Editorial

घनघोर कुहासे में लोकतंत्र

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार की परेशानियों में इजाफा तेजी से हो रहा है। केंद्रीय जांच एजेंसी सीबीआई के शीर्ष स्तर पर मचा घमासान हो या फिर भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार के मध्य टकराव का परवान चढ़ना रहा हो, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीशों का अपने ही मुखिया की निष्ठा पर सवाल खड़ा करना हो या फिर हिंदी पट्टी के तीन महत्वपूर्ण राज्यों में भाजपा की सत्ता से बेदखली हो, भाजपा और केंद्र सरकार नित् नई चुनौतियों से दो-चार हो रही है। गत् सप्ताह ऐसी ही दो चुनौतियों या मुसीबतों ने भाजपा और केंद्र सरकार को अपनी चपेट में ले लिया। चूंकि दोनों ही मुद्दे गंभीर हैं इसलिए इन पर चर्चा होनी आवश्यक है।
पहला है अंग्रेजी समाचार पोर्टल ‘दि कारवान’ (www. caravan magazine.in) में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार अजीत डोभाल के पुत्रों की उन व्यावसायिक गतिविधियों की बाबत जो केंद्र सरकार की कालेधन के खिलाफ मुहिम को शंका के घेरे में लाती है। दूसरा मुद्दा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में कथित धांधली पर एक कथित साइबर एक्सपर्ट का वह दावा है जो यदि कुछ भी सत्यता लिए हो तो पूरी चुनाव प्रणाली को शक के दायरे में ला खड़ा करता है। तो पहले चर्चा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से जुड़े प्रसंग पर। डोभाल मुल्क की शीर्ष जासूसी एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक रह चुके हैं। 2005 में ब्यूरो से सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होंने विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन की शुरुआत की। इसी दौर में वे पूर्व उप प्रधानमंत्री लालकøष्ण आडवाणी के खासे करीबी बने।

भाजपा में सक्रिय रहते उन्होंने कालेधन पर दो महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किए। इनमें से एक Indian black money abroad : In secret banks and tax heaven’s यानी विदेशों में भारतीय काला धन : खुफिया बैंकों और कर मुक्त देश।’ इस रिपोर्ट का सार था कि बड़े पैमाने पर भारतीयों ने अपनी ब्लैक मनी विदेशी मुल्कों में जमा कर रखी हैं जिस पर कड़ी कार्यवाही की जरूरत है। भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत के साथ 2014 में केंद्र की सत्ता पर जिन मुद्दों को हथियार बना काबिज हुई थी उनमें से एक कालाधन का मुद्दा भी था। कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ चले अन्ना आंदोलन ने देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल तैयार किया। इस माहौल का राजनीतिक लाभ भाजपा ने उठाया। कालेधन से देश को मुक्त कराने और विदेशों में जमा खजाने की वापसी का वादा भाजपा की ताजपोशी का एक बड़ा कारण था। ऐसे में प्रधानमंत्री के अतिविश्वस्त कहे जाने वाले और देश के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के परिजनों पर यदि शक की ऊंगली उठती है तो उस पर निश्चित ही सरकार को उच्च स्तरीय जांच करानी चाहिए ताकि शंका के बादल छंट सके। ‘दि कारवान’ में प्रकाशित खबर के अनुसार नोटबंदी के मात्र तेरह दिन बाद अजीत डोभाल के छोटे पुत्र विवेक
डोभाल द्वारा कालेधन का स्वर्ग कहे जाने वाले देश केयमन आईलैंड में अपनी कंपनी को रजिस्टर करवाया गया। विवेक डोभाल वित्तीय सलाहकार हैं और इंग्लैंड के नागरिक हैं। उन्होंने एक वित्तीय कंपनी जिसे तकनीकी भाषा में ‘हेज फंड’ कहा जाता है, को इस मुल्क में खोला। सीधे शब्दों में इस कंपनी का व्यापार विभिन्न क्षेत्रों से पैसा इंकट्ठा कर उसे लाभदायक कंपनियों में निवेश कर लाभ कमाना है। ‘दि कारवान’ के अनुसार विवेक डोभाल का एक कालेधन के मामले में कुख्यात देश में अपनी कंपनी खोलना और मात्र दो वर्षों में सत्तहतर करोड़ एकत्रित करना कई सवाल खड़े करता है। इस समाचार में अजीत डोभाल के बड़े पुत्र शौर्य डोभाल की बाबत बताया गया है कि उनके अपने भाई की इस कंपनी से सीधे तार जुड़े हैं। इस रिपोर्ट में कई और तथ्य भी मामले रखे गए हैं, मसलन 2017 के बाद से केयमन आयलैंड का भारत में पूंजी निवेश यकायक इतना बढ़ गया जितना पिछले डेढ़ दशक में नहीं हुआ था।

