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Editorial

भीमा कोरेगांव केस : दलित उत्पीड़न और फ्रीडम टू स्पीक पर अंकुश की कहानी/भाग दो

भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में 28 अगस्त, 2018 को पुणे पुलिस देश के पांच प्रतिष्ठित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को जिनमें कवि, पत्रकार, वकील, राजनीतिक कार्यकर्ता शामिल थे, गिरफ्तार कर लेती हैं। ये पांच कौन है इस पूरे मामले की तह में जाने से पहले, समझा जाना जरूरी है। इन पांचों का संक्षिप्त परिचय कुछ यूं हैंः

1. गौतम नवलखाः पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता, ‘Political and Economic Weekly’ के सलाहकार, ‘People’s Union for Democratic Rights’ संस्था के सचिव। कश्मीर पर विशेष काम। सेना के असीमित अधिकारों के विरोधी। नक्सल क्षेत्र छत्तीसगढ़ में भी लगातार कार्यरत्। UAPA के घोर विरोधी। कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की बात पर राष्ट्रवादियों के निशाने पर। ‘Days and nights in the heartland of rebellion’ छत्तीसगढ़ और आंध्र प्रदेश के नक्सल प्रभावी इलाकों पर केंद्रित पुस्तक के लेखक। पेन्गुइन, लंदन से प्रकाशित।

2. सुधा भारद्वाजः मानवाधिकार की मुखर आवाज ट्रेड यूनियन नेता, People’s Union for Civil Liberties संस्था की महासचिव। विचारों से वामपंथी। जन्म से अमेरिकी। 11 बरस की उम्र में भारत आकर यहां की नागरिकता। आईआईटी कानपुर से मास्टर्स की डिग्री। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में विजिटिंग प्रोफेसर। जुलाई 2018 में अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी का दावा कि सुधा देश में Anarchy लाने का षड्यंत्र रच रही हैं।

3. वरवर रावः तेलगु भाषा के प्रतिष्ठित कवि। पंद्रह कविता संग्रह देश की सभी भाषाओं में अनुवादित। 1986 में एक कविता संग्रह आंध्र सरकार द्वारा प्रतिबंधित। ‘मीसा’ कानून के तहत् आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी। आंध्र हाईकोर्ट ने निर्दोष माना। 20 मुकदमें देश द्रोह से लेकर नक्सलपंथी होने के दर्ज। सभी में बरी।

4. अरुण फरेराः सामाजिक कार्यकर्ता एवं वकील। प्रतिष्ठित सेंट जोवियर्स कॉलेज मुंबई से स्नातक। लगातार नागरिक अधिकारों के लिए सक्रिय। 2007 में UAPA के अंतर्गत गिरफ्तारी। 4 बरस तक नागपुर जेल में बंद रहे। पुलिस ने Narco Test भी कराया लेकिन फरेरा के किसी भी गैरकानूनी/आतंकी संगठनों से संबंध स्थापित कर पाने में विफल रही। 2012 में सभी मामलों में अदालत द्वारा बाइज्जत बरी।

5. वरनोन गोन्सालवेजः 64 वर्षीय वरनोन लेखक हैं, सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पेशे से अध्यापक। मुंबई के ख्याति प्राप्त HR College of Comerce and Economics में अध्यापन किया। 19 अगस्त, 2007 को महाराष्ट्र के एंटी टेरर पुलिस द्वारा नक्सलवादी नेता होने के आरोप में गिरफ्तार किए गए थे। 19 मामले UAPA के तहत् मुंबई पुलिस ने दर्ज किए। 17 मामलों में 2013 में कोर्ट से बरी। ऐसे में सजा 1 मामला हाईकोर्ट में, आदिवासियों के बीच खासे लोकप्रिय गोन्सालवेज पर मुंबई एंटी टेरर पुलिस कोई भी अपराध साबित नहीं कर पाई है।

इन सभी को 28 अगस्त, 2018 को यलगार परिषद् मामले में गिरफ्तार कर लिया गया, एफआईआर नं. 004/2018, पुलिस स्टेशन विश्राम बाग, पुणे के अंतर्गत। इस गिरफ्तारी के खिलाफ पांच प्रतिष्ठित नागरिक सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा अगले ही दिन यानी 29 अगस्त, 2018 को खटखटाते हैं। इन पांचों को भी जान लीजिएः

