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Editorial

गोबर नैतिकता और जनता सरकार

पिचहत्तर बरस का भारत/भाग-98

चौधरी चरण सिंह मात्र 23 दिन पूर्णकालिक प्रधानमंत्री रहे। 22 अगस्त 1979 से 14 जनवरी 1980 तक वे बतौर कार्यवाहक प्रधानमंत्री देश की सत्ता पर काबिज रहे थे। दिल्ली में सत्ता के लिए चल रहे घमासान ने जयप्रकाश नारायण को पूरी तरह तोड़ने का काम कर दिया था। बम्बई (अब मुम्बई) के जसलोक अस्पताल में डायलिसिस कराते जे.पी. अपने साथियों और अनुयायियों की घोर उपेक्षा का शिकार हो सरकार गिराने और बनाने के खेल को एक मूक दर्शक की भांति देख रहे थे। उनकी सेहत अब तेजी से बिगड़ने लगी थी। अंततः 8 अक्टूबर, 1979 को उन्होंने जसलोक अस्पताल में दम तोड़ दिया। उनके साथ ही सम्पूर्ण क्रांति का उनका सपना भी हमेशा के लिए कहीं गहरे दफन हो गया। हालांकि सपने कभी मरा नहीं करते हैं। जे.पी. के विचार दुनिया भर में समय-समय पर जनांदोलनों के जरिए अपनी बात सामने रखने का काम करते रहते हैं, फिर चाहे वह 2011 का अन्ना आंदोलन हो, 2010 में खाड़ी के देशों में सरकारों की खिलाफत में बुलंद हुए स्वर हों या फिर 2019 में लैटिन अमेरिकी देशों में शुरू हुआ जन आक्रोश हो, जयप्रकाश की सम्पूर्ण क्रांति का सपना बार-बार उभरकर सामने आने का प्रयास करता रहता है।

जनवरी, 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए जिनमें कांग्रेस को प्रचंड बहुमत दे जनता ने जनता पार्टी के प्रति अपने आक्रोश को व्यक्त करने का काम किया। इस चुनाव में कांग्रेस ने दो नारों का खासा उपयोग किया-‘चुनिए उसे जो सरकार चला सके’ और ‘जनता हो गई फेल, खा गई चीनी मिट्टी और तेल’। सत्ता हाथ से निकलते ही जनता परिवार बिखरने लगा था। चैधरी चरण सिंह अपनी अलग पार्टी लोकदल के बैनर तले चुनाव मैदान में उतरे थे। जनता पार्टी ने जगजीवन राम को बतौर प्रधानमंत्री चेहरा घोषित कर चुनाव लड़ा था और कांग्रेस (एस) देवराज अर्स के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी। कांग्रेस (इंदिरा) ने 492 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए जिनमें से 353 चुनाव जीत संसद पहुंचे। विपक्ष इस चुनाव में इस कदर धराशायी हुआ कि किसी भी पार्टी को आधिकारिक तौर पर विपक्ष का दर्जा तक न मिल सका था। इंदिरा गांधी ने अपनी परम्परागत सीट रायबरेली के साथ-साथ आंध्र प्रदेश की मेडक सीट से भी चुनाव लड़ा और दोनों ही सीटों से विजयी रही थीं। अमेठी संसदीय सीट से उनके पुत्र संजय गांधी भी चुनाव जीतने में सफल रहे। 1977 में इंदिरा गांधी को रायबरेली से परास्त करने वाले राजनारायण लोकदल प्रत्याशी बतौर वाराणसी से चुनाव लड़े और कांग्रेसी नेता कमलापति त्रिपाठी के हाथों परास्त हो गए। इस चुनाव में जनता परिवार के कई दिग्गज फेल रहे। इनमें जनेश्वर मिश्र, मधु लियमे, मुरली मनोहर जोशी, पीलू मोदी, शरद यादव, विजयाराजे सिंधिया, सुषमा स्वराज, सिकंदर बख्त और कुशाभाऊ ठाकरे सरीखे दिग्गज शामिल थे। 