दिसंबर 2017 से मार्च 2018 के बीच कुल आठ हजार करोड़ रुपया वाया केयमन आईलैंड भारत में निवेश किया जा चुका है। बहुत संभव है कि विवेक डोभाल और उनके अग्रज शौर्य डोभाल की व्यावसायिक गतिविधियों में किसी प्रकार का झोल ना हो। यह भी संभव है कि भारतीय सुरक्षा सलाहकार के पुत्र का मनी लॉन्ड्रिग के काले कारोबार से दूर-दूर तक वास्ता ना हो लेकिन जब आरोप लग रहे हों तो सरकार का दायित्व है कि वे निष्पक्ष जांच करवाए। दायित्व है, नैतिकता का तकाजा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस पर सार्वजनिक रूप से अपनी राय से देश की जनता को बावस्ता कराएं। हो लेकिन हो यह रहा है कि ना तो सरकार, ना ही मीडिया में इस रिपोर्ट पर बहस करने को कोई तैयार है। बड़े समाचार पत्र हों या फिर न्यूज चैनल, सब ने अजब किस्म की खामोशी ओढ़ ली है। कुछ ऐसी ही खामोशी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने पिछले दिनों सदन में हुई ईवीएम मशीनों की हैकिंग के दावों बाद अख्तियार कर ली है। इंडियन जर्नलिस्ट एसोशिएशन (यूरोप) ने अमेरिका स्थित एक भारतीय तकनीकि विशेषज्ञ सैयद शुजा की बजरिए वीडियो एक प्रेस कॉन्फ्रेस का आयोजन लंदन में किया। इस कॉन्फ्रेंस में शामिल होने का न्यौता सभी भारतीय राजनीतिक दलों और मीडिया को भेजा गया। कांग्रेस के कपिल सिब्बल इस प्रेस कांफ्रेस में पहुंचे भी। सैयद शुजा ने इस कॉन्फ्रेस में कई चौंकाने वाले इस ऐसे किए जिन पर विश्वास कर पाना कठिन है। उन्होंने खुद को केंद्र सरकार के प्रतिष्ठान इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (ईसीआईएल) का कर्मचारी बताते हुए दावा किया कि वे उस टीम के सदस्य थे जिन्हें ईवीएम मशीनों में कैसे छेड़छाड़ की जाती है, की तकनीकी समझ थी। उन्होंने दावा किया कि 2014 के आम चुनाव समेत कई विधानसभा चुनावों में बजरिए ईवीएम भारी छेड़खानी कर चुनाव नतीजों को प्रभावित किया गया। उन्होंने यह भी कह सनसनी फैलाने का काम किया कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले उस पर अमेरिका में जानलेवा हमला किया गया है। सबसे अविश्वसनीय कथन उनका जो प्रथम दृष्या प्रतीत होता है कि ईसीआईएल की इस कथित ईवीएम हैंकिंग टीम के ग्यारह लोग मारे जा चुके हैं। उन्होंने भाजपा के वरिष्ठ नेता और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे की एक कार दुर्घटना में हुई मौत के तार भी ईवीएम हैकिंग से जोड़ते हुए दावा किया है कि मुंडे की हत्या करवाई गई। शुजा ने यह भी दावा किया है कि उन्हें अमेरिका ने शरण देते हुए इस पूरे प्रकरण से जुड़े सभी दस्तावेज अपने पास जमा कराए हैं। शुजा ने अपनी टीम के उन ग्यारह साथियों के नाम भी बताए जिसको बकौल शुजा हैदराबाद के एक गेस्ट हाऊस में गोली मार निपटा दिया गया। जैसा मैंने पहले लिखा, यह दावे काल्पनिक और अविश्वसनीय प्रतीत