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Editorial

जाहि विधि राखे राम

एक बात की तो दाद संघ और भाजपा को देनी ही पड़ेगी। आजादी के 74 बरस बाद ही सही दोनों ने अपने एजेंडे को चारों दिशाओं में स्थापित कर डाला है। पांच राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान बोलबाला केवल और केवल धर्म का रहा। साथ ही नाना प्रकार की जातियों में बंटे समाज को और ज्यादा बांटने का खेल भी इन चुनावों में जमकर खेला गया। संघ-भाजपा जोड़ी को दाद इसलिए क्योंकि उसने राजनीति को इस मुहाने ला खड़ा कर ही डाला कि खुद को धर्म-पंथ निरपेक्ष कहने वाले राजनेताओं को भी इसी धर्म-पंथ की शरण लेनी पड़ गई। संविधान नामक पुस्तक की प्रस्तावना का ऐसा खुलकर मखौल पहली बार उड़ा, यह सब पांच राज्यों में सत्ता पाने के चलते हुआ है। समझना कठिन नहीं कि 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में इस पुस्तक ‘संविधान’ की कैसी और कितनी धज्जियां उड़ाई जाएंगी और 2024 में लोकसभा चुनावों तक यदि यह पुस्तक बची रही तो इसके संग कितना और कैसा खिलवाड़ होगा।

