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Editorial

‘सब कुछ बेच डालो’ की नीति वाला बजट

साल था 2015, संसद का बजट सत्र शुरू हो चुका था। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अपने भाषण की शुरुआत एक कविता से कीः-

‘कुछ तो फूल खिलाए हमने, और कुछ फूल खिलाने हैं,

मुश्किल यह है बाग में, अब तक कांटे कई पुराने हैं।’

साल है 2021, संसद का बजट सत्र चल रहा है। वर्तमान वित्तमंत्री 2021-22 के वित्तीय वर्ष का बजट पेश कर चुकी हैं। बजट को सत्तापक्ष शानदार-धारदार बता रहा है तो विपक्ष निराशाजनक। यह हमारे लोकतंत्र की परिपाटी है। इसलिए सत्ता और विपक्ष के दावों से इतर एक प्रयास कर रहा हूं इस बजट को समझने-समझाने और इस प्रयास के सहारे देश की अर्थव्यवस्था की असलियत टटोलने का।

सबसे पहली बात जो समझ में आती है वह स्व अरुण जेटली द्वारा 2015-16 के बजट पेश करते समय कही कविता पर इस बजट के खरा उतरने की है। जेटलीजी ने तब इन पंक्तियों को मनमोहन सिह सरकार के संदर्भ में कहा था। सटीक, लेकिन वे वर्तमान सरकार पर साबित हुई हैं। 2016 में यकायक नोटबंदी का फैसला, जल्दबाजी में लागू की गई जीएसटी प्रणाली, बेरोजगारी को रोक पाने की भारी विफलता, बुनियादी समस्याओं से नजरें फेर जुमलों के सहारे सरकार चलाने की प्रवृत्ति ने पिछले छह बरसों के दौरान देश की अर्थव्यवस्था का बंटाधार कर डाला है। रही-सही कसर कोविड-19 महामारी के चलते पूरे विश्व में आई आर्थिक मंदी ने पूरी कर दी। 2021-22 के बजट का विश्लेषण करते समय इन सभी बातों को याद करना आवश्यक है ताकि भारी-भरकम सरकारी आंकड़ेबाजी के पीछे छिपे सच तक पहुंचा जा सके। तो चलिए, पांच ट्रिलियन इकोनॉमी का सपना या जुमले की हकीकत से रूबरू होने का प्रयास बजरिए बजट 2021-22 से करते हैं।

वित्तमंत्री के बजट भाषण का सार ऐसा आभास देता है मानो कोविड-19 के चलते हमारी अर्थव्यवस्था पर कुछ असर पड़ा ही नहीं हो। होना तो यह चाहिए था कि भारी आर्थिक संकट झेल रहा देश का आम आदमी इस बजट से कुछ राहत महसूस कर पाता। हुआ लेकिन ठीक उलट है। आम आदमी को राहत देने का कोविडकाल में सबसे बड़ा सहारा बनी ‘मनरेगा’ का बजट इस बजट में भारी कटौती का शिकार बन गया है। मैं बजट के उन पहलुओं पर बात करने जा रहा हूं जो सीधे तौर पर आम आदमी को प्रभावित करते हैं। इनमें है 1. रोजगार और मनरेगा 2. खाद्य सुरक्षा 3. शिक्षा 4. स्वास्थ्य 5. सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली पेंशन।

1. महात्मा गांधी नेशनल रूलर गारंटी स्कीम के बजट में इस बार 38,500 करोड़ कम कर दिए गए हैं। 2020-21 में इस स्कीम का बजट 1,11,500 करोड़ था। याद रहे मनरेगा कोविडकाल में सबसे ज्यादा सहारा बन उभरा है। ऐसे में सरकार का इस वित्तीय वर्ष में इस स्कीम के बजट में की गई कटौती केंद्र सरकार के जनसरोकारों पर बड़ा प्रश्न-चिन्ह खड़ा करती है। ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण की सबसे बड़ी परियोजना के बजट को कम किया जाना साफ करता है कि केंद्र सरकार भारी आर्थिक संकट का सामना कर रही है।

