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Editorial

एक आधा-अधूरा सा फैसला

मेरी बात
नोटबंदी को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत का फैसला केंद्र सरकार के लिए भले ही राहत भरा रहा हो, फैसला आधा-अधूरा-सा है। आधा-अधूरा सा इसलिए क्योंकि इस फैसले ने केंद्र सरकार को तो हर तरीके से क्लीन चिट दे राहत देने का काम किया, न तो नोटबंदी किए जाने के जो कारण केंद्र सरकार ने गिनाए उनका सच, न ही नोटबंदी के जरिए जो कुछ भी केंद्र सरकार हासिल करना चाहती थी, उनकी पड़ताल इस फैसले के जरिए किए जाने का प्रयास उच्चतम न्यायालय करती नजर आई।  8 नवंबर, 2016 की शाम 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच सौ और हजार रुपए के नोटों को यकायक ही बंद किए जाने का ऐलान करते हुए इस नोटबंदी से होने वाले जो फायदे गिनाए थे उनमें सबसे महत्वपूर्ण था कालेधन का सफाया, भारत का कैशलेस अर्थव्यवस्था में तब्दील होना, सरकारी राजस्व में भारी बढ़ोतरी, आतंकी फंडिंग पर रोक और सरकारी बैंकों के पास अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त संसाधनों की उपलब्धता। इनमें से एक भी लक्ष्य हासिल कर पाने में सरकार नाकाम रही। महीनों तक आम जनता को भारी कष्टों का सामना करना पड़ा। सीधी-सरल भाषा में जनता को बेवकूफ बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय जनता के साथ की गई इस ठगी पर खामोश है। लोकतंत्र में स्वतंत्र संस्थाओं का मुख्य दायित्व सरकारों के कामकाज पर निगाह रखने के साथ-साथ सत्ता का संतुलन बनाए रखना भी होता है। इस दृष्टि से नए वर्ष में सुप्रीम कोर्ट का पहला बड़ा फैसला निराशाजनक रहा है।
नवंबर 2016 में जब यह फैसला लिया गया था तब बकौल रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया कुल 17.77 खरब मूल्य की प्रकाशित मुद्रा प्रचलन में थी जिनमें से 14.18 खरब की मुद्रा पांच सौ और हजार के बैंक नोट के रूप में थी। यानी नोटबंदी के समय कुल प्रचलित नोटों में से 86.4 प्रतिशत पांच सौ और हजार रुपए के नोट थे। सरकार ने दावा किया था कि इनमें से जितनी भी संख्या कालेधन की होगी वह स्वतः ही नष्ट हो जाएगी। ऐसा लेकिन हुआ नहीं। 2018 में जारी रिजर्व बैंक की रिपोर्ट अनुसार 99.3 प्रतिशत पांच सौ और हजार के नोट बैंको में जमा कर दिए गए थे। यानी कालाधन सफेद में बदल दिया गया था। केंद्र सरकार का यह भी दावा था कि इस नोटबंदी का एक बड़ा परिणाम कैश लैस अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आएगा। ऐसा भी नहीं हुआ। मार्च, 2018 में कुल 18.03 खरब की प्रिटेंड मुद्रा प्रचलन में थी जिनमें से 80.6 प्रतिशत मुद्रा दो हजार और पांच सौ के नए नोटों के रूप में थी। नोटबंदी के पांच बरस बाद अक्टूबर, 2021 में जारी आंकड़ों अनुसार कैश लैश अर्थव्यवस्था का वायदा कहीं गुम हो गया और कुल प्रिटेंड मुद्रा बढ़कर 29.17 खरब पहुंच गई है। नोटबंदी के फैसले चलते अर्थव्यवस्था पर भारी नकारात्मक प्रभाव पड़ा था। औद्योगिक विकास दर में भारी कमी दर्ज की गई थी, कृषि क्षेत्र में भी इस नोटबंदी ने कहर ढहाने का काम किया था। सकल घरेलू उत्पाद दर (जीडीपी) में भारी गिरावट 2017-18 में इस फैसले चलते दर्ज की गई थी। नोटबंदी ने रोजगार सृजन के क्षेत्र में भारी कटौती लाने का काम भी किया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार सितंबर-दिसंबर 2016 तिमाही में देश में 40.65 करोड़ के पास रोजगार था जो नोटबंदी के बाद जनवरी- अप्रैल 2017 की तिमाही में घटकर 40.5 करोड़ रह गया। 15 लाख मात्र कुछ महीनों में ही बेरोजगार हो गए थे। नोटबंदी चलते कमजोर हुई अर्थव्यवस्था का असर सरकार द्वारा संचालित विभिन्न जनकल्याण योजनाओं पर भी प्रतिकूल रहा। कई योजनाओं के लिए बजट या तो कम किया गया था उसमें भारी व्यवधान देखने को मिला। कई बड़े आर्थिक विशेषज्ञों की नजरों में भी केंद्र सरकार का निर्णय अविवेकपूर्ण रहा। नोबेल अर्थशास्त्री अमृत्य सेन के अनुसार यह एक ‘निरंकुश निर्णय’ था। विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बासू ने इसे एक बड़ी भूल करार देते हुए इसके होने वाले नुकसान को किसी भी संभावित लाभ से कहीं अधिक घातक करार दिया था। कुल मिलाकर नोटबंदी का फैसला देश की अर्थव्यवस्था के लिए, देश के लिए किसी भी दृष्टि से लाभकारी नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट में इस निर्णय को चुनौती देनी वाली याचिकाओं पर पूरे 6 बरस सुनवाई चली। जाहिर है 6 बरस पूर्व लिए गए फैसले को बदला जाना संभव नहीं था। इसलिए इस निर्णय के आने से पूर्व ही इसे अकादमिक महत्व वाला मुकदमा कहा जाने लगा था।