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Editorial

घातक झप्पीमार विदेश नीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को ‘झप्पीमार’ नीति कह पुकारा जा सकता है। मोदी हरेक मुल्क के राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री संग गले मिलते अनेक बार देखे जा चुके हैं। हीनताबोध से ग्रसित देश का एक बहुत बड़ा तबका इससे खुद को गौरवान्वित महसूस करता है। वाॅट्सअप विश्वविद्यालय के जरिए प्रधानमंत्री के यशोगान में इस ‘झप्पीमार’ कला का खासा गुणगान किया जाता है। मोदी किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की तुलना में सबसे ज्यादा विदेशी दौरे करने का रिकाॅर्ड भी बना चुके हैं। उनकी ‘इवेंट मैनेजमेंट टीम’ अमेरिका समेत कई मुल्कों में उनका ‘इवेंट’  आयोजित करा चुकी है। इतना सब कुछ करने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी की सरकार विदेशी मुल्कों संग संबंध प्रगाढ़ करने में सर्वथा विफल रही है। देश का हाल हमारे सामने है ही। पिछले सात बरस के दौरान हम आर्थिक, राजनीतिक, मानवीय, कहने का मतलब यह कि हरेक क्षेत्र में गिरावट को देख रहे हैं, भोग भी रहे हैं। अर्थव्यवस्था की कमर टूट चुकी है, सामाजिक सौहार्द अपने रसातल पर है, गरीब और गरीब होता जा रहा है, अमीरी के पायदान में खड़े कई दिग्गज लुढ़क चुके हैं। केवल चुनिंदा के लिए पूरा तंत्र काम करता स्पष्ट नजर आ रहा है। तमाम महत्वपूर्ण संस्थाओं को वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान के हितों की रक्षा करने वाली एजेंसियों में तब्दील होते देखने को हम मानो अभिशप्त हों। इस सबके बावजूद भक्तों की भक्ति कम होने का नाम नहीं ले रही है। भक्त इतने आनंदित हैं या कह सकते हैं कि ‘हिप्नोटाइज्ड’ हैं कि कुछ सुनने-समझने को तैयार नहीं है। अपन का फिर भी कर्तव्य बनता है कि हर कीमत पर, हर हालात पर, सच का आइना दिखाते रहें, इस उम्मीद के साथ कि कभी तो भक्ति भाव से देश उबरेगा, हकीकत को समझेगा।

