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Editorial

संपादकीय │एक रुका हुआ फैसला

संपादकीय │एक रुका हुआ फैसला

देर से सही, देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर अंततः भारतीय फौज में महिलाओं की हिस्सेदारी तय करने वाला फैसला आ ही गया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी.वाई. चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में पुरुषों की तरह ही महिलाओं को भी न केवल स्थाई कमीशन बल्कि कमांड पोस्ट दिए जाने का रास्ता खोल दिया है। इससे पहले शॉर्ट सर्विस कमीशन पाने वाली महिला अफसरों की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऐसा ही फैसला सुनाया था जिसे रक्षा मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर महिलाओं को कम आंकने की प्रवृति पर कहा है कि सामाजिक धारणाओं के आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव स्वीकार्य नहीं है और यह सरकार के पूर्वाग्रह का प्रतीक है।

कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार को महिलाओं के बाबत अपनी धारणा बदलनी होगी। निश्चित ही महिला अफसरों को कमांड पोस्ट न देना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। इस पूरे मुद्दे पर केंद्र सरकार का रवैया न केवल अतार्किक रहा, बल्कि महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रहों से भरा रहा। सरकार ने दलील दी थी कि भारतीय सेना में ग्रामीण परिवेश से आने वाले फौजी महिला अफसर के अधीन काम नहीं कर पाएंगे। यह दलील सीधे तौर पर पुरुष की महिला को दोयम मानने का उदाहरण है। भारतीय सैन्य बलों में महिलाओं का प्रवेश आजादी मिलने के पैंतालीस बरस बाद 1992 में शुरू हुआ था। तब सैन्य बलों के शिक्षा, सिग्नल्स, खुफिया एवं इंजीनियरिंग कोर में पांच बरस के लिए महिला अफसरों को शामिल करने की नीति बनी। 2006 में इसे बढ़ाकर चौदह बरस तक कर दिया गया, लेकिन लड़ाकू कोर में महिलाओं की एंट्री के लिए सरकार का रवैया निगेटिव बना रहा।

इतना ही नहीं जिन क्षेत्रों में महिला अफसरों की नियुक्ति हुई थी वहां उन्हें 14 बरस के बाद रिटायर करने के पीछे कर्नल या उसके समकक्ष वायु एवं जल सेना में पद देने से रोकने की नीयत थी ताकि इन अफसरों को कमांड पोस्ट देने से रोका जा सके। चूंकि सरकारी सेवा में पेंशन का प्रावधान कम से कम बीस बरस की नौकरी बाद लागू होता है इसलिए 14 बरस की नौकरी बाद रिटायर महिला अफसरों को पेंशन से भी वंचित रहना पड़ा।  2003 में पहली जनहित याचिका महिला अफसरों को सेना में स्थाई कमीशन दिए जाने के बाबत दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल की गई। कोर्ट में याचिका पर बहस के दौरान ही 2008 में रक्षा मंत्रालय ने महिला अफसरों को सैन्य बलों के दो विभागों, न्याय एवं शिक्षा में स्थाई कमीशन दिए जाने का निर्णय ले लिया।

2010 में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक प्रगतिशील फैसला महिला अफसरों को सेना में स्थाई कमीशन देने के बाबत सुनाया जिसे केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर डाला। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक नहीं लगाई, लेकिन न्यायालय में मामला विचाराधीन होने की आड़ में रक्षा मंत्रालय ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को लागू नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट में चल रही बहसों के दौरान सरकार को अहसास हो गया कि कोर्ट की सहानुभूति महिला अफसरों के साथ है। किसी प्रतिकूल फैसले की आशंका से घबराई केंद्र सरकार ने 2019 में न्याय एवं शिक्षा के साथ-साथ सैन्य बलों के आठ अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं को स्थाई कमीशन दिए जाने का आदेश दे डाला, लेकिन अपने पूर्वाग्रहों के चलते सरकार ने ऐसे स्थाई कमीशन पाने वाली महिला अफसरों को कमांड पोस्ट न दिए जाने का प्रावधान अपने आदेश में जोड़ दिया।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने पूरा प्रयास किया कि महिला अफसों का स्थाई कमीशन रोका जा सके। इसके लिए सरकार ने प्रस्ताव दिया कि इन अफसरों को बीस बरस तक सेना में काम करने दिया जाएगा जैसे कि इन्हें पेंशन आदि सुविधाओं का लाभ मिल सके। केंद्र सरकार का तर्क था कि भारतीय समाज में महिला अफसर के आदेश मानने पर ग्रामीण परिवेश के जवानों को दिक्कत होगी। इतना ही नहीं महिलाओं की शारीरिक क्षमता को लेकर भी केंद्र सरकार की तरफ से कुतर्क दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में केंद्र सरकार के हर ऐसे तर्क को खारिज करते हुए व्यवस्था दी है कि महिला अफसरों को उनके पुरुष समकक्ष के तमाम अधिकार उपलब्ध रहेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महिला अधिकारियों को सेना की यूनिट कमांड करने का मौका उपलब्ध होगा। इसका सीधा मतलब यह कि ले. कर्नल या उसके समक्ष पद से रिटायर कर दी जाने वाली महिला अधिकारी अब ले. जनरल तक के पद पर पहुंच सकती हैं।

