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हम पब्लिसिटीबाज नहीं कोश्यारी जी!

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री रह चुके भगत सिंह कोश्यारी पिछले दिनों केंद्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद से मिले। उन्होंने एक पत्र कानून मंत्री को सौंपा। पत्र का मजमून मेरी हैरानी, काफी हद तक बेचैनी और इस मुद्दे पर कुछ नया करने के संकल्प का कारक बना है। कोश्यारी जी ने कानून मंत्री को लिखे अपने पत्र में पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन यानी जनहित याचिकाओं पर टिप्पणी करते हुए उन्हें पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन यानी प्रचार के लिए दायर की जाने वाली याचिकाएं करार दे डाला। मैं श्री भगत सिंह कोश्यारी के इस कथन से कतई इत्तेफाक ना रखते हुए इसे गैर जिम्मेदाराना और सस्ता प्रचार पाने के लिए लिखा गया पत्र करार देता हूं। भगत सिंह कोश्यारी ने किस संदर्भ में यह बात कही और उनके कथन में कितनी सच्चाई है, इस पर अपनी बात रखने से पूर्व मैं कुछ तथ्य पीआईएल कानून की बाबत रखता हूं ताकि इस व्यवस्था का महत्व समझा जा सके। वर्ष 1979 तक हमारे कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी जिसके जरिए कोई तीसरा पक्ष अदालत के समक्ष ऐसे किसी भी मसले पर वाद दायर कर सके जिससे उसका सीधा कुछ लेना-देना ना हो। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता पुष्पा कपिला हिगोंरानी, जिन्हें अब जनहित याचिकाओं की मां कहा जाता है, ने बिहार की जेलों में बरसों से बंद अंडर ट्रायल कैदियों की बाबत एक याचिका दायर की थी। इस अकेली याचिका का असर रहा कि ना केवल बिहार बल्कि देश भर की जेलों में बंद लगभग चालीस हजार कैदियों की रिहाई संभव हो पाई। इस केस को हुसैनारा खातून केस के नाम से जाना जाता है।