विश्वविख्यात नाटककार विलियम सेक्सपियर अपने नाटक ‘दि टेम्पपेस्ट’ में कहते हैं- ”Misery acquaints a man with strange bedfellows”, राजनीति पर यह गरीबी से कहीं अधिक सटीक बैठता है। ‘हर-हर मोदी-घर-घर मोदी’ वाले नरेंद्र मोदी जब केरल के पलाक्कड़ में एक चुनाव रैली को संबोधित करते हुए ईसाइयों की पवित्र पुस्तक बाइबिल को याद करते हैं तब सेक्सपियर के कथन का राजनीति संग रिश्ता ज्यादा स्पष्ट समझ आने लगता है। इसे आप भारतीय राजनीति का उदारचरित्र मानने की भूल कत्तई मत करियेगा। इसमें उदारता रंचमात्र भी नहीं है। केवल और केवल किसी भी कीमत पर सत्ता पाने की भूख है। ऐसी भूख जो कट्टर हिंदुत्व के सबसे कट्टर चेहरे को भी बाइबिल का नाम लेने पर मजबूर कर देती है। प्रधानमंत्री ने बाइबिल के एक ऐसे चरित्र की बात अपने भाषण में कही जो एक विश्वासघाती चरित्र है। जुड़ास् इस पवित्र पुस्तक का वह चरित्र है जो मात्र चंद चांदी के सिक्कों के लिए प्रभु ईसा मसीह संग गद्दारी कर देता है। पीएम साहब ने केरल में सत्तारूढ़ वामपंथी सरकार की तुलना जुडास् से कर डाली ताकि ईसाई समाज में उनकी बात पहुंच सकें। हिंदू मतदाता को रिझाने के लिए उन्होंने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा उठा वामपंथी सरकार को घेरने का प्रयास किया। इस प्रकार मोदी जी ने भगवान अय्यपन् और प्रभु ईसा मसीह को एक साथ, एक ही मंच से याद कर डाला। इधर पीएम केरल में दहाड़ रहे थे तो उनके डिप्टी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह नंदीग्राम में आदिवासी समाज को लुभाने में जुटे थे। आदिवासियों को समझाया जा रहा था कि भगवान राम उनके अपने हैं। यदि ममता बनर्जी पर ममता बरसाई तो ‘फूफी’, और ‘खाला’ के रिश्तेदार उनका जीना मुहाल कर देंगे। ‘फूफी’ से अर्थ मुसलमानों की बुआ तो ‘खाला’ से तात्पर्य रोहिंग्या शरणर्थियों की मामी से था। संघ और भाजपा को दाद इसलिए कि उन्होंने ममता बनर्जी और राहुल गांधी को तो अपना-अपना गोत्र बताने के लिए मजबूर कर ही डाला, धर्म से कोसों दूर रहने वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम के नेताओं को भी बैकफुट में ला खड़ा किया। पहली बार तमिलनाडु के चुनावी समर में द्रमुक मंदिरों के दरवाजे पर मत्था टेकती नजर आई है। मोदी-शाह के 2014 में भाजपा का चेहरा बनने के बाद खुलकर हिन्दुत्व का कार्ड खेला जाने लगा। हालांकि जनसंघ का नया अवतार बन 1980 में जन्मी भाजपा की राजनीति हमेशा से ही धर्म आधारित रही लेकिन उसमें नर्म धर्मनिरपेक्षता का तड़का हमेशा मौजूद रहता था। अटल बिहारी इस नर्म तत्व का चेहरा थे तो आडवाणी-मुरली मनोहर जोशी उग्र तत्व का। दोनों के मध्य संतुलन साध ही पहली बार केंद्र में भाजपा सरकार बना पाई थी। 2014 आते-आते सब कुछ बदल गया। मोदी-शाह ने नर्मपंथी तत्वों को पूरी तरह हाशिए में डाल भाजपा के चाल-चरित्र और चेहरे से नकाब हटा डाली। बेनकाब भाजपा का जादू तबसे निरंतर अपना जलवा बिखेर रहा है। ऐसा जलवा कि ममता बनर्जी चुनावी सभाओं में चंड़ीपाठ करने लगी हैं। उन्हें दुर्गा का जयकारा लगाना पड़ रहा है और अपना गोत्र भी बताने पर मजबूर होना पड़ रहा है। कांग्रेस नेता धर्म के इस जलवे अथवा जलजले को 2019 में ही भांप मंदिरों में मत्था टेकने लगे थे। उन्होंने जनेऊ भी धारण कर डाला था। हालांकि इससे कुछ खास फायदा तब उन्हें मिला नहीं। हां, इतना अवश्य स्पष्ट हो गया कि अब हिंदुत्व की आंधी का मुकाबला करने के बजाए, आंधी का बगलगीर होना ही एकमात्र विकल्प है। आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल इस सच को समय रहते पकड़ लिए थे। मुझे याद है एक शाम अपनी पार्टी के लिए चंदा मांगने वे एक रात्रि भोज में गए थे। मैं उनके साथ था। यह रात्रि भोज जिसे ‘डिनर फंडिंग’ कहा जाता है, मेरे लिए विस्मयकारी रहा। जिन केजरीवाल से मेरी मित्रता थी वह दूर-दूर तक कट्टर पंथी नहीं थे। इसलिए जब उन्होंने खुद को व्यापारियों के इस डिनर में बनिया बताते हुए अपने गोत्र का ऐलान किया तो मैं हतप्रभ रह गया। यह केजरीवाल के राजनीतिक होने की शुरुआत भर थी। जिस प्रकार आम आदमी पार्टी ने 2019 के विधानसभा चुनाव के दौरान शाहीनबाग आंदोलन से दूरी बनाई और केजरीवाल हनुमान भक्त बन उभरे उससे स्पष्ट हो गया कि संघ और भाजपा अपने एजेंडे में पूरी तरह सफल हो चले हैं। यही कारण है कि अब यदि भाजपा का मुकाबला करना है तो ‘संविधान’ नामक पुस्तक से परे जाकर खुलकर धर्म की शरण में जाना ही पड़ेगा। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए हुए चुनाव प्रचार के दौरान धर्म के साथ-साथ भारतीय समाज की एक और विभाजक रेखा को उभारने का खेला खूब खेला गया। बात केवल हिन्दू-मुसलमान ध्रुवीकरण तक नहीं रही। इस बार जात-पात का शेयर बाजार सूचकांक खूब चढ़ा। प्रधानमंत्री मोदी ने नई इबारत लिख डाली। किसी भी सूरतेहाल में पश्चिम बंगाल में कसम खिलाने के लिए कटिबद्ध मोदी कोरोना काल के दौरान अपनी पहली विदेश यात्रा में बांगलादेश पहुंचे तो सीधे ओराकांड़ी स्थित मटुआ मंदिर में नजर आए। पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी दलित जाति के इस मंदिर में पहुंच उन्होंने ‘दीदी’ के कोर वोट बैंक को साधने का प्रयास कर डाला। हमारे संविधान निर्माताओं ने भले ही आजाद भारत की कल्पना एक धर्म और पंथ निरपेक्ष राज्य के तौर पर की थी, हकीकत हमारे सामने है। सदियों से, अनादिकाल से हम नाना प्रकार की जातियों में, धर्मों में बंटा हुआ समाज थे। यह बंटवारा हमारे डीएनए में है। 1947 में धर्म आधारित बंटवारे ने हमारे डीएनए में मौजूद इस तत्व यानी धर्म को समाज विभाजन का मुख्य कारक बनाया। फिर धीरे-धीरे अन्य कारक भी अपना सिर उठाने लगे। आज हम भले ही एक राष्ट्र के बतौर स्थापित नजर आते हों, भीतर ही भीतर राष्ट्र नामक तत्व खोखला हो चला है। हम राष्ट्र के नागरिक बाद में, धर्म और जाति पर आधारित ऐसे समाज में परिवर्तित हो चुके हैं जहां मानवीय सरोकारों का कोई स्थान नहीं है। और अभी तो यह शुरुआत भर है। यह खेल इतने में ही नहीं रुकने वाला। इसका वीभत्स और क्रूरतम चेहरा अभी देखा जाना, भोगा जाना बाकी है।