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी को लेकर दर्ज की गई याचिकाओं की सुनवाई करने से पहले कहा था कि यदि यह मुद्दा ‘अकादमिक’ है तो अदालत का समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है। इस पर याचिकाकर्ताओं की तरफ से दलील दी गई थी कि सवाल इस बात का है कि क्या भविष्य में इस कानून का इस तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं के वकील पी. चिदंबरम ने आरबीआई एक्ट 1934 का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि नोटबंदी की अनुशंसा का काम आरबीआई का है, न कि केंद्र सरकार का। पांच सौ और हजार के नोटबंदी के समय आरबीआई ने कोई सिफारिश नहीं की थी, बल्कि केंद्र सरकार ने यह फैसला स्वयं ले लिया था। चिदंबरम ने पूर्व में दो बार की गई नोटबंदी का हवाला देते हुए कहा था कि 1946 और 1978 में नोटबंदी करने के लिए संसद में बकायदा कानून पारित किया गया था, लेकिन 2016 में ऐसी किसी प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया। याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क सही प्रक्रिया को न अपनाए जाने को लेकर था जिसके आधार पर उन्होंने केंद्र सरकार के फैसले को अवैध ठहराने की अपील सुप्रीम कोर्ट से की थी।
सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय पीठ ने 4ः1 के बहुमत से इस बाबत अपना फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार के फैसले को विधिसम्मत करार दिया है। पांच न्यायाधीशों में से केवल एक न्यायाधीश न्यायूमर्ति बी.वी. नागरत्ना ने बाकी न्यायाधीशों से असहमति दर्ज कराते हुए केंद्र सरकार के फैसले को गैरकानूनी माना। न्यायमूर्ति नागरत्ना का कहना है कि यह फैसला सही तरीकों का इस्तेमाल किए बगैर लिया गया। कायदेनुसार या तो रिवर्ज बैंक को नोटबंदी की प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार है या फिर केंद्र सरकार को संसद के जरिए ऐसा करना चाहिए था। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 के अनुच्छेद 26(1) का हवाला देते हुए अपने निर्णय में कहा है कि नोटबंदी का सही तरीका रिजर्व बैंक द्वारा इस बाबत समस्त कारणों और तथ्यों पर विचार उपरांत केंद्र सरकार को संस्तुति भेजा जाना है। यदि किसी कारणवश केंद्र सरकार स्वयं ऐसा निर्णय (बगैर रिजर्व बैंक की संस्तुति के) लेना चाहती है तो उसे ऐसा संसद में कानून लाकर करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के चार अन्य न्यायाधीशों ने एकमत से केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराते हुए इस विषय को लेकर दायर सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट का बहुमत सरकार के पक्ष में गया है इसलिए अब नोटबंदी की वैधता को लेकर कोई संशय बाकी नहीं रह गया है। मुझे यह फैसला आधा-अधूरा प्रतीत होता है। सरकार के फैसले की वैधता के साथ-साथ इस फैसले का औचित्य भी संदेह के घेरे में था, है और आगे भी रहेगा। क्या यह निर्णय मात्र काले धन पर रोकथाम के लिए, डिजिटल करेंसी को बढ़ावा देने के लिए और आतंकी फंडिंग इत्यादि की रोकथाम मात्र के लिए लिया गया था? यदि ऐसा था तो फिर इनमें से एक भी लक्ष्य को पाने में सरकार नाकाम क्यों रही? और क्योंकर पांच सौ और हजार के नोट बंद कर दो हजार के नोट प्रचलन में लाए गए? सुप्रीम कोर्ट को चाहिए था कि इन प्रश्नों के आलोक में सरकार की मंशा को अपने निर्णय के दायरे में रखती। कम से कम इससे भविष्य में इस प्रकार के निर्णय लेने से पूर्व एक सही प्रणाली को विकसित करने की शुरुआत होती। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की जवाबदेही भी तय की जानी जरूरी थी। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा कि नोटबंदी का फैसला सोच-समझ कर और रिजर्व बैंक से सलाह-मशविरा कर लिया गया था। यदि ऐसा है तो प्रश्न उठता है कि क्या रिजर्व बैंक ने केंद्र सरकार को इस फैसले से पैदा होने वाले संकटों की जानकारी दी थी? क्या रिजर्व बैंक ने सरकार के फैसले के खिलाफ अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थी? या फिर केंद्र सरकार की हां में हां मिला रिजर्व बैंक के अधिकारियों ने अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वहन नहीं किया था। नोटबंदी का निर्णय अविवेकपूर्ण था यह उसके घोषित लक्ष्यों को पाने में नाकामी से स्पष्ट हो चुका है। ऐसे में कम से कम इतना तो सुप्रीम कोर्ट को करना चाहिए था कि इस गलत निर्णय को लागू करने वाले, इस निर्णय के लिए अपनी सहमति देने वाले और इस निर्णय चलते हुए नुकसान की भरपाई के लिए सभी संबंधितों की जिम्मेवारी तय करती ताकि ऐसे तुगलकी फरमान भविष्य में जारी करने से हमारे हुक्मरान बाज आएं। ऐसा कुछ लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से हासिल नहीं हुआ है जो न केवल निराशाजनक है बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र को असली खतरा ऐसे पेशेवरों से है जो पेशेवर तरीके से अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करते हैं।

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