यह स्पष्ट है कि सैन्य प्रमुख बनने का मौका इस आदेश के बाद भी महिलाओं को उपलब्ध नहीं होगा। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट का निर्णय लिंग के आधार पर भेदभाव की नीति विरुद्ध लिया गया एक बेहद महत्वपूर्ण कदम है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस फैसले की सराहना की है, सेना ने लेकिन आधिकारिक तौर पर हाल- फिलहाल तक कोई टिप्पणी इस आदेश पर नहीं की है। सैन्य बलों में महिलाओं के साथ भेदभाव केवल हमारे यहां तक ही सीमित नहीं रहा है। विश्व के प्रगतिशील और विकसित देशों में भी ऐसा ही लंबे अर्से तक होता आया है। सोवियत संघ पहला ऐसा देश था जिसने अपनी महिला को युद्ध के मैदान में जाने दिया। हालांकि सोवियत संघ टूटने के बाद नए बने राष्ट्रों ने इस नीति पर रोक लगा दी। रूस तक में महला देश सैन्य अफसरों को युद्ध संबंधी जिम्मेदारी नहीं दी जाती है।

21वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं के प्रति इस भेदभाव पूरी नीति को लेकर सबसे बड़ा बदलाव यूएनओ की सुरक्षा परिषद द्वारा लाया गया। परिषद ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एवं शांति में महिलाओं की समान भूमिका को लेकर प्रस्ताव पारित कर सैन्य बलों में उनको समान अधिकार दिए जाने का मार्ग प्रशस्त किया। 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमले बाद अमेरिका और ब्रिटेन ने आतंकवाद के खिलाफ छेड़ी अपनी लड़ाई में पहली बार महिला सैन्य बलों की टुकड़ी ‘फीमेल इंगेजमेंट टीम’ का इस्तेमाल किया। इस टुकड़ी की आतंकवाद के खिलाफ छिड़ी जंग में अब तक 150 महिला सैनिक अपनी जान गंवा चुकी हैं। 2013 के बाद से अमेरिका ने महिलाओं को युद्ध में जाने की औपचारिक सहमति दी। ब्रिटेन में 2016 में यह व्यवस्था लागू की गई। इन दो देशों के अलावा कनाड़ा, जर्मनी, स्वीडन, पोलैंड और ऑस्ट्रेलिया में भी सेना में महिलाओं को युद्ध क्षेत्र में जाने की इजाजत है। इजराइल और उत्तर कोरिया में तो महिलाएं लंबे अर्से से युद्ध के मैदान में सक्रिय भूमिका निभाती आ रही हैं।

स्कैनिडिनेवियन मुल्कों में नार्वे, फिनलैंड और स्वीडन पहले से ही महिला समानता के पक्षधर रहे हैं। इसलिए वहां महिलाओं को पुरुषों के बराबर सेना में अधिकार प्राप्त हैं। हालांकि विश्व की सबसे बड़ी फौज ने अपनी महिलाओं के प्रति दुराग्रहपूर्ण नीति अभी तक बरकरार रखी है। चीन में वैसे भी महिलाओं की स्थिति दोयम दर्जे की है। कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय महिलाओं के हक में उठा एक बड़ा कदम है जो निश्चित ही पुरुष प्रधान समाज को आंखें खोलने के लिए बाध्य करेगा। कितना दकियानूसी तर्क केंद्र सरकार ने न्यायालय के समक्ष रखा कि महिलाएं शारीरिक रूप से पुरुष से कमजोर होती हैं और उनके आदेश को मानने के लिए पुरुष बाहुल्य सेना के जवान तैयार नहीं होंगे क्योंकि वे ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं।

सच तो यह कि सेना के पुरुष अफसर, जनरल, एडमिरल, एयर मार्शल आदि हीनग्रंथि के शिकार हैं जिसके चलते वे महिलाओं के अंडर काम करने को अपने ‘पौरुष’ के खिलाफ मानते हैं। देश के प्रधान ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ की बात करते हैं। दिश-विदेश में उनकी प्रगतिशील सोच को सराहा जाता है। फिल्में बनती हैं तो दूसरी तरफ उनकी ही सरकार बेहूदे तर्कों का सहारा ले बेटियों की राह रोकने का प्रयास करती हैं। उम्मीद की जानी चाहिए आने वाले समय में इस प्रकार का भेदभाव पूरी तरह समाप्त होगा और देश की कोई बेटी एक दिन भारतीय जल, थल और वायुसेना की प्रमुख बनेगी। इस फैसले का तहेदिल से मैं स्वागत करते हुए यह उम्मीद अब अपनी उच्चतम न्यायलय से लगा रहा हूं कि महिलाओं की समानता के मुद्दे पर कोर्ट का अगला प्रगतिशील कदम सबरीमाला समेत सभी ऐसे स्थानों पर महिलाओं के प्रवेश का होगा जहां पर लिंग को आधार बना, महिलाओं को दोयम साबित करने का षड्यंत्र आज तक चला आ रहा है।

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