[gtranslate]
मेरी बात

आजादी के पिचहत्तर बरस बाद अन्ततः देश में समान नागरिक अचार संहिता बनाए जाने की शुरुआत हो ही गई। हमारे संविधान के निर्माताओं की मंशा को साकार रूप देने का श्रेय उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह  धामी के खाते में गया। गत् सप्ताह राज्य विधानसभा में ‘समान नागरिक संहिता उत्तराखण्ड विधेयक 2024’ प्रस्तुत कर उन्होंने खुद के लिए इतिहास में विशेष स्थान दर्ज कराने के साथ-साथ देश के अन्य राज्यों को भी इस दिशा में काम करने का मार्ग प्रशस्त कर डाला है। निश्चित ही पुष्कर सिंह धामी इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं। हालांकि इस विधेयक को लेकर विपक्षी दलों समेत बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग और अल्पसंख्यकों के मध्य थोड़ा अविश्वास और खासी बेचैनी का माहौल है। इस बेचैनी और अविश्वास के पीछे भारतीय जनता पार्टी का कोर एजेंडा हिंदुत्व का होना है। बीते 10 बरसों के दौरान कई ऐसे विधेयक केंद्र सरकार लेकर आई, कई राज्यों  ने ऐसे तुगलकी फरमान जारी किए, बुलडोजर नीति बना डाली जिसने विपक्षी दलों, अल्पसंख्यकों और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग की दुश्चिंताओं में भारी इजाफा करने का काम किया। जाहिर है ऐसे माहौल में समान नागरिक संहिता की बात चूंकि भाजपा की तरफ से आई है तो उसको शक की निगाहों से देखा जाना स्वाभाविक है। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा राज्य विधानसभा में पेश किया गया विधेयक मेरे हाथों में हैं। 172 पृष्ठों वाला यह विधेयक गंभीर अट्टययन मांगता है। इस विधेयक की खूबियों और खामियों पर तो इसे पढ़कर ही ईमानदार टिप्पणी की जा सकती है। इसलिए मैं इस विधेयक पर टिप्पणी किए बगैर संविधान निर्माताओं की भावना को मूर्त रूप देने के लिए मुख्यमंत्री धामी को बधाई देता हूं। स्मरण रहे हमारे संविधान के अनुच्छेद 44, भाग चार में राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत लिखा गया है कि-‘राज्य, भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता प्राप्त करने का प्रयास करेगा।’ उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री धामी ने यही प्रयास किया है इसलिए वे साधुवाद के पात्र हैं। यह साधुवाद इस अपेक्षा के साथ है कि उनके द्वारा प्रस्तुत विधेयक संविधान की मूल धारणा के अनुरूप है जिसमें किसी भी धर्म विशेष को किसी अन्य धर्म की तुलना में कमतर अधिकार नहीं दिए गए हैं।

संविधान निर्माण के दौरान ही नेहरू और अम्बेडकर समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) बनाए जाने के प्रबल पक्षधर थे। इस मुद्दे पर संविधान सभा में गरमा-गरमी हुई थी। सभा के मुस्लिम सदस्यों ने अपने धार्मिक कानूनों के स्थान पर संविधान प्रदत्त समान नागरिक कानून लाए जाने का घोर विरोध तब किया था। मुस्लिम सदस्यों का तर्क था कि ‘जहां तक मुसलमानों की बात है तो हमारे विरासत कानून, विलय और तलाक पूरी तरह हमारे धर्म पर निर्भर करते हैं।’ डॉ. अम्बेडकर ने इस तरह के (कु) तर्कों को खारिज करते हुए जोर दिया कि पुराने समय के समाज में ट्टार्म का जीवन के हर क्षेत्र में हस्तक्षेप था लेकिन आधुनिक लोकतंत्र में इसे समाप्त अथवा कम किया जाना जरूरी है ताकि अपेक्षित सामाजिक सुधार लाए जा सकें।