2. खाद्य सुरक्षा : खाद्य सुरक्षा यानी फूड सिक्योरिटी के प्रति भी सरकार का रुख बेहद हैरतनाक है। सरकार की नीतियां पूरी तरह कॉरपोरेट सेक्टर के आचार-व्यवहार को सपोर्ट करने वाली हैं। पिछले वर्ष के बजट में फूड सिक्योरिटी जिसमें पीडीएस, आंगनबाड़ी, मिड डे मील स्कीम इत्यादि शामि हैं। इनका कुल बजट था 3.4 लाख करोड़। दिल थाम कर बैठिए इस वर्ष के बजट में इसमें से 1.4 लाख करोड़ कम कर दिए गए हैं। कैसी त्रासदी है इस मुल्क की। हम अन्न में आत्मनिर्भर देश हैं। आपको आश्चर्य होगा यह जानकर कि सरकारी गोदामों में हमारे जरूरत से पांच गुना ज्यादा अन्न का स्टॉक हमेशा रहता है जिसे सरकार बजट, बजट को सुंदर दिखाने के चलते ‘एसेट्स’ साइड में रखती है। ट्रेजडी यह कि इतने अन्न से भरपूर देश में करोड़ों भूखे रहते हैं। डबल ट्रेजडी यह कि सरकार खाद्य सुरक्षा के बजट में सबसे बड़ी कटौती नए वित्त वर्ष में करने जा रही है।

3. स्वास्थ्य एवं शिक्षा : यहां पर भी बड़ी कटौती की गई है। 2020-21 दके बजट में 82,445 हजार करोड़ स्वास्थ्य में दिए गए थे। आने वाले वित्तीय वर्ष में इसे 7845 हजार कम करके 74,600करोड़ कर दिया गया है। आप समझेंगे मैं गलत बयानी कर रहा हूं, क्योंकि वित्तमंत्री ने हेल्थ केयर के लिए भारी-भरकम बजट आवंटन की बात कही है। दरअसल, इसमें अकेले 35000 करोड़ रुपया कोविड वैक्सीन के लिए है जो वन टाइम है। इसे रेगुलर बजट के साथ नहीं जोड़ा जा सकता है। इसलिए वित्तमंत्री का कहना कि नए बजट में 137 प्रतिशत की भारी-भरकम बढ़ोतरी की गई है, केवल आंकड़ेबाजी मात्र है। यदि बजट का गहराई से अध्ययन किया जाए तो समझ में आएगा कि गत् वर्ष 2020-21 में 85,089 करोड़ से कम करके इस बार इसे 73,931.77 कर दिया गया है। तो भला 137 प्रतिशत कैसे वृद्धि हुई। इसे विस्तार से समझने की जरूरत है।

अब इनमें यदि गौर करें तो 2,23,846 करोड़ में से 35,000 करोड़ तो कोविड वैक्सीन का है जो वन टाइम ग्रांट है। इसके अलावा खाना, पीने का पानी, सफाई को सीधे हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर से जोड़ना सही नहीं है। देखिए, 2021 की इकोनॉमी सर्वे में स्वास्थ्य पर कहा गया ‘‘हेल्थ केयर टेक्स् सेंटर स्टेज फाइनली’’ यानी स्वास्थ्य सेवाओं को अंततः फोकस पर ले ही लिया गया है। हमने कोविड के समय देखा कि किस प्रकार गांव-देहात तो छोड़िए बड़े शहरों तक में बेसिक सुविधाएं जैसे वेंटिलेटर, ऑक्सीजन भी उपलब्ध नहीं थी। ऐसे में उम्मीद जगी कि सही में केंद्र सरकार स्वास्थ्य पर अपना विशेष फोकस इस बजट में रखेगी जो हुआ नहीं। केवल जुमलेबाजी नजर आ रही है। जिस ‘प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना’ का उन्होंने बजट में जिक्र किया और बताया कि सरकार ने इस योजना के लिए 64,180 करोड़ का बजट प्रावधान किया है। वह छह बरस का बजट है। यानी प्रतिवर्ष इस योजना के लिए मात्र 10,700 करोड़ रखे गए हैं। 125 करोड़ के देश में यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे समान है। 2017 में केंद्र सरकार नेशनल हेल्थ पॉलिसी लाई थी। इसमें कहा गया था कि सकल घरेलु उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम 2.5-3 प्रतिशत स्वास्थ्य इन्फ्रा पर लगना चाहिए जो वर्तमान में मात्र 1 प्रतिशत के करीब है। यही कारण है कि 180 देशों में स्वास्थ्य के मामले पर हम 145वें स्थान पर हैं।

