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Editorial

लोक और तंत्र में गहराती खाई

अठाइस अगस्त 2018 के दिन महाराष्ट्र पुलिस ने देशभर में छापेमारी कर दस ऐसों की गिरफ्तारी कर डाली जो उनकी नजरों में माओवादियों के समर्थक हैं। एक नया नाम ऐसे माओवाद-नक्सलवाद समर्थकों के लिए सामने आया – ‘अर्बन नक्सल’ यानी शहरों में रहने वाले वे बुद्धिजीवी जो जंगलों में हथियारबंद नक्सलियों के शहरों में रह रहे समर्थक हैं। इन गिरफ्तार में से पांच ऐसे नाम हैं जिन्हांने मानवाधिकार, स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति और आदिवासियों के हक के लिए लंबा संघर्ष किया है। पुणे पुलिस को शायद इल्म न रहा होगा कि ये गिरफ्तारियां इतना बड़ा बवाल पैदा कर देंगी। यह भी उनकी समझ से परे रहा होगा कि देश की शीर्ष अदालत इस मामले में इतनी तत्परता दिखाएगी। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच का कथन कि  “Dissent is the safety valve of democracy… if it is not allowed, the pressure cooker will burst” अपने आप में एक बड़ा कथन है जो सत्ता प्रतिष्ठान को आगाह करता है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत प्रतिरोध है। यदि इस अधिकार को जनता से छीन लिया जाएगा तो हालात भयावह हो जाएंगे। दरअसल, पुलिस की इस ताजा कार्यवाही की जड़ें 31 दिसंबर 2017 को पुणे में आयोजित एक विशाल रैली से जुड़ी हैं। इस रैली का आयोजन यलगार परिषद नाम के एक दलित संगठन ने 1818 के युद्ध में तत्कालीन मराठा शासक पेशवा की हार का जश्न मनाने के लिए किया था। एक जनवरी 1818 को भीमा-कोरेगांव में हुए युद्ध में अंग्रेज सेना का साथ स्थानीय दलित समाज ने दिया था। इस युद्ध में पेशवा की सेना हार गई थी। पेशवा शासक जाति से ब्राह्मण थे जिन्हें दलित समाज अपने शोषक के रूप में देखता था। हजारों की संख्या में दलित कार्यकर्ता 31 दिसंबर 2017 के दिन एकत्रित हुए। देशभर से आए दलित चिंतकों और राजनेताओं ने इस रैली में अपने विचार रखे। सवर्ण समाज ने इस रैली का विरोध किया। नतीजा रहा बड़े पैमाने पर हुई हिंसा जिसमें एक व्यक्ति की मौत भी हुई। पुणे पुलिस ने इस मामले में दोनों पक्षों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए। छह जून 2018 को पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी इस मामले में की गई। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रोना विल्सन, दिल्ली के ही राणा जैकब, यलगार परिषद् के सुधीर धावेल और नागपुर से शोभा सेन, महेश राऊत और सुरेंद्र गाडलिंग को गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त रहने के आरोपों के चलते गिरफ्तार किया गया। तब पुणे पुलिस ने दावा किया था कि उसने इन सामाजिक कार्यकर्ताओं के नक्सलवादियों संग संबंध होने के पर्याप्त प्रमाण न जुटा लिए हैं। हालांकि इन गिरफ्तारियों का तब भी विरोध हुआ था लेकिन इतने स्तर पर नहीं जितना 28 अगस्त के दिन पुणे पुलिस द्वारा सुधा भारद्वाज, गौतम नौलखा, वरवर राव, वरनोन गोन्साल्विस और अरुण फैरिरा की गिरफ्तारी के बाद हुआ। सुधा भारद्वाज जानी-मानी वकील, कानून की प्रोफेसर और ट्रेड यूनियन आंदोलन से जुड़ी वह शख्सियत हैं जिन्होंने हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद को ठुकरा दिया था। वरवर राव कवि हैं, उनकी पहचान उग्र वामंपथी कार्यकर्ता की रही है। पूर्व में भी वे गिरफ्तार किए जा चुके हैं। गौतम नौलखा मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। अरुण फैरिरा और वरनोन गोन्वाल्विस पेशे से वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। पुलिस का दावा है कि ये सब गिरफ्तार लोग नक्सलवादी आंदोलन के कट्टर समर्थक हैं जिनके प्रतिबंधित माओवादी संगठनों संग गठजोड़ के उसके पास पुख्ता प्रमाण हैं। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद पुणे पुलिस मीडिया से मुखातिब हुई। उसने दावा किया कि सुधा भारद्वाज का एक पत्र उसके पास है जो उनके और माओवादियों के बीच संबंधों की पुष्टि करता है। सुधा भारद्वाज ने इस पत्र को, जो शायद किसी इमेल का हिस्सा है, को पूर्णतः फर्जी बताया है। बहरहाल, इन प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को सुप्रीम कोर्ट ने उनके घर में ही नजरबंदी में बदल डाला है। अब अगली सुनवाई के बाद ही तय होगा कि इन गिरफ्तारियों के पीछे वाकई इन पांचों का नक्सली संगठनों संग रिश्ता होना है या फिर जैसा आरोप पुलिस पर लग रहा है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में मानवाधिकार उल्लंघन का विरोध करने के चलते इन्हें जबरन अपराधी बनाया जा रहा है, वह सच है। इस