीं तो बजाय आत्मवान बनने के, हम क्यों संकुचित घेरों में बंध मनुष्यता का सर्वनाश करने में तुले हैं? मेरी समझ से सत्य और प्रेम ही ईश्वर है, परमात्मा है। समस्या यह है कि हम न तो सत्य चाहते हैं, न ही प्रेम। इसलिए ईश्वर के नाम पर, धर्म के नाम पर अपनी दुकान चलाते रहते हैं। कितना बड़ा, कितना घातक षड्यंत्र हमने रच लिया है। जनक ने अष्टावक्र से पूछा कथम् ज्ञानम्? जनक जैसा महाज्ञानी भला ऐसा प्रश्न एक बारह बरस के बालक से क्यों पूछता है? ज्ञान का तो वह स्वयं भंडार थे?

नाना प्रकार के शास्त्र उनके पास थे। फिर भी यदि उन्होंने प्रश्न पूछा तो इसके गहरे मायने हैं। तमाम किताबें, तमाम शास्त्र और अब तो ‘गूगल बाबा’ भी हमारे पास हैं। लेकिन ज्ञान का दूर-दूर तक पता नहीं तो इसका सीधा अर्थ है कि जो कुछ किताबों में है, शास्त्रों में है, वह राख मात्र है। यदि उनमें जीवन होता तो धर्म के नाम पर सदियों से मानवता का संहार न होता। जनक इसे समझते थे। इसलिए प्रश्न किया कथम् ज्ञानम्? अष्टावक्र का उत्तर अद्भुत है। वे कहते हैं ‘मुक्ति पाने का मार्ग ज्ञान है। ज्ञान वही जो मुक्त करे, लेकिन संकट यह कि सभी कथित ज्ञानी सामान्य इंसान से भी ज्यादा बंधे हुए हैं। लकीर के फकीर हैं।

आज के संदर्भ में जिन्हें हम बुद्धिजीवी कहते हैं, मानते हैं, वे सब ऐसे ही नाना प्रकार की विचारधाराओं में जकड़े विवेकहीन लोगों का समूह मात्र हैं। ऐसों से ज्ञान की, समाज में समरसता की उम्मीद करना व्यर्थ है। यदि सही में जीवन को सार्थक करना है, तो मुक्ति की तलाश करनी होगी। मुक्ति से मेरा अर्थ है धर्म से मुक्ति। अकेले यदि धर्म से हम मुक्ति पा लें तो जीवन सार्थक हो जाए। धर्म हमें बांधता है। दूसरे धर्मवालों को हेय समझने का कारक बनता है। धर्म मनुष्य को एक ही धर्म के मानने वालों को भी बांटने का काम करता है।

वर्ण व्यवस्था के मूल में धर्म ही है। कल्पना कीजिए यदि धर्म न रहे तो कितनी शांति संसार में हो जाएगी। सारा आतंकवाद समाप्त हो जाएगा। मनुष्य का डर समाप्त हो जाएगा। डर समाप्त होगा तो मुक्ति अपने आप मिल जाएगी। मैं कुछ ऐसा ही सार्थक करना चाहता हूं। मैं जीवन का एक बड़ा हिस्सा महाडरपोक बनकर जीता आया हूं। डर भविष्य को लेकर नाना प्रकार की आशंकाओं का डर जो बचपन से ही मन में बैठा दिया जाता है उस अनदेखी शक्ति की बाबत जिसको यदि न मानो तो वह कुपित हो आपका सर्वनाश कर सकता है।

इसलिए मानो, चाहे डरकर ही सही, लेकिन उसके आगे शीश जरूर नवाओ। लंबा समय जीवन का इसी डर में बीत गया। जब कभी कोई संकट आया यह डर ज्यादा गहरा गया। अब पीछे मुड़कर देखता हूं तो समझ में आता है कि कितना समय व्यर्थ में ही जाया कर दिया। मुक्ति की छटपटाहट इसी के चलते ज्यादा प्रबल हो गई है। अपने निजी अनुभवों की बिना पर बिला शक कह सकता हूं कि मनुष्य द्वारा निर्मित भगवान कल्पना मात्र हैं, डर की उपज हैं। साथ ही यह भी कहना चाहता हूं कि कहीं न कहीं कोई सर्व शक्तिमान ऊर्जा स्रोत जरूर है जो हमारे कर्म अनुसार हमारे जीवन को संचालित करता है। सकारात्मक सोच जीवन को सकारात्मक बनाती है और यह सर्व शक्तिमान ऊर्जा ही जीवन को सही अर्थ प्रदान करती है। कह सकता हूं देर से ही सही चेतना अब जगी है जो निश्चित ही जीवन को सार्थकता देने का मार्ग प्रशस्त करेगी।

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‘दि संडे पोस्ट’ और ‘पाखी’ में लंबे अर्से तक सहयोगी प्रेम भारद्वाज असमय ही कालकवलित हो गए। प्रेम ‘दि संडे पोस्ट’ के शुरुआती दिनों में ही आ जुड़े थे। बिहार में कुछ अर्सा पत्रकारिता करने के बाद दिल्ली पहुंचे प्रेम सीधे हमारे परिवार से ही जुड़े और तमाम विषम परिस्थितियों में साथ बने रहे। डेढ़ दशक से ज्यादा समय वे इस अखबार के कार्यकारी संपादक रहे। 2008 में जब साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ की शुरुआत की तो पहले दो बरस वे उसके पूर्णकालिक संपादक बने। पत्रकार से कहीं ज्यादा वे साहित्य के अनुरागी थे।

‘पाखी’ ने उन्हें नई पहचान दी तो उन्होंने भी ‘पाखी’ संपादक की भूमिका पूरे समर्पण के साथ निभाई। इस लंबी सहयात्रा के दौरान मेरे उनके मतभेद भी कई मुद्दों पर हुए, लेकिन मनभेद नहीं हुआ। उनके साथ स्थायी तौर पर रची-बसी नकारात्मकता को लेकर मैं उनसे नाराज होता। उनसे जिरह करता कि क्योंकर वे हरेक से खता खाए रहते हैं। प्रेम लेकिन जैसे प्रण करके धरती पर अवतरित हुए थे कि दुख का साथ छोड़ेंगे नहीं।

संस्थान के प्रति उनकी निष्ठा, विशेषकर ‘पाखी’ संग उनका प्रेम अद्भुत था जो अंत तक रहा। मेरे और उनके मध्य दूरियां पैदा करने का लगातार प्रयास कुछ ‘बुद्धिजीवी’ करते रहे, कुछ हद तक सफल भी हुए, लेकिन इतने भी नहीं कि हमारे संबंध पूरी तरह टूट जाएं। अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होंने मेरे से लंबी बातचीत की। शायद कभी लिखूं इस सब पर। अभी लेकिन समय माकूल नहीं है। प्रेम भाई तुम बहुत याद आओगे और तुम्हारे ‘पाखी प्रेम’ को मैं हमेशा याद रखूंगा। साथ ही प्रयास करूंगा कि ‘पाखी’ के माध्यम से तुम्हारी यादें जिलाए रखने की।

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