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Editorial

लोकतंत्रा के चौथे स्तम्भ पर प्रहार

 पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-87
 

आपातकाल लागू होने के एक सप्ताह बाद 1 जुलाई, 1975 को प्रधानमंत्री ने देश की दशा और दिशा दुरुस्त करने का ऐलान करते हुए ‘20 सूत्री कार्यक्रम’ की घोषणा करी। इस कार्यक्रम के जरिए उन्होंने देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन करने के लिए स्पष्ट लक्ष्य नियन्त्रित कर दिए। इन 20 सूत्रों में मुख्य रूप से आवश्यक वस्तुओं के दामों को नियंत्रित करना, सरकारी खर्चों को कम करना, भूमिसुधार का व्यापक अभियान चलाना, बंधुआ मजदूरी को जड़ से समाप्त करना, ग्रामीण भारत में बड़ी समस्या बन चुकी सूदखोरी पर अंकुश लगाना, सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करना, रोजगार के नए अवसर पैदा करना इत्यादि शामिल थे। आपातकाल के शुरुआती दिनों में आम आदमी को राहत देने का भी काम बड़े स्तर पर प्रधानमंत्री ने इन 20 सूत्री कार्यक्रम के जरिए शुरू करा था। भ्रष्टाचार में बड़े स्तर पर कमी, दैनिक जरूरत की वस्तुओं के दाम घटने, अपराध पर नियंत्रण, टेªनों का सही समय पर संचालन, तस्करों की बड़े स्तर पर गिरफ्तारी इत्यादि को इस दौर में आमजन द्वारा सराहा गया था। इंदिरा गांधी के लिए धर्मनिरपेक्षता हमेशा से ही महत्वपूर्ण मुद्दा रहता आया था। आपातकाल लगने के साथ ही ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’, ‘जमात-ए-इस्लामिया -ए-हिंद’, ‘आनंद मार्ग’ और नक्सलवादी संगठनों को प्रतिबंधित कर प्रधानमंत्री ने अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को मजबूत करने का काम किया। आपातकाल के शुरुआती दिनों में सरकारी तंत्र की चुस्ती भले ही जनता के लिए थोड़ी ही राहत पैदा करने का कारण बनी, जयप्रकाश नारायण के प्रति आमजन में आदर का भाव उनकी गिरफ्तारी चलते जोर भी पकड़ने लगा। 15 अगस्त 1975 को भारत की आजादी के दिन ब्रिटेन के दैनिक ‘द टाइम्स ऑफ लंदन’ में एक पूरे पृष्ठ का विज्ञापन जेपी समर्थकों ने प्रकाशित कर उन्हें तत्काल रिहा कराए जाने की मांग उठाई। इस विज्ञापन में कहा गया था- “Today is India”s Independence Day”…Don”t let the light go out on India”s Democracy” (आज भारत का स्वतंत्रता दिवस है . . . भारतीय लोकतंत्र की रोशनी को बुझने न दो) इस विज्ञापन को जारी करने वालों में ब्रिटेन के जाने-माने समाजशास्त्री, कलाकार, लेखक इत्यादि शामिल थे।  प्रधानमंत्री  लेकिन जयप्रकाश नारायण को रिहा करने के लिए राजी नहीं हुईं।

इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र का ककहरा भले ही अपने पिता जवाहर लाल नेहरू से सीखा था, लोकतांत्रिक व्यवस्था से उनका मोहभंग आपातकाल लगाए जाने से काफी अर्सा पहले से ही शुरू हो चुका था। लोकतंत्र का सही अर्थ आजादी पश्चात् भारतीय समाज वस्तुतः सही तरीके से आत्मसात नहीं कर ही पाया था। विभाजन अपने साथ धार्मिक दंगे लेकर आया जिनको तात्कालिक तौर पर भले ही नेहरू सरकार ने शांत करा, दिलों में पड़ी दरार लगातार चौड़ी होती चली गई जो वर्तमान में अपने चरम पर जा पहुंची है। 1948 में तेलंगाना सुलगने लगा था तो कुछ समय उपरान्त ही भाषा विवाद ने पंजाब, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। अलगाववाद की लहर पूर्वोत्तर से उठने लगी थी। कश्मीर का भारत संग विलय भले ही नेहरू-पटेल करा पाने में सफल रहे वहां के हालात 1947 से आज तक तनावपूर्ण बने रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जिस असहयोग की नीति को कांग्रेस ने ब्रिटिश व्यवस्था के खिलाफ एक मजबूत और कारगर हथियार के बतौर तैयार किया था, आजादी पश्चात् सत्ता में बने रहने अथवा विपक्षी दलों को सत्ता से बाहर रखने के लिए कांग्रेस समय-समय पर इस हथियार को ढाल बना अपना उद्देश्य पूरा करती रही जिसका खामियाजा लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने का रहा है। इंदिरा ने 1958 में कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही केरल की वामपंथी सरकार के खिलाफ इसी भीड़तंत्र का सहारा लिया था। नेहरू तब एक चुनी गई सरकार को बर्खास्त करने के कतई पक्ष में नहीं थे लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए इंदिरा ने ही मजबूर कर दिया था। यह लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के प्रति उनकी कमजोर प्रतिबद्धता का पहला उदाहरण कहा जा सकता है। 1963 में ख्याति प्राप्त मानव विज्ञानी वेरियर एलविन (जो भारत में एक मिशनरी बनकर आए थे और महात्मा गांधी के दर्शन से प्रभावित हो आदिवासियों के मध्य रह उनके कल्याण के लिए खुद को समर्पित कर दिया था।) को लिखे एक पत्र में इंदिरा गांधी ने लोकतंत्र की बाबत शिकायती शब्दों में लिखा था- ‘लोकतंत्र न केवल औसत दर्जे के व्यक्ति को ऊपर उठाता है, बल्कि सबसे मुखर व्यक्ति को ताकत देता है, भले ही उनमें ज्ञान और समझ की कमी हो।’