बीच इस पर भी चर्चा शुरू हो गई है कि लोकसभा चुनावों के नजदीक आने के साथ ही उग्र राष्ट्रवाद की भावनाओं को उकसाया जा रहा है ताकि सत्तारूढ़ गठबंधन को इसका राजनीतिक लाभ पहुंच सके। इसे मात्र आरोप नहीं कहा जा सकता। एक तरफ भीमा-कोरेगांव विवाद के बाद जिस सनातन धर्म संस्था के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था, वह कछुए की चाल से रेंग रहा है। गौरी लंकेश, गोविंद पानसरे और दाभोलकर की हत्या में शामिल कट्टर हिंदू संगठनों का नाम सामने आने से छिछालेदर इस विचारधारा के समर्थकों की हुई, उससे भी आमजन का ध्यान भटकाना जरूरी है। साथ ही बहुत कुछ और भी देश में ऐसा चल रहा है जिसे अब जनता समझने लगी है। गुजरात दंगों के दोषियों को राहत पहुंचने लगी है। फर्जी एन्काउंटरों में शामिल पुलिस अफसरों की ‘गरिमामय’ वापसी सिस्टम में हो चुकी है। कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों के खिलाफ मुकदमे बंद किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार सहारनपुर दंगां के आरोपियों को राहत पहुंचाने की नीयत से मुकदमे ही वापस लेने में लगी है।
केंद्र के मंत्री मॉब लिंचिंग के आरोपियों का महिमामंडन, उनका माल्यार्पण करते नजर आए हैं। केंद्र की सरकार दलित को राष्ट्रपति बनाकर, एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को त्वरित गति से बजरिए संसद खारिज कर इस वर्ग को लुभाने में जुटी है तो दूसरी तरफ भले ही आप दलितों के लिए संघर्ष कर रहे हों, यदि भाजपा के प्रति उदार नहीं, तो कोई राहत आपको नहीं मिलने वाली। उत्तर प्रदेश में भीम सेना के चंद्रशेखर इसका उदाहरण हैं जो राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत लंबे अर्से से जेल में बंद हैं। देश का मीडिया पूरी तरह से गोदी मीडिया में तब्दील हो चुका है। सरकार की विफलताओं पर कुछ भी नहीं बोला जा रहा है। जो थोड़े-बहुत कुछ कहने का प्रयास करते भी हैं तो उन्हें तत्काल उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। एबीपी न्यूज चैनल से पुण्य प्रसून वाजपेयी, अभिसार शर्मा और मिलिंद खाड़ेकर की विदाई हमारे सामने है। प्रिंट मीडिया यानी समाचार पत्रों में एक चलन शुरू हुआ था। विज्ञापन को खबर का रूप दिया जाता था। लेकिन कहीं कोने पर लिखा अवश्य होता था कि यह विज्ञापन है। अब हालात यह हैं कि खबर और विज्ञापन में फर्क करना असंभव हो चला है। विशेषकर चैनलों के हालात तो बेहद सोचनीय हो चले हैं। इन चैनलों के एंकर भाजपा, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुणगान करते नहीं अघाते। नोटबंदी, जीएसटी, कालाधन, बेरोजगारी, मॉब लिंचिंग जैसे मामलों में कोई सार्थक बहस नहीं होती। इस बात पर चर्चा होती है कि हमारे पीएम ट्रंप, पुतिन, ओबामा अथवा अन्य किसी बड़े राष्ट्राध्यक्ष के संग किस प्रकार गले मिलते हैं या बात करते हैं। इस पर बात नहीं होती कि हमारी विदेश नीति इन साढ़े चार सालों के दौरान कितनी सफल या विफल रही है। इजरायल संग हमारी बढ़ती निकटता से दशकों पुरानी फिलीस्तीन संग दोस्ती पर पड़ रहे नकारात्मक प्रभाव पर बात नहीं होती। राफेल रक्षा सौदे में कथित भ्रष्टाचार पर गहरी खामोशी पसरी है। डोकलाम में चुप्पी है। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों की चिंता पर बात करने को कोई तैयार नहीं। कहने का मतलब यह कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में तंत्र और लोक के बीच बढ़ती दूरी को देख-समझ तो सब रहे हैं, बोलने की, विरोध की जिसकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है, वह खामोश हो चला है। पुणे की पुलिस जब देशभर में छापेमारी कर नक्सल समर्थक कह मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी करती है तो चर्चा जिस पर सबसे गंभीर और सबसे ज्यादा होनी चाहिए, वह है नक्सलवाद का कारण क्या है? कौन नक्सली बन रहे हैं? और क्यों बन रहे हैं? सबसे बड़ा संकट यही कि इन अप्रिय प्रश्नों से न तो हमारे राजनीतिक दल दो-चार होना चाहते हैं, न ही मीडिया। समस्या के मूल में जो शोषण का दावानल छिपा है उससे सब बचना चाहते हैं। सच्चाई से मुंह मोड़ने से लेकिन कुछ हासिल हो नहीं सकता। बंदूक की नाल से शांति स्थापित होगी नहीं। दमन की राह स्थितियों को और विस्फोटक बनाने का काम करती है। इतिहास इसका गवाह है। जरूरत है लोकतंत्र में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा, असहमति के स्वर को सम्मान और कतार में खड़े अंतिम आदमी के हितों की सुरक्षा। यदि ऐसा नहीं होगा तो आज नहीं तो कल हालात इतने बिगड़ चुके होंगे कि संभाले नहीं संभल पाएंगे।

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