Editorial

हिंदी का अलबेला नायक

हिंदी साहित्य के ‘शिखर पुरुष’, ‘हिंदी आलोचक के नियामक’, ‘आलोचना की धारा’, ‘आलोचना के सांस्कृतिक स्रोत’, ‘तर्क के डिक्टेटर’, ‘आलोचना की कसौटी’ और निजी रूप में मुझसे आगाध स्नेह रखने/करने वाले डॉ. नामवर सिंह नहीं रहे। लंबे अर्से से अस्वस्थ चल रहे, एम्स, दिल्ली में भर्ती रहे नामवर जी दीर्घआयु जिए, शेर की भांति जिए, गरिमापूर्ण और बेदाग जीवन जिए। ऐसे में उनकी मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के बजाए मैं उनकी गरिमामय जीवनयात्रा पर अपने अनुभवों से कुछ कहना बेहतर समझता हूं। उनके न रहने पर सबसे पहला स्मरण उनके प्रथम दर्शन का मुझे हो रहा है। मौका था ‘पाखी’ के लोकार्पण कार्यक्रम का। दिल्ली के हिंदी भवन के सभागार में लेखकों और पाठकों का जमावड़ा जुट चुका था। राजेंद्र यादव समेत कई दिग्गज पहुंच चुके थे। इंतजार डॉ. नामवर सिंह का था। मैं और मेरे सहयोगी और अभिन्न मित्र प्रेम भारद्वाज बेसब्री से नामवर सिंह का इंतजार सभागार के द्वार पर खड़े कर रहे थे। बेचैनी मुझसे ज्यादा प्रेम जी के चेहरे पर थी। मैंने हंसते हुए पूछा तो बोले नामवर जी अमूमन लोकार्पण करते समय कई बार संबंधित पुस्तक अथवा पत्रिका की धज्जियां उड़ा देते हैं। हम तो पूरी तरह गैर साहित्यिक मिजाज के लोग हैं। पता नहीं उनका क्या रिएक्शन रहेगा। प्रेम के कथन से मैं भी थोड़ा विचलित हुआ फिर उन्हें और स्वयं को ढाढ़स बंधाते हुए बोला चिंतित न होइए हम बेहद ईमानदारी से एक सार्थक प्रयास करने जा रहे हैं। सब अच्छा ही होगा। आमतौर पर मैं चरण-स्पर्श नहीं करता। यह किसी अहंकार बोध के चलते नहीं, बल्कि संस्कारवश है। यही बचपन से सिखाया गया था कि श्रद्धा हो या श्रद्धा जगे तो ही पैर छुआ करो। डॉ. सिंह गाडी से उतरे और मानो भीतर से आवाज उठी, मैं लपका उनके चरणों की तरफ। जिस अंदाज में वे मुस्कुराए, मुझे निहारा, मैं कृतज्ञता से मानो भर उठा। फिर ‘पाखी’ का अध्यक्षीय भाषण। मैं और प्रेम दिल थाम कर उन्हें सुन रहे थे। ऐसा लगा मानो ‘पाखी’ ने सही में, अपने प्रवेशांक से ही नामवर जी का दिल जीत लिया हो।
उन्होंने ‘पाखी’ को ‘हंस’ न बनने की सलाह दी। राजेंद्र यादव मंचासीन थे। वाद-विवाद का केंद्र न बने और हिंदी साहित्य के लिए ऊर्वरक भूमि बने, उसकी उड़ान निर्बाध हो, इत्यादि-इत्यादि। हम दोनों यानी मैं और प्रेम कुछ हतप्रभ, बहुत प्रसन्न। इसके बाद नामवर जी से मिलने का सिलसिला शुरू हो गया। वे ‘पाखी’ के हर साहित्य महोत्सव में शरीक हुए। उन्होंने हमेशा मेरे आग्रह का मान रखा। मैं आज उनके ना रहने पर यही सोच रहा हूं कि क्यों कर मुझे हिंदी के दो शिखर पुरुषों ने इतने  प्रेम और विश्वास योग्य माना। स्व. प्रभाष जोशी और स्व.  नामवर सिंह ने मुझे अद्भुत स्नेह से सराबोर किया। 