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Editorial

आत्ममुग्धता से उपजे खतरे

क्या हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री आत्ममुग्धता के शिकार हो चले हैं? यह बेहद गंभीर प्रश्न है। इसे हल्के में मत लीजिएगा। न ही इसे प्रधानमंत्री के विरोध में समझने की भूल कीजिएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर एक व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि 130 करोड़ जनता के सरोकारों से वास्ता रखने वाला है। आत्ममुग्धता का अर्थ है ऐसा व्यक्ति जो केवल अपनी सोचता हो और अपने कार्यों की प्रशंसा स्वयं करता हो। अंग्रेजी में इस अवस्था को ‘सेल्फ ऑब्सेशन’ कहा जाता है। मुझे ऐसा क्यों कर महसूस हुआ इस पर चर्चा करने से पूर्व जरा प्रधानमंत्री जी के कामकाज पर, उनकी कार्यशैली पर कुछ बात की जाए ताकि असल मुद्दे तक पहुंचते-पहुंचते मामला पूरी तरह पारदर्शी हो सके। शुरुआत वजीरे-ए-आजम साहब के प्रति माह दिए जाने वाले कार्यक्रम ‘मन की बात’ से करता हूं। 3 अक्टूबर, 2014 को शुरू हुए इस कार्यक्रम की अब तक 73 किश्तें आ चुकी हैं। यानी 73 बार बजरिए रेडियो प्रधानमंत्री देश की अवाम को संबोधित कर चुके हैं। पहली बार उन्होंने जब अपने ‘मन’ की बातें हमारे संग साझा की तब लगा था साहिबे आला इसके जरिए ‘जन के मन’ को थाहना चाह रहे हैं। अपनी पहली ‘मन की बात’ में पीएम ने खादी के कपड़ों को पहनने का आह्वान किया था और स्वच्छ भारत अभियान की चर्चा की थी। इसके बाद से ही वे विविध विषयों पर अपने मन की बात लगातार करते आ रहे हैं, जनता के मन की बात नहीं। उनके कार्यक्रम की टीआरपी इसी कारण घटती जा रही है। 2014 में कराए गए एक सर्वे अनुसार 66.7 प्रतिशत जनता को ‘मन की बात’ सुहा रही थी। 2020 आते-आते यह परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। 30 अगस्त 2020 को इस कार्यक्रम के 68वें एपिसोड का वीडियो जैसे ही भाजपा के यूट्यूब चैनल में डाला गया उसे पचास हजार लोगों ने डिसलाईक यानी अस्वीकार कर डाला। गोदी मीडिया भले ही इसे खबर नहीं बनाए यह वीडियो यूट्यूब में सबसे ज्यादा नापसंद किए गए वीडियोज में पहला स्थान रखता है। 12 लाख डिसलाईक इसके खाते में दर्ज हैं। इस कार्यक्रम के पचासवें एपिसोड के बाद ऑलइंडिया रेडियो ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें बताया गया था कि जनता को सबसे ज्यादा पसंद ‘सेल्फी विद डाॅटर’, ‘इन्क्रेडिबल इंडिया’, ‘फिट इंडिया’ आदि पीएम के जुमले खासे पसंद हैं। 60वें एपिसोड के बाद अंग्रेजी दैनिक ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ ने खबर की, कि पीएम ‘इंडिया’ और ‘नेशन’ शब्दों का सबसे ज्यादा उल्लेख करते हैं। 60वें एपिसोड तक उन्होंने 73 बार ‘पानी’, 30 बार ‘यूथ’ एवं 54 बार ‘यंग’ शब्द का प्रयोग किया। ‘इकानाॅमी’ यानी अर्थव्यवस्था पर मात्र आठ बार पीएम बोले हैं। इस जानकारी से यह स्पष्ट होता है कि प्रधानमंत्री उन्हीं मुद्दों पर बात करते हैं जो उन्हें सुहाते हैं। वे उन मुद्दों पर बात करने से बचते हैं जो जनता सुनना चाहती है। इसलिए यह कार्यक्रम जनता का न होकर मोदी जी के ‘मन की बात’ होती है। जनता उन मुद्दे पर पीएम को सुनना चाहती है जिनसे वह त्रस्त है। उदाहरण के लिए बेरोजगारी, गिरती अर्थव्यवस्था, दिनोंदिन बढ़ती जा रही महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार, किसानों से जुड़े मुद्दे। इन पर लेकिन प्रधानमंत्री जी बोलने से कतराते हैं। शायद खास महत्व के न लगते हों या फिर वे महसूसते हैं कि उनके मन की बात ही दरअसल देश के मन की बात है। यदि ऐसा है तो निश्चित ही वे आत्ममुग्धता के शिकार हो चले हैं।