4. सामाजिक सुरक्षा (पेंशन) : यहां भी ‘निल बट्टा सन्नाटा’ पसरा है। कैसा भद्दा मजाक है कि एक तरफ केंद्र सरकारों ने नई शताब्दी के शुरुआती चरण से ही सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाली पेंशन समाप्त कर डाली तो गरीब जनता जो बीपीएल में है, उसे रुपया दो सौ प्रति माह दिया जाता है। निर्मला सीतारमण बताएं कि इन दो सौ रुपयों में क्या एक आदमी का 30 दिन कट सकता है?

5. वित्तमंत्री ने अमेरिकी डॉलर वाले 5.54 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था को दोहराया। रोड, हाइवे, एयरपोर्ट आदि की बात कही। बुलेट ट्रेन का जिक्र किया। प्रधानमंत्री तीन हजार करोड़ खर्च कर सरदार पटेल की प्रतिमा बना ही डाले हैं। अपने लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की तर्ज पर दो विशेष विमान मंगवा चुके हैं। नई संसद बना रहे हैं, यानी इतिहास उन्हें याद रखे। इसके लिए भूखी-प्यासी जनता से कर के रूप में वसूल की जा रही राशि को ऐसे कामों में लगा रहे हैं जिनसे उनके पदचिन्ह, उनकी छाप आने वाली शताब्दियों तक अमिट रहे। गरीब-गुरबा का क्या? फटे कपड़े पहन हरचरणा भाग्य-विधाता का गुण गाने को अभिशप्त इस मुल्क में है, बना रहेगा।

 

वित्तमंत्री ने शायद पश्चिम बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर को याद करते हुए उनकी कविता की दो पंक्तियां अपने बजट भाषण में कहीः-

‘‘विश्वास वह चिड़िया है जो प्रकाश की अनुभूति कराती है,

और तब गाती है जब भोर में भी अंधकार बना रहता है।’’

अपने बजट भाषण के अंत की तरफ आते-आते वित्तमंत्री महोदया को तमिलनाडु में होने जा रहे विधानसभा चुनाव याद आ गए। उन्होंने प्रसिद्ध तमिल कवि थिरुवल्लुवर को याद करते हुए उनके कथन का जिक्र कियाः-

“A king/ruler is the one who creates and acquires wealth,

protects and distributes it for common good,”

 

देश के प्रधानमंत्री नेहरू ने समाजवादी पूंजीवाद की नीति बनाते हुए थिरुवल्लुवर को अवश्य याद किया होगा। उन्होंने एक से बढ़कर एक सरकारी कंपनियों की (पीएसयूएस) की नींव रखी। उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर इतिहास रचा। वर्तमान सरकार कॉरपोरेट की तरफ पूरी तरह झुकी नजर स्पष्ट आ रही है। सरकारी कंपनियों को बेचे जाने से आगे निकल अब सरकारी बैंकों को भी कॉरपोरेट के हवाले करने की योजना बन चुकी है। वित्तमंत्री अपने बजट भाषण में कहती हैंः-

‘‘विनिवेश और रणनीतिक विक्रय

 

कोविड-19 के बावजूद हम रणनीतिक विनिवेश की दिशा में कार्य करते रहे हैं। बीपीसीएल, एयर इंडिया, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, आईडीबीआई बैंक, बीईएमएल, पवन हंस, नीलाचल इस्पात निगम लिमिटेड के साथ होने वाले कई लेन-देन 2021-22 में पूरे हो जाएंगे। वर्ष 2021-22 में हम आईडीबीआई बैंक के अलावा दो सार्वजनिक क्षेत्रीय बैंकों और एक सामान्य बीमा कंपनी का भी निजीकरण करने का प्रस्ताव रखते हैं। इसके लिए वैधानिक संशोधनों की जरूरत पड़ेगी और इसी सत्र में ही इन संशोधनों को लाने का हमारा विचार है।’’