होते हैं। बिल्कुल मुंबईया सस्पेंस थ्रिलर माफिक कहानी शुजा ने बयान की है। लेकिन यदि इनमें थोड़ी सी भी सत्यता है तो पूरा लोकतंत्र खतरे में है। शुजा की बातों से मुझे बिल्कुल इत्तेफाक नहीं लेकिन जब वह एक अंतरराष्ट्रीय प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बकायदा मारे गए लोगों के नाम बता रहे हो, यह दावा कर रहे हो कि वे सब एक सरकारी कंपनी में काम कर रहे थे तो सरकार को तुरंत ही एक उच्च स्तरीय जांच का आदेश दे दूध का दूध और पानी का पानी कर देना चाहिए। ईसीआईएल को स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसी कोई टीम उसके यहां कभी थी या नहीं और अमेरिकी सरकार से संपर्क साध शुजा द्वारा कथित तौर पर राजनीतिक संरक्षण लेने और पूरे प्रकरण के सबूत जमा कराने के दावे की विश्वसनीयता जांचनी चाहिए। अफसोस ऐसा कुछ अभी तक होता नजर नहीं आया है। केंद्र सरकार ने पूरे प्रकरण पर चुप्पी साध ली है तो भाजपा इसे विदेशी धरती पर देश को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश बता असल मुद्दे से ध्यान हटाने का काम करती नजर आ रही है। गोपीनाथ मुंडे के भतीजे ने, जो महाराष्ट्र में नेता प्रतिपक्ष जैसे पद पर काबिज हैं, यह कहकर कि उनके परिवार को पहले ही दिन से आशंका थी कि मुंडे की हत्या करवाई गई है, मामले को और उलझा दिया है। शुजा ने पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या को भी इस प्रकरण से यह कहते हुए जोड़ दिया है कि उनकी हत्या का असल कारण उनके द्वारा इस पूरे प्रकरण की तह तक पहुंचने का प्रयास था। मुझे सबसे ज्यादा अफसोस और कुछ हद तक हैरानी इस पूरे प्रसंग में मीडिया के रुख पर हुई है। रवीश कुमार जैसे कुछ को छोड़ लगभग सभी ने, चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रॉनिक पूरी तरह से इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को या तो नजरअंदाज कर दिए या फिर सरकार भक्ति में लीन कुछेक ने इस पूरे प्रकरण को कांग्रेस की साजिश करार दे डाला। हमारी सबसे बड़ी शक्ति है एक मजबूत और संवेदनशील लोकतंत्र। इस लोकतंत्र को बनाए रखने और इसे बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है कि इसकी साख पर उठने वाले सवालों को दफन करने के बजाय उनके उत्तर तलाशे जाएं। अन्यथा जो लोकतंत्र विषम परिस्थितियों में भी पिछले सत्तर सालों के दौरान फला- फूला और मजबूत हुआ है, उसे भरभरा कर ढहने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। रही बात सत्तारूढ़ दल भाजपा पर चुनाव पूर्व छा रहे संकटों के बादल की, तो यह पार्टी नेतृत्व को भलीभांति समझ लेना चाहिए कि भले ही राजनीतिक दल मुल्क की आवाम को मूर्ख समझने का भ्रम पाले रहें, समय आने पर यही मूर्ख आवाम राजा को रंक बनाने से नहीं चूकती।

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