रोमिला थापर देश की ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खासी ख्याति अर्जित कर चुकी शिक्षाविद् हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्वालय में इतिहास की प्रोफेसर रोमिला थापर दो बार भारत सरकार द्वारा दिए गए पद्म भूषण सम्मान ठुकरा चुकी हैं। ऑक्सफोर्ड और शिकागो विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें मानद डॉक्ट्रेट की उपाधि दी गई है। रोमिला थापर के साथ इस पेटिशन को दायर करने वालों में ख्याति प्राप्त, पद्म भूषण सम्मान प्राप्त अर्थशास्त्री, महिला अधिकारों एवं सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाली देवकी जैन, रोहड्स स्कॉलर, अर्थशास्त्री, केरल योजना आयोग के उपाध्यक्ष रह चुके एवं यूनाइटेड नेशन टास्क फोर्स ऑन ग्लोबल फाइनेंस सिस्टम के सदस्य प्रभात पटनायक, दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्री, प्रसिद्ध मेलकॉम पुरस्कार प्राप्त, भारत सरकार के EQUAL OPPURTUNITY COMMISSION के सदस्य, शिकागो एवं पेरिस विश्वविद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर सतीष देशपाण्डे एवं कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव की बोर्ड मेंबर, पिछले 40 बरसों से मानवाधिकारों के लिए संघर्षरत् माजा दारूवाला शामिल थीं।

रोमिला थापर एवं अन्य की इस याचिका की सुनवाई तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए. एम खानविलकर एवं न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड की बेंच में हुई। इन पांचों ख्याति प्राप्त नागरिकों ने कोर्ट से कहा कि ‘हम आरोपों की जांच रोकने की मांग नहीं कर रहे किंतु हम एक निष्पक्ष जांच की अपेक्षा के साथ आपके पास आए हैं ताकि इन पांच गिरफ्तार किए गए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के साथ न्याय हो और देश के लोकतांत्रिक ढांचे की रक्षा हो।

अब बात करते हैं एफआईआर नं. 004/2018 की जिसके आधार पर ये गिरफ्तारियां की गई। पहली चौंकाने वाली बात यह कि इस एफआईआर को कराने वाला व्यक्ति रमेश दामुले, हिंदुवादी संगठन के उस नेता का खास चेला है जिसे कोरेगांव हिंसा के लिए एफआईआर नं. 002/2018 जो अनीता साल्वे ने दर्ज कराई थी, में दोषी कहा गया था। एफआईआर नं. 002, दो तारीख यानी हिंसा के एक दिन बाद दर्ज कराई गई, जबकि 004/2018 08/01/2018 को दर्ज हुई। प्रथम दृष्टया स्पष्ट है कि आठ दिन बाद दर्ज एफआईआर का उद्देश्य जांच को भटकाना था। जांच को गलत दिशा देने का सुनियोजित कदम था। रमेश दामुले ने अपनी एफआईआर में लिखा है कि उसने फेसबुक पोस्ट के जरिए जाना था कि एक मीटिंग दलित संगठनों की 31 दिसंबर, 2017 को कबीर कला मंच आयोजित करवा रहा है। यह भी मीटिंग में गया जहां इसने जिग्नेश मेवानी समेत कई नेताओं को उत्तेजक भाषण, गाना गाते सुना। इसने सुना वक्ता कह रहे हैं ‘जब जुल्म हो तो बगावत होनी चाहिए शहर में, जब जुल्म हो तो बगावत होनी चाहिए शहर में। बगावत न हो तो बेहतर है कि रात ढलने से पहले यह शहर जल के राख हो जाए, यह शहर जल के राख हो जाए।’ इस प्रकार के कई नारों का, गीतों का जिक्र रमेश दामुले ने अपनी एफआईआर में किया और आशंका जताई कि 01/01/2018 की हिंसा प्रतिबंधित माओवादी संगठन सीपीआई (एम) की साजिश चलते हुई। रमेश ने कबीर कला मंच के सागर गोखले, हर्षिल पोतदार, रमेश गईचोर, दीपक एवं ज्योति जगताप का नाम इस एफआईआर में लिया।

अब देखिए, कमाल जिन पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी हुई उनमें से किसी का नाम इस एफआईआर में नहीं था। एफआईआर नं. 002/2018 को भूलकर पुणे पुलिस इस एफआईआर के आधार पर जांच में जुट गई। रोमिला थापर एवं अन्य की याचिका में स्पष्ट कहा गय कि हिंदुवादी नेता मिलिंद एकबोटे और साम्भाजी राव भिड़े को बचाने के लिए पुणे पुलिस ने एफआईआर नं. 004/2018 दर्ज की है और इन लोगों को नकली सबूत बनाकर गिरफ्तार किया है। इस याचिका में यह भी कहा गया कि पुलिस जान बूझकर चुनिंदा मीडिया को ऐसे नकली दस्तावेज लीक कर रही है जिन्हें समाचार बना गिरफ्तार लोगों के खिलाफ जनमानस तैयार इन मीडिया हाउस द्वारा किया जा रहा है। इन दस्तावेजों में वे कथित दस्तावेज भी हैं जो पुणे पुलिस ने रोना विल्सन के कम्यूटर से कथित तौर पर बरामद किए हैं जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजीव गांधी के हत्याकांड की तरह मारने की बात कही गई है।