पूरा विश्व इस समय कोरोना महामारी से त्रस्त है। दिल्ली में प्रधानमंत्री अपने ‘मन की बात’ में कहते हैं ‘दवाई भी, कड़ाई भी’। राज्यों के मुख्यमंत्रियों संग कोविड महामारी को रोकने के लिए बुलाई गई बैठक में पीएम ने मुख्यमंत्रियों को कई सलाहें दी। यहां तक बता डाला कि मास्क को कैसे पहनना चाहिए। भक्तों ने इस पर भी पीएम को सराहा होगा। जब पीएम चुनावी रैलियों में गरजते हैं और हजारों की भीड़ कोविड को धता बात पीएम को सुनने आती है तब स्वयं पीएम अपने कहे को भूल जाते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह खुलकर बगैर मास्क पहने रोड शो करते घू रहे हैं। उनकी रैलियों में भी कोविड प्रोटोकाॅल नदारद है। ममता दी का रोड शो हो या फिर हरिद्वार में चल रहा कुंभ, हर जगह कोई नियम नजर नहीं आता। कथनी और करनी में इस फर्क का खामियाजा ताली-थाली बजाने वाली जनता को ही भुगतना पड़ेगा। हम ऐसे ही समाज, ऐसे ही राजनेता और राजनीति के लायक हैं। अंग्रेजों ने दो सौ बरस तक हमें गुलाम बनाए रखा क्योंकि हम गुलाम मानसिकता के हैं। अंग्रेज गए तो कुछ समय, मात्र कुछ समय गुलाम मानसिकता के तत्व हमारे डीएनए में दबे रहे। अब फिर वह कुछ समय ‘डारमेंट’ रहने के बाद पूरी तरह ‘एक्टिव’ हो चले हैं। इस बार हम धर्म और जात-पात के नाम पर गुलाम बनते जा रहे हैं। जैसा समाज, वैसी राजनीति, राजनेता। तब व्यर्थ की चिंता काहे की जाए। जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए।

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