Editorial

संपादकीय │कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर

संपादकीय │कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर

दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजे कई मायनों में बेहद रोमांचकारी प्रतीत होते हैं। देश की गंगा-जमुनी संस्कृति के मुझ सरीखे पैरोकारों को इन नतीजों ने बड़ी राहत पहुंचाने का काम किया है। हालांकि, यह राहत यथार्थ के धरातल पर परखने पर कितनी खरी उतरेगी यह कहना अभी जल्दबाजी होगी, किंतु जिस प्रकार से भाजपा ने, जिस स्तर पर भाजपा ने, जिन तेवरों के साथ भाजपा ने इस चुनाव को हिंसा और घृणा की राजनीति के सहारे लड़ा, उससे एक बार को तो लगने लगा था कि चुनावी फिजा बदलने लगी है। नतीजों ने लेकिन दिल्ली के वोटरों की परिपक्वता को प्रमाणित कर यह स्पष्ट कर दिया है कि धर्म और जाति के नाम पर बरसों से चल रहा कुत्सित खेल अब मैदान छोड़ रहा है, उसकी जड़ें भीतर ही भीतर खोखली होने लगी हैं।

राष्ट्रीय नागरिकता कानून में पिछले दिनों किए गए संशोधन, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर जैसे मुद्दों पर दिल्ली का शाहीनबाग इलाका प्रदर्शनकारी ताकतों का केंद्र बन उभरा है। इसमें कम से कम मुझे कोई शक-शुबहा नहीं कि शाहीन बाग संविधान प्रदत्त हमारे अधिकारों के अंतर्गत चल रहा ऐसा प्रदर्शन है जो आवाम की आवाज को हुक्मरानों तक पहुंचाने के लिए उठाया गया सही कदम है। इतिहास गवाह है कि विश्वभर में जब कहीं भी, किसी भी सत्ता ने, आवाम की आवाज को दबाने का प्रयास किया, जन आक्रोश ज्यादा तेज हुआ और अंततः जीत अवाम की ही हुई है। ताजा तरीन उदाहरण हांगकांग में चल रहा आंदोलन है जिसे सुपर पावर समझे जाने वाले चीन के तमाम दांव-पेंच भी रोक पाने में विफल रहे हैं। यह ताकत है जनता के आक्रोश की जो जुल्म की इंतहा होने पर ज्वालामुखी बन जाने की ताकत रखता है। शाहीनबाग में चल रहा धरना लेकिन आम जनता के लिए ही एक बड़ी समस्या भी बन चुका है। दिल्ली को नोएडा से जोड़ने वाला संपर्क मार्ग पिछले दो महीनों से बंद है। नतीजा आमजन को प्रतिदिन भारी परेशानी है।

राजधानी में पहले ऐसे धरने-प्रदर्शनों का स्थान जंतर-मंतर हुआ करता था। वही जंतर-मंतर जहां से लोकपाल आंदोलन की शुरुआत अन्ना हजारे ने की थी। बाद में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के आदेश के चलते जंतर-मंतर में प्रदर्शन करने, धरना देने पर प्रतिबंध लगा। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इस प्रतिबंध को गलत बताते हुए हालांकि इस रोक को हटा दिया, लेकिन वहां के नागरिकों की समस्या को समझते हुए अब बड़े पैमाने पर होने वाले प्रदर्शनों को रामलीला मैदान में किए जाने की व्यवस्था है। शाहीनबाग के प्रदर्शन से चूंकि आम जनता की दैनिक आवाजाही खासी प्रभावित हो रही है इसलिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को उचित कदम उठाने की बात इस विधानसभा चुनाव के दौरान एक याचिका की सुनवाई करते हुए कही थी। लेकिन जामिया विश्वविद्यालय में बगैर इजाजत घुस जाने वाली दिल्ली पुलिस ने कोई कदम नहीं उठाया। यह चौंकाने वाला है। यदि दिल्ली पुलिस की इस ‘सहृदयता’ का विश्लेषण करें तो स्पष्ट होता है कि ऐसा दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान हिंदू बनाम मुस्लिम कार्ड खेलने वालों की धुव्रीकरण की वह मंशा थी जिस पर भाजपा ने जमकर बैटिंग तो करने का प्रयास किया, लेकिन ‘नो बॉल’ पर। ‘व्हायट बॉल’ भाजपा के बाउंसरों ने ज्यादा फेंक, जीत आम आदमी पार्टी के पाले में डाल दी।

अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा, प्रकाश जावडे़कर समेत सभी भाजपाई खिलाड़ियों ने अपनी पूरी ताकत हिंदू मतों के ध्रुवीकरण के लिए लगाई जिस पर तड़का प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह का रहा, लेकिन केजरीवाल का विकास मॉडल इन सब पर भारी पड़ा और प्रचंड बहुमत के साथ एक बार फिर से केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पा गए। चारों तरफ केजरीवाल के विकास के मॉडल की गूंज है। ‘मोदी मैजिक’ के सामने हथियार डाल चुके विपक्षी दलों में भी इस जीत ने उत्साह का संचार किया है। पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी हों या फिर आंध्र प्रदेश के चंद्र बाबू नायडू, तमिलनाडु के स्टालिन, केरल के विजयन, उत्तराखण्ड के हरीश रावत, यानी कांग्रेसी, कम्युनिस्ट, समाजवादी, अंबेडकरवादी सभी इस जीत से आनंदित हैं। देशभर में दशकों से जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दों की लड़ाई लड़ रही आंदोलनकारी शक्तियां भी इस जीत के बाद आश्वस्त हैं कि जो पानी ठहर गया प्रतीत होता था, उसमें हलचल होने लगी है। इस जीत को मैं एक-दूसरे नजरिए से भी देख रहा हूं।

देख रहा हूं और समझने का प्रयास कर रहा हूं कि क्या वाकई यह धर्म, जाति, संप्रदाय के सहारे चल रही राजनीति के ऊपर जन सामान्य को राहत पहुंचाने वाले केजरीवाल के विकास मॉडल की जीत है जिसकी गूंज पूरे देश में न केवल सुनाई दे रही है, बल्कि आने वाले समय में बिहार, बंगाल, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश में भी इसका परिणाम देखने को मिलेगा। जितना इस पर विचार कर रहा हूं उतना ही मेरा उत्साह मंद होता जा रहा है। निश्चित ही केजरीवाल और उनकी सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, बिजली-पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। दिल्ली की जनता को निश्चित ही उनके कामों से राहत पहुंची है। उनके ‘गुड गवर्नेंस’ मॉडल को दिल्ली ने सिर माथे बैठाया है। लेकिन धर्म का जलवा जनाब बरकरार है। भाजपा ने इन चुनावों में धर्म के आधार पर धु्रवीकरण का जो प्रयास किया उसका सबसे बड़ा प्रमाण दिल्ली के कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर है जो एक नए शक्ति केंद्र के रूप में उभरा है।

उत्तर प्रदेश में विश्वनाथ धाम आंध्र प्रदेश में तिरूपति बालाजी, उत्तराखण्ड में बद्री-केदारधाम, केरल में सबरीमाला, असम में कामाख्या देवी तो हिमाचल में ज्वाला देवी, पंजाब में स्वर्ण मंदिर, हरियाणा-पंजाब में नाना प्रकार के डेरे, स्वामी रामदेव, श्रीश्री रविशंकर कर्नाटक के मठ आदि शक्ति केंद्र रहे हैं जो राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। दिल्ली लेकिन अभी तक इससे दूर थी। हालांकि यहां मुसलमानों की राजनीति को प्रभावित करने वाली जामा मस्जिद जरूर है, लेकिन अब वहां के शाही इमाम बुखारी परिवार का जलवा लगभग खत्म हो चला है। कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर इन चुनावों में ऐसा ही शक्ति केंद्र बन उभरा है जो आने वाले समय में धर्म और राजनीति के घालमेल को परवान चढ़ाने का काम करेगा। अरविंद चूंकि खांटी राजनेता में तब्दील हो चुके हैं इसलिए उन्होंने भाजपा के जय श्री राम की काट रामभक्त पवन पुत्र हनुमान के जरिए कर डाली। चुनाव से पहले केजरीवाल हनुमान जी का आशीर्वाद लेने इस मंदिर में पहुंचे। उनकी इस धार्मिक और निजी यात्रा को आम आदमी पार्टी ने बजरिए सोशल मीडिया में जमकर प्रचारित किया। इसके बाद जैसे-जैसे भाजपा हिंदू मतों को प्रभावित करने वाले उपाय आजमाने लगी, आप के कार्यकर्ताओं का ‘जय हनुमान’ नारा उतनी ही तेजी से बुलंद होता चला गया।

