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Editorial

आस्था दरकने का संकट

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र संयुक्त राष्ट्र अमेरिका में तब बवंडर उठ खड़ा हुआ जब 2018 में वहां के सुप्रीम कोर्ट में बतौर सहायक जज एक ऐसे वकील की नियुक्ति की गई जिन पर नस्लवाद और यौन दुराचार के गंभीर आरोप थे। ब्रेट क्वानोग इन गंभीर आरोपों के बावजूद जज बना दिए गए। हमारे देश में इन दिनों सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर यौन दुराचरण के आरोपों के चलते न्यायपालिका के शीर्ष की निष्ठा पर प्रश्न उठने लगे हैं। स्वयं न्यायमूर्ति रंजन गोगोई एक बड़े षड्यंत्र की तरफ इशारा कर रहे हैं। उनका मानना है कि जिस महिला ने उन पर आरोप लगाए हैं उसे ऐसा करने के लिए उन शक्तियों द्वारा उकसाया गया है जो बतौर मुख्य न्यायाधीश उनसे पीड़ित रहे हैं अथवा ऐसा उन महत्वपूर्ण याचिकाओं को प्रभावित करने के लिए किया गया है जिनकी सुनवाई स्वयं न्यायमूर्ति गोगोई कर रहे हैं। इन याचिकाओं में प्रतिकूल आदेश की आशंका से प्रभावित ताकतें बकौल मुख्य न्यायाधीश उनका चरित्र हनन करने का प्रयास कर रही हैं। यदि देश की शीर्ष अदालत का शीर्ष न्यायाधीश ऐसी आशंका जाहिर करे तो प्रश्न मुख्य न्यायाधीश पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं रह जाता, खतरा लोकतंत्र के सबसे विश्वसनीय स्तंभ को कमजोर करने का बन जाता है। गत् वर्ष जनवरी में जिस प्रकार चार न्यायाधीशों ने, जिनमें गोगोई भी शामिल थे, सार्वजनिक रूप से कहा कि लोकतंत्र खतरे में है। ऐसे में न्याय की सबसे बड़ी पीठ का चीरहरण भयावह है। यदि गोगोई की आशंका में इंच भर भी सच्चाई है तो समझ लीजिए हालात आपातकाल से भी कहीं ज्यादा खतरनाक हैं। पहले इस मामले को समझा जाए। न्यायमूर्ति रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट के सचिवालय में काम करने वाली एक महिला द्वारा यौन दुराचार के आरोप लगाए गए हैं। यह महिला जस्टिस गोगोई के निवास में बतौर उनकी सहायिका नियुक्त थी। महिला का कहना है कि न केवल न्यायमूर्ति गोगोई ने उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जो यौन शोषण की परिधि में आता है, उसकी शिकायत के पश्चात उसे और उसके दो रिश्तेदारों की नौकरी छीन ली गई। इस महिला द्वारा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को इस बाबत एक पत्र भेजा गया जो चार महत्वपूर्ण मीडिया पोर्टल्स ने 20 अप्रैल को जारी कर दिया। शनिवार को उच्चतम न्यायालय का अवकाश होता है। जस्टिस गोगोई ने अवकाश के बावजूद इन आरोपों पर सुनवाई के लिए कोर्ट बुला ली। उनके साथ जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस संजीव खन्ना इस खंडपीठ का हिस्सा थे। गोगोई ने अवकाश के दिन इस विशेष सुनवाई के दौरान जो कहा वह 18 जनवरी, 2018 के दिन चार जजों की प्रेसवार्ता का स्मरण कराता है। तब आजाद मुल्क के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने प्रेस को संबोधित करने का अप्रत्याशित कदम उठाया था। न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने इस प्रेस वार्ता में आशंका व्यक्त करते हुए कहा था कि ‘सुप्रीम कोर्ट को रिमोट कंट्रोल के जरिए चलाने का प्रयास किया जा रहा है।’