नेहरू स्वयं समान संहिता लाने के प्रबल पक्षधर थे लेकिन विभाजन के चलते पैदा हुई परिस्थितियों, विशेषकर अल्पसंख्यक समुदाय में भारत के प्रति विश्वास बनाए रखने की विवशता चलते वे ऐसा कर पाने का साहस नहीं जुटा पाए। बहुसंख्यकों के लिए नेहरू सरकार द्वारा लाए गए हिंदू कोड बिल, जिसमें हिंदुओं के साथ-साथ सिख, बौद्ध और जैन शामिल थे, का भी भारी विरोध कांग्रेस भीतर ही उठना शुरू हो गया था जिसने नेहरू को कमजोर करने का काम किया। स्वयं संविधन सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके पक्ष में नहीं थे। मार्च 1949 में तो बकायदा एक ‘अखिल भारतीय हिंदू विरोधी संहिता विधेयक समिति’ का गठन किया गया जिसका नेतृत्व अखिल भारतीय राम राज्य परिषद् के संस्थापक हरिहरानंद सरस्वती उर्फ करापात्री महाराज कर रहे थे। इस संगठन का मानना था कि यह बिल हिंदुओं के रीति-रिवाजों, परंपराओं और धर्म शास्त्रों के विरुद्ध है। करापात्री महाराज की इस मुहिम को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, हिंदू महासभा समेत कई हिंदूवादी संगठनों का समर्थन था। संघ ने 11 सितंबर, 1949 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित एक जनसभा में इस बिल को ‘हिंदू समाज पर फेंका जा रहा परमाणु बम’ तक की संज्ञा दे डाली थी’ भारी मशक्त के बाद अंततः तत्कालीन कानून मंत्री डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने 1951 में इस बिल को संसद में पेश कर ही दिया लेकिन संसद के भीतर और बाहर मचे घमासान चलते यह महत्वपूर्ण सुधारवादी कानून को नेहरू संसद से पारित कराने में असफल रहे थे। उन्होंने जल्द होने जा रहे पहले आम चुनाव का हवाला देते हुए इस बिल को स्थगित रख दिया। यहां पर समझा जाना, समझाया जाना जरूरी है कि भारत को आजादी मिलने के समय तक हिंदू समाज में पुरुषों और महिलाओं को तलाक का कानूनी अधिकार नहीं था। विधवा स्त्री का पुनर्विवाह भी संभव नहीं था और विधवाओं को संपत्ति के अधिकार से भी वंचित रखा गया था। पुरुष बहुविवाह कर सकते थे लेकिन स्त्रियों को यह छूट नहीं थी। अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत किए गए हिंदू कोड बिल में व्यापक सुधार करते हुए विधवा अथवा उसके बच्चों को पिता की संपत्ति पर बराबर का अधिकार, पुत्री को पिता की संपत्ति पर बराबर का हिस्सा, हिंदू पुरुष के बहुविवाह पर रोक तथा पुरुष अथवा महिलाओं को तलाक का अधिकार दिए जाने का प्रावधान रखा गया था। संसद में जब फरवरी 1951 में यह बिल पेश किया गया तब कट्टरपंथी हिंदूवादी संगठनों ने संसद के बाहर भारी  धरना-प्रदर्शन किया था जिसमें नारे लगते थे ‘पाकिस्तान तोड़ दो, नेहरू हुकूमत छोड़ दो।’ अम्बेडकर ने तत्काल इस बिल पर बहस कराए जाने पर जोर दिया था। फरवरी के बाद सितंबर 1951 में एक बार फिर से बिल पर बहस शुरू हुई लेकिन सितंबर में ही संविधानसभा के भंग किए जाने और आम चुनावों की घोषणा होने चलते इस बिल पर चर्चा पूरी नहीं हो सकी। इस दौरान राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के भारी दबाव के कारण नेहरू ने पहली निर्वाचित संसद में इस बिल को रखे जाने का निर्णय ले लिया जिससे आहत हो डॉ. अम्बेडकर ने अक्टूबर, 1951 में केंद्र सरकार से इस्तीफा दे डाला। 1952 के आम चुनावों में कांग्रेस को मिले भारी बहुमत ने नेहरू के आत्मविश्वास को बढ़ाने का काम किया जिसका नतीजा रहा ‘हिंदू कोड बिल’ के स्थान पर इसमें प्रस्तावित सुधारों को अलग-अलग कानून बना संसद से पारित कराना। ‘हिंदू विवाह अधिनियम, 1955’, ‘हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956’, ‘हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956’ एवं ‘हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956’ इसी हिंदू कोड बिल का हिस्सा और ऐसे बड़े सुधारवादी कदम हैं जिन्हें नेहरू सरकार ने तमाम विरोधा के बावजूद लागू करने में सफलता पाई। तब तक इन कानूनों के रचयिता डॉ. अम्बेडकर अपना पहला चुनाव (1952) हारने के बाद राजनीतिक परिदृश्य में हाशिए पर जा चुके थे। दिसंबर, 1956 में लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।