14 जनवरी, 1980 के दिन इंदिरा गांधी ने भारतीय संघ के प्रधानमंत्री बतौर चौथी बार शपथ ली और मात्र ढाई बरस सत्ता से बाहर रहने के बाद पूर्ण दमखम के साथ वापस सत्तासीन हो गईं। इस तरह से आजादी बाद पहली बार केंद्र में जयप्रकाश नारायण और आचार्य कृपलानी के प्रयासों से सत्ता में आई पहली गैर कांग्रेस सरकार की सत्ता का पतन हो गया।
जनता पार्टी की सत्ता से आमजन के मोहभंग को उस दौर के साहित्य से भी समझने में मदद मिलती है। मन्नू भंडारी का उपन्यास ‘महाभोज’ जनता काल के दौरान ही 1979 में प्रकाशित ऐसा ही राजनीतिक उपन्यास है जो भारतीय लोकतंत्र और राजनीति के नग्न यथार्थ को सामने लाने का साहस करता है। मन्नू भंडारी ने इस उपन्यास के प्राक्कथन में लिखा है-‘अपने व्यक्तिगत दुख-दर्द, अंतर्द्वंद्व या आंतरिक ‘नाटक’ को देखना बहुत महत्वपूर्ण, सुखद और आश्वस्त दायक तो मुझे भी लगता है, मगर जब घर में आग लगी हो तो सिर्फ अपने अंतर्जगत में बने रहना या उसी का प्रकाशन करना क्या खुद ही अप्रासंगिक, हास्यास्पद और किसी हद तक अश्लील नहीं लगने लगता? सम्भवतः इस उपन्यास की रचना के पीछे यही प्रश्न रहा हो। इसे मैं अपने व्यक्तित्व और नियति को निर्धारित करने वाले परिवेश के प्रति ऋण-शोध के रूप में ही देखती हूं।’
‘महाभोज’ राजनेता और नौकरशाह के भ्रष्ट गठजोड़ में लोकतंत्र में लोक की दारुण स्थिति को बयां करता है। विपक्षी दल के एक चालक और सत्तालोलुप नेता सकुुल बाबू के माध्यम से लेखिका आजाद भारत की बाबत कहती हैं-‘बयान लेने का नाटक तो हो ही गया और इस बार बहुत मुस्तैदी से भी हुआ! अब मामला गहरी छानबीन के लिए ऊंचे अफसरों के हाथ में सौंप दिया जाएगा जो कभी किसी नतीजे पर पहुंचेंगे ही नहीं। कम से कम चुनाव तक तो नहीं पहुंचेंगे। आम लोग मरे या जिए, इन्हें तो चुनाव जीतना है-हर हालत में। और चुनाव जीतने के लिए गांव के घनी किसानों के वोट भी चाहिए और पैसा भी। इसलिए अभी उनकी हर ज्यादती पर, हर अन्याय पर परदा डाला जाएगा, उन्हें बचाया जाए। इसलिए अच्छी तरह से जान लीजिए कि इस हत्या के लिए कुछ नहीं होने जा रहा है। कौन करेगा? पंचायत इनकी, पुलिस इनकी और अब तो विश्वास हो गया होगा आपको कि सरकार भी इन्हीं की है। तब कौन लड़ेगा आपकी लड़ाई?… आपको न्याय दिलाने के लिए…आपका हक दिलाने के लिए कौन आएगा।’