वित्तमंत्री ने थिरुवल्लुवर का जिक्र करते हुए राजा कैसा हो इसकी व्याख्या की तो मुझे तुलसीदास का स्मरण हो आया। तुलसीदास कहते हैंः-

‘‘जा सुराज प्रिय प्रजा दखारी

तो नप अवस नरक अधिकारी।’’

यानी जिस राज्य की प्रजा दुखी रहती हो, उस राज्य का नृप यानी राजा नर्क का अधिकारी होता है।

तुलसीदास ने रामराज की व्याख्या भी की है। हमारा वर्तमान सत्ता प्रतिष्ठान हमेशा से ही रामराज की अवधारणा को हकीकत में उतारने की बात कहता आया है। तो सुनिए, ऐसे बजट में जिसमें पहले से ही आकाश छू रहे पेट्रोल/डीजल के दामों पर सरकार ने कृषि के नाम पर एक टैक्स और जोड़ दिया है। तुलसीदास कहते हैं कि रामराज में जनता से ‘कर’ लेने की व्यवस्था ऐसे ही थी जैसे सूर्य पृथ्वी से लेता है। वह समुद्र, नदी, तालाब आदि से पानी सोख कर उन्हें बादल में बदल जहां सूखा पड़ा हो वहां बरसा देता है। सोखता है तो पता भी नहीं चलता, बरसाताहै तो हरेक को पता चल जाता है। हरेक प्रसन्न हो जाता हैः-

‘‘बरसत हरसत सब सखें, करसत सखे न कोय,

तुलसी प्रजा सुभाग से, भूप भानु सो होय’’

मतलब साफ टैक्स इतनाभर हो कि एहसास भी न हो, उसके बदले इतना मिले की प्रजा खुश हो जाए।

वित्तमंत्री कॉरपोरेट प्रो बजट बनाते समय पूरी तरह गरीब-गुरबा को भूल गई। भूल गई रामराज में राजा राम क्या कहते थे। तुलसीदास कहते हैं रामराज में बड़े पूंजीपतियों, धनवान लोगों की पसंद की वस्तु पर अधिक टैक्स और गरीब के जीवन को प्रभावित करने वाली वस्तुओं पर कोई टैक्स नहीं होता थाः-

‘‘मणि-माणिक महंगे किए, सहजे तृण, जल, नाज

तुलसी सोई जानिए राम गरीब नवाज’’

हालांकि रामराज की बात करना, तुलसीदास, कबीर, रहीम के दोहों को याद करना अब अर्थहीन हो चला है। वक्त बदला, दौर बदला, बदल गए कई निजाम, अब न तो राजा राम कहीं हैं, न ही उनका रामराज। रहीम दास का एक दोहा चलते-चलते आपको सुना दूं, अचानक याद आ गया हैः-

‘‘फरजी साह न है समे, गति टेढ़ी तासीर

रहिमन सीधी चाल सो प्यादो होत वजीर।’’

रहीम कहते हैं फरजी चाल चल के कोई राजा नहीं बन सकता, सीधी चाल चल के प्यादा भी वजीर हो जाता है। अब यदि ऐसा होता तो खुद समझ लीजिए जो आज ‘टॉप बॉस’ हैं, क्या सीधी चाल के भरोसे रह वे ‘टॉप’ पर पहुंच सकते थे।

बहरहाल, बजट मेरी समझ से मात्र आंकड़ेबाजी की बाजीगरी है। यह सरकार वित्त व्यवस्था को, वित्तीय प्लानिंग को बना पाने, संभाल पाने में सर्वथा विफल होती नजर आ रही है। जन सरोकारों से कुछ लेना-देना नहीं, केवल जुमलेबाजी के सहारे, गोदी-चारणी मीडिया के सहारे भरमाने का खेल चल रहा है। तुलसीदास का एक लिखा ऐसे में परफेक्ट बैठता है।

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