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Editorial

कांग्रेस अब राहुल-प्रियंका हवाले

पंजाब में सत्ता परिवर्तन कोई मामूली घटना नहीं है। इस घटना के पीछे का घटनाक्रमअराजनीतिक राहुल गांधी के राजनीतिक अवतार कीपटकथा कहता है। दशकों बाद ऐसा कुछ कांग्रेस के भीतर देखने को मिला है। इंदिरा गांधी के दौर में प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों को बदला जाना एक आम घटना हुआ करती थी। इंदिरा गांधी ने अपने किसी भी क्षत्रप को खुलकर शासन करने की छूट नहीं दी थी। मुख्यमंत्री भले ही कोई हो, सत्ता की कुंजी इंदिरा अपने हाथों में ही रखती थीं। सोनिया गांधी द्वारा पार्टी की कमान संभालने के बाद इस परिपार्टी को बदला गया। राज्यों में मुख्यमंत्री ताकतवर हुए। अनावश्यक रूप से दिल्ली ने उनके कामकाज में हस्तक्षेप करना कम कर दिया। सोनिया गांधी दरअसल ‘रिलेक्टेंट पॉलिटिशयन’ (Reluctant politician) रही हैं। वे न तो अपने पति राजीव गांधी की इन्ट्री राजनीति में चाहती थीं, न ही राजीव जी की हत्या पश्चात स्वयं सत्ता संभालने की वे इच्छुक थीं। 1992 में कांग्रेस नेताओं की तमाम कोशिशों के बाद भी उन्होंने पार्टी की कमान संभालने अथवा  सरकार का दायित्व लेने से इंकार कर एक अद्भुत मिसाल कायम की। भारतीय राजनीति में ऐसे उदाहरण बिरले हैं जहां किसी राजपुरुष ने स्वयं सत्ता ठुकराई हो। ऐसे मेरी दृष्टि में केवल दो व्यक्ति हैं। महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण। महात्मा ने पूरे बत्तीस बरस स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन की अगुवाई की लेकिन आजादी के बाद सत्ता अपने हाथों लेने से स्पष्ट दूरी बना डाली। जेपी का संघर्ष न होता तो आपातकाल के दौरान तानाशाह बन उभरीं इंदिरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर पाना न तो मोरारजी देसाई की कूवत थी, न ही चौधरी चरण सिंह की। जेपी ने भी देश की पहली गैर कांग्रेसी सरकार से दूरी बना खुद को सत्ता मोह में फंसने नहीं दिया। सोनिया गांधी आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास में ऐसा ही तीसरा व्यक्तित्व बन उभरी हैं। नेहरू-गांधी परिवार को हेय दृष्टि से देखने वालों को मेरी बात से सख्त नाइत्तेफाकी हो सकती है। लेकिन यदि पूर्वाग्रहों का चश्मा उतार आकलन करें तो गांधी, जेपी और सोनिया को छोड़ एक उदाहरण नहीं ढूंढ़ पायेंगे जहां त्याग और बलिदान का प्रतिदिन ‘जाप’ करने वाले किसी भी राजनेता ने सत्ता ठुकराई हो। सोचिए है ऐसा कोई अन्य उदाहरण? गांधी और जयप्रकाश ने देश के दो बड़े राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व किया लेकिन स्वयं कभी चुनावी राजनीति को हिस्सा नहीं बने। सोनिया गांधी तो बकायदा चुनावी राजनीति का अटूट हिस्सा हैं। उनके नेतृत्व में कमजोर कांग्रेस सशक्त बन उभरी, दोबारा केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई। इसके बावजूद उन्होंने प्रधानमंत्री जैसा सर्व शक्तिमान पद ठुकरा दिया। स्मरण रहे 2004 में सवा तीन सौ सांसदों का उन्हें समर्थन प्राप्त था। तत्कालीन राष्ट्रपति ने उन्हें ही सरकार बनाने का न्यौता भेजा था। यहां मैं स्पष्ट करना चाहूंगा कि गांधी या जेपी के विराट व्यक्तित्व से सोनिया गांधी की तुलना करना न मेरा मंतव्य हैं, न ही ऐसी मूर्खता मैं करने का कोई इरादा रखता हूं। बहुत संभव है कि उनका विदेशी मूल का होना उनकी राह का रोड़ा बना हो। भले ही उनके समक्ष कोई संवैधानिक अड़चन नहीं थी और तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम यदि चाहते तो भी उन्हें पीएम बनने से रोक नहीं सकते थे। फिर भी उन्होंने त्याग की परंपरा आगे बढ़ाई तो इसका खुले मन से स्वागत करना  बनता ही है।