हरिशंकर परसाई का एक व्यंग्य ‘एक अपील का जादू’ मोरारजी देसाई सरकार की कार्यशैली पर तीखा प्रहार करता है। बढ़ती महंगाई से त्रस्त जनता की कहानी कहता यह व्यंग्य जनता सरकार की नीयत और नीति को कुछ यूं सामने रखता है-‘एक दिन कुछ लोग प्रधानमंत्री के पास यह शिकायत करने गए कि चीजों की कीमतें बहुत बढ़ गई हैं। प्रधानमंत्री उस समय गाय के गोबर से कुछ प्रयोग कर रहे थे। वे स्वमूत्र और गाय के गोबर से देश की समस्याओं को हल करने में लगे थे। उन्होंने लोगों की बात सुनी। चिढ़कर कहा, ‘आप लोगों को कीमतों की पड़ी है। देख नहीं रहे हो, मैं कितने बड़े काम में लगा हूं? मैं गोबर में से नैतिक शक्ति पैदा कर रहा हूं। जैसे गोबर गैस वैसे ‘गोबर नैतिकता।’ इस नैतिकता के प्रकट होते ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। तीस साल के कांग्रेसी शासन ने देश की नैतिकता खत्म कर दी है।’ एक मुंहफट आदमी ने कहा, ‘इन तीस में से बाईस साल आप भी कांग्रेस के मंत्री, मुख्यमंत्री और उप प्रधानमंत्री रहे हैं। तो तीन-चौथाई नैतिकता तो आपने ही खत्म की होगी।’ प्रधानमंत्री ने गुस्से में कहा, ‘बको मत। तुम कीमतें घटवाने आए हों न! मैं व्यापारियों से अपील कर दूंगा।’ एक ने कहा, ‘साहब, कुछ प्रशासकीय कदम नहीं उठाएंगे?’ दूसरे ने कहा, ‘साहब, कुछ अर्थशास्त्र के भी तो नियम होते हैं।’
प्रधानमंत्री ने कहा, ‘मेरा विश्वास न अर्थशास्त्र में है, न प्रशासकीय कार्यवाही में। यह गांधी का देश है। यहां हृदय-परिवर्तन से काम होता है। मैं व्यापारियों से नैतिकता की अपील कर दूंगा। वे कीमतें एकदम घटा देंगे। अपील से उनके दिलों में मैं लोभ की जगह त्याग फिर कर दूंगा। मैं सर्जरी भी जानता हूं।’ जनता परिवार के शासनकाल पर परसाई के व्यंग्य काफी कुछ कहते हैं। ‘तीसरी आजादी का जांच कमीशन-2’ नामक व्यंग्य में एक काल्पनिक जांच आयोग जयप्रकाश नारायण को पूछताछ के लिए बुलाता है। परसाई इस जांच कमीशन की कार्यवाही के जरिए जयप्रकाश नारायण को ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का दिवास्वप्न दिखाने के लिए कठघरे में खड़ा करने का काम कुछ यूं करते हैं-
कमीशन: लोकनायक जयप्रकाश नारायण गवाह की जगह पर आएं।
जयप्रकाश: यहां जयप्रकाश नारायण हैं, पर वह लोकनायक नहीं है। लोकनायक का खिताब मैंने तभी घबराकर छोड़ दिया था।
सचिव: अच्छा, केवल जयप्रकाश नारायण।
जयप्रकाश: यह ‘केवल’ क्या है? इसका मतलब ‘ओनली’ है? मैं ‘ओनली’ जयप्रकाश नारायण नहीं हूं। ‘ओनली’ जरूर हो गया हूं। आप मुझे जयप्रकाश कहिए। मैंने ‘नारायणत्व भी त्याग दिया है। मैंने सब त्याग दिया है। अब मैं विनोबा की तरह सिर्फ स्वास्थ्य और अध्यात्म पर बात करता हूं।
कमीशन: अच्छा, जयप्रकाश जी, आप यह बताइए कि क्या आप दूसरी आजादी लाए? यानी, क्या आपके नेतृत्व में आंदोलन के फलस्वरूप दूसरी आजादी आई?
जयप्रकाश: आई प्लीज नाॅट गिल्टी। मैं बेकसूर हूं। दूसरी  आजादी मेरे बावजूद आ गई। मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि ऐसी दुर्घटना हो जाएगी। लोगों ने व्यर्थ मेरे ऊपर तोहमत लगा दी और मैं बदनाम हो गया।
कमीशन: पर सम्पूर्ण क्रांति का नारा तो आपने ही दिया था?