जस्टिस गोगोई ने तब ‘लोकतंत्र खतरे में है’ कह डाला था। इस सुनवाई के दौरान गोगोई ने कहा “There are forces that are trying to destabilize the judiciary. There are bigger forces behind these allegations hurled at me” यानी उन्हें आशंका है कि उनके चरित्र हनन के पीछे कुछ ऐसी शक्तिशाली ताकतें हैं जो न्यायपालिका को निष्पक्ष रूप से काम नहीं करने देना चाहती। उन्होंने यह भी कह डाला कि ‘मैं देशवासियों को बताना चाहता हूं कि न्यायपालिका को गंभीर खतरा इस समय हो चला है।’ मुख्य न्यायाधीश की इन आशंकाओं पर चर्चा से पूर्व कुछ तथ्य सामने रखने जरूरी हैं जिससे यह समझने में मदद मिले कि न्यायपालिका स्वयं पर लगने वाले ऐसे आरोपों को कितनी गंभीरता से लेती है। नब्बे के दशक में राजस्थान सरकार की एक कर्मचारी भंवरी देवी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। भंवरी देवी ने अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। उनकी मदद के लिए महिलाओं के अधिकारों पर काम करने वाली एक संस्था ‘विशाखा’ सामने आई। ‘विशाखा’ के प्रयासों के चलते 1997 में सुप्रीम कोर्ट ने अपना महत्वपूर्ण निर्णय दिया जिसे ‘विशाखा गाइडलाइन्स अगेन्सट सेक्सुअल हैरेसमेंट’ के नाम से जाना जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने यौन शोषण की परिभाषा तय करते हुए सभी सरकारी एवं निजी संस्थाओं, कंपनियों में यौन शोषण के मामलों से निपटने के लिए एक कमेटी बनाए जाने का आदेश दिया। 2013 में यानी इस निर्णय के पंद्रह साल बाद देश की संसद ने कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ कानून बनाया। इस कानून के बनने से पूर्व एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें रंजन गोगोई भी शामिल थे, इस बात पर खेद जताया था कि पंद्रह बरस पूर्व दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं हो रहा है। इस पीठ ने संसद से कानून बनाए जाने की तब बात कही थी। मध्य प्रदेश के एक जज पर लगे आरोपों की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ही व्यवस्था दी थी ‘In order to ensure that the investigation process is fair and just, it is imperative to divest the judge concerned (against whom allegations have been levelled), of his administrative and supervisory authority and control of witnessess, to be produced either on behalf of the complainant, or on behalf of the judge concerned himself’ यानी स्वयं सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यदि कोई जज यौन दुराचार के आरोपों के घेरे में आता है तो उसके जांच रिपोर्ट फाइनल होने तक सभी अधिकार छीन लिए जाएं। 2014 में कानून की एक छात्रा ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। बकौल पीड़िता जज स्वतंत्र कुमार ने सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश रहते उसके संग यौन दुर्व्यवहार किया था। इस मामले की सुनवाई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पी. सदाशिवम और न्यायाधीश रंजन गोगोई ने की थी। यह वही समय था जब कलकत्ता हाईकोर्ट के जज एके गांगुली पर ऐसे ही आरोपों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट कर रहा था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की इस खंडपीठ ने यह मानते हुए खेद व्यक्त करते हुए कि जजों पर लगने वाले आरोपों की सुनवाई का कोई स्थापित तरीका उपलब्ध नहीं है, दो जाने-माने वकीलों, फली एस नरीमन और पीपी राव की एक कमेटी बनाते हुए उनसे ऐसी व्यवस्था बनाए जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को एक रिपोर्ट सौंपने को कहा था। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ‘No matter how high the judges are, they are definitely not to be treated as immune from charges of sexual harassment of women at the workplace’ उपरोक्त से दो बातें स्पष्ट होती हैं, पहली यह कि 1997 में कार्यस्थल पर यौन शोषण को रोकने के लिए तथा ऐसे आरोपों की जांच के लिए जो दिशा-निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए, उन पर स्वयं कोर्ट ने खुद के लिए अमल नहीं किया। दूसरी बात आरोपों की जांच होने के दौरान ऐसे जज को न्यायिक एवं प्रशासनिक कार्य न करने दिए जाने की बात भी इस मामले में इग्नोर की गई है। रंजन गोगोई स्वयं पर लगे आरोपों की जांच खुद कैसे कर सकते हैं? या फिर कैसे अन्य न्यायाधीशों की कमेटी बना सकते हैं? उन्हें तो आरोप लगने के साथ ही इस पूरे प्रकरण से खुद को दूर करते हुए एक मिसाल कायम करनी चाहिए थी। अवकाश के दिन कोर्ट बुलवाकर उन्होंने न्यायपालिका पर मंडरा रहे खतरों की जो बात कही वह पूरी तरह सही भी हो सकती है लेकिन बगैर जांच कराए स्वयं को किन्हीं शक्तिशाली ताकतों के निशाने पर होने की बात कह मुख्य न्यायाधीश ने जजों के ऊपर लगने वाले यौन शोषण या अन्य प्रकार के आरोपों की जांच प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगा डाला है। इसका पहला दुष्प्रभाव तत्काल देखने को मिला जब कथित रूप से पीड़ित महिला ने उसके आरोपों की जांच के लिए बनी कमेटी की ही निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए स्वयं को इस जांच से अलग कर डाला है।

मैं समझता हूं हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर खतरा वास्तविक है। लोकतंत्र की बुनियाद वर्तमान दौर में दरकती हम सभी देख रहे हैं। हमने देखा देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई और गुप्तचर एजेंसी इन्टेलिजेंस ब्यूरो की गंदगी का सार्वजनिक होना। हमने सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की आशंका, उनके आक्रोश को भी सार्वजनिक होते देखा। सैन्य बलों के शौर्य का श्रेय लूटते हम इस समय हर रोज अपने राजनेताओं को देख रहे हैं। रंजन गोगोई की आशंका और चेलमेश्वर का कथन बहुत संभावना है कि मात्र आशंका न हो, कटु सत्य हो, विलियम शेक्सपीयर के विश्व प्रसिद्ध नाटक ‘जूलियस सीजर’ के मुख्य पात्र सीजर का कथन ऐसे में याद आ रहा है कि “Caesar’s wife must be above suspicion” यानी सीजर की पत्नी हर प्रकार के संदेहों से ऊपर होनी चाहिए। न्यायपालिका संग भी यही सबसे बड़ा सच है कि उसे स्वयं को हर प्रकार के संदेहों से ऊपर रहना चाहिए ताकि उसके प्रति जनमानस की आस्था न दरके। सीजर और न्यायपालिका पर अगली बार कुछ और चर्चा/इंतजार करें।

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