Editorial

शुतरमुर्गी आचरण के खतरे

उत्तर प्रदेश में जब-जब समाजवादी पार्टी की सत्ता रही, राज्य में यादववाद तो चला ही चला, गुंडे- बदमाशों की बन आई। ऐसा माहौल राज्य में बनता मैंने देखा कि मानो सरकार इन लफंगों की हो जो थाने में तक गुंडई करने से नहीं चूकते नजर आते थे। डीएम, एसएसपी को खुलेआम धमकाते घूमते। बड़ी-बड़ी लक्जरी गाड़ियों में लोहिया को मुंह चिढ़ाता समाजवादी झण्डा और ध्वनि प्रदूषण करती हूटर बजाती गाड़ियां तेज रफ्तार में सड़क का सीना रौंदते घूमा करती थीं। मैं सोच में पड़ जाता कि क्यों कर भला मुलायम सिंह, छोड़िए मुलायम सिंह को, उनके विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त पुत्र अखिलेश यादव इस प्रकार की लपंटई को भला क्यों संरक्षण देते होंगे। मुझे याद है सत्ता संभालने के बाद लगातार अखिलेश अपने कार्यकर्ताओं को चेताते रहते थे कि हूटर-सायरन, काले शीशे वाली गाड़ी आदि का प्रयोग न करें। सुनता उनकी लेकिन कोई नहीं था। आज इसका जिक्र राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के चलते। भागवत ने दशहरे के दिन दिए एक संबोधन में मॉब लिंचिंग की घटनाओं को एक षड्यंत्र का हिस्सा करार देते हुए कहा कि ऐसे मामलों को जानबूझ कर तूल दिया जाता है। उन्होंने मॉब लिंचिंग के नाम पर एक भय का वातावरण तैयार करने को साजिश बताते हुए कहा कि इक्का-दुक्का घटनाएं ऐसी होती हैं जिन्हें बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है। संघ प्रमुख ने मॉब लिंचिंग शब्द को विदेशों से आयात कर भारत में थोपे जाने का भी दावा किया। उनके इस कथन ने मुझे सपा शासन के दौरान उत्पाती तत्वों की रंगबाजी याद दिला दी। जिस प्रकार अखिलेश यादव कड़े शब्दों में अपनी पार्टी के कॉडर को गलत काम, गलत आचरण न करने के लिए चेताते थे, ठीक उसी प्रकार प्रधानमंत्री मोदी भी हरेक उपलब्ध मंच से मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर अपना रोष प्रकट करते आए हैं। पीएम भारतीय जनता पार्टी के कॉडर को भी संयमित आचरण, अनुकरणीय आचरण की सलाह देते हैं। कभी-कभी वे बेहद क्रुद्ध भी हो जाते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय के विधायक बेटे आकाश के आचरण पर तो पीएम बेहद खिन्न हो उठे। इतने खिन्न कि पार्टी की एक बैठक में उन्होंने इस प्रकार के आचरण को किसी भी सूरत में बर्दाश्त न करने की बात तक कह डाली। जरा सोचिए, कुछ देर ठहर कर, कि ऐसा क्योंकर होता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति, किसी राजनीतिक दल का प्रमुख, घटना या आचरण विशेष से इत्तेफाक नहीं रखता है, अपने कॉडर को ऐसा न करने की कठोर ताकीद करता है, लेकिन उसके कहे का प्रभाव शून्य नजर आता है। सर संघ चालक मोहन भागवत जब मॉब लिंचिंग की घटनाओं को इक्का-दुक्का कहते हैं तब इस बात का अर्थ ज्यादा साफ होता है। संघ प्रमुख का बयान ऐसी वारदातों को अंजाम देने वालों की हौसला अफजाई करता है। 2010 से 2017 तक मॉब लिंचिंग की कम से कम 40  घटनाएं हुई हैं, जिनमें कथित 28 गौ हत्यारों की मौतें हुई हैं जिनमें 24 मुसलमान थे। 