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Editorial

प्रसंग लोकतंत्र की मजबूती का

यदि सेना का एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ जनरल देश के प्रति अपने अद्वितीय योगदान के बावजूद सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा भुला दिया जाता है और एक अन्य वरिष्ठ जनरल इसे सेना के राजनीतिकरण से जोड़ देखते हैं तो निश्चित ही यह गंभीर चिंता का विषय है। ठीक इसी प्रकार अपनी जांबाजी और ईमानदारी के लिए विख्यात एक पुलिस अफसर यदि खुद को मानसिक रूप से अपने ही मुल्क में द्वितीय श्रेणी का नागरिक मान लेने को विवश हैं तो यह भी लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है। आर्क बिशप ने अपने अनुयायियों को सोच-समझकर २०१९ में वोट डालने की बात कही है। उनके कहे के भले ही जो भी राजनीतिक निहितार्थ तलाशे जा रहे हों, हर जागरूक भारतीय को जनरल मेहता और जुलियो रिबेरो की चिंताओं पर चिंतन अवश्य करना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत रह सके

पिछला पखवाड़ा खासा उथल-पुथल का रहा। कर्नाटक में नैतिकता और जनादेश की दुहाई दे भाजपा ने राज्य के राज्यपाल से पहले सरकार बनाने का न्यौता तो पा लिया, लेकिन इसे नैतिकता और जनादेश का अपमान बताने वाली कांग्रेस ने जनता दल (सेक्युलर) के साथ मिलकर भाजपा की सरकार को मात्र दो दिन में गिरा डाला। अब राज्य में जद (सेक्युलर)-कांग्रेस गठबंधन की सरकार है। यह गठबंधन कितना नैतिक है और उसे सरकार बनाने का कैसा जनादेश है, यह सभी जानते-समझते हैं। कर्नाटक के राज्यपाल की भूमिका की नैतिकता भी अद्भुत है। वे कितने संविधान के प्रति समर्पित हैं और कितना भाजपा के प्रति, इस पर भी इन दिनों जमकर बहस चल रही है। इस बीच तमिलनाडु में वेदांता समूह की तांबा फैक्ट्री में भारी उत्पात के बाद राज्य सरकार अपनी कुंभकर्णी नींद से जागी और उसने प्रदूषण का जहर उगलते इस प्लांट की बंदी का निर्णय ले लिया। केंद्र में काबिज नरेंद्र मोदी सरकार ने अपनी सत्ता के चार बरस भी इसी पखवाड़े पूरे कर लिए। सरकार और भाजपा विकास और विकास की जीत के नाम जश्न मना रही है तो विपक्षी दल इन चार सालों को विश्वासघात के वर्ष कह अपना राग अलाप रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश का तूफानी दौरा कर एक बार फिर विदेश यात्रा पर निकल चुके हैं। यानी इतना कुछ है जिस पर लिखा जा सकता है। मेरा ध्यान लेकिन पिछले दिनों पढ़ने को मिले दो लेखों पर अटक गया है। इन दो लेखों के लेखक सेवानिवृत्त हो चुके वरिष्ठ सैन्य और पुलिस अधिकारी हैं। दोनों की ही गिनती उन अफसरों में होती है जिनकी निष्ठा बेदाग रही है। तो चलिए इन लेखों की बरक्श देश की वर्तमान दशा और दिशा को समझने का प्रयास किया जाए। शांतिकाल में अद्वितीय योगदान के लिए भारतीय सेना का सर्वोच्च पदक है परम विशिष्ट सेवा मेडल (पीवीएसएम) इसी श्रेणी का एक अन्य सम्मान है विशिष्ट सेवा मेडल (वीएसएम)। युद्धकाल में महावीर चक्र दूसरे नंबर का सबसे बड़ा मेडल है। वीर चक्र तीसरे स्थान पर है। ऐसे बिरले ही सैनिक हुए हैं जिन्हें युद्ध एवं शांतिकाल में यह सभी सम्मान दिए गए हों। जाहिर है ऐसे सभी सम्मान पाने वाले सैनिक सामान्य नहीं, कुछ अलग ही मिट्टी के होते हैं। ऐसे में जब राष्ट्रवाद की जबरदस्त आंधी चल रही हो, इन वीर सपूतों को विस्मृत कर दिया जाए तो प्रश्न उठने लाजिमी हैं। पिछले दिनों भारतीय थल सेना के एक ऐसे ही शूरवीर ने जब अंतिम सांस ली तो उनको याद करने की, उन्हें सम्मानजनक अंतिम विदाई देने की सुध किसी ने न ली। मैं बात कर रहा हूं सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर चंद्र बक्शी उर्फ जोरू की जिनका गत्‌ २४ मई को सत्तानवे वर्ष की आयु में निधन हो गया। आश्चर्य और विषाद की बात यह कि उनके निधन पर नकली ही सही लेकिन एक आंसू तक बहाना हमारे द्घोर राष्ट्रभक्त राजनेताओं और उनके भक्तों ने