याचिका में कहा गया कि इन पांच लोगों के यहां पुणे पुलिस ने जब रेड डाली तो गिरफ्तारी के समय नियमानुसार जिन निष्पक्ष लोगों की, जो आमतौर पर अड़ोस-पड़ोस के होते हैं जिन्हें पंच कहा जाता है, के बजाय पुणे पुलिस अपने साथ पुणे से लोग लेकर आई थी जो पूरी तरह नियम विरुद्ध है। पुलिस ने इन पांचों के यहां से जो सामान जब्त किया उसका मेमो मराठी में था जिसमें गौतम नवलखा और सुधा भारद्वाज समझ तक नहीं पाए। याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अपील की गई कि एक एसआईटी बनाकर सारे मामले की जांच की जाए, महाराष्ट्र सरकार से पूछा जाए कि क्योंकर इतनी गिरफ्तारी की जा रही हैं तथा गिरफ्तार किए गए सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताआों को रिहा किया जाए।

कोर्ट में इस पर बहस शुरू हुई। सरकारी पक्ष ने दावा किया कि पुलिस की जांच सही दिशा में की जा रही है। पुलिस के पास इन सभी गिरफ्तार लोगों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। याचिकाकर्ताओं की तरफ से इन सब बातों का खंडन किया गया। कोर्ट के संज्ञान में यह तथ्य भी लाया गया कि यलगार परिषद् दो पूर्व न्यायाधीश हिस्सा हैं जिनमें एक जस्टिस पी.सी. सावंत तो सुप्रीम कोर्ट में जज रह चुके थे, दूसरे न्यायाधीश मुंबई हाईकोर्ट के जज रह चुके हैं। कहा गया कि अचानक ही इस हिंसा के मामले को झूठे सबूतों के सहारे प्रधानमंत्री की हत्या के षड्यंत्र से जोड़ सनसनीखेज बना दिया गया है। आश्चर्य जताया कि इतने बड़े षड्यंत्र करने वाली पुणे पुलिस ने न तो प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश पर कोई एफआईआर दर्ज की न ही राज्य सरकार ने सीबीआई या एनआईए से जांच को कहा। केवल ताबड़तोड़ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की जा रही है।

बहरहाल, लंबी बहस के बाद 20 सितंबर, 2018 को कोर्ट का फैसला आया जिसमें दो न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा एवं न्यायमूर्ति ए.एम. खानविलकर ने एक फैसला तो न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अलग फैसल दिया। जाहिर है 2ः1 सिद्धांत के आधार पर दो जजों का फैसला लागू हुआ।

न्यायमूर्ति मिश्रा एवं न्यायमूर्ति खानविलकर ने याचिकाकर्ताओं की पहली मांग यानी एसआईटी गठन को रिजेक्ट कर दिया। उनका मानना था कि चूंकि इस याचिका के साथ ही पांचों अभियुक्तों ने अपनी याचिका जोड़ ली है इसलिए कानूनन् अभियुक्त को इस बात की सुविधा नहीं दी जा सकती कि वह अपनी पसंद की एजेंसी से जांच करवाए।

यहां एक बात जो दो जजों ने इस केस को सीबीआई को ट्रांसफर करने की बाबत कही वह वर्तमान समय में सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण के दृष्टिगत बेहद महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने कहा “Before parting with the case, we deem it necessary to emphasise that despite wide powers conferred by Articles 32 13 (2010) 3 SCC 571 38 and 226 of the Constitution, while passing any order, the Courts must bear in mind certain self-imposed limitations on the exercise of these Constitutional powers. The very plenitude of the power under the said articles requires great caution in its exercise. Insofar as the question of issuing a direction to the CBI to conduct investigation in a case is concerned, although no inflexible guidelines can be laid down to decide whether or not such power should be exercised but time and again it has been reiterated that such an order is not to be passed as a matter of routine or merely because a party has levelled some allegations against the local police. This extraordinary power must be exercised sparingly, cautiously and in exceptional situations where it becomes necessary to provide credibility and instil confidence in investigations or where the incident may have national and international ramifications or where such an order may be necessary for doing complete justice and enforcing the fundamental rights. Otherwise the CBI would be flooded with a large number of cases and with limited resources, may find it difficult to properly investigate even serious cases and in the process lose its credibility and purpose with unsatisfactory investigations.”

