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Editorial

चुनावी रंग में रंगा देश

देश चुनावी माहौल में रंगने लगा है। इस वर्ष चार राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं। इनमें राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मिजोरम शामिल हैं। साथ ही तेलंगाना में भी मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव विधानसभा भंग कर समय पूर्व ही चुनाव में जाने की घोषणा कर चुके हैं। लोकसभा के लिए भी चुनावी तैयारियां तेज होने लगी हैं। सोलहवीं लोकसभा का कार्यकाल मई 2018 के मध्य में समाप्त होने जा रहा है। इस दृष्टि से आम चुनाव विभिन्न चरणों में अप्रैल से मई माह के भीतर होने की पूरी संभावना है। भारतीय जनता पार्टी 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारी जनादेश से सत्तासीन हुई थी। पहली बार अपने दम पर उसने केंद्र में सरकार बनाई। हालांकि सरकार केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए की कही जाती है। लेकिन सोलहवीं लोकसभा में भाजपा 286 सीटें जीत पूर्ण बहुमत के साथ विजयी हुई। चूंकि चुनाव गठबंधन के अंतर्गत लड़ा गया इसलिए सरकार में भाजपा के सहयोगी दल शामिल हैं। भाजपा को मिला अभूतपूर्व जनादेश और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से लेकिन एनडीए के सहयोगी दल संतुष्ट नहीं हैं। पिछले साढ़े चार सालों में दो महत्वपूर्ण बातें हुई। पहली भाजपा का राज्यों में हुए चुनावों में लगातार विजयी होते रहना और दूसरा एनडीए के घटक दलों में असंतोष का बढ़ते जाना। नतीजा भाजपा के सबसे पुराने और विश्वस्त सहयोगी शिवसेना का खुलकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व पर अविश्वास जताने के रूप में सामने आया है। बहुत संभावना है कि शिवसेना लोकसभा और अगले वर्ष ही सितंबर में प्रस्तावित महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव अकेले लड़ सकती है। तेलगु देशम एनडीए से अलग हो ही चुकी है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री की सबसे बड़ी नाराजगी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा न दिए जाने की रही। उनकी नाराजगी का एक बड़ा कारण प्रधानमंत्री द्वारा उन्हें सम्मान न दिया जाना भी रहा। स्मरण रहे एन चंद्रबाबू नायडू न केवल एनडीए के संयोजक रह चुके हैं, बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उनकी भूमिका संकट मोचक की भी रही है। 1998 तक वे एंटी भाजपा मोर्चे के साथ थे। राजनीति के शातिर खिलाड़ी नायडू राजनीति की हवा भांपने में माहिर हैं। उन्होंने ऐसे समय में भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन का हाथ थामा, जबकि राममंदिर की लहर चलते भाजपा का ग्राफ खासा बढ़ चुका था और वाजपेयी दो बार प्रधानमंत्री रह चुके थे। हालांकि नायडू की छवि एक धर्मनिरपेक्ष नेता की रही हैं लेकिन वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा के प्रति उनका समर्पण भाव इतना गहरा था कि 2002 में गुजरात दंगा बाद भी वे एनडीए का हिस्सा बने रहे। नायडू गुजरात दंगों के चलते एनडीए में खुद को खासा असहज पा रहे थे। यही हाल नेशनल कॉन्फ्रेंस का था जिसके नेता फारुख अबदुल्लाह की नायडू संग खासी छनती थी। ऐसा माना जाता है कि अब्दुल्लाह के कहने पर ही नायडू इन दंगों बाद भी एनडीए का हिस्सा बने रहे। यदि वे उस समय एनडीए का साथ छोड़ देते तो फारुख अब्दुल्लाह की स्थिति बेहद असहज हो जाती। नायडू ने लेकिन अपने करीबी सहयोगी टीडीपी नेता जीएमसी बालयोगी की मृत्यु पश्चात लोकसभा अध्यक्ष पद पर अपने दल के किसी नेता का नाम प्रस्तावित नहीं किया। इस तरह उन्होंने भाजपा संग अपनी दूरी बनने के राजनीतिक संकेत दे डाले थे। 2014 के चुनाव से पूर्व जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया तब नायडू के सामने मात्र दो ही विकल्प मौजूद थे या तो मोदी का विरोध कर वे एनडीए से विदा ले लें या फिर साथ बने रहते हुए अपने वोट बैंक के लिए काम करें। उन्होंने भाजपा संग दूरी बरकरार रखते हुए भी एनडीए का हिस्सा बने रहने का निर्णय लिया। मोदी के पीएम बनने के साथ ही नायडू विभाजित आंध्र प्रदेश के लिए स्पेशल राज्य की मांग लगातार केंद्र सरकार के सामने उठाते रहे लेकिन उनकी मांगों को केंद्र सरकार और भाजपा ने तरजीह नहीं दी। हालात इस स्तर तक जा पहुंचे कि एनडीए छोड़ने से पहले नायडू ने जब पीएम से संपर्क करने का प्रयास किया तो पीएम उन्हें उपलब्ध नहीं हुए। एनडीए के एक अन्य छोटे लेकिन बिहार की राजनीति में महत्वपूर्ण दखल रखने वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी भी इन दिनों संकेत दे रही है कि वह गठबंधन से अलग हो सकती है। नीतीश कुमार की एनडीए में वापसी के बाद से ही इसके अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा स्वयं को उपेक्षित पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जहां से सर्वाधिक 73 सीटें लोकसभा में पाई हैं, छोटे-छोटे घटक दल अब आंखें तरेरने लगे हैं। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर हालांकि योगी मंत्रिमंडल में मंत्री हैं, लेकिन वे खुलकर अपना असंतोष जाहिर करते इन दिनों घूम रहे हैं।