बहरहाल, अब सोनिया गांधी शनैः शनै राजनीति से बाहर जा रही हैं। उन्होंने यह फैसला भी स्वयं लिया था, काफी अर्सा पहले ले लिया था। राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान भी सौंप दी थी लेकिन 2019 के आम चुनाव की हार बाद राहुल का पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना एक बार फिर से सोनिया की वापसी का कारण बन गया। वे पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष जबरन बनाई गईं। बगैर गांधी परिवार कांग्रेस का गुजारा नहीं। परिवार आश्रित पार्टी होना कांग्रेस का प्रारब्ध है। बीते डेढ़ बरसों के दौरान कांग्रेस भीतर अध्यक्ष कौन पर मंथन चिंतन होता रहा, पार्टी कमजोर पड़ती चली गई। हालात इस कदर बिगड़े कि कभी सर्वशक्ति मान कहलाए जाने वाला पार्टी आलाकमान यानी गांधी परिवार अपनी पकड़ खोता नजर आने लगा। इस दौरान गांधी परिवार के खिलाफ कांग्रेस के कई दिग्गज मुखर होते हम सभी ने देखे। एक बारगी को लगने लगा था कि अब कांग्रेस का अंतिम समय करीब आ पहुंचा है। लेकिन पंजाब में हुए घटनाक्रम ने सब कुछ बदल सा दिया है। पार्टी के कद्दावर नेता और मजबूत मुख्यमंत्री कहलाए जाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह को जिस अंदाज में सत्ता से बेदखल किया गया है उससे एक बात स्पष्ट हो उभरती है कि अब राहुल-प्रियंका के हाथों कांग्रेस की कमान पूरी तरह आ चुकी है और सोनिया गांधी जल्द ही राजनीतिक परिदृश्य से खुद को ओझल करने जा रही हैं। मैं ऐसा इसलिए समझ रहा हूं क्योंकि जिस तरीके से अमरिंदर सिंह को हटा नया मुख्यमंत्री पंजाब में बनाया गया, वह सोनिया गांधी की कार्यशैली से कतई मेल नहीं खाता। कैप्टन अमरिंदर सिंह पिछले बावन वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं। वे राजीव गांधी के करीबियों में थे। गांधी दंपत्ति से उनका रिश्ता लंदन के दिनों से था जब राजीव राजनीति का हिस्सा नहीं हुआ करते थे। पंजाब का पहली बार मुख्यमंत्री उन्हें सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने बाद 2002 में बनाया गया था। पूरे पांच बरस उन्होंने दिल्ली के बगैर किसी दबाव में शासन किया तो इसके पीछे उन्हें सोनिया गांधी का पूरा समर्थन होना था। राहुल गांधी संग लेकिन उनके सुर-ताल जमे नहीं। राहुल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते भी कैप्टन सोनिया गांधी संग ही सलाह मशविरा करना पसंद करते थे। कांग्रेस के कई नेता इस बात की तस्दीक करते हैं कि राहुल गांधी के न चाहने पर भी पंजाब के मामलात में सोनिया कैप्टन की राय को ही तरजीह देती थीं। राहुल गांधी ने स्वेच्छा से पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ा था। लेकिन कांग्रेस की राजनीति में उनका बराबर हस्तक्षेप