In the present case, except pointing out some circumstances to question the manner of arrest of the five named accused sans any legal evidence to link them with the crime under investigation, no specific material facts and particulars are found in the petition about mala fide exercise of power by the investigating officer. A vague and unsubstantiated assertion in that regard is not enough. 39 Rather, averment in the petition as filed was to buttress the reliefs initially prayed (mentioned in para 7 above) – regarding the manner in which arrest was made. Further, the plea of the petitioners of lack of evidence against the named accused (A16 to A20) has been seriously disputed by the Investigating Agency and have commended us to the material already gathered during the ongoing investigation which according to them indicates complicity of the said accused in the commission of crime. Upon perusal of the said material, we are of the considered opinion that it is not a case of arrest because of mere dissenting views expressed or difference in the political ideology of the named accused, but concerning their link with the members of the banned organisation and its activities.

इस कोर्ट ने यह कहते हुए 28/03/2018 को रोमिला थापर एवं अन्य की याचिका खारिज कर डाली। दूसरी तरफ न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने निर्णय में एसआईटी गठन को जरूरी बताया। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का निर्णय बहुत सारी ऐसी बातों पर प्रकाश डालती है जिन्हें मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा एवं न्यायधीश ए.एम. खानविलकर ने संज्ञान नहीं लिया।

न्यायमूर्ति डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने निर्णय में विस्तार से गिरफ्तार किए गए एक्टिविस्टों, याचिकाकर्ताओं की बाबत लिखा। सबसे महत्वपूर्ण बात न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने अतिरिक्त महाअधिवक्ता तुषार मेहता के इस पेटिशन की सुनवाई को लेकर उठाई गई आपत्ति पर कही। तुषार मेहता का कहना था कि इन पांचों याचिकाकर्ताओं का इस मुद्दे पर हस्तक्षेप करना बनता ही नहीं, क्योंकि इनका सीधे इस केस से कोई वास्ता नहीं। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने इस पर अपने फैसले में जो लिखा वह भविष्य के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण नजीर है। उन्होंने कहा “In the present case no less than five distinguished citizens with a track record of service to the nation have done so — the Court must look beyond locus into the heart of the matter. Whether the grievance has any substance is indeed a distinct matter which must be determined objectively. The Court will not interfere in every case merely because it has the jurisdiction. But its duty to scrutinise, perceive and remedy violations of human rights is non-negotiable. However, the issue of locus, even in a technical sense, has receded into the background. During the course of the hearing, the Court has been apprised that each of the five individuals who were arrested has subscribed to the averments in the petition and would stand by what is urged before this Court in protection of their rights. The objection to maintainability lacks substance, in either view of the matter.”

उन्होंने ‘जब-जब जुल्म हो…’ के गीत पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के वकील अभिषेक मनु सिंघवी स्पष्ट कर चुके हैं कि यह Bertolt Brecht’s की प्रसिद्ध कविता का अनुवाद भर है। न कि कोई बगावत भड़काने वाले नारे। उन्होंने पुलिस द्वारा मीडिया को लीक किए गए कथित दस्तावेजों पर भी विस्तार से टिप्पणी की। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि “I must, at the outset, dwell on the fairness of the manner in which the police have approached this investigation. On 29 August 2018, this Court issued notices to the State of Maharashtra and to the others impleaded as respondents to the proceedings. Within a few hours of the conclusion of the court hearing, a press conference was held in Pune by Shivarjirao Bodhke, the Joint

Commissioner of Police proclaiming that the Pune police had more than 27 sufficient evidence against the five individuals whose transit remand was stayed by this Court while ordering them to be placed under house arrest. This is disconcerting behaviour – the Joint Commissioner sought in this oblique manner to respond to the interim order of this Court by recourse to the electronic media. On 31 August 2018, a press conference was addressed by a team of senior police officers headed by Shri Parambir Singh, ADG (Law and Order), Maharashtra. During the course of the press conference letters (many of which should form part of the case diary) were selectively flashed and read out. According to the petitioners they were also leaked to the media. A video of the press conference is annexed in the form of a CD at Annexure R-2 of the rejoinder and has been uploaded on https://www.youtube.com/watch?v=PCVKfstx2Qc. On 1 September 2018 the ADG (Law and Order) appeared on a television programme titled “Truth v Hype” on NDTV, during the course of which he is stated to have agreed that the letters which had been read out by him were still undergoing forensic analysis together with the electronic devices. The CD of the programme is annexed as Annexure R-3 to the rejoinder. Besides this, the attention of the Court has been drawn to the fact that the first round of arrests in the present case took place on 6 June 2018. On 8 June 2018 an alleged letter was released by the police to the media a little before the proceedings for remand before the competent court (in the June arrests), alleging that the arrested persons were plotting to attack the Prime Minister. On 4 July 2018 when the arrested persons were to be produced before the Court in Pune, a letter attributed to Sudha Bhardwaj was 28 sensationally telecast on a television channel linking her with the unlawful activities of certain groups. A serious grievance has been made about the fact that these letters have neither been placed before the Court of law nor did they find mention in the transit remand applications moved before the CJM, Faridabad by the Pune police.”

