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Editorial

भीमा कोरेगांव हिंसा : जातिगत विद्वेष का बढ़ता जहर/भाग एक

Bhima Coregaun violence- Afact based research

यंग जनरेशन यानी नई पीढ़ी को हमेशा पुरानी पीढ़ी हेय दृष्टि, हिकारत की नजरों से देखती आई है। ह एक प्रकार की रवायत है। सोशल मीडिया के दौर में यह ज्यादा देखने को मिल रहा है। मां-बाप बदलते दौर के हिसाब से स्वयं को ढाल नहीं पा रहे हैं। रही-सही कसर कोविड-19 (कोरोना) ने पूरी कर दी है। स्कूल-कॉलेज बंद हैं। मां-बाप इस संक्रमणकामल में बच्चों के मानसिक अवसाद को समझने के बजाय उन पर पढ़ाई का दबाव बना रहे हैं। आउटडोर एक्टिविटी न होने से बच्चों में गुस्सा बढ़ रहा है। बहरहाल ऐसे समय में यंग जनरेशन की परिपक्व समझ को समझने का मौका मुझे अपने घर में तब मिला जब मेरी 14 वर्षीय बेटी जायरा ने मुझसे भीमाकोरेगांव कांड पर सवाल पूछे। I was Literally shocked when she asked me ‘what kind of democracy we are living in when we cannot speak up our minds freely? उसकी गुस्से/उत्तेजना का कारण दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हनी बाबू की गिरफ्तारी थी। पूछने पर पता चला कि प्रो बाबू की बेटी फरज़ाना और ज़ायरा मित्र हैं। उसे पूरा प्रकरण समझाने और उसके अनगिनत प्रश्नों का उत्तर देने के लिए मुझे इस मुद्दे को खुद डिटेल में समझना पड़ा। तो चलिए आप सबसे इस मुद्दे पर अपने विचार रखता हूं। इस उम्मीद के साथ कि आपके तार्किक उत्तर मुझ तक पहुंचेंगे। भक्तगणों से भी करबद्ध अनुरोट्टा है कि तार्किक टिप्पणी करें ताकि स्वस्थ संवाद स्थापित हो सके।
महाराष्ट्र के एक गांव कोरेगांव में 1 जनवरी, 1818 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज और मराठा शासक पेशवा बाजीराव-2 की फौज आमने-सामने थी। मराठा साम्राज्य 18वीं शताब्दी तक खासा शक्तिशाली था। ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद से ही मराठा शासकों का क्षरणकाल शुरू हो गया। 1802 में कई मराठा क्षत्रपों ने ब्रिटिश कंपनी के आगे समर्पण कर दिया था। इनमें पुणे का पेशवा, ग्वालियर का सिंधिया, इंदौर की होल्कर, बड़ौदा की गायकवाड़, नागपुर का भोसले राजवंश शामिल था। बाजीवराव पेशवा द्वितीय अकेले ऐसा मराठा शासक थे जिन्होंने अंग्रेजों के समक्ष हथियार नहीं डाले। नवंबर 1817 में उन्हें ब्रिटिश फौजों ने हरा दिया। बाजीराव-2 भागकर सतारा चले गए। बाजीराव पेशवा-2 अपनी शर्तों पर ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करने को तैयार थे। उन्होंने यह समझौता किया भी जिसके चलते पेशवा वंश को अंग्रेजों ने मराठा शासकों में सुप्रीम माना। लेकिन बाजीराव की अंग्रेजों के साथ पटरी नहीं खाई। उन्होंने पुणे को ब्रिटिश हुकुमत से आजाद कराने के लिए 5 नवंबर 2017 को अपनी फौजें भेज दी। बाजीराव द्वितीय को उम्मीद थी कि पेशवा साम्राज्य वापस स्थापित करने के लिए सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ और भोसले उनकी मदद करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 1 जनवरी 1818 को पुणे के निकट कोरेगांव में हुए युद्ध में बाजीराव के सेना पराजित हुई। अंग्रेजों के साथ उन्हें समझैता कर महाराष्ट्र छोड़ना पड़ा। पेशवा टाइटल भी उनसे छीन लिया गया और एक निर्वासित राजा की तरह उन्हें कानपुर के निकट बिठुर में गंगा किनारे बसा दिया गया।