पुष्पा हिगोंरानी ने इसके बाद बिहार के भागलपुर कांड में शामिल पुलिसकर्मियों के खिलाफ याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली जिस पर उच्चतम न्यायालय ने दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्यवाही के आदेश दिए थे। पुष्पा हिगोंरानी पहली भारतीय महिला अधिवक्ता थीं जिन्होंने ख्याति प्राप्त कार्ड्रिफ लॉ स्कूल, वेल्स से कानून की शिक्षा ली थी। इस विश्वविख्यात संस्था के अब्रेडेयर हॉल में पुष्पा हिगोंरानी के सम्मान में एक पट्टिका लगी है। 86 वर्ष की आयु में 2013 में हिगोंरानी की मृत्यु हुई। वे पहली महिला अधिवक्ता हैं जिनका पोट्रेट सुप्रीम कोर्ट के पुस्तकालय में 2017 में लगाया गया है। जनहित याचिका हमारे संविधान में अनुच्छेद 39ए के अंतर्गत समानता का अधिकार और निशुल्क न्याय व्यवस्था से संबंधित है। पुष्पा हिगोंरानी की याचिका से पहले केवल किसी भी कारण विशेष से पीड़ित व्यक्ति ही न्यायालय की शरण ले सकता था। सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीएन भगवती को इस व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव का श्रेय जाता है जिन्होंने हिगोंरानी की याचिका पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। तब से लेकर आज तक जनहित के कई बड़े निर्णय इन याचिकाओं की बदौलत ही सामने आए हैं। हालांकि कई कानूनविद् 1976 में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका ‘मुंबई कामगार सभा बनाम अब्दुल भाई फैजल भाई’ को पहली जनहित याचिका करार देते हैं लेकिन अधिकांश न्यायमूर्ति पी-एन भगवती के पुष्पा हिगोंरानी की याचिका में दिए निर्णय को जनहित याचिकाओं का जन्मदायी निर्णय मानते हैं। कोश्यारी जी के कथन पर कुछ कहने से पहले मैं कुछेक ऐसे ऐतिहासिक जनसरोकारी निर्णयों से आपको बावस्ता कराना चाहूंगा जिनके चलते कई ऐसे कानून बनें जिन्होंने आम आदमी के अधिकारों को शक्ति दने का काम किया है। पहला उदाहरण है कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ बना कानून जिसकी बुनियाद में है राजस्थान की सामाजिक कार्यकर्ता भंवरी देवी का बाल विवाह के खिलाफ संघर्ष जिसका खामियाजा उन्हें सामूहिक बलात्कार का शिकार हो चुकाना पड़ा। अपने संग हुए अन्याय के खिलाफ भंवरी देवी को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता नैना कपूर ने भंवरी देवी को न्याय दिलाने के लिए उच्चतम न्यायालय में याचिका डाली जिसे ‘विशाखा बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान’ कहा गया। उच्चतम न्यायालय ने भंवरी देवी व कार्यस्थल पर यौन शोषण का शिकार हो रही महिलाओं को संविधान में प्रदत्त समानता, भेदभाव, जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों का हनन माना और भारत सरकार को इस विषय पर कठोर कानून बनाने के दिशा निर्देश जारी किए। नतीजा यह कि आज कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ महिलाओं के पक्ष में सशक्त प्रक्रिया हर सरकारी और निजी संस्थाओं में लागू है। दूसरा उदाहरण है ‘एमसी मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’। पर्यावरणविद् और अधिवक्ता एमसी मेहता द्वारा 1987 में दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 12, 1988 में अपना निर्णय सुनाते हुए गंगा नदी में प्रदूषण कर रही पचास हजार से ज्यादा ईकाइयों को बंद करने, ऐसे उद्योगों में दूषित पानी को साफ करने के लिए वाटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने और गंगा में शौच को बहाने पर रोक लगाने के आदेश जारी किए। इसी प्रकार ‘परमांनद कटारा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ जनहित याचिका में सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार कार्यकर्ता परमानंद कटारा की याचिका पर सुनवाई करते हुए रोड एक्सीडेंट में घायल हुए नागरिकों को बगैर पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराए तत्काल स्वास्थ्य सुविधा दिए जाने का आदेश पारित किया था। यह मात्र तीन उदाहरण है। लिस्ट इतनी लंबी है कि मैं लिखते- लिखते थक जाऊंगा और कोश्यारी जी पढ़ते-समझते। उत्तराखण्ड की बात करूं तो मेरी एवं एक अन्य याचिका पर 2010 में उच्च न्यायालय, नैनीताल ने अपना ऐतिहासिक फैसला देते हुए ऋषिकेश स्थित खरबों की जमीन की बंदरबांट को रोका, पूरी जमीन सरकार में निहित करवाई और राज्य के भ्रष्ट तंत्र पर कठोर टिप्पणी भी अपने आदेश पर की। अभी कुछ दिए हुए मेरी ही अन्य याचिका पर रामनगर स्थित प्रसिद्ध लीची फल पट्टी क्षेत्र में अवैध निर्माण आदि पर उच्च न्यायालय ने अंकुश लगाने का काम किया। ठीक कहते हैं आप कोश्यारी जी कि यह काम न्यायालय का कतई नहीं। आपने कानून मंत्री को लिखे अपने पत्र में लिखा है कि ‘पिछले दिनों उत्तराखण्ड के समाचार पत्रों में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का एक बयान आया कि उत्तराखण्ड में प्रदेश सरकार की जगह न्यायपालिका शासन चला रही है। यूं पिछले एक-दो वर्षों से ऐसी चर्चा आम थी। किंतु एक उत्तरदायी राजनेता के बयान के बाद इस पर गंभीरता से विचार करना जरूरी हो गया है। उच्च न्यायालय नैनीताल द्वारा प्रतिदिन एक न एक जनहित याचिका पर निर्णय आ जाता है ऐसा लगता है ये ;च्प्स्द्ध च्नइसपब प्दजमतमेज स्पजपहंजपवद न होकर च्नइसपबपजल प्दजमतमेज स्पजपहंजपवद हो गए हैं। नैनीताल और कुमाऊं क्षेत्र के लोग तो अब न्यायालय को न्याय के मंदिर की जगह इसे अपने लिए एक आफत समझने लगे हैं।’ पर बताएं आप कि कोर्ट को ऐसा क्यों करना पड़ रहा है। क्या आप कहना चाहते हैं कि उच्च न्यायालय, नैनीताल के विद्वान न्यायाधीश अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर राज्य के नागरिकों के अहित में फैसला दे रहे हैं? आपके पत्र का सार मेरी समझ अनुसार यह है कि केंद्र सरकार संसद में कानून बना कर जनहित याचिकाओं को बंद करने की व्यवस्था करे ताकि निरंकुश सत्ता खुलकर राज्य के संस्थानों की लूट कर सके। कोश्यारी जी इससे भी कहीं महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, उसके कहीं अधिक राज्य के खांटी जननेता होने के नाते आपने राज्य सरकारों द्वारा समय-समय पर लिए गए जनविरोधी फैसलों पर क्या कदम उठाए हैं? 2007 में राज्य में आपकी पार्टी सत्ता में थी। तब जमकर राज्य के संसाधनों संग खिलवाड़ हुआ। जलविद्युत परियोजनाओं के आवंटन में हुई धांधलियों से क्या आप परिचत नहीं थे? क्यों आपने तत्कालीन सरकार के जनविरोधी आचरण का विरोध नहीं किया? क्या ऋषिकेश में सिटुरजिया बायोकेमिकल्स को पट्टे पर दी गई जमीन का बंदरबांट पर आपने कोई जनआंदोलन किया? या फिर आप मानते हैं कि सरकार के निर्णय खिलाफ दायर मेरी जनहित याचिका से मेरा कोई व्यक्तिगत स्वार्थ से जुड़ा था? हमारे शिशु राज्य में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए क्या आपने कोई पहल की है? क्योंकर आप ऐसों के पक्ष में खड़े नजर आते हैं जो नाना प्रकार के गंभीर आरोप लगने के बावजूद आपकी पार्टी का टिकट पा मंत्री तक बन जाते हैं? नैनीताल शहर अवैध निर्माणों कार्यों के चलते अपने अस्तित्व का संकट झेल रहा है यदि अब भी हम नहीं चेते तो इस ऐतिहासिक नगर का नामोनिशान नहीं रहेगा। नैनीताल उच्च न्यायालय इसे रोकने की दिशा में सराहनीय पहल कर रहा है। निश्चित ही यह इसलिए हो रहा है क्योंकि राज्य की सरकारें अपने दायित्वों का निर्वहन करने में पूर्णतः विफल रही हैं। केदारनाथ में आई भीषण आपदा के बाद मुझे स्मरण है कि आप और आपकी पार्टी के नेताओं ने पानी पी-पीकर तत्कालीन सरकार के मुखिया को कोसा था लेकिन जब इन्हीं पूर्व मुख्यमंत्री ने कांग्रेस से बगावत कर आपकी पार्टी की शरण ली तो उनके सारे पाप मानो गंगा रूपी भाजपा में आकर धुल गए। आप खुशी- खुशी उनके बगलगीर हो गए। क्या पहाड़ का बेटा होने के नाते कभी आपकी आत्मा आपको कचोटती नहीं कि सत्ता पाने और सत्ता में बने रहने के लिए आप इस स्तर तक समझौता परस्त हो गए कि हम जैसे उत्तराखण्डी आपको पब्लिसिटी बाज, स्टंटबाज नजर आने लगे हैं? बहुत संभव है कि आपने अपने पत्र में जो लिखा उसमें कुछ सच्चाई हो। लेकिन इसके लिए जिम्मेदार न्यायालय या फिर जनहित याचिका दायर करने वाले नहीं, बल्कि हमारे राज्य के शासन तंत्र का पूरी तरह भ्रष्ट और खोखला हो जाना है। यदि व्यवस्था पूरी ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वहन करने लगे तो भला क्यों हम जैसे बावले न्यायालय का दरवाजा खटखटाने जाएंगे? उत्तराखण्ड हाईकोर्ट में वकील दुष्यंत मैनाली समय-समय पर लोकहित से जुड़े मुद्दों पर ऐसी जनहित याचिकाओं की पैरवी करते हैं। शायद आपको ज्ञात न हो हम जैसे स्टंटबाज उन्हें पारिश्रमिक तो छोड़िए, खर्चों की रकम तक नहीं देते। तब क्या माना जाए कि मैनाली और उन सरीखे अधिवक्ता किसी निजी हित, निजी महत्वाकांक्षा के चलते ऐसा कर रहे हैं? ऐसा कतई नहीं है मान्यवर। सच यह है कि आप यानी हमारे रहबर अपने दायित्वों को निभा पाने में सफल नहीं रहे हैं। आप खुशफहमी का शिकार हैं कि आपसे जनता को बेहद स्नेह है इसलिए आप लोग संसद और विधानसभा पहुंचते हैं। सच यह है कि जनता के पास विकल्प की भारी कमी है। यह विकल्पहीनता का दंश ही है जो कभी आपको तो कभी कांग्रेस को सत्तासुख देता आया है। शायद आगे भी यही होता रहेगा, शायद कोई नई जनचेतना आने वाले समय में उभरेगी। प्रश्न लेकिन इसका नहीं आपकी रहबरी का है। आप हमारे रहबर हैं, चिंतन अवश्य करिएगा कि क्या आप अपनी जन्म भूमि संग न्याय कर पाए? रही बात जनहित याचिकाओं अथवा जनहित याचिकाकर्ताओं और न्यायालय की मंशा पर आपके शक-शुबहा करने की तो मैं इतना भर कहना चाहता हूं कि दूसरों के पाप (यदि आप की नजरों में हम पापी हैं तो) गिनाने से अपने पाप कम नहीं हो जाते। शायद इस शेर के जरिए आप तक अपनी बात पहुंचा सकेंः

तू इधर-उधर की बात न कर

ये बता कि काफिला क्यूं लूटा

मुझे रहजनों की गरज नहीं

तेरी रहबरी का सवाल है

मैं बताऊं कि काफिला क्यों लुटा

तेरा रहजनों से था वास्ता

मुझे रहजनों से गिला नहीं,

तेरी रहबरी पर मलाल है।

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