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Editorial

नई सम्भावनाएं, पुरानी आशंकाएं

मेरी बात 
चार जून को आए आम चुनाव नतीजों बाद एक बार फिर से केंद्र सरकार द्वारा 1 जुलाई से लागू किए जा रहे तीन आपराधिक कानूनों को स्थगित कर पहले इन पर व्यापक चर्चा कराए जाने की मांग उठने लगी है। 20 जून को नागरिक समाज के 3,700 बुद्विजीवियों, न्यायविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इन कानूनों को लेकर अपनी गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए एनडीए गठबंधन में शामिल चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार, जयंत चौधरी और ‘इंडिया गठबंधन’ के नेताओं को एक पत्र भेज मांग की है कि इन तीन कानूनों पर एक संयुक्त संसदीय कमेटी विचार करे तथा इस विमर्श में कानूनविदों, संविधान विशेषज्ञों और आमजन को भी शामिल किया जाए। जाहिर है नागरिक समाज ने यह पत्र इस उम्मीद भरोसे लिखा है कि गठबंधन में शामिल दलों का दबाव सरकार को स्वीकारना होगा। ऐसे में जब इन कानूनों के लागू होने का समय आ चुका है, यह जानना-समझना जरूरी हो जाता है कि ये कानून हैं क्या? और इनके लागू होने से क्या प्रभाव आमजन पर पड़ने जा रहा है? तो चलिए इनको थोड़ा समझने का प्रयास किया जाए।
दिसंबर, 2023 में केंद्र सरकार ने संसद से तीन नए कानून पारित कराए थे और इन्हें भारतीय न्याय व्यवस्था में आमूल-चूल सुधार लाने वाले क्रांतिकारी कदम करार दिया था। ये तीन कानून हैं- ‘भारतीय न्याय संहिता’, ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ और ‘भारतीय साक्ष्य संहिता’। ‘भारतीय न्याय संहिता’  वर्तमान में मौजूद ‘भारतीय दंड संहिता’ के बदले लाई गई है। ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ वर्तमान में मौजूद ‘आपराधिक प्रक्रिया संहिता’ के स्थान पर और भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872’ के स्थान पर ‘भारतीय साक्ष्य संहिता’ लाई गई है। अगस्त 2023 में इन तीन कानूनों को लोकसभा में रखा गया था। दिसंबर में इन तीनों को पहले सरकार ने वापस लिया और फिर संशोधित तीन नए कानून सदन में रखे। विपक्ष ने तब तीनों पर व्यापक बहस की मांग की थी जिसे सरकार ने स्वीकारा नहीं और दिसंबर 2023 में कानूनों को संसद के दोनों सदनों से पारित करा दिया। 25 दिसंबर, 2023 को राष्ट्रपति ने इन कानूनों पर अपनी सहमति भी दे डाली। तभी से न्यायविदों का, बुद्विजीवियों का और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का एक बड़ा वर्ग इन कानूनों को दमनकारी बता अपनी आशंकाएं व्यक्त करता आ रहा है कि इन कानूनों के जरिए राज्य संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को संकुचित करने का काम करने जा रहा है। 1 जुलाई, 2024 से ये तीनों कानून लागू हो जाएंगे। ऐसे में यह समझना, समझाया जाना जरूरी हो जाता है कि इन तीन कानूनों से न्याय प्रणाली में क्या स्वागत योग्य होने की संभावनाएं हैं और क्या कुछ ऐसा है जो नागरिक समाज के एक बड़े वर्ग को डरा रहा है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का कहना है कि इन तीन कानूनों के लागू होने बाद आम नागरिक ब्रिटिश कालीन गैरजरूरी और दमनकारी कानूनों से मुक्त हो जाएगा तो दूसरी तरफ इन कानूनों के आलोचक दावा कर रहे हैं कि इन कानूनों के चलते राज्य (केंद्र सरकार) की एजेंसियों को ऐसे अधिकार मिल जाएंगे जिनके दुरुपयोग का भारी अंदेशा बना रहेगा और भारत एक ‘पुलिस स्टेट’ में तब्दील हो जाएगा। नागरिक समाज की आशंकाएं बेबुनियाद नहीं हैं। वर्ष 2020 में ‘नेशनल कम्पैन अंगेंस्ट ट्रार्चर’ नामक संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में विस्तार से बताया था कि भारत में औसतन प्रतिदिन पांच लोग पुलिस हिरासत में मारे जाते हैं। ऐसा तब जबकि वर्तमान व्यवस्था में पुलिस के अधिकारों को सीमित रखने के कई सारे प्रावधान मौजूद हैं और समय-समय पर उच्चतम न्यायालय पुलिस की ज्यादतियों को रोकने के लिए कड़े दिशा-निर्देश जारी करता रहा है। इसके बावजूद पुलिस हिरासत में हत्या, गैर कानूनी तरीकों से गिरफ्तारियां और सिविल मामलों में पुलिसिया कार्यवाही आम बात है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता पुलिस को अधिक शक्ति प्रदान करती है। इसकी धारा 187(2) और 187(3) में प्रावधान है कि पुलिस हिरासत 60 अथवा 90 दिन तक बढ़ाई जा सकती है। वर्तमान में पुलिस हिरासत अधिकतम 15 दिनों की है जिसके पूरी होने बाद कथित अपराधी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है। उच्चतम् न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले ‘सीबीआई बनाम अनुपम जे. कुलकर्णी’ में यह व्यवस्था दी थी कि पुलिस हिरासत गिरफ्तारी के शुरुआती