बाजीराव की कोरेगांव युद्ध में पराजय का श्रेय ब्रिटिश सेना की महार रेजिमेंट को जाता है। दलित जाति के योद्धा इस रेजिमेंट में थे जिनमें पेशवा साम्राज्य के दौरान मिली प्रताड़ना का बदला लेने की आग धधक रही थी। जाति का खेल ही वर्तमान समस्या के मूल में है। लगभग दो सौ वर्षों से दलित समाज के विचारक, चिंतक समेत पूरा समाज 1 जनवरी को विजय दिवस के रूप में मनाता आया है। महार जाति को यूं तो दलित माना जाता है लेकिन उनकी प्रसिद्धि एक लड़ाकू कौम की रही है। 17वीं शताब्दी में शिवाजी ने मराठा सेना में सबसे ज्यादा भर्तियां महारों की ही की थी। महार सैनिकों ने मराठा राजाओं के पक्ष में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ लड़ाई भी की। पेशवा की फौज में शामिल हो महारों ने पानीपत की तीसरी लड़ाई में अंग्रेज सेना के छक्के छुड़ा दिए थे। बाजीराव द्वितीय लेकिन महारों पर यकीन नहीं करते थे। उन्होंने अपना फौज में महार जाति को शामिल न कर महारों से दुश्मनी मोल ली थी। नतीजा 1 जनवरी 1818 के युद्ध में महार पेशवा के खिलाफ मैदान में थे। पेशवा उच्च जाति के ब्राह्माण थे। जातिगत विद्वेष ही वर्तमान में भी विवाद का मूल कारण है। डॉ. अम्बेडकर 1 जनवरी 1927 को कोरेगांव में हुए जश्न का हिस्सा इन्हीं जातिगत कारणों के चलते बने थे। यहां 60 फीट ऊंचा एक स्मारक हैं जो बॉम्बे नेटिव इन्फ्रेंट्री में शामिल उन 49 सैनिकों की याद में बनाया गया है जिनमें से 21 महार जाति के थे। यह स्मारक अंग्रेजों ने 1818 में बनाया था।
इस विजय दिवस के 200वीं वर्षगांठ मनाए जाने को लेकर सवर्ण और दलित जातियों के मध्य भारी विवाद 1 जनवरी 2018 के दिन देखने को मिला था। अखिल भारतीय ब्राह्माण महासभा नाम के एक संगठन का कहना है कि पेशवा की सेना में हर जाति के लोग थे, इसी प्रकार ब्रिटिश सेना में भी हर जाति के लोग थे। इसलिए यह युद्ध भारतीयों बनाम अंग्रेजों का युद्ध था जिसमें भारत की हार हुई थी इसलिए एक जाति विशेष का इस दिन उत्सव मनाना गलत है। दूसरी तरफ दलित नेताओं की दलील है कि हमारे पूर्वजों ने इस दिन क्रूर पेशवा साम्राज्य का अंत किया है इसलिए हमारे लिए यह विजय दिवस है। इसके चलते दोनों समुदायों में ठन गई। एक तरफ Right wing (दक्षिणपंथी) थे तो दूसरी तरफ अम्बेडकरवादी जो हिंदुत्व के विस्तार से चिंतित हो 1 जनवरी 2018 के दिन इस विजय दिवस को अपनी शक्ति प्रदर्शन का दिन मनाने को आतुर थे। दोनों 1 जनवरी को आपस में भिड़ गए। दोनों तरफ से पत्थरबाजी हुई जिसमें 28 बरस के नवयुवक राहुल पतांगले की मौत हो गई। तीन दर्जन के करीब घायल हुए। दो दिन बाद 3 जनवरी को बाबा साहेब के पोते प्रकाश अम्बेडकर ने महाराष्ट्र बंद का आह्वान किया। इससे पूरे राज्य में ट्रेन-बस सेवा बाधित/Disturb हो गई।
