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Editorial

राजीव युग का प्रारम्भ

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-106
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना 1969 में उनके प्रधानमंत्रित्वकाल की ही देन थी। नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति को इंदिरा गांधी ने अमेरिका के सख्त ऐतराज के बाद भी जारी रखा। उन्होंने बड़े पैमाने पर भू-सुधार की दिशा में कदम उठाए, जिनका बड़ा लाभ भूमिहीन किसानों को मिला। बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण भारत को आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराकर निजी सूदखोरों पर लगाम कसी गई। दलितों के सशक्तिकरण के लिए उनके शासनकाल में महत्वपूर्ण योजनाएं लागू की गईं। कुख्यात दस्यु सुंदरी फूलन देवी का 1983 में आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटना इंदिरा की सुधारवादी नीतियों का ही परिणाम था।

यह इंदिरा का एक रूप था। उनका दूसरा रूप एक निर्मम तानाशाह, पुत्रमोह में अंधी मां, भ्रष्टाचार को अनदेखा करने वाली और कांग्रेस को एक न रख पाने वाली नेता का है। ऐसी नेता, जिसे यह भारी गलतफहमी हो गई थी कि केवल उनके ही हाथों में देश सुरक्षित है। भारत की राजनीति और समाज पर पैनी नजर रखने वाले भारतीय इतिहास एवं राजनीति के नेपल्स विश्वविद्यालय में प्रोफेसर डिएगा मायोरानो के अनुसार- ‘इंदिरा गांधी शासनकाल के तीन प्रमुख दीर्घकालिक विनाशकारी परिणाम चिन्हित किए जा सकते हैं। सर्वप्रथम, उन्होंने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार को संस्थागत रूप से स्थापित करने का काम किया…चूंकि वे 1970 में राजनीतिक दलों को औद्योगिक घरानों से मिलने वाले चुनावी चंदे पर प्रतिबंध लगा चुकी थी, जिसके चलते एक समानांतर अर्थव्यवस्था विकसित हुई, जिसने भ्रष्टाचार को भारतीय राजनीति में पनपाने का काम किया… इंदिरा गांधी शासनकाल का दूसरा दीर्घकालिक विनाशकारी परिणाम राज्य की संस्थाओं को व्यक्तित्व और पक्षपातपूर्ण उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल में लाना। दूसरे शब्दों में, इंदिरा गांधीकाल ने ‘सत्ता को अत्यधिक व्यक्तिगत और संस्थागत रूप से कमजोर’ करने के विचार को आगे बढाया …इंदिरा गांधी ने कांग्रेस (आई) के शत्रुओं को ‘राजनीतिक रूप से’ समाप्त करने के लिए सरकारी तंत्र का दुरुपयोग किया, जिस कारण संस्थाओं का क्षरण उनकी मृत्यु के पश्चात् भी भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में बना रहा…श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल का तीसरा दीर्घकालिक और विनाशकारी परिणाम वंशवादी राजनीति का उदय होना रहा। पहले वे स्वयं एक संस्था बन बैठीं…दूसरे शब्दों में, वंशवादी राजनीति ने लोकतंत्र की संस्थाओं को कमजोर करने का काम किया, जिसके चलते इन संस्थाओं का आम आदमी से वास्ता कमजोर होता चला गया।’

इंदिरा गांधी 14 बरस तक भारतीय राजनीति के क्षितिज पर विराजमान रहीं। उन्होंने इन 14 बरसों के दौरान बहुत कुछ सकारात्मक तो नहीं नकारात्मक प्रभाव भारतीय राजनीति और लोकतंत्र पर डाला, जिस पर विस्तार से पूर्व में चर्चा की जा चुकी है। उन्होंने उपरोक्त के अतिरिक्त एक ऐसा प्रभाव भारतीय राजनीति पर छोड़े, जिसको आज तक दरकिनार नहीं किया जा सका है। 1970 के आम चुनाव में उन्होंने सीधे आमजन से खुद को जोड़ने के लिए ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया था। इस नारे का ही प्रभाव है कि 50 बरस बीत जाने के बाद भी भले ही गरीबी समाप्त कर पाने में अपेक्षित सफलता न मिल पाई हो, लेकिन भारतीय राजनीति का केंद्रबिंदु आम आदमी आज भी बना हुआ है।

राजीवकाल

31 अक्टूबर के दिन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह मॉरीशस में थे। केंद्रीय गृहमंत्री नरसिम्हा राव अपने गृह जनपद आंध्र प्रदेश में तो कांग्रेस महासचिव राजीव गांधी केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी और रेलमंत्री ए.बी.ए. ग़नी ख़ान चौधरी के साथ पश्चिम बंगाल में चुनाव सभा कर रहे थे। इंदिरा गांधी के विश्वस्त नौकरशाह पी.सी. एलेक्जेंडर और कैबिनेट सेक्रेटरी कृष्णा स्वामी राव साहब मुम्बई दौरे पर थे। इन सभी को तत्काल दिल्ली पहुंचने का संदेश भेजा गया। राजीव गांधी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) पहुंचने से पहले ही कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के मध्य आपसी सलाह -मशिवरा कर राजीव को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाए जाने पर सहमति बन गई थी। प्रणव मुखर्जी के अनुसार- ‘उन्होंने कलकत्ता (अब कोलकाता) से वापस लौटते समय वायुयान में ही राजीव को कह दिया था कि उन्हें प्रधानमंत्री पद संभालना होगा। बकौल मुखर्जी राजीव ने उनसे पूछा कि क्या आप समझते हैं कि मैं यह जिम्मेवारी संभाल पाऊंगा? मेरा उत्तर था-‘हां’। हम सब आपके साथ हैं और आपको सभी का सहयोग मिलेगा।’

राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के दिल्ली वापस पहुंचते ही कांग्रेस संसदीय बोर्ड की तरफ से राजीव गांधी को कांग्रेस संसदीय दल का नया नेता चुने जाने की बाबत पत्र सौंप दिया गया। राष्ट्रपति ने भी तत्काल ही इसके लिए अपनी सहमति प्रदान कर दी। शाम 6ः45 मिनट पर राजीव गांधी ने भारतीय गणतंत्र के सातवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ले ली। उनके शपथ लेने के पश्चात् ही आधिकारिक रूप से इंदिरा गांधी की मृत्यु का समाचार दूरदर्शन एवं ऑल इंडिया रेडियो से प्रसारित किया गया था।

अपने छोटे भाई संजय गांधी के ठीक विपरीत राजीव राजनीति से सख्त परहेज रखने वाले पारिवारिक स्वभाव के व्यक्ति थे। इंडियन एयरलाइंस में बतौर पायलट अपनी नौकरी से बेहद संतुष्ट राजीव और उनकी इटली मूल की पत्नी सोनिया के निकट मित्रों में कोई भी राजनीतिक व्यक्ति नहीं था। कवि हरिवंश राय बच्चन के पुत्रों अमिताभ और अजिताभ संग राजीव की घनिष्ठ मित्रता थी। उनके अन्य करीबियों में एयरलाइंस के सहकर्मी शामिल थे। राजीव के लिए कहा जाता है कि उन्होंने कभी भी प्रधानमंत्री का पुत्र होने का नाजायज फायदा नहीं उठाया। इंडियन एयरलाइंस के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक कैप्टन ए.एम. कपूर के अनुसार- ‘मुझे सभी पायलट्स की कार्यक्षमता की बाबत रिपोर्ट मिला करती थीं। पायलट राजीव गांधी के बारे में हर रिपोर्ट में कहा जाता था कि वे अपने कार्य में निपुण हैं। उनके बारे सबसे अच्छी बात यह थी कि वे हर नियम का पालन करते थे। एक भी ऐसा अवसर नहीं आया, जब उन्होंने एयरलाइंस के मामलों में हस्तक्षेप किया हो। वे प्रधानमंत्री का पुत्र होने के नाते कोई दबाव नहीं बनाते थे। सच तो यह है कि वे दिखाई तो देते, लेकिन सुनाई नहीं देते थे। अनुशासन के मामले में वे अन्य पायलटों के लिए आदर्श थे।’

संजय गांधी की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात् राजीव पर राजनीति में आने के लिए भारी दबाव बनाया गया था। सोनिया और राजीव इसके लिए कतई तैयार नहीं थे, लेकिन अंततः उन्हें इंदिरा गांधी के आगे झुकना ही पड़ा था। इंदिरा गांधी की मृत्यु के पश्चात् जब राजीव को प्रधानमंत्री बनाने की बात उठी तब भी सोनिया ने इसका पुरजोर विरोध किया था। उन्हें डर था कि राजीव का हश्र भी उनकी मां समान हो जाएगा। सोनिया गांधी के जीवनीकार जेवियर मोरो के अनुसार जब भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में राजीव ने सोनिया को कहा- ‘ये लोग मुझे प्रधानमंत्री बनाने जा रहे हैं। सोनिया ने अपनी आंखे बंद कर लीं। यह सबसे बुरी बात थी, जो वह सुन सकती थीं। यह मौत की घोषणा के समान बात थी।’

नियति ने शायद राजीव और सोनिया के लिए राजनीति में प्रवेश को अनिवार्यता तय कर लिया था। राजीव न चाहते हुए भी राजनीति का हिस्सा बने, प्रधानमंत्री बने और अन्ततः सोनिया गांधी की आशंकाओं को सही साबित करते हुए इसी राजनीति की भेंट चढ़ गए।