वर्ष 1971 में पाकिस्तान के दो टुकड़े करवाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी इसी बीमारी से ग्रस्त हो गई थीं। किसी ने उन्हें तब मां दुर्गा कह पुकारा तो बहुत सारे कोरस में गाने लगे थे ‘इंडिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इंडिया’। सन् 71 के आम चुनावों में इंदिरा जी ने नारा दिया ‘गरीबी हटाओ’। वे प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटीें थीं। यानी जुमला सुपर हिट रहा। तब से आंकड़ों में गरीबी भले ही कम हुई हो, हकीकत में गरीब और गरीब हुआ है, अमीर और अमीर होता चला गया है। आक्सफाॅम संस्था की मानें तो देश की 73 प्रतिशत संपदा पर 1 प्रतिशत उन जैसों का कब्जा है जिन्हें कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ‘हम दो-हमारे दो’ कह इन दिनों पुकार रहे हैं। 2018 में ‘वल्र्ड पाॅवर्टी क्लाॅक’ की रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में सात करोड़ हिन्दुस्तानी बेहद गरीब कैटेगरी ;म्गजतमउम चवअमतजलद्ध में जीवन बिताने के लिए अभिशप्त हैं। लगभग 22 प्रतिशत जनता गरीबी रेखा से नीचे है। इस मुद्दे पर पीएम लेकिन खामोश रहते हैं। वे जिस ‘स्वच्छ भारत-आत्मनिर्भर भारत’ की बात करते हैं, ‘फिर इंडिया- यंग इंडिया’ की बात करते हैं, ‘खादी’ पर चर्चा करते हैं या फिर ‘देश’ पर अपना फोकस बनाए रखते हैं, उन सबसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं वे सारे विषय जिन पर वे खामोश हैं। इंदिरा जी भी सन् 71 में आत्ममुग्धता की शिकार हो चलीं थी। नतीजा उनका तानाशाह बनना रहा। अब वर्तमान प्रधानमंत्री भी इसी आत्ममुग्धता के जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। लक्षण भी स्पष्ट नजर आ रहे हैं। जो भी सरकार की नीतियों से इत्तेफाक नहीं रख रहा है उसे देशद्रोही करार दिया जा रहा है। संविधान प्रदत्त नागरिक अधिकारों का सत्ता खुलकर हनन कर रही है। सोचिए भला प्रधानमंत्री जी क्यों नहीं उन मुद्दों पर बोलते हैं जिन्हें हम सुनना चाहते हैं। ज्यादा मुश्किल नहीं है समझना। दरअसल ये सारे मुद्दे वे हैं जिन पर पिछले सात बरस से केंद्र की सत्ता में काबिज सरकार पूरी तरह विफल रही है। महंगाई को ले लीजिए। प्रधानमंत्री ने ढोल-नगाड़ों के साथ ‘स्वच्छ ईंधन, बेहतर जीवन’ की बात कहते हुए मई, 2016 में ‘प्रधानमंत्री उज्जवला योजना’ की शुरुआत की थी। लक्ष्य रखा गया वर्ष 2019 तक पांच करोड़ गरीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों को कम कीमत पर खाने की गैस उपलब्ध कराना। 2021 आते-आते सरकार दावा करती है कि इस योजना के अंतर्गत 8 ़3 करोड़ परिवारों को लाभ पहुंच चुका है। निश्चित ही सरकार की यह बेहद कल्याणकारी योजना साबित हुई है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू उतना ही निराशाजनक है। एक तरफ वर्ष 2020 से सरकार ने खाने की गैस में दी जाने वाली रियायत (सब्सिडी) को पूरी तरह समाप्त कर डाला तो दूसरी तरफ लगातार इसमें मूल्य वृद्धि होती गई है। दिसंबर 2019 से मार्च 2021 के बीच चार बार रसोई गैस सिलेंडर का मूल्य बढ़ा है। प्रति सिलेंडर यह मूल्य वृद्धि इन चार महीनों में 225 रुपया प्रति सिलेंडर हो चुकी है। इसका सबसे ज्यादा निगेटिव असर ‘उज्जवला योजना’ के लाभार्थियों पर पड़ा है जो वापस लकड़ी और कोयले पर अपना खाना बनाने लगे हैं, क्योंकि वे इस कीमत पर गैस खरीदने में असमर्थ हैं। डीजल और पेट्रोल के दाम आसमान छूने लगे हैं जिसके चलते माल भाड़ा बढ़ा है, नतीजा हर वस्तु महंगी हो चुकी है। वजीर- ए-आला इसीलिए इस पर कुछ नहीं बोलते हैं। बेरोजगारी और अर्थव्यवस्था का सच भी कुछ इतना ही भयावह है इसलिए जनता के मन की बात पीएम के मन की बात का हिस्सा नहीं बनती है।