यदि इन चुनावों के दौरान आप की रणनीति का विश्लेषण किया जाए तो साफ होता जाता है कि क्योंकर केजरीवाल शाहीन बाग मसले पर खुलकर बोलने से बचते रहे। जहां कांग्रेस शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों के साथ खड़ी थी, भाजपा खुलकर उनको देशद्रोही, टुकड़े-टुकड़े गैंग का हिस्सा बता रही थी, आम आदमी पार्टी ने पूरे मुद्दे से दूरी बनाए रखी। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया बेचारे चूक कर गए। उन्होंने शाहीनबाग के पक्ष में खुलकर बात  कही। नतीजा दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन करने वाला व्यक्ति हारते-हारते बचा। केजरीवाल, लेकिन पूरे मुद्दे को दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार के पाले में डालते और स्वयं सीधी टिप्पणी करने से बचते दिखे। उन्होंने हनुमान का आशीर्वाद लेकर आप कार्यकर्ताओं से जय श्री राम के नारे का जवाब हर सभा में जय हनुमान के नारे लगवा कर दिया। यहीं से भाजपा बैकफुट पर आ गई। अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा और प्रकाश जावडे़कर समेत सभी वरिष्ठ भाजपा नेताओं के प्रयास हनुमान जी के चलते व्यर्थ हो गए। यानी धर्म का राजनीति संग घालमेल इन चुनावों में भी जमकर चला। फर्क सिर्फ इतना रहा कि दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को मात्र हनुमान भक्ति के चलते ही नहीं, बल्कि उनकी सरकार के कार्यों को ध्यान में रखकर दोबारा सत्ता तक पहुंचाया। केजरीवाल भली-भांति समझ चुके हैं कि शत्रु के हथियार की काट उससे ज्यादा शक्तिशाली हथियार के जरिए ही संभव है। उन्होंने विकास और धर्म को मिलाकर ऐसा एलॉय तैयार किया जिसके आगे भाजपा के सभी हथियार फेल हो गए।

बहरहाल, कनॉट प्लेस का हनुमान मंदिर तय मानिएगा अब दिल्ली में एक शक्ति केंद्र बन उभरेगा। हनुमान दिल्ली के राजनीतिक दलों के लिए एक प्रकार से अनिवार्य हो जाएंगे। जो जीतेगा वह कहने पर मजबूर होगा कि हनुमान का आशीर्वाद मुझे ही मिला, जो हारेगा वह इसी श्रद्धा से हनुमान चालीसा का पाठ करता मिलेगा, ठीक वैसे ही जैसा एक टीवी एंकर के कहने पर केजरीवाल ने किया। इस बीच जाति और धर्म की राजनीति बेरोकटोक चलेगी। बिहार चुनाव में इसका जमकर उपयोग होगा। नीतीश अपने सुशासन और धर्म का ठीक वैसा ही एलॉय बनाने का प्रयास करेंगे जैसा दिल्ली में केजरीवाल ने किया। तो दिल्ली चुनाव के नतीजे इस दृष्टि से थोड़ा आश्वस्तकारी हैं कि अब राजनीति में विकास का मॉडल एक महत्वपूर्ण रोल निभाएगा। इससे ज्यादा अपेक्षा फिलहाल करना व्यर्थ है। धर्म और जाति हमारे लोकतंत्र का एक अभिन्न, अनिवार्य हिस्सा बन चुका है, जिसका जलवा बरकरार रहेगा।

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