भाजपा के लिए एक बड़ी दुविधा तमिलनाडु की भी हैं जहां वह एक विश्वसनीय क्षेत्रीय सहयोगी नहीं बना पाई है। राजस्थान में वसुंधरा राजे की सरकार से जनता की नाराजगी जग जाहिर है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यहां कांग्रेस की वापसी तय है। मध्य प्रदेश में जैसे-तैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की मुश्किलें बढ़ने लगी हैं। एक तरफ कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरआदित्य आपसी अदावत को पीछे छोड़ चुनावी मैदान में कमर कसकर उतर चुके हैं तो एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने  के चलते केंद्र सरकार, विशेषकर भाजपा के खिलाफ राज्यभर का सवर्ण मतदाता मुखर हो गया है। हालांकि इस मुद्दे पर मध्य प्रद्रेश ही नहीं, बल्कि पूरे देश का सवर्ण समाज भाजपा से खासा आक्रोशित है। भाजपा नेतृत्व के समक्ष एक बड़ा संकट बहुजन समाजपार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच चुनावी गठबंधन का भी है। उत्तर प्रदेश में यह गठबंधन लोकसभा चुनावों में भाजपा को ध्वस्त करने की क्षमता रखता है। हालांकि बहुत जोर-शोर से गठबंधन की घोषणा करने वाली बसपा प्रमुख मायावती अब कुछ ऐसे संकेत दे रही हैं जिनसे आशंका उत्पन्न होने लगी है कि आखिरी क्षण में वे अकेले चुनाव मैदान में उतरने का ऐलान कर सकती हैं। इस आशंका के पीछे मुख्य कारण मायावती सरकार के कथित भ्रष्टाचार से जुड़े ऐसे मामले हैं जिनकी जांच का भय बहिन जी को गठबंधन से दूर कर सकता है। यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही यह भाजपा के लिए बेहद मुफीद होगा। मायावती इस आधार पर भी गठबंधन से दूरी बना सकती हैं कि उन्हें कांग्रेस मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में सम्मानजनक सीटें नहीं दे रही है। छत्तीसगढ़ में तो उन्होंने अजीत जोगी संग गठबंधन का ऐलान तक कर डाला है। कांग्रेस के सामने बड़ा संकट इस बात का है कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन उसे महत्व देने को तैयार नहीं तो अन्य राज्यों में बसपा संग गठबंधन कर खास लाभ नहीं पाती है। उल्टे बसपा के रूप में भविष्य में वह नया राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी जरूर खड़ा कर लेगी। भाजपा नेतृत्व हालांकि कांग्रेसमुक्त भारत के अपने घोषित लक्ष्य को लगभग पा लेने का दावा इन दिनों कर रहा है, इस सच को वह भलीभांति समझ रहा है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भले ही इस समय कोमा में जा पहुंची है, नरेंद्र मोदी सरकार से दिनों दिन जन सामान्य की बढ़ रही नाराजगी कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम कर रही है। मोदी सरकार का निष्पक्ष आकलन उसे कई मोर्चे पर पूरी तरह नाकाम साबित कर रहा है। बेरोजगारी अपने चरम पर है। उद्योग-धंधे मरणासन्न है। महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। कश्मीर में हालात बेकाबू हैं। भ्रष्टाचार थमा तो था ही नहीं, राफेल विमान सौदे पर आ रही नित नई जानकारियां भाजपा के लिए ठीक वैसी ही मुसीबतें खड़ी कर रही हैं जैसा बोफोर्स तोप सौदे में कथित 65 करोड़ के घोटाले ने राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के लिए किया था। तब मामला मात्र पैंसठ करोड़ का था। राफेल में आरोप छत्तीस हजार करोड़ की दलाली के लग रहे हैं। भाजपा और सरकार के लिए सबसे बड़ा संकट फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति के उस बयान बाद खड़ा हो चुका है जिसमें उन्होंने अनिल अंबानी की कंपनी संग राफेल कंपनी के गठबंधन का ठीकरा भारत सरकार पर फोड़ा है। रक्षा मंत्री और वित्तमंत्री भले ही इस पर कुछ सफाई दें, अब यह तय है कि राफेल विमान सौदे का मुद्दा इन चुनावों में भाजपा के लिए बड़ी परेशानी का सबब बनने वाला है। नतीजे चाहे जो भी हों, यह तय है कि 2019 के आम चुनाव और पांच राज्यों में इस वर्ष होने जा रहे विधानसभा चुनाव कांग्रेस से ज्यादा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के राजनीतिक भविष्य को तय करने का काम करेंगे।

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