तो चलिए, अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी, मेक इन इंडिया, मेड इन इंडिया, स्वच्छ भारत, आत्मनिर्भर भारत आदि से इतर कुछ चर्चा मोदी सरकार की विदेश नीति पर ताकि अमूमन आमजन की समझ से, आमजन के फोकस से दूर रहते आए इस मुद्दे पर भी वर्तमान सरकार की भूमिका को समझा जा सके। पहली और सबसे महत्वपूर्ण बात यह समझने की है कि झप्पीमार नीति भले ही हीन भावना से ग्रस्त-त्रस्त भक्तों को सुख का अहसास कराए, मुल्क के लिए इसका कोई महत्व नहीं। यूं भी इसे कहा जा सकता है कि इस दौर में विदेश नीति को मोदी अपने व्यक्तित्व में चार चांद लगाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। इसे जुमलों की भाषा में ‘मोदी पहले – देश बाद में’ नीति मान सकते हैं। 2021 के बाद लगातार नए प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं का तर्क यह कहकर दिया गया कि मोदी से पहले अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारत की इज्जत दो कौड़ी की थी।
भक्तों ने इस नैरेटिव को जमकर सराहा भी। असल में विदेशी सरकारों ने, विदेशी ताकतों ने खुद को महिमामंडित करने वाले हमारे प्रधानमंत्री की इस कमजोरी को तेजी से न केवल समझा, बल्कि लपक भी लिया। चीन का उदाहरण सामने है। उनके राष्ट्रपति भारत आए तो अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे बैठ मोदी जी संग झूला झूले। देश गद्गद् हो गया अपने पीएम की ताकत देखकर। लगभग 20 बार तब से अब तक दोनों नेता मिल चुके हैं। मोदी 2014 से आज तक पांच बार चीन यात्रा कर आए हैं। हर जगह उनके संग जबर्दस्त फोटो चीनी नेताओं के खींचे गए। आत्ममुग्धता के चरम पर पहुंचे मोदी और उनके भक्तों की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। चीनी राष्ट्रपति संग अपनी निजी मित्रता पर इतराते पीएम साहब ने कई बार दोहराया कि कैसे शी जिंगपिंग ने उन्हें चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के भारत यात्रा के दौरान मोदी के गांव में रुकने की जानकारी दी। मानो शताब्दियों पहले ही ह्वेन त्सांग को पता था कि इस गांव की माटी से भविष्य में एक महान नेता जन्म लेगा। मोदी-शी बेस्ट फ्रेंड का ड्रामा चलता रहा, हम गद्गद् कराए जाते रहे, फिर गलवान घाटी पर चीनी फौज ने हमला बोल इस मित्रता का सच सामने ला दिया।
प्रधानमंत्री ने सत्ता संभालते ही ‘नेबरहुड फस्र्ट’ नीति की घोषणा की। बैंड बाजे के साथ नेपाल यात्रा पर गए। गोदी मीडिया ने कसीदे पढ़े कि कैसे पूरा नेपाल मोदीमय हो गया है। ज्यादा समय नहीं बीता कि नेपाल ने अपने अंतरराष्ट्रीय नक्शों में भारतीय इलाकों को शामिल कर इस मोदीमय गुब्बारे की हवा निकाल दी। नेपाल संग वर्तमान में हमारे रिश्ते सबसे निचले स्तर पर हैं। बांग्लादेश का जन्म हमारी सहायता के चलते संभव हुआ। इस ऐतिहासिक सच से कोई इंकार नहीं कर सकता। ठीक ऐसे ही इस सच को भी नहीं झुठलाया जा सकता है कि भले ही अपनी हालिया बांग्लादेश यात्रा के दौरान पीएम साहब ने वहां के स्वतंत्रता संग्राम में खुद के योगदान का जिक्र कर शेख हसीना सरकार को प्रभावित किया हो, बांग्लादेश में उनकी यात्रा का जमकर विरोध हुआ, हिंसा तक हुई। आज की तारीख में बांग्लादेश हमारे से कहीं अधिक चीन के करीब है। म्यांमार को ले लीजिए। वहां सेना ने एक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार का तख्तापलट तो किया ही, क्रूरता की सभी हदों को पार करते हुए अब तक कई सौ नागरिकों की नृशंस हत्या तक कर डाली है। हमेशा से लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ खड़ा भारत लेकिन पूरे प्रकरण पर खामोश है। पश्चिमी देश खुलकर म्यांमार की सेना के खिलाफ आ खड़े हुए हैं, उसका बहिष्कार, उस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं ताकि लोकतंत्र बहाली के लिए दबाव बनाया जा सके। हमारे राजदूत सेना के सालाना जलसे में शरीक हो यह संदेश देते हैं कि भारत खूनी सेना के साथ खड़ा है। कुछ ऐसा ही श्रीलंका को लेकर है। जब संयुक्त राष्ट्र संघ में तमिलों के नरसंहार पर, उनके मानवाधिकरों के हनन पर श्रीलंका सरकार के खिलाफ प्रस्ताव लाया गया तो मोदी सरकार ने उसमें भाग न लेकर सबको हैरान कर डाला। इससे पूरे विश्व में संदेश गया है कि भारत ने इस मुद्दे पर अपनी दशकों पुरानी नीति को पलट डाला है और अब उसके लिए तमिल नरसंहार कोई मुद्दा नहीं रहा है।
राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकांल में श्रीलंकाई तमिलों और श्रीलंका की सेना के मध्य चल रहे खूनी युद्ध को रोकने की नीयत से भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) को भेजा गया था। लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम का सफाया करने में इस सेना का बड़ा योगदान रहा। विदेशी मामलों में इस सीधे हस्तक्षेप का खामियाजा अपनी शांति सेना के जवानों की शहादत और पूर्व पीएम राजीव गांधी की हत्या से चुकाया। राजीव जी की हत्या के बाद से लगातार भारत श्रीलंका के तमिलों की रक्षा करने वाले देशों में शुमार रहा है। अब लेकिन यकायक ही इस विदेश नीति में भारी उलट-पलट कर दी गई है।
प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश नीति के साथ सबसे बड़ी छेड़छाड़ या खिलवाड़ अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संग अपने ‘निजी’ और ‘प्रगाढ़’ संबंधों का सार्वजनिक प्रदर्शन कर किया जिसका खामियाजा आने वाले समय में भारत-अमेरिकी संबंधों पर पड़ना तय है। ‘अब की बार ट्रंप सरकार’ का जुमला अब हमें भारी पड़ेगा ही पड़ेगा। अमेरिका की सत्ता में काबिज हो चुके डेमोक्रेट्स एक विदेशी नेता की इस उद्घोषणा को भूलने वाले नहीं हैं। अतीत में ऐसा कोई उदाहरण नहीं देखने को मिलता है जहां किसी देश की आंतरिक राजनीति में इस प्रकार किसी अन्य राष्ट्र के नेता ने यूं खुलकर हस्तक्षेप किया हो। पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शिवशंकर मेनन की एक टिप्पणी मुझे याद आ रही है। जनवरी 2020 में मेनन ने नागरिकता संशोधन कानून को लेकर कहा था ‘यह खुद पर घाव करने जैसा है।’ इस संशोधन के चलते आंतरिक अशांति तो जनमी ही, हमारे संबंध अपने पड़ोसी देशों से लेकर यूरोप, मीडिल ईस्ट, अफ्रीका, अमेरिका आदि तक से बिगड़ गए। रही-सही कसर किसान कानूनों में बदलाव, लोकतांत्रिक चेतना की आवाजों को दबाए जाने, लव जेहाद जैसे कानून बनाना, कहने का मतलब यह कि असहिष्णुता का माहौल देश में बढ़ते जाना आदि ने विश्वभर में भारत की साख को गिराने का काम किया है। लगातार अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं भारतीय लोकतंत्र में आ रही गिरावट को सामने ला रही हैं। विदेशों में भारत की साख मोदीकाल में निरंतर घट रही है तो समझ जाना चाहिए कि जुमलेबाजी, मीडिया मैनेजमेंट और मार्केटिंग के सहारे करिश्माई छवि का छद्म भले ही कुछ समय के लिए पैदा किया जा सकता है, सच लेकिन किसी न किसी तरीके से बाहर आ ही जाता है। भक्तगणों को इसे यूं समझना चाहिए कि उन्होंने राफेल विमान खरीद में भ्रष्टाचार के सच को सच नहीं माना, क्योंकि उनके ‘अराध्य’ ऐसा कहते हैं सच सामने आ ही गया है। ठीक इसी प्रकार प्रधानमंत्री की जबरन झप्पीमार विदेश नीति का सच भी सामने आने लगा है। कुछ और समय इंतजार कीजिए पिक्चर अभी बाकी है।

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