28 जानों को यदि संघ प्रमुख इक्का-दुक्का कहते हैं तो निश्चित ही इससे इन घटनाओं को बढ़ावा मिलता है। कुछ ऐसा ही पीएम के कड़े तेवरों का भी है। आकाश विजयवर्गीय पर भाजपा ने कोई कठोर कार्यवाही न करके स्पष्ट कर दिया कि भले ही पीएम इस प्रकार के आचरण को सही न मानें, पार्टी लाइन से बाहर जाने वालों के खिलाफ कार्यवाही नहीं होने से, कथनी और करनी का भेद स्पष्ट झलकता है। जब मोहन भागवत यह बात कह रहे थे तब से कुछ ही घंटा पहले राजस्थान के अलवर जिले के नूंह शहरवासी रईस खान मॉब वायलेंस का शिकार हुए थे। रईस खान अपनी एक महिला रिश्तेदार के साथ बस अड्डा जा रहे थे तभी शराब के नशे में चूर दो व्यक्तियों वंश भारद्वाज और सुरेंद्र भटिया ने उन्हें रोक कर न केवल गलियाया, महिला की तरफ इशारा कर अश्लील बातें की, बल्कि उन्हें देशद्रोही तक कह डाला। स्पष्ट है देश की जनता में हिंसक प्रवृत्ति का इजाफा हो रहा है। प्रश्न उठता है कि क्या हिंदुत्व के  उबाल के चलते एक धर्म विशेष के लोग अल्पसंख्यक समाज के प्रति ज्यादा हिंसक हो रहे हैं या फिर इसके अन्य कारण, धर्म से इत्तर कारण भी हैं। हिंसा मूलतः किसी भी प्रकार की निराशा, हताशा से उपजती है। हताशा, निराशा हमारे दिमाग के उन हार्मोंस को सक्रिय कर देती है जिनके चलते मनुष्य हिंसक हो उठता है। टेस्टोस्टेरोन हार्मोन यदि अधिक मात्रा में सक्रिय हो तो मनुष्य में हिंसा की भावना जोर पकड़ने लगती है। यह भावना विचार के स्तर पर भी हो सकती है और शारीरिक स्तर पर भी। विभिन्न वैज्ञानिक रिसर्च में यह पाया गया है कि हताशा-निराशा के क्षणों में यह हार्मोन ज्यादा निकलने लगता है। अब इस हार्मोन का संबंध वर्तमान में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति से जोड़ा जाए तो एक बात स्पष्ट नजर आती है कि समाज में लगातार बढ़ रही हिंसा का कहीं न कहीं रिश्ता बेरोजगारी, आर्थिक मंदी से जरूर है। केंद्र सरकार चाहे लाख दावा करे नोटबंदी के बाद से ही हमारे मुल्क की अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट दर्ज हुई है। सरकार ने राष्ट्रीय सैंपल सर्वे विभाग के आंकड़े छुपाने का भरकस प्रयास किया, लेकिन वह इसमें सफल हुई नहीं। हर सेक्टर से खबर निगेटिव है। ऑटोमोबाइल क्षेत्र में पिछले दिनों लाखों की संख्या में रोजगार छिने हैं। सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल सेक्टर के ताजातरीन आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2019 तक वाहनां की बिक्री में 35 प्रतिशत की गिरावट का सीधा प्रभाव इस सेक्टर में काम करने वालों पर पड़ा है। लगभग ढाई लाख नौकरियां ऑटो सेक्टर में समाप्त हो जा चुकी हैं और यदि हालात नहीं सुधरे तो इस वर्ष के अंत तक यह आंकड़ा पांच लाख पार कर जाएगा। ‘द हिंदू’ अखबार के आंकड़े तो बेहद भयावह हैं। इसके अनुसार लगभग 10 लाख नौकरियां ऑटो सेक्टर में अगस्त तक गंवाई जा चुकी हैं। पिछले 45 सालों में बेरोजगारी का स्तर इस समय सबसे ज्यादा खराब है। यानी जो वादे मोदी जी ने 2014 में देश की जनता से किए थे, उन पर वे खरा उतर नहीं पाए हैं। वादा एक उन्नत और प्रगतिशील राष्ट्र का था। इन दो शब्दों-‘उन्नत’ और ‘प्रगतिशील’ में मोदी द्वारा दिखाए गए सभी स्वप्नों का सार है। प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी बनने के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नए दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरी थी। कांग्रेस तब तक भ्रष्टाचार और अहंकार के दीमक के चलते पूरी तरह खोखली हो चली थी। देश में व्याप्त निराशा को भाजपा ने भांप लिया था। मोदी का गुजरात मॉडल विकास के एक ऐसे मॉडल के रूप में प्रचारित किया गया जिसकी कोख में देश की हर समस्या का समाधान छिपा था। जनता ने इस मॉडल को हाथों-हाथ लपका और अपने दम पर पहली बार भाजपा केंद्र की सत्ता में आसीन हो गई। प्रधानमंत्री बनने के बाद लेकिन मोदी अपने वादों को यर्थात में उतार पाने में स्पष्ट असफल रहे। हालांकि जनता जर्नादन ने उन्हें 2019 में ज्यादा समर्थन दे दोबारा देश का नेतृत्व सौंपा है लेकिन इसमें मोदी सरकार का सफल कार्यकाल से कहीं ज्यादा विकल्पहीनता का दंश बड़ा फैक्टर रहा है। कांग्रेस पूरी तरह दिशाहीन है, अस्त- पस्त है तो क्षेत्रीय दलों के प्रति भी जनता का रोष बरकरार है। 