पंद्रह दिनों में ही दी जाएगी और इन पंद्रह दिनों के बाद कथित अपराधी को पुलिस दोबारा अपनी कस्टडी में नहीं ले सकती है। नए कानून में पुलिस पुनः हिरासत की माग कर सकती है। इसका सीधा असर ऐसे किसी कथित अपराधी की जमानत पर पड़ना तय है क्योंकि जमानत मिलने के बाद भी पुलिस ऐसे व्यक्ति को पुनः जांच के नाम पर गिरफ्तार अब कर सकती है। इतना ही नहीं एक अन्य महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला बदलाव नए कानून में यह किया गया है कि मौजूदा कानून के अनुसार केस के विचाराधीन रहते हुए जेल में बंद अंडर ट्रायल कैदी जिस अपराध के लिए वे गिरफ्तार हैं, उसकी अधिकतम सजा का यदि आधा समय निर्णय आने के दौरान ही जेल में बिता देते हैं तो वे स्वतः जमानत के अधिकारी हो जाते हैं। अब 1 जुलाई से यह अधिकार समाप्त हो जाएगा और अदालती आदेश आने तक ऐसे कैदी जिन पर एक से ज्यादा मुकदमें चल रहे हों या एक ही मुकदमें में उन पर कई धाराएं लगाई गई हों, उन्हें जमानत नहीं मिलेगी। यह उच्चतम् न्यायालय द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ‘नो जेल बट बेल’ (जमानत नियम है, जेल अपवाद है) के खिलाफ है और ‘दोषी साबित होने तक बेगुनाह’ माने जाने वाले सिद्धांत के भी खिलाफ है। नागरिक समाज का एक बड़ा वर्ग इसलिए भी आशंकित है और इन कानूनों का विरोध कर रहा है क्योंकि विचाराधीन कैदियों से जुड़े ज्यादा मामले पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के हैं। ‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो’ के अनुसार जेल में बंद 75 प्रतिशत से ज्यादा कैदी विचाराधीन हैं जिनमें 30 प्रतिशत ओबीसी और 19.3 मुसलमान हैं। ऐसे में जमानत की शर्तों को ज्यादा कठोर बनाना अल्पसंख्यक और पिछड़ों के प्रति न्याय संगत कतई नहीं जान पड़ता है।
केंद्र सरकार ने ‘भारतीय दंड संहिता’ के स्थान पर नई व्यवस्था ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ को लागू करने की बाबत दिए अपने स्पष्टीकरण में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि अब औपनिवेशिक काल का काला कानून ‘राजद्रोह’ समाप्त कर दिया गया है। ‘राजद्रोह’ निश्चित तौर पर एक दमनकारी कानून अंग्रेज हुकूमत द्वारा 1870 में उनकी सत्ता के खिलाफ भारतीयों में बढ़ रहे आक्रोश को दबाने के उद्देश्य से लाया गया था। आजादी पूर्व और आजादी उपरांत इस कानून का भारी दुरुपयोग देखने को मिलता रहा है। समय-समय पर इसे समाप्त किए जाने की मांग भी उठती रही है। वर्ष 2022 में उच्चतम न्यायालय ने इस 155 बरस पुराने कानून को स्थगित करते हुए इसे पुर्नविवेचना के लिए एक तीन सदस्यीय खण्डपीठ को सौंप दिया था। ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ में इस कानून को समाप्त कर दिया गया है लेकिन कानूनविदों और नागरिक समाज के एक बड़े वर्ग का मानना है कि मात्र ‘राजद्रोह’ शब्द हटाया गया है और इस 1870 के ब्रिटिश कानून से कहीं अधिक दमनकारी कानून धारा 150 के अंतर्गत लाया गया है। पुराने कानून की धारा 124-ए के अनुसार- ‘जो कोई भी शब्दों के माध्यम से या मौखिक या लिखित, या संकेतों द्वारा या दृश्य प्रतिनिधित्व द्वारा, या भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमानना लाता है या उत्तेजित करने का प्रयास करता है, उसे आजीवन कारावास की सजा दी जाएगी। इसमें जुर्माना जोड़ा जा सकता है या कारावास जो तीन साल तक बढ़ाया जा सकता है, उसमें जुर्माना भी जोड़ा जा सकता है।’ नए कानून में राजद्रोह शब्द तो समाप्त कर दिया गया है किंतु इसकी धारा 150 जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है उसमें राजद्रोह शब्द भले ही वर्णित नहीं है, प्रावधान बेहद सख्त बना दिए गए हैं। यह धारा कहती है- ‘जो कोई भी जान-बूझकर या शब्दों के माध्यम से या तो मौखिक या लिखित संकेतों या दृश्य प्रतिनिधित्व या इलेक्ट्रॉनिक संचार या वित्तीय साधनों का उपयोग करके उत्तेजित करता है या उत्तेजित करने का प्रयास करता है, अलगाववाद या सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को उत्तेजित करता है या प्रयास करता है या अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं को प्रोत्साहित करता है या भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को खतरे में डालता है या इस तरह के किसी भी कृत्य में शामिल होने या करने पर आजीवन कारावास या सात साल तक के कारावास से दंडित किया जाएगा और जुर्माना भी लगाया जाएगा।’ स्पष्ट है कि नया कानून पुराने राजद्रोह कानून से कहीं अधिक कठोर है। इसमें एक बड़ी चिंताजनक बात यह कि अब ऐसे किसी भी अपराध में शामिल व्यक्ति को कैद की सजा होगी ही होगी। पहले जुर्माना लगा दण्डित करने का प्रावधान भी था जो अब समाप्त कर दिया गया है।