नेहरू ने हिंदू धर्म में प्रचलित कई विसंगतियों को तो दूर करने का काम तो कर दिखाया लेकिन अन्य  धर्मों, विशेषकर मुस्लिम समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने के लिए वे संविधान निर्माताओं, जिनमें वे स्वयं भी शामिल थे, की मंशानुसार कदम उठाने से चूक गए। बाद के वर्षों में अल्पसंख्यक वोट बैंक में तब्दील हो गया और केंद्र व अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारों ने तुष्टीकरण की नीति अपना समान नागरिक संहिता को ठंडे बस्ते में डाल दिया। हमारे संविधान की प्रस्तावना में स्पष्ट कहा गया है कि ‘हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण, प्रभुत्व-सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मर्पित करते हैं।’ यह सही है कि हमारा संविधान हमें उपासना की स्वतंत्रता देता है लेकिन वह लोकतंत्रात्मकता की बात भी करता है। लोकतंत्र में नागरिकों के लिए उनके धर्मानुसार कानून नहीं हो सकते, नहीं होने चाहिए। यदि भारत के अल्पसंख्यक धर्म के आधार पर कानून होने के अधिकार की बात करेंगे तो यह उनके लिए आत्मघाती होगा। उनकी यह मांग बहुसंख्यकों की उग्रता को बढ़ाने का काम करेगी। धर्म को हथियार बना अपनी राजनीति को परवान चढ़ाने वाले यही चाहते भी हैं। संविधान निर्माता इस सत्य से भली-भांति परिचित थे। यही कारण है कि उन्होंने राज्य के नीति निदेशक तत्वों में समान नागरिक संहिता बनाए जाने की बात कही। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयक इस दृष्टि से स्वागत योग्य कदम है। हालांकि इस विधेयक में शामिल कुछ बिंदुओं को लेकर मैं आशंकित हूं। उदाहरण के लिए लिव-इन रिश्तों का पंजीकरण कराया जाना और बगैर पंजीकरण करा एक साथ रह रहे जोड़ों को छह माह की जेल का प्रावधान मुझे अव्यवहारिक और संविधान प्रदत्त निजता के अधिकार का हनन् करता प्रथम दृष्टया प्रतीत हो रहा है। इस पर तथा अन्य कुछ बिंदुओं पर चर्चा से पहले इस विधेयक को पूरी तरह पढ़ना जरूरी है। अभी के लिए इस उम्मीद के साथ कि यह विधेयक किसी धर्म विशेष के प्रति अनुदार और किसी  धर्म विशेष के प्रति अति उदार नहीं होगा, मैं एक बार फिर से पुष्कर सिंह धामी को साधुवाद और बधाई देता हूं।

You may also like

MERA DDDD DDD DD