90 के दशक में उभरे ज्यादातर क्षेत्रीय दलों ने स्थानीय भावनाओं का तिरस्कार ही किया। चाहे उत्तर प्रदेश की सपा -बसपा हों या फिर असम की अगप, पश्चिम बंगाल की तृणमूल, दक्षिण भारत की द्रमुक-अन्नाद्रमुक, तेलगुदेशम आदि राजनीतिक पार्टियां, सभी का नेतृत्व जनहित से कोसों दूर, स्वहित की राजनीति में उलझा रहा है। अपने पहले कार्यकाल के अंतिम एक वर्ष में भाजपा, विशेषकर मोदी और उनके मजबूत और भरोसेमंद साथी अमित शाह ने जन आक्रोश को भलिभांति भांप लिया था। भाजपा के 2014- 19 के घोषणा पत्रों का अध्ययन इस बात को स्पष्ट करता है। राजनीति में जो दिखता है या दिखाया जाता है, वही बिकता है, को दोबारा मोदी-शाह ने 2019 में इस्तेमल किया। पूरा नैरेटिव बदला गया। रोजगार, रोटी-कपड़ा-मकान पर चूंकि फोकस करना आत्मघाती होता, इसलिए राष्ट्रीय अस्मिता के मुद्दे पर खेल रचा गया। पीएम मोदी 2019 के अपने हर सार्वजनिक संबोधन में सबसे ज्यादा राष्ट्रवाद पर फोकस करते रहे। उन्होंने दो बातों को बड़ी खूबसूरती से अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से त्रस्त भारतीयों के सामने रखा, कहा जा सकता है दिल और दिमाग में कहीं गहरे धंसाया कि अब भारत सुपर पॉवर बन चुका है। अब भारत अपने शत्रुओं को मुंहतोड़ जवाब दे रहा है। पाकिस्तान के भीतर घुसकर भारतीय सेना आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद कर रही है। पूरा विश्व मोदी डिप्लोमेसी से चमत्कृत है, आदि- आदि। अमेरिकी राष्ट्रपति टं्रप ने भले ही कश्मीर मुद्दे में कभी खुलकर समर्थन नहीं किया, उन्होंने अमेरिका में रह रहे भारतीयों को भले ही दोयम दर्जे का नागरिक माना, नैरेटिव लेकिन इतना शानदार गढ़ा गया है कि इन मुद्दों की गहराई जानने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है। चारों तरफ एक किस्म का उन्माद छाया है। यह उन्माद स्वयं के विश्व शक्ति बनने की उस दमित इच्छा से जुड़ा है, जो हमें सच को स्वीकारने से दूर ले जा रही है। कोई शक नहीं कि मोदी ने अपनी धुआंधार विदेश यात्राओं के जरिए भारत के पक्ष में सकारात्मक माहौल बनाया है। लेकिन यह माहौल हमारे एक मुल्क के तौर पर अवसाद से निकल विकास के हाईवे पर दौड़ने के चलते नहीं, बल्कि विश्व की अर्थव्यवस्था में हमारी क्रय शक्ति से जुड़ा है। अमेरिका, रूस, फ्रांस आदि देशों के लिए भारत एक बड़ा बाजार है। विशेषकर सैन्य सामानों का बाजार। व्यापारिक हितों के चलते हमारा महत्व विश्व में बढ़ा है। लेकिन यह कृत्रिम है। सोचिए जब घर की नींव लगातार कमजोर होती जा रही हो तब कब तक हम कृत्रिम चमक के सहारे स्वयं को मुगालते में डाल सच्चाई से मुंह मोड़ते रह सकते हैं। सच, भयावह है। सच यही है कि हमारी आर्थिक स्थिति लगातार खराब हो रही है, हमारे नौजवान बेरोजगारी के दलदल में धंसते जा रहे हैं, हमारी गंगा-जमुनी संस्कृति का लगातार हृस हो रहा है। हमारा समाज हिंसक हो चला है। ये सब संकेत हैं, बानगी हैं, आने वाले भारत की। भले ही संघ प्रमुख लाख बार दोहराएं, लेकिन मॉब लिंचिंग आज के भारत का सच है। ऐसा सच जिससे मुंह मोड़ना आत्मघाती होगा। जरूरत ऐसे सभी सचों से दो चार होने की है, अन्यथा गढ़ते रहिए आप नए-नए जुमले, नए-नए नैरेटिव। अंततः बुनियादी मुद्दों से बचने का खामियाजा न केवल भाजपा, बल्कि पूरे राष्ट्र को भारी पड़ेगा।

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