इस कानून को यदि नए ‘दूर संचार बिल-2023’ को जोड़कर देखा जाए तो स्थिति ज्यादा बेहतर समझ आती है। नए दूर संचार बिल में सरकार को हरेक नागरिक के इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों द्वारा भेजे जा रहे संदेशों, ईमेल इत्यादि पर गुप्त रूप से नजर रखने का अधिकार होगा। सीधे शब्दों में इस नए दूरसंचार बिल के जरिए आम नागरिक की निजता पूरी तरह छिन जाना तय है क्योंकि सरकार हर प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक माध्यम जैसे एसएमएस, वाट्सऐप, ईमेल, इत्यादि पर नजर रखने का अधिकार पा जाती है।

केंद्र सरकार द्वारा आपराधिक कानूनों में पुनर्विचार किया जाना मेरी समझ से एक स्वागत् योग्य कदम हो सकता था लेकिन तब जब इसमें व्यापक विचार-विमर्श होता और नागरिक समाज को भी इसमें शामिल किया जाता। संसद द्वारा भी इन पर वृहद समीक्षा की जाती और सभी को विश्वास में लेकर इन्हें लागू किया जाता। आनन-फानन में संसद में अपने बहुमत को आधार बना लिया गया निर्णय पहले से ही केंद्रीय जांच एजेंसियों के भारी दुरुपयोग का आरोप झेल रहे सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान की मंशा को शक के घेरे में लाता है। लोकतंत्र की खूबसूरती लोक के साथ संवाद में है जिसका लगातार क्षरण होते हम सभी देख रहे हैं। नए आपराधिक कानूनों ने इस आशंका को बलवती करने का काम किया है कि अब संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का दायरा और सिकुड़ जाएगा। होगा क्या यह तो भविष्य के गर्भ में है।

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