उचित नहीं समझा। ख्याति प्राप्त सेवानिवृत्त मेजर जनरल अशोक मेहता ‘दि इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखते हैं : “India’s greatest wartime hero was laid to rest unsung at the ripe old age of 97 on May 24. It marked the end of an era. There was no ceremonial send-off, no ritual last rites at the crematorium, no last post, no rise, and only one wreath was laid. The omissions were not made good at the prayer ceremony on May 25. India’s true military icon, Lt Gen Zorawar Chand Bakshi, unarguably India’s greatest soldier, did not die. He simply faded away. He deserved a farewell befitting the Bakshis of all times. Without naming them, lesser soldiers were made much of, because they were politically connected. Zoru was not. He was a true professional and was completely apolitical.” फौज के एक वरिष्ठ जनरल के ये विचार निसंदेह चिंताजनक तो हैं ही, साथ ही एक जांबाज सिपाही के तिरस्कार के चलते सेना और वर्तमान सत्ता की बेरुखी पर भी बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। जनरल मेहता का यह कहना कि जनरल जोरावर को अंतिम विदाई के समय गार्ड ऑफ ऑनर न दिया जाना, सैनिक सम्मान से अंतिम विदाई का न होने का कारण, उनका पूर्णतः गैरराजनीतिक होना था, एक बेहद गंभीर कथन है। भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी सफलता सेना का पूरी तरह गैरराजनीतिक होना रहा है। ऐसे में यदि जनरल बक्शी की अनदेखी इसी विशेषता के चलते होती है और एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ जनरल इस पर कठोर टिप्पणी करते हैं तो इसे खतरे की द्घंटी मान व्यवस्था को दुरुस्त करना बेहद जरूरी हो जाता है ताकि सैन्य बलों का मनोबल तो बना रहे ही, उसके राजनीतिकरण की जिस संभावना का जिक्र जनरल मेहता ने किया है, उसे भी तुरंत काबू में किया जा सके। लेफ्टिनेंट जनरल जोरावर चंद्र बक्शी के पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में थे। उन्हें ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर से सम्मानित किया गया था। जोरावर बक्शी, १९४३ में भारतीय सेना की ब्लूच रेजिमेंट में कमीशन पा अफसर बने। द्वितीय विश्वयुद्ध में बर्मा में जापानी फौज के साथ युद्ध में उनकी बहादुरी के लिए ब्रिटिश साम्राज्य ने उन्हें सम्मानित किया था। बर्मा युद्ध के पश्चात जोरावर बक्शी ने मलेशिया को जापान से मुक्त कराने के लिए हुए युद्ध में भी भाग लिया। अद्भुत शौर्य के चलते जोरावर बक्शी को आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दे मेजर बना दिया गया। आजादी के बाद बक्शी पांच गोरखा राइफल्स में आ गए। १९४८ में कश्मीर में पाकिस्तानी सेना की द्घुसपैठ में उनकी शूरवीरता ने उन्हें वीरचक्र दिलाया तो १९६५ के भारत-पाक युद्ध में महावीर चक्र। बाद के वर्षों में उन्हें वीएसएम और पीवीएसएम से भी सम्मानित किया गया। ऐसे जांबाज फौजी की अंतिम विदाई के अवसर पर केंद्र सरकार का एक भी मंत्री, यहां तक कि सेना के किसी भी वरिष्ठ अफसर का उपस्थित न होना निसंदेह बेहद दुखद है। वह भी ऐसे समय में जब राष्ट्रवाद की आंधी को फैलाने का काम जोरों पर हो और राष्ट्रभक्ति का राग अलापने वालों की सरकार देश के बाइस राज्यों और केंद्र में हो। दूसरा आर्टिकल ‘दि टाइम्स ऑफ इंडिया’ का है। इस लेख के लेखक हैं जुलियो रिबेरो। रिबेरो भारतीय पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं जिन्हें पंजाब पुलिस का महानिदेशक रहते सिख आतंकवाद से कड़ाई से निपटने के लिए जाना जाता है। वे उन चंद पुलिस अफसरों में से एक हैं जो केंद्र सरकार के साथ-साथ दो-दो राज्यों के पुलिस महानिदेशक भी रहे। गुजरात और पंजाब के पुलिस प्रमुख, मुंबई के पुलिस कमीशनर, केंद्रीय रिजर्व पुलिस फोर्स के महानिदेशक, केंद्रीय गृह मंत्रालय में विशेष सचिव और रोमानिया में राजदूत रह चुके रिबेरो का २८ मई के ‘दि टाइम्स ऑफ इंडिया’ में एक लेख प्रकाशित हुआ : “A Prayer For Secularism : Hindu Rashtra, which would make my country a saffron Pakistan, is profoundly anti-national” अपने इस लेख में रिबेरो भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने वालों पर टिप्पणी करते हुए लिखते हैं कि ‘यह मेरे मुल्क को भगवा पाकिस्तान बनाने जैसा होगा।’ रिबेरो ने यह लेख दिल्ली के आर्क बिशप अनिल क्वोटो के उस पत्र से उठे बवाल पर लिखा है जिसमें आर्क बिशप ने अपने अनुयायियों यानी ईसाई समाज को २०१९ के चुनाव में सोच-समझकर वोट देने की बात कही है। ईसाई धर्मगुरु के इस पत्र पर भारी हंगामा इन दिनों राजनीतिक मंचों पर मचा हुआ है। भाजपा समर्थकों की त्यौरियां चढ़ी हैं। बिशप ने संविधान प्रदत्त लोकतांत्रिक मूल्यों और भारतीय समाज के धर्म निरपेक्ष आदर्श व्यवस्था पर मंडरा रहे खतरों का जिक्र करते हुए अपने अनुयायियों को चेताया है कि उनका वोट बहुत सोच- समझकर दिया जाना बेहद आवश्यक है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व, जिनमें पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह शामिल हैं, बिशप अनिल क्वोटो पर धर्म के आधार पर मतों के ध्रुवीकरण का आरोप लगा चुके हैं। केंद्रीय मंत्री केजे अल्फोंस ने धर्मगुरुओं को राजनीति में दखल न देने की सलाह दे डाली है। रिबेरो ने इसी प्रसंग को आधार बनाते हुए अपने इस लेख में मोदी सरकार के केंद्र में बनने के बाद से लगातार अल्पसंख्यक समाज पर बढ़ रहे खतरों का जिक्र किया है। रिबेरो का कहना है कि मुस्लिम समाज को आतंकित किया जा रहा है। अगला निशाना ईसाई समाज होगा। वे लिखते हैं कि ‘मैं जिस समाज में पला-बढ़ा वह निश्चित ही हिंदू बाहुल्य था, पुलिस में मेरे आला अफसर और मेरे जूनियर ज्यादातर हिंदू थे, लेकिन मुझे कभी भी कोई परेशानी नहीं हुई।’ वे कहते हैं कि ‘मैं एक देशभक्त ईसाई हूं, जैसा इस देश के अल्पसंख्यक अन्य ईसाई हैं। अब लेकिन मैं खुद को हिंदू राष्ट्र के भीतर रहने के लिए तैयार कर रहा हूं। मैं केवल इतना चाहता हूं कि मुझे अपने धर्म अनुसार आचरण करने की छूट होनी चाहिए। मैं यह उम्मीद रखता हूं कि मुझे धर्म परिवर्तन कराने जैसे झूठे मामलों में नहीं फंसाया जाएगा। मुझे तैयार रहना होगा कि अब मैं अपने ही देश में सेकेंड क्लास नागरिक बनकर रहूं। मैं तैयार रहूं कि मुझे राज्यपाल, जज अथवा सेना का प्रमुख नहीं बनाया जाएगा क्योंकि मैं अल्पसंख्यक हूं। मैं इसके लिए भी तैयार हूं। इस शर्त पर की मुझे बेवजह राष्ट्रद्रोही न करार दिया जाए और मेरी देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न न लगाए जाए। यदि ऐसा होता है तो मेरा देश भगवा पाकिस्तान समान बन जाएगा। आर्क बिशप भी इसी आशंका से पीड़ित हैं। उन्हें गलत न समझा जाए।’ मेरा मानना है कि यदि सेना का एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ जनरल देश के प्रति अपने अद्वितीय योगदान के बावजूद सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा भुला दिया जाता है और एक अन्य वरिष्ठ जनरल इसे सेना के राजनीतिकरण से जोड़ देखते हैं तो निश्चित ही यह गंभीर चिंता का विषय है। ठीक इसी प्रकार अपने जांबाजी और ईमानदारी के लिए विख्यात एक पुलिस अफसर यदि खुद को मानसिक रूप से अपने ही मुल्क में द्वितीय श्रेणी का नागरिक मान लेने को विवश हैं तो यह भी लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है। आर्क बिशप ने अपने अनुयायियों को सोच-समझकर २०१९ में वोट डालने की बात कही है। उनके कहे के भले ही जो भी राजनीतिक निहितार्थ तलाशे जा रहे हों, हर जागरूक भारतीय को जनरल मेहता और जुलियो रिबेरो की चिंताओं पर चिंतन अवश्य करना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत रह सके।

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