2009 जून, यदि तारीख सही याद है तो 20-21 जून, 2009, ‘दि संडे पोस्ट’ के उत्तराखण्ड संस्करण का लोकार्पण नैनीताल जनपद के हल्द्वानी में होना तय हुआ। मेरे आग्रह पर नामवर जी और प्रभाष जी ने 21 जून को नैनीताल में ‘पाखी’ संग लंबी बातचीत के लिए अपनी सहमति दे डाली। सार्थक और शानदार बातचीत नैनीताल में हुई। शामिल थे प्रेम भारद्वाज, मैं, शैलेय और चंदन पाण्डेय। प्रभाष जी अलग कमरे में बंद ‘कागद कारे’ लिखने में मशगूल रहे। अगले दिन मेरे आग्रह पर रानीखेत, मेरी जन्मस्थली जाने का कार्यक्रम बन गया। दोनों शिखर पुरुष रानीखेत पहुंचते ही प्रफुल्लित हो उठे। प्रभाष जी बोले ‘यार, तुम्हारा शहर तो सचमुच स्वर्ग है। यहां तो दोबारा आना ही पड़ेगा।’ मुझे तस्वीरें निकालने का शौक है। मेरा कैमरा देख प्रभाष जी ने आदेश दिया ‘मेरी नामवर जी संग शानदार फोटो निकालो।’ फिर क्या था मैं शुरू हो गया। नामवर सिंह जी, प्रभाष जी और उनकी पत्नी ऊषा जी एक झूले में बैठे और मैं फोटो खींचने लगा। प्रेम जी को भी दोनों के बीच बैठा तस्वीरें निकाली। फिर नामवर जी ने मुझे दो महापुरुषों के बीच बैठा प्रेम के हाथों में कैमरा थमा दिया। हालांकि प्रेम जी कैमरे के जानकार नहीं थे लेकिन तस्वीर जानदार निकाली। आज भी नामवर जी, प्रभाष जी के घर में ये तस्वीर टंगी हैं। मेरे दफ्तर में भी ठीक कुर्सी के पीछे यह तस्वीर लगी है। मुझे हमेशा महसूस होता है कि मेरी संघर्षयात्रा के तमाम व्यवधानों बाद भी जारी रहने के पीछे मेरे पिता का आशीर्वाद, मां का अथाह स्नेह, पत्नी का निस्वार्थ सहयोग और इन दो महापुरुषों का आशीर्वाद रहना है। खैर, बात रानीखेत की तो एक रोचक वाक्या याद आ रहा है। शाम होने को थी। प्रेम भारद्वाज ने पूछा कुछ ‘पीने’ का इंतजाम है या नहीं? प्रभाष जी तो पीते नहीं, नामवर जी शायद लेते हैं। मैंने जवाब दिया है तो इंतजाम, लेकिन पूछेगा कौन नामवर जी से? प्रेम जी बैकआऊट कर गए। बोले आप ही पूछिए। वाह साहब यह क्या बात हुई। सुझाव आपका है तो आप ही पूछो। जरूरत लेकिन पड़ी नहीं। नामवर जी ने स्वयं ही पूछ लिया और सामने हाजिर। हम तीनों, हल्की- हल्की चुस्की लगाने लगे। यकायक ही नामवर सिंह बोले ‘तुम्हें सुबह प्रभाष जी ने महापंडित कहकर पुकारा था। जानते हो महापंडित की उपाधि सर्वप्रथम कब, किसे और क्यों दी गई थी?’ फिर उन्होंने ही महांपडित की उपाधि पाने के मेरे खुमार को उतारते हुए कहा ‘काशी के विद्वानों ने राहुल सांकृत्यायन का माखौल उड़ाते हुए उन्हें यह संबोधन दिया था।’ फिर बातचीत का क्रम आगे बढ़ा, अनेक बातें हम तीनों करते रहते। प्रभाष जी क्रिकेट मैच देखने में व्यस्त थे। एक बार फिर नामवर जी ने मुझे और प्रेम को यह कह चौंका दिया कि ‘अपूर्व मुझे तुम्हें देख अज्ञेय याद आ जाते हैं।’ प्रेम जी पर भी कुछ नशे का खुमार चढ़ चुका था। बोले ‘भला इनकी और अज्ञेय जी की तुलना कैसे?’ नामवर मुस्कुराए, बोले ‘पी रहा हूं इसलिए नहीं बोल रहा। अज्ञेय भी बेहद अबोध, बालक स्वभाव के थे। अपूर्व भी बेहद निश्चल प्रवृत्ति के हैं इसलिए यह तुलना कर रहा हूं। मुंह देखी कहने की आदत नहीं मेरी।’ प्रेम चुप, मैं खुशी के मारे फूला नहीं समा रहा। हमने जब ‘पाखी’ महोत्सव को स्थाई तौर पर नोएडा में कराने का निर्णय लिया तो नामवर जी ने एक बार फिर हमें आशीर्वाद यह कह दे डाला ‘यमुना पार इस कंक्रीट के जंगल में तुम लोगों ने साहित्य की सुगंध बिखेरने का काम किया है।’ जब बनारस विश्वविद्यालय के प्रागंण में हमने ‘पाखी’ महोत्सव का आयोजन किया, उद्देश्य डॉ. नामवर सिंह को उनके ही विश्वविद्यालय में शिखर सम्मान से सम्मानित करना था, तब एक विकट संकट ‘नामवर विशेषांक’ को लोकार्पण से पूर्व उन तक ना पहुंचाने का था। कारण हमारे सभी विशेषांक संबंधित लेखक के स्तुति गान से इतर कुछ ना कुछ निगेटिव लेखन भी लिये रहे हैं। ऐसा मेरा मानना रहा है कि कोई भी संपूर्ण नहीं होता। इसलिए विशेषांकों में सभी कुछ समाहित होना जरूरी है। नामवर अंक में भी विजेंद्र नारायण सिंह का संस्मरण ‘सर्वहारा से ‘सहारा’ तक’ कुछ ऐसा ही था। बहरहाल लोकार्पण के समय ही वह अंक नामवर जी के हाथों पहुंचा। मंच में बैठे डॉ. साहब पन्ने पलटते हुए हल्के से बोले ‘कुछ बेसुरा सा है यह संस्मरण।’ बस ना इससे ज्यादा न कार्यक्रम के बाद ही कभी भी उन्होंने मुझे या प्रेम को इस विषय पर कुछ कहा।
प्रेम भारद्वाज के लगातार दबाव बनाए रखने पर जब मैंने ‘दि संडे पोस्ट’ और ‘पाखी’ के लिए लिखे अपने तमाम संपादकीय को पुस्तक के रूप में लाने का प्रयास शुरू किया तो प्रबल इच्छा थी कि प्रथम पुस्तक की भूमिका डॉ.  नामवर सिंह लिखें। इस इच्छा के मूल में उनके संग हुई एक दूरभाष वार्ता होना था। उत्तराखण्ड में 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद दैनिक ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित मेरे एक आलेख को पढ़ नामवरजी ने मुझे फोन किया। रुंधे गले से बोले ‘तुम्हारा लिखा अुआ पढ़ा तो मेरी आंखों में आंसू आ गए हैं।’ उनका यह कथन मेरे लिए आजीवन कुछ सार्थक लिखने का सबसे बड़ा कारण बना रहेगा। प्रेम जी ने बहुत प्रयास किया। नामवरजी के यहां कई चक्कर हमने लगाए लेकिन वे चाहकर भी लिख न सके।
डॉ. नामवर सिंह के ना रहने से हिंदी समाज शोकाकुल है। सुबह से लगातार शोक संदेश आ रहे हैं। मैं अतीत की यादों में डूबा हुआ हूं। वाकई उनके साथ बिताए क्षण मेरी अनमोल धरोहर हैं। उनका स्नेह ताउम्र मुझे प्रेरणा देता रहेगा कुछ सार्थक हिंदी के लिए करने का। अब जब ‘पाखी’ के संपादन का भार पुनः उठा लिया है तो डॉ. नामवर सिंह का आशीर्वाद मुझ पर वे जहां कहीं भी होंगे, वहां से बरसेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। मेरे लिए वे प्रेरणास्रोत थे, हैं और सदैव रहेंगे।

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