[gtranslate]
Editorial

हिंदू-मुस्लिम एकता के सर्वश्रेष्ठ राजदूत

पिचहत्तर बरस का भारत- 4
 
हिंदू-मुस्लिम एकता के सर्वश्रेष्ठ राजदूत लॉर्ड कर्जन के बाद भारत के वायसराय बने लॉर्ड मिण्टो ब्रिटिश भारत में तेज हो रही राजनीतिक चेतना के नतीजों को भली भांति समझ रहे थे। उन्होंने इस चेतना को कुंद करने के लिए ‘फूट डालो शासन करो’ की नीति अपनाई। बहुसंख्यक हिंदुओं की काट के लिए उन्होंने अल्पसंख्यक मुसलमानों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। इसी क्रम में देशभर के पैंतीस अमीर मुस्लिम नेताओं संग शिमला में उनकी मुलाकात हुई। लॉर्ड मिण्टो के साथ अपनी मुलाकात के दौरान उन्हें सौंपे गए लिखित ज्ञापन में कुलीन और धनाढ्य मुसलमानों ने आशंका जताई कि ब्रिटिश सरकार द्वारा किए जा रहे प्रशासनिक सुधारों और प्रांतीय विधान परिषदों में मुसलमानों के सही प्रतिनिधित्व की यदि व्यवस्था नहीं की गई तो इससे मुसलमानों के राष्ट्रीय हित सुरक्षित नहीं रह पाएंगे और मुसलमानों को उनके प्रति ‘कठोर रुख’ रखने वाले बहुसंख्यक हिंदुओं के रहमोकरम पर जीना पड़ेगा। इस लिखित ज्ञापन में हिंदुओं के लिए पहली बार मुस्लिम नेताओं द्वारा ‘हमारे प्रति कठोर’ बहुसंख्यक शब्द का इस्तेमाल किया गया जो अंग्रेज वाइसराय को खास पसंद आया। मिण्टो ने इस बैठक में मुसलमान प्रतिनिधिमण्डल को भरोसा दिया कि उनके द्वारा किए जा रहे प्रशासनिक सुधारों में मुस्लिम समाज के राजनीतिक और सामाजिक अधिकार सुरक्षित रहेंगे। स्टेनली वोलपर्ट अपनी पुस्तक ‘जिन्ना ऑफ पाकिस्तान’ में इस घटना की बाबत लिखते हैं कि लॉर्ड मिण्टो के निजी सचिव लेफ्टिनेंट कर्नल सर जेम्स डनलप ने लेडी मिण्टो को इस बैठक की बाबत जानकारी देते हुए कहा था कि ‘यह उपलब्धि छह करोड़ मुसलमानों को बागियों की कतार में शामिल होने से रोक लेने से कमतर नहीं हैं।’
शिमला की इस बैठक बाद एक पृथक मुस्लिम संगठन बनाए जाने की प्रक्रिया में तेजी आ गई। ढाका तेजी से ऐसी मुस्लिम राजनीति का केंद्र बनने लगा था जिसमें अंग्रेज हुकूमत के प्रति गहरा सद्भाव तो कांग्रेस की राष्ट्रवादी  राजनीति के प्रति उतना ही गहरा अविश्वास था। 30 दिसंबर, 1906 में ढाका के शाह बाग में मुस्लिम लीग की स्थापना ऐसे ही माहौल में हुई। लीग के पहले अध्यक्ष बने हैदराबाद के नवाब मुश्ताक हुसैन ने लीग को संबोधित करते हुए जो भाषण दिया उससे स्पष्ट होता है कि किस कदर अलगाव की भावना इन धनाढ्य मुस्लिमों में पनप चुकी थी और अंग्रेज सत्ता के प्रति वफादार यह वर्ग आजादी मिलने की अवस्था में बहुसंख्यक हिंदुओं के हाथों प्रताड़ित होने की आशंका से ग्रस्त था। नवाब मुश्ताक अहमद ने कहा कि ‘अगर दूर भविष्य में कभी भारत में ब्रिटेन की सरकार न रही तो भारत की हुकूमत उस समुदाय के हाथ में चली जाएगी जो हमसे तकरीबन चार गुना बड़ा है। इसलिए  मेहरबानों, आप में से हर एक को सोचना चाहिए कि अगर भारत में ऐसे हालात बन गए तो उनमें आप की स्थिति क्या होगी। उस समय हमारी जिंदगी, हमारी संपत्ति, हमारी इज्जत और हमारा दीन बहुत बड़े खतरे में होगा। आज के हालात में भी जब  शक्तिशाली ब्रिटिश प्रशासन अपनी प्रजा की सुरक्षा कर रहा है, हम मुसलमानों  को अपने पड़ोसियों के हड़पू हाथों से अपने हितों की हिफाजत करने में संगीन दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। …. उस वक्त के बारे में सोचिए, जब हम अपने पड़ोसियों की प्रजा बन जाएंगे। …. अपने पड़ोसियों की ऐसी इच्छा पूरी होने से रोकने के लिए मुसलमानों को इससे बेहतर और गारंटीशुदा रास्ता कोई और नहीं मिल सकता कि वे ग्रेट ब्रिटेन के परचम तले संघबद्ध हो जाएं और अपने जान-माल को उसी की हिफाजत के हवाले कर दें।’ उस पूरे दौर में मोहम्मद अली जिन्ना ने लीग से और उसके नेताओं से स्पष्ट दूरी बनाए रखी। लीग के स्थापना कार्यक्रम में भाग लेने के बजाए जिन्ना ने कलकत्ता में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में शिरकत करना पसंद किया। इस अधिवेशन की अध्यक्षता दादा भाई नौरोजी कर रहे थे और जिन्ना बतौर उनके सचिव इस अधिवेशन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन मौजूद थे। जिन्ना ने आगा खान के नेतृत्व में वाइसराय लॉर्ड मिण्टो से मिलने गए मुस्लिम प्रतिनिधि मण्डल से गहरी असहमति दर्ज कराते हुए गुजरात के प्रतिष्ठित अखबार ‘गुजराती’ के संपादक को लिखे एक पत्र में पूछा कि ‘इस प्रतिनिधिमण्डल को कैसे भारतीय मुसलमानों का प्रतिनिधि मण्डल कहा जा सकता है। ये चुने हुए प्रतिनिधि नहीं बल्कि खुद ही खुद को चुने गए लोगों का प्रतिनिधि मण्डल था।’ लीग की स्थापना को लेकर भी जिन्ना के तेवर कड़े रहे। उन्होंने ऐसे किसी भी संगठन को अलगाववादी कह पुकारा।
यह वह समय था जब राष्ट्रीय एकता का रंग जिन्ना पर पूरी तरह चढ़ चुका था और मुस्लिम लीग की अलगाववादी नीतियों से इतर जिन्ना पूरे देश में ‘हिंदू-मुस्लिम’ एकता के पैरोकार बन उभरने लगे थे। इसी अधिवेशन में सरोजनी नायडू पहली बार जिन्ना संग मिली थीं। सरोजनी नायडू ने 1917 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘Mohammad Ali Jinnah:An Ambassador of Unity’ में जिन्ना को हिंदू- मुस्लिम एकता का राजदूत करार दिया था। गोपाल कृष्ण गोखले ने जिन्ना के लिए कहा था ‘जिन्ना सच्चे तत्वों से बने हैं। साम्प्रदायिक पूर्वाग्रह से मुक्त वह हिंदू-मुस्लिम एकता के सर्वश्रेष्ठ राजदूत हैं।’
जिन्ना का कद 1906 से लेकर 1913 तक लगातार कांग्रेस भीतर बढ़ता गया। इस दौरान 1910 में वे वाइसराय की सलाहकार परिषद के सदस्य भी निर्वाचित हुए। पैंतीस बरस की उम्र में इस परिषद का सदस्य बनने वाले वे सबसे युवा नेता थे। इसे विडंबना कहा जा सकता है कि तत्कालीन वाइसराय लॉर्ड मिण्टो द्वारा धर्म के आधार पर इस परिषद में सीटों के आरक्षण का विरोध करने वाले जिन्ना स्वयं मुस्लिमों के लिए आरक्षित बंबई की सीट से चुने गए थे। जिन्ना ने 1911 में इस परिषद में अपना पहला कानूनी प्रस्ताव रख मुसलमानों के बीच अपनी गहरी छाप छोड़ने और सम्मानजनक पैठ बनाने का काम किया। दरअसल बरसों पहले 1894 में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय मुसलमानों के ट्रस्ट जिन्हें वक्फ बोर्ड कहा जाता है, को कर में मिलने वाली छूट से बाहर कर दिया था। वक्फ की संपत्ति वह संपत्ति होती है जो मुसलमान दीन के कामों के लिए अर्थात् दान-पुण्य के लिए दान कर देता है। इस प्रकार की संपत्ति को हमेशा से ही टैक्स फ्री रखा जाता रहा है। 