एक जनवरी 2018 से पहले इस दिवस को मनाने के लिए 250 के करीब दलित समूहों ने एकजुट हो एक कमेटी का गठन किया था। जिसे ‘यलगार परिषद्’ का नाम दिया। इसमें दो पूर्व न्यायाधीश समेत कई दलित चिंतक और राजनेता जुड़े थे। 31 दिसंबर 2017 को एक सभा का आयोजन किया गया जिसमें हिंदुत्ववादी शक्तियों के बढ़ते प्रभाव को रोकने की बात कही गई। गुजरात के युवा नेता एक्टिविस्ट जिग्नेश मेवानी भी इसमें शामिल हुए थे। भीमा कोरेगांव कांड के मूल में एक मुद्दा और भी है। कहा जाता है कि मुगल बादशाह बाबर ने छत्रपति शिवाजी के बेटे और मराठा साम्राज्य के संस्थापक साम्भाजी महाराज को 1689 में मार डाला था और उनके शव तक के साथ अभद्रता की थी। भीमा कोरेगांव के निकट एक गांव वधू बुदरक में अपने राजा के शव का तब सम्मानजनक, विधिपूर्वक दाह संस्कार एक महार जाति के युवक गोविंद महार ने किया था। गोविंद महार की याद में एक स्मारक उनकी मृत्यु के बाद साम्भाजी महाराज के स्मारक के साथ बनाया गया। मराठा इसे अपना अपमान मानते आए हैं। बहरहाल, 2 जनवरी 2018 को हिंदुत्ववादी नेता साम्भाजी भिड़े और मिलिन्द एकबोरे के खिलाफ पुणे पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली लेकिन कोई संतोषजनक कार्यवाही नहीं की। यह एफआईआर अनीता साल्वे नाम की एक चश्मदीद गवाह ने दर्ज कराई थी जिसमें इन दो नेताओं को हिंसा करने का दोषी बताया गया था। इस एफआईआर पर तो इन हिंदुत्ववादी नेताओं पर लेकिन पुणे पुलिस ने कोई कार्यवाही न करते हुए आठ जनवरी को एक अन्य एफआईआर दलित नेताओं पर दर्ज कर ली। एक तरफ पुणे पुलिस (स्मरण रहे महाराष्ट्र में तब भाजपा सरकार थी) दक्षिणपंथी साम्भाजी भिड़े और मिलिंद एकबोरे को तलाश पाने में जरा भी दिलचस्पी नहं दिखा रही थी, वहीं दूसरी तरफ मार्च 2018 में एक कथित वैचारिक संस्था Forum for integrated national security जिसमें सेना के कुछ पूर्व अफसर कर्ताधर्ता हैं, ने एक रिपोर्ट जारी कर इन दोनों को निर्दोष बता डाला। साथ ही इस हिंसा के लिए माओवादी विचारकों को दोषी ठहरा दिया। इसके बाद पुणे पुलिस की चाल बदल गई। सारे मामले को इस रिपोर्ट के नजरिए से परखे जाने की कवायद शुरू हो गई। 8 जून 2018 को माओवादियों के साथ संबंध रखने के आरोप में सुरेंद्र गाडलिंग (नागपुर के मानवाधिकार वकील एवं दलित चिंतक), सुधीर धवले (मराठी पत्रिका ‘विद्रोही’ के संपादक, एक्टिविस्ट), रोना विल्सन (Committe Release of Political Prisoners ds lfpo के सचिव), शोमा सेन (नागपुर विश्वविद्यालय में अंग्रेजी की असिस्टेंट प्रोफेसर, महिला अधिकार कार्यकर्ता) एवं महेश राउत (नक्सल बेल्ट गढ़चिरोली में सामाजिक सेवा कर रहे एवं Tata Institutes of Social Sciences तथा Prime Minister Rular Development Fellow) को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद हिंदुत्ववादी नेता जिन पर हिंसा फैलाने का आरोप था, पुणे पुलिस के रडार से हट गए। उनकी जगह कथित माओवादी समर्थकों ने ले ली। इस बीच 22 अप्रैल 2018 को इस मामले की एक गवाह, 22 बरस की पूजा साकेत एक कुएं में मरी पाई गई। परिवार ने पुणे पुलिस पर इस गवाह को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया तो उसके भाई जयदीप को, जो खुद भी इस हिंसा के मामले में चश्मदीद गवाह है, हत्या का प्रयास करने के एक आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। 