1967 में जब वे प्रधानमंत्री पद पर आसीन हो चुकी थी, उन्होंने एक विदेशी पत्रकार संग अपनी बातचीत के दौरान यहां तक कह डाला कि- ‘कभी-कभी मुझे लगता है कि संसदीय प्रणाली भी मरणासन्न हो गई है . . .हमारी व्यवस्था एक मृत लकड़ी की जगह दूसरी मृत लकड़ी रखने में तब्दील हो चुकी है . . .मैं कभी-कभी सोचती हूं कि काश हमारे यहां भी आजादी के समय रूस अथवा फ्रांस सरीखी वास्तविक क्रांति हुई होती।’
लोकतंत्र के प्रति उनकी अनुदारता का परिणाम आपातकाल और आपातकाल लगाए जाने के तुरंत बाद संविधान में किए गए संशोधनों के रूप में जल्द ही सामने आ गया था। 22 जुलाई, 1975 को केंद्र सरकार ने संसद में 38वां संविधान संशोधन प्रस्ताव रखा जिसमें आपातकाल को मान्यता देने के साथ-साथ आपातकाल के दौरान जारी किए गए राष्ट्रपति के आदेशों (अध्यादेशों) को अदालत के दायरों से बाहर रखा गया था। साथ ही राज्य सरकारों को यह भी अधिकार दे दिए गए कि वह आपात स्थितियों में नागरिकों के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को भी स्थगित कर सके। ऐसे हर आदेश को न्यायालय में चुनौती देने पर भी इस संशोधन के जरिए प्रतिबंधित कर दिया गया। संसद में पूर्ण बहुमत चलते यह प्रस्ताव तत्काल ही पारित हो कानून बन गया। अगस्त में केंद्र सरकार 39वां संविधान संशोधन विधेयक ले आई जिसे भी संसद ने बगैर हील हुज्जत किए पारित कर दिया। इस संशोधन का एकमात्र याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए इंदिरा गांधी की संसद सदस्यता को रद्द घोषित कर दिया था। उच्चतम न्यायालय ने इस फैसले पर रोक तो लगा दी थी लेकिन अन्तिम फैसला आने तक प्रधानमंत्री की संसद सदस्यता पर खतरा बरकरार बना हुआ था। इस खतरे को जड़ से समाप्त करने के लिए 39वां संविधान संशोधन विधेयक लाया गया जिसके चलते राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष पद को अदालतों में चुनौती न दिए जाने का प्रावधान लागू कर दिया गया। साथ ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा के अध्यक्ष को उनके पद ग्रहण करने से पूर्व तथा पद में रहते लिए गए किसी भी निर्णय को सिविल अथवा आपराधिक न्याययिक परिधि से बाहर रख दिया गया था। इस विधेयक के कानून बनने के साथ ही प्रधानमंत्री किसी भी न्यायालय की जांच से परे हो गई। संसदीय व्यवस्था को ‘मरणासन्न’ मानने वाली प्रधानमंत्री ने आपातकाल के दौरान संसद में ‘प्रश्न काल’ के समय पूछे जाने वाले प्रश्नों की परम्परा को समाप्त करते हुए यह व्यवस्था लागू कर डाली कि ‘केवल अति आवश्यक और महत्वपूर्ण सरकारी कामकाज’ ही संसद सत्रों के दौरान किया जाएगा। हालांकि आपातकाल के दौरान सभी महत्वपूर्ण विपक्षी नेताओं को इंदिरा सरकार ने कैद कर लिया था, विपक्षहीन संसद भी प्रधानमंत्री की नापसंद बनी रही। 1974 में केंद्र सरकार मात्र 14 अध्यादेश लेकर आई थी। आपातकाल लागू होने के बाद राष्ट्रपति ने 6 महीनों में ही 25 अध्यादेशों को अपनी स्वीकृति देने का रिकॉर्ड कायम कर डाला। इन अध्यादेशों के जरिए केंद्र सरकार ने सत्ता पर अपनी पकड़ निरंकुश बनाए रखने का काम किया। प्रेस सेंसरशिप आपातकाल के दौरान केंद्र सरकार, विशेष रूप से इंदिरा गांधी के केंद्र में रही। केंद्र सरकार ने लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर प्रहार करते हुए प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को समाप्त कर दिया। 