बेहद कठिन समय और परिस्थिति में प्रधानमंत्री बने राजीव शुरुआती चरण में ही गम्भीर चूक कर बैठे। पंजाब में सिख आतंकियों द्वारा निर्दाेष हिंदुओं की हत्याओं के चलते पहले से ही सिखों के प्रति नाराजगी बढ़ने लगी थी, जिसे सुलगाने का काम इंदिरा गांधी की उनके दो सिख सुरक्षाकर्मियों द्वारा हत्या किए जाने ने कर दिखाया। 31 अक्टूबर, 1984 की शाम से ही देशभर, विशेषकर दिल्ली में सिख-विरोधी दंगे भड़क उठे। राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जब 31 अक्टूबर की शाम ‘एम्स’ पहुंचे, तब तक दिल्ली की फिजा हिंसक होने लगी थी। देश के प्रथम नागरिक की कार पर भीड़ ने हमला बोलकर स्पष्ट संकेत दे दिए थे, यदि स्थिति को तत्काल संभाला नहीं गया तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। इसी शाम 6ः45 बजे राजीव ने देश की सत्ता संभाली थी, लेकिन वे समय रहते सिखों के खिलाफ तेजी से फैल रही हिंसा को रोक पाने में पूरी तरह विफल साबित हुए तब इस हिंसा को हवा देने का काम कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने किया था। दिल्ली में कांग्रेस सांसद जगदीश टाइटलर, टेªड यूनियन नेता ललित माकन, सज्जन कुमार और एच.के.एल. भगत ने खुलकर सिखों के खिलाफ पार्टी कार्यकर्ताओं को भड़काने, निर्दाेष सिखों को मौत के घाट उतारने और प्रशासनिक तंत्र को निष्क्रिय बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। सांसद सज्जन कुमार पर तो ख़ुद उग्र भीड़ का नेतृत्व करने तक के आरोप लगे थे। तीन दिन तक दिल्ली समेत देशभर के तकरीबन 40 शहरों में चले इस नरसंहार में तकरीबन 3000 सिख अकेले दिल्ली में मार डाले गए थे। अन्य शहरों में मारे गए सिखों की संख्या भी कई हजार में रही। इन दंगों के दौरान लगभग 50,000 सिखों का विस्थापन हुआ।

बड़े पैमाने पर सिख महिलाओं और लड़कियों संग बलात्कार किया गया। दिल्ली पुलिस इस दौरान मूक दर्शक बनी रही थी। कई पुलिस अधिकारियों पर तो खुलकर दंगाइयों का साथ तक देने के आरोप लगे थे। 19 नवम्बर, 1984 को इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर कांग्रेस पार्टी ने एक बड़ी सभा का आयोजन किया। इस सभा को सम्बोधित करते हुए नवनियुक्त प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसा कह डाला, जिसने सिख समुदाय के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर दिया। राजीव ने कहा- ‘हमें इंदिरा जी को याद रखना है। हमें याद रखना है कि उनकी हत्या क्यों हुई? हमें याद रखना है कि कौन- कौन लोग इसके पीछे हो सकते हैं। जब इंदिरा जी की हत्या हुई थी, तो हमारे देश में कुछ दंगे-फसाद हुए थे। हमें मालूम है कि भारत की जनता के दिल में कितना क्रोध आया, कितना गुस्सा आया। और कुछ दिन के लिए लोगों को लगा कि भारत हिल रहा है, लेकिन जब भी कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती है।’

एक प्रधानमंत्री का दंगों को यह कहते हुए उचित ठहराना कि ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती थोड़ी हिलती है’, हर दृष्टि से एक बेहद असंवेदनशील और अपरिपक्व कथन था। उनका यह कथन इस आशंका और आरोप की भी पुष्टि करता प्रतीत होता है कि इन दंगों को सीधे कांग्रेस नेतृत्व का समर्थन प्राप्त था, जिसके चलते पुलिस प्रशासन पूरी तरह निष्क्रिय रहा था। कांग्रेस नेतृत्व ने कभी भी इन दंगों की ईमानदारीपूर्वक जांच कराने, दोषियों को चिन्हित करने और उन्हें दण्ड देने का कोई प्रयास नहीं किया। हालांकि खानापूर्ति के लिए केन्द्र सरकार ने नवम्बर, 1984 में दिल्ली पुलिस की भूमिका की पड़ताल के लिए आईपीएस अधिकारी वेद मारवाह की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन जरूर किया था। लेकिन मारवाह कमीशन को जांच पूरी करने से पहले ही 1985 के मध्य में रोक दिया गया और उसकी अधूरी जांच रिपोर्ट को एक नए गठित न्यायिक आयोग को सौंप दिया गया। यह न्यायिक आयोग उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा की अध्यक्षता में मई, 1985 में गठित किया गया था। वेद मारवाह ने पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद वर्ष 2013 में खुलासा किया था कि दिल्ली पुलिस की इन दंगों के दौरान भूमिका बेहद शर्मनाक थी। मारवाह के शब्दों में- ‘अपनी जांच के दौरान मैं पूर्व और दक्षिणी दिल्ली के थानों में गया। मैंने पाया कि पुलिस दंगों के दौरान घटनास्थल पर गई ही नहीं। इस बात के प्रमाण थे, जिन्हें मैंने अपने कब्जे में ले लिया…होना तो यह चाहिए था कि दोषी पाए गए पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही होती, लेकिन हुआ इसके ठीक विपरीत। एक व्यक्ति, जो अपने काम करने का प्रयास कर रहा था, उसे बीच में ही रोक दिया गया।’

क्रमशः

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