28 अगस्त 2018 को पुणे पुलिस ने माओवादी चिंतक, कवि वरवर राव, सुप्रीम कोर्ट में वकील सुधा भारद्वाज, क्रिमिनल वकील, एक्टिविस्ट अरुण फरेरा, मानवाट्टिकार कार्यकर्ता एवं प्रसिद्ध पत्रिका ‘Economic and Polictical Weakly’  के सलाहकार गौतम नवलखा एवं वरनोन गोन्सावेज के घरों में छापेमारी के बाद गिरफ्तार कर डाला। इन प्रतिष्ठित लोगों की गिरफ्तारी से खासा बवाल मचा। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कुछ समय घर में ही कैद के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने सुनाए। अब सभी जेल में हैं। पुलिस का दावा है कि ये सभी माओवादी हैं। 31 दिसंबर 2017 को यलगार परिषद् की बैठक के पीछे यही सब थे। उनका कहना है कि गोविंद महार ने ऐसा कुछ नहीं किया था। इन्हीं के चलते 1 जनवरी 2018 की हिंसा हुई। यानी Nutshell में जिन हिंदुवादी नेताओं को हिंसा करते हजारों ने देखा वह झूठ, पुणे पुलिस सही। पुलिस इतने पर ही नहीं रूकी, बल्कि इन लोगों और CPI (Maoist) के द्वारा प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश को भी इसमें जोड़ दिया गया है। इस बीच महाराष्ट्र में सत्ता बदली। कांग्रेस, एनसीपी के साथ भाजपा को ठेंगा दिखा शिवसेना ने सरकार बना डाली। बहुतों को आस बंधी कि अब शायद पुणे पुलिस की एकतरफा जांच का तरीका बदलेगा लेकिन प्रधानमंत्री की हत्या के एंगल को आधार बना 25 जनवरी 2020 को केंद्र सरकार ने मामला अपने हाथों में लेते हुए जांच का काम NIA को सौंप दिया।
हनी बाबू का संकट NIA के आते ही गहराने लगा। 10 सितंबर 2019 को पुणे पुलिस ने हनी बाबू का घर दिल्ली में खंगाला था। आरोप था भीमा कोरेगांव हिंसा से उनके संबंध होना। उनका लैपटॉप, सेलफोन आदि पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिए थे। हनी बाबू ने तब बकायदा एक बयान जारी कर कहा था कि उनका भीमा कोरेगांव से कुछ भी लेना-देना नहीं। 24 जुलाई 2020 को NIA  ने उन्हें पूछताछ के लिए बुलाया। पांच दिन तक NIA के मुंबई दफ्तर में पूछताछ के बाद उन्हें 28 जुलाई को गिरफ्तार कर लिया गया। हनी बाबू की गिरफ्तारी का भारी विरोध बुद्धिजीवियों द्वारा किया गया है। पुलिस इतिहासकार रोमिला थापर भीमा कोरेगांव मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर चुकी हैं। उनकी याचिका के चलते ही शुरुआती चरण में सुप्रीम कोर्ट ने पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की हाउस एरेस्ट का आदेश दे उन्हें राहत दी थी।

अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े इस मामले की वर्तमान स्थिति क्या है, सुप्रीम कोर्ट में रोमिला थापर की याचिका के दौरान क्या-क्या हुआ और क्यों इस पूरे मामले को अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात (Big Danger) कहा जा रहा है। पुणे पुलिस की पूरी कार्यवाही को क्यों हिंदुत्ववादी ताकतों का षड्यंत्र बताया जा रहा है। इस पर चर्चा दूसरे भाग में।

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