सुधा भारद्वाज द्वारा कामरेड प्रकाश (जो पुलिस की थ्योरी अनुसार वरवर राव हैं) ईमेल को भी उन्होंने संदिग्ध करार दिया। उन्होंने कहा कि इस ईमेल में भेजने वाले की आईडी न होना। सत्रह बार इस कथित ईमेल में मराठी शब्दों का होना संदेहास्पद है, क्योंकि सुधा भारद्वाज को मराठी नहीं आती। उन्होंने इस पर भी टिप्पणी की कि पुणे पुलिस मीडिया को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जो जानकारी दे रही है, जिन सबूतों की बात कर रही है उसे कोर्ट में जमा नहीं करा रही है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने पुलिस द्वारा इस मामले में जिस प्रकार जांच का तरीका अपनाया उस हर विषय को अपने निर्णय में शामिल किया, जबकि इस बेंच के दो अन्य न्यायाधीशों ने ऐसे सभी पर खामोशी रखी थी। पुलिस द्वारा पुणे से पंचों को लाने पर भी सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का हवाला देते हुए गलत बताया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 1994 में जोगिन्दर कुमार वर्सेज स्टेट ऑफ यूपी में दिए गए निर्णय को अपने निर्णय में कोट किया।

This Court in Joginder Kumar v. State of U.P. [(1994) 4 SCC 260 : 1994 SCC (Cri) 1172] (to which one of us, namely, Anand, J. was a party)
considered the dynamics of misuse of police power of arrest and opined:

“No arrest can be made because it is lawful for the police officer to do so. The existence of the power to arrest is one thing. The justification for the exercise of it is quite another. … No arrest should be made without a reasonable satisfaction reached after some investigation as to the genuineness and bona fides of a complaint and a reasonable belief both as to the person’s complicity and even so as to the need to effect arrest.

Denying a person of his liberty is a serious matter.”” 34 (1994) 4 SCC 260 35 (1997) 1 SCC 416 42 39 This Court has a constitutional obligation, where its attention has been drawn, in a case such as the present, to a real likelihood of the derailment of a fair investigative process to issue appropriate directions under Article 142 of the Constitution.

जस्टिस चंद्रचूड़ ने इसके बाद अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘मैं इस विचार का हूं कि इस मामले में जांच निष्पक्ष हो इसलिए एक एसआईटी का गठन किया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस की जांच पर संदेह पैदा करने वाले कई तथ्य हमारे सामने रखे गए हैं जिसकी बिना पर एक इंडिपेंडेंट जांच जरूरी हो जाती है। इसलिए मैं पूरी दृढ़ता के साथ एसआईटी गठन का पक्षधर हूं। इस एसआईटी को कोर्ट मॉनिटर करेगी और एक समयबद्ध सीमा में अपनी रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल किया करेगी। स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों का फैसला लागू हुआ।

पुणे पुलिस के साथ ही अब एनआईए जांच में शामिल हो चुकी है। पांचों मानवाधिकार कार्यकर्ता के साथ ही हनी बाबू भी जेल में हैं। दिल्ली में पिछले दिनों हुए दंगों की जांच में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद से पूछताछ इस आशंका को मजबूती देती है कि ‘लोकतंत्र भारी खतरे में हैं। मौज में न रहे, तटस्थ न रहें। जांच के नाम पर यह आंच कल आप तक भी पहुंच सकती है।’

चलते-चलते मैं आपको जर्मन कवि, लेखक मार्टिन नीमौलर की एक कविता सुनाता हूं ताकि आपकी तटस्थता खत्म हो सके, भक्ति भाव कम हो सके।
First they came for the Communists
And I did not speak out
Because I was not a Communist
Then they came for the Socialists
And I did not speak out
Because I was not a Socialist
Then they came for the trade unionists
And I did not speak out
Because I was not a trade unionist
Then they came for the Jews
And I did not speak out
Because I was not a Jew
Then they came for me
And there was no one left
To speak out for me

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