जयप्रकाश: सही है, पर रिकॉर्ड है कि पूरी जिंदगी मैंने वही नारा दिया, जो हो नहीं सकता। यह मेरी आदत है और नियति भी। 1952 के पहले आम चुनाव में मैंने नारा दिया था कि प्रजा समाजवादी दल सरकार बनाएगा। मेरे साथी अशोक मेहता ने ऐलान किया था- वी विल स्वीप दि पोल्स। इस मुहावरे ने ही हमारे साथ मजाक किया। चुनाव के बाद एक कार्टून छपा था, जिसमें अशोक को मतदान-केंद्र पर झाड़ू लगाते दिखाया गया था। हमारी पार्टी की खटिया खड़ी हो गई। पार्टी का टूटना शुरू हुआ। मैं छिटककर विनोबा के पास चला गया। मैंने भूदान का नारा विनोबा के साथ दिया, पर भूमि नहीं मिली। ग्रामदान का नारा दिया, ग्राम नहीं मिले। मैं देशदान का नारा भी दे रहा था, पर जवाहर लाल ने नहीं देने दिया। मैंने जीवनदान का नारा दिया, पर मेरे सिवाय किसी ने जीवन नहीं दिया। आखिर मैंने ही अपना जीवन वापस ले लिया। मैंने पार्टी हीन लोकतंत्र का नारा दिया, वह नहीं हुआ। मैंने बुनियादी लोकतंत्र का नारा दिया, पर लोगों ने दो-दो जनेऊ पहन ली। मैंने नारा दिया-जाति तोड़ो तो ऊंची और नीची जाति वालों में आपस में सिर-फुटौवल होने लगी। जो मैंने कहा, वह कभी नहीं हुआ। मेरे चाल-चलन का ऐसा बढ़िया रिकाॅर्ड है। जीवन में पहली बार न जाने क्या उल्टा-सुल्टा हुआ कि सरकार बदली और इसका कलंक मेरे माथे मढ़ दिया गया। मैं बेकसूर हूं।
कमीशन: आपने सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया था?
जयप्रकाश: हां। मैंने नारा दिया था कि ‘सम्पूर्ण क्रांति अब नारा है, भावी इतिहास हमारा है।’ मैंने विगत और वर्तमान इतिहास को एकदम काट दिया था।
कमीशन: सम्पूर्ण क्रांति क्या है? इसकी व्याख्या कीजिए।
जयप्रकाश: मैं नहीं जानता। जिंदगी में जो भी मैंने किया, उसकी व्याख्या कभी नहीं कर सका। मेरे साथ यही दिक्कत है। मैं एक व्याख्यानहीन जिंदगी जीता रहा हूं।
सरकारी वकील: क्या सम्पूर्ण क्रांति की कोई आइडियोलॉजी थी?
जयप्रकाश: नहीं, आइडियोलॉजी मेरी ही कभी नहीं रही। लोग कहते हैं, मेरी आइडियाॅलाॅजी ‘कनफ्रयूनिज्म’ रही है।
कमीशन: यानी ‘कनफ्रयूशियस’ से इसका संबंध है?
जयप्रकाश: नहीं, ‘कन्फ्यूजन’ से।
कमीशन: क्या सम्पूर्ण क्रांति के लिए आपका कोई संगठन था?
जयप्रकाश: नहीं, संगठन मैं क्यों बनाने लगा! मैं तो संगठन तोड़ने का काम करता हूं। समाजवादियों का संगठन तोड़ने का क्रम मैंने ही शुरू किया था। फिर मैंने सर्वोदय को भी तोड़ा।
सरकारी वकील: आपकी आत्मा ऐसी कैसी है?
जयप्रकाश: मेरी लोकतांत्रिक समाजवादी आत्मा में सर्वोदय और हताशा शामिल है।
कमीशन: तो क्या इंदिरा गांधी ‘बोल्शेविक’ हैं?
जयप्रकाश: वह क्या हैं, यह तो बोल्शेविक भी नहीं जानते। मैंने तो देखा कि शासन में सब जगह बोल्शेविक घुसे हैं। नीतियां बोल्शेविक बनाते थे। फिर इंदिरा गांधी ने रूस से बीस-साल संधि कर ली थी मुझे डर था कि देश कहीं वारसा गुट का सदस्य न हो जाए।
कमीशन: तो इसलिए आपने इमरजेंसी खत्म होने पर पांच दलों की जनता पार्टी बनवा दी?
जयप्रकाश: मैं इस जिम्मेदारी से भी इनकार करता हूं। मुझे व्यर्थ बदनाम किया गया। ये राजनीति के घुटे हुए नेता व्यावहारिक रूप में मेरे चाचा होते हैं। वे 1967 मिलकर संविदा सरकार बनाएं, या अलग-अलग जेल में जाएं, यही तो विकल्प उनके सामने थे। वे एक हो गए। पर उन्हें एक होने का बहाना चाहिए था। तो वे कहने लगे कि जयप्रकाश के आग्रह से हम मिल गए। बदनामी मेरी हुई।
सरकारी वकील: मगर कहा तो यह जाता है कि आपने जनता सरकार बनवाई है।

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