रहा। वे बगैर किसी पद में होते हुए ज्यादा मजबूती के साथ कांग्रेस के पुनर्गठन की अपनी योजना को मूर्तरूप देने में जुटे रहे हैं। धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी संगठन में अपनी पकड़ को मजबूत करने का काम पिछले डेढ़ बरस के दौरान किया। अध्यक्ष पद छोड़ते समय राहुल ने स्पष्ट रूप से कहा था कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ उनके अभियान को अपेक्षित सफलता न मिलने के पीछे सबसे बड़ा कारण वरिष्ठ पार्टी नेताओं का सहयोग नहीं मिलना रहा। इन डेढ़ बरसों में राहुल और प्रियंका ने उन तमाम वरिष्ठ कांग्रेसियों को हाशिए में डालने का काम किया है जो भले ही सोनिया गांधी के करीबी रहे हों, गांधी परिवार की नई पीढ़ी संग उनकी पटरी नहीं बैठ पा रही है। ऐसे एक नहीं अनेक उदाहरण हैं। अमरिंदर सिंह की विदाई ने स्पष्ट संकेत दे दिए हैं कि कांग्रेस को राहुल और प्रियंका अपने तरीके से चलाने के लिए अब तैयार हो चुके हैं। पंजाब से अमरिंदर सिंह की विदाई ने राजनीति विश्लेषकों से लेकर अदब की राजनीति के पैरोकारों तक को असहज कर डाला है। ऐसा माहौल रचा जाने का प्रयास भी हो रहा है कि कांग्रेस के प्रति समर्पित एक राजनेता को अपमानित कर सत्ता से बेदखल कर पार्टी ने पंजाब में दोबारा सत्ता पाने का सुनहरा अवसर गंवा दिया है। ऐसा समझने वाले लेकिन इस सच से अंजान हैं कि 2014 में सत्ता गंवाने बाद कांग्रेस आलाकमान को कमजोर समझने वाले कांग्रेसी क्षत्रपों में कैप्टन सबसे आगे थे। उन्होंने धीरे-धीरे 10 जनपथ और 24 अकबर रोड को इग्नौर करना शुरू कर दिया था। राहुल गांधी संग बीते दो बरसों में कैप्टन का कोई संवाद तक न होना इसे प्रमाणित करता है। राहुल गांधी ने बकायदा रणनीति बना कैप्टन को पैदल करने का काम किया। पहले तो राज्य का प्रभारी बदला गया। हरीश रावत को प्रभारी बना कैप्टन को संदेश देने का काम किया कि एक बड़े कद के नेता को संगठन का कामकाज देखने का मतलब वे समझ लें और पार्टी आलाकमान को कमजोर समझने की भूल को सुधार लें। महाराजा पटियाला लेकिन सत्ता के मद में मदहोश रहे। रावत ने प्रभारी बनने के साथ ही पार्टी विधायकों में पनप रहे असंतोष को हवा दी। विधायकों को एक जुट कर पहले तो प्रदेश अध्यक्ष राहुल-प्रियंका की पसंद का बनाया गया फिर ऐसा चक्रव्यूह रचा गया कि कैप्टन संभल पाते, उससे पहले ही धराशाई हो गए।
पंजाब के जरिए कांग्रेस के दिग्गजों को राहुल-प्रियंका ने संकेत देने का काम किया है कि अब कांग्रेस भीतर बहुत कुछ बदलने की कवायद रुकने वाली नहीं। जी-23 गु्रप को पहले ही राहुल ने यह कहकर कि जो चाहे, जब चाहे कांग्रेस छोड़ सकता है, धारहीन बना डाला है। अब राजस्थान की बारी आ सकती है जहां मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट को तरजीह देने से अब तक परहेज करते आए हैं। केंद्रीय नेतृत्व के कहने पर भी सचिन समर्थकों को सरकार में शामिल नहीं करने वाले गहलोत या तो अब मान जाएंगे या फिर उनकी भी जबरन विदाई करा दी जाएगी। लगता है कांग्रेस के पुनर्जीवित होने का समय नजदीक आ गया है। गांधी परिवार की अगली पीढ़ी अपने अंदाज में संगठन को चलाने के लिए अब पूरी तरह तैयार हो चुकी है।

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