1894 में लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने इसे टैक्स के दायरे में ला दिया था। जिन्ना ने वाइसराय की परिषद के समक्ष इसको दोबारा से टैक्स फ्री करने का विधेयक रखा। इससे उनकी छवि कट्टरपंथी मुसलमानों में भी निखरी। 2013 में यह कानून अंततः ब्रिटिश सरकार बनाने पर मजबूर हो गई। 1911 में ही एक अन्य बड़ी घटना सामने आई जिसके चलते दिनों-दिन अपना राजनीतिक आधार बढ़ा रही मुस्लिम लीग को गहरा झटका लगा। दिसंबर, 1911 में ब्रिटिश के सम्राट जॉर्ज पंचम भारत यात्रा पर आए थे। उन्होंने नाटकीय अंदाज में 1905 में विभाजित किए गए बंगाल प्रांत को वापस एक करने की घोषणा कर डाली। इतिहासकार इसे कांग्रेस के नेतृत्व में शुरू हुए ‘बंग-भंग आंदोलन की जीत बतौर देखते हैं। सम्राट जॉर्ज पंचम की इस घोषणा का एक बड़ा असर लीग की राजनीति पर पड़ा। अभी तक ब्रिटिश हुकूमत की चापलूसी करते आ रहे लीगी नेताओं को अब अपनी राजनीति बचाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत की वफादारी से इतर सोचने को मजबूर कर दिया। जॉर्ज पंचम की इस घोषणा ने कांग्रेस को भारी मजबूती दे डाली। ब्रिटेश के सम्राट ने अपनी इसी यात्रा के दौरान ही ब्रिटेन भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने की घोषणा भी करी थी। बहरहाल कट्टरपंथी मुस्लिम लीग के नेताओं ने अब जिन्ना की बातों को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया। जिन्ना सदस्य कांग्रेस के थे लेकिन अब वे लीग के कार्यक्रमों में भी बतौर ‘सम्मानित अतिथि’ बुलाए जाने लगे थे। बिहार के शहर बांकीपुर में दिसंबर, 1912 में कांग्रेस और लीग के वार्षिक सम्मेलन हुए जिनमें जिन्ना उपस्थित थे। उन्होंने लीग को कांग्रेस की ‘स्वराज’ की मांग संग जुड़ने की अपील की। इसके कुछ महीनों बाद जिन्ना ने लखनऊ में आयोजित एक बैठक में लीग के नेताओं को अपने संविधान को उदारवादी बनाने के लिए तैयार कर डाला। नया संविधान पेश करते हुए लीग के अध्यक्ष सर मियां मोहम्मद शफी ने अपने भाषण में जिन्ना की तारीफों के कसीदे पढ़ते हुए जिन्ना के वक्फ बोर्ड को टैक्स फ्री करने के लिए वाइसराय परिषद में कानूनी प्रस्ताव लाने को सराहा। 2013 आते-आते जिन्ना को मुस्लिम समाज के एक बड़े वर्ग ने लीग का सदस्य बनने के लिए मना ही लिया। जिन्ना राजी तो हुए लेकिन बर्शत। उन्होंने शर्त रखी कि ‘My loyality to the Muslim league and the Muslim interst would in no way and at no time imply even the shadow of disloyality to the larger national interest to which my life is dedicated (मुस्लिम लीग और मुसलमानों के हितों के प्रति मेरी वफादारी का यह कतई अर्थ न निकाले जाए कि उस राष्ट्रीय मकसद के प्रति मेरी निष्ठा कम होगी जिनके लिए मैंने अपना जीवन समर्पित कर दिया है)।
जिन मोहम्मद अली जिन्ना को हम, आजाद भारत की संताने, घृणा की दृष्टि से देखती आई हैं, उनका इतना राष्ट्रभक्त और उदारवादी चेहरा 1920 तक बना रहा। इतिहास का गंभीर अध्ययन यह इशारा जरूर करता है कि दक्षिण अफ्रिका से महात्मा गांधी की वापसी और उनका कांग्रेस की राजनीति में प्रवेश, जिन्ना का पहले कांग्रेस और बाद में उदारवादी विचारों से दूरी का कारण बना। इस पर चर्चा अगले भाग में….

You may also like

MERA DDDD DDD DD