आप प्रश्न कर सकते हैं कि इस सबका आत्ममुग्धता से क्या लेना-देना? वाजिब प्रश्न है। मुझे ऐसा बहुत पहले से महसूस होता आया है। शायद पीएम साहब और इस सरकार की नीतियों से मेरा इत्तेफाक न रखने के चलते मुझे ऐसा लगता हो। लेकिन जब देश के महामहिम ने 24 फरवरी के दिन अहमदाबाद में वर्षों पहले बने एक स्पोर्ट स्टेडियम का पुनर्निर्माण के बाद उद्घाटन किया तब मेरी यह आशंका मुझे सही होती नजर आई। महामहिम ने जैसे ही उद्घाटन पट्टिका में लगा पर्दा खिसकाया तो सरदार पटेल के स्थान पर नरेंद्र मोदी जी नाम देख सभी हक्के-बक्के रह गए। बहुत हो-हल्ला इस पर मच रहा है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में ढेर सारी संस्थाओं के नाम नेहरू जी, इंदिरा जी, राजीव जी के नाम पर रखे हैं। निश्चित ही ऐसा है लेकिन यह हमारी परंपरा का हिस्सा है। अपने स्वर्गीय नेताओं के नाम पर, महापुरुषों के नाम पर स्मारकों का निर्माण, सड़कों का नाम, भवनों का नाम रखा जाता रहा है ऐसा लेकिन पहली बार हुआ है कि किसी महापुरुष का नाम हटाकर एक सिटिंग पीएम के नाम पर किसी भवन का नाम रखा गया है। सत्ता में रहते खुद की मूर्तियां प्रदेश भर में लगाने का अनोखा काम हालांकि उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अवश्य किया है। राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा पहली बार देखने को मिला। मुझे प्रधानमंत्री जी के आत्ममुग्ध होने और इस आत्ममुग्धता का असर हमारे जनजीवन, हमारे लोकतंत्र पर प्रतिकूल तरीके से पड़ने की भारी आशंका हो रही है। मेरी इस आशंका के पीछे एक इतिहास है। 1933 में जर्मनी में बना एक स्टेडियम तत्कालीन तानाशाह एडोल्फ हिटलर ने अपने नाम पर रखा। रूस के तानाशाह स्टालिन ने तो खुद अपने नाम पर शहर ही बना डाला ‘स्टालिनग्राद’। उनके नाम पर एक भव्य स्टेडियम भी उनके ही शासनकाल में बना था। इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने 1930 में बने एक स्टेडियम का नाम खुद के नाम पर रखा था। हालिया समय में इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन चरम आत्ममुग्धता के शिकार रहे। उनके शासनकाल में 1980 में बने एक विशाल जिमनेजियम का नाम उन्होंने सद्दाम हुसैन जिमनेजियम रखा और खुद ही उसका उद्घाटन किया। नाॅर्थ कोरिया के कुख्यात शासक किम संग दो ने अपने ही नाम पर एक विशाल स्पोर्ट्स काम्पलैक्स 1982 में बनवाया।

इतिहास के पन्ने उलटने पर जो दृष्टांत सामने आते हैं उनसे भयभीत होना जायज है। हम विश्व के एक सशक्त लोकतंत्र बन उभर चुके हैं। लोकतंत्र में बातें भी लोक के मन की होनी चाहिए, नीतियां भी लोक कल्याण की बननी चाहिए। जिस तरीके से वर्तमान सरकार कृषि कानूनों के  विरोध में चल रहे आंदोलन को इग्नोकर करती नजर आ रही है, नागरिकता संशोधन कानून को लेकर उसका रवैया, जे.एन.यू. , जामिया जैसे शिक्षण संस्थानों को लेकर उसका रुख, लोकतंत्र की नींव कहलाए जाने वाली सभी महत्वपूर्ण संस्थाओं में लगातार आ रहा विचलन आदि को जरा गहराई से समझने का प्रयास करेंगे तो आपको भी मेरी तरह की नाना प्रकार आशंकाएं अपने घेरे में लें लेंगी। उम्मीद लेकिन जिलाए रखनी चाहिए कि यह हमारा भ्रम हो। उम्मीद करता हूं मेरी समस्त आशंकाएं गलत साबित हों और हमारा लोकतंत्र बचा रहे।

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