253 पत्रकारों को इस दौरान गिरफ्तार किया गया था। इंदिरा गांधी ने सबसे हैरतनाक कदम अपने पति फिरोज गांधी द्वारा संसद में पेश किए गए प्रेस स्वतंत्रता से जुड़े एक कानून को रद्द कर उठाया। 1956 में कांग्रेस सांसद फिरोज गांधी ने एक निजी सदस्य विधेयक (प्राइवेट मेम्बर बिल) लोकसभा में रखा था जिसे ‘संसदीय कार्यवाही (प्रकाशन का संरक्षण) अधिनियम, 1956’ कहा जाता है। फिरोज गांधी प्रेस की पूर्ण स्वतंत्रता के प्रबल समर्थक थे। फिरोज ने नेहरू सरकार में शामिल कुछेक मंत्रियों के भ्रष्टाचार को लोकसभा में उठा प्रेस से भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के नाम प्रकाशित करने की बात कही थी। उनका मानना था कि संसद में कहे गए कथनों को पूरी निर्भिकता के साथ प्रकाशित करने की आजादी प्रेस को मिलनी चाहिए। उन्हें इस बात का मलाल था कि उनके द्वारा संसद में बीमा कम्पनियों के घोटाले में शामिल लोगों का नाम प्रकाशित करने से अखबारों ने परहेज किया। फिरोज ने अपने निजी विधेयक के जरिए प्रेस को संसदीय कार्यवाही प्रकाशित करने में पूर्ण स्वतंत्रता दिए जाने का प्रस्ताव रखा था। लोकसभा में उन्होंने इस बाबत कहा- ‘हमारी सरकार और हमारे लोकतंत्र की सफलता के लिए और इसलिए भी कि जनता की भावनाओं की रक्षा हो सके, यह आवश्यक है कि जनता को यह पता हो कि इस सदन में क्या होता है। यह आपका या मेरा सदन नहीं है, यह जनता का सदन है। हम उनकी ओर से यहां बोलने और कार्य करने के लिए चुने गए हैं। जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि रहते अथवा कहते हैं। इसलिए इसके लिए हर अड़चन को हटाना ही होगा।’ संसद ने उनके इस बिल को मंजूरी देते हुए इस विषयक कानून पारित किया था जिसे आपातकाल के दौरान अपनी निरंकुशता की राह में बाधक मानते हुए इंदिरा गांधी ने रद्द कर दिया। आजादी बाद 300 से अधिक निजी विधेयक संसद में अब तक रखे जा चुके हैं जिनमें से 95 प्रतिशत पर कभी बहस नहीं हुई। मात्र 14 ऐसे विधेयकों को संसद में बहस उपरांत पारित किया गया है। फिरोज गांधी का उपरोक्त बिल आजाद भारत में लाया गया ऐसा चौथा बिल था जिसे संसद में पारित कर कानून में बदला गया था। आपातकाल के बाद गठित जनता सरकार ने 1977 में इस कानून को वापस लागू किया था। प्रधानमंत्री इस दौर में नाना प्रकार की आशंकाओं से भी ग्रसित रहने लगी थी। उन्हें उनके खुफिया तंत्र से भी आगाह किया जाता था कि अमेरिकी सरकार सीआईए की मदद से उन्हें अपदस्थ करना चाह रही है।

14 अगस्त, 1975 को बांग्लादेश के राष्ट्रपति मुजीबुर रहमान, उनकी पत्नी दोनों बेटों, बहुओं और दस बरस के पोते की निर्मम हत्या सेना के कुछ अफसरों द्वारा किए जाने से इंदिरा की चिन्ताओं में भारी इजाफा करने का काम किया। मुजीबुर की हत्या के पीछे एक बड़ा कारण उनका पूरी तरह तानाशाह बन जाना था। दिसम्बर 1974 में बांग्लादेश के संविधान को संशोधित कर देश में एक दलीय प्रणाली लागू करने के साथ-साथ राष्ट्रपति व्यवस्था भी घोषित कर वे स्वयं को राष्ट्रपति घोषित कर चुके थे उनकी सरकार भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों चलते खासी अलोकप्रिय हो चली थी।

क्रमशः

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