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पच्चीस अक्टूबर को जब कन्हैया कुमार पटना के एतिहासिक गांधी मैदान में भाषण दे रहे थे तो वहां उत्साहजनक उपस्थिति थी। उस उपस्थिति से वामपंथी दलों में एक उत्साह का संचार हुआ है। गांधी मैदान के मंच से कन्हैया कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधा। उन पर सीधा हमला बोला।
पटना के गांधी मैदान में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से भाजपा भगाओ, देश बचाओ रैली का आयोजन किया गया था। इस रैली में महागठबंधन के नेता भी शामिल थे। शरद यादव गुलाम नवी आजाद, जीतनराम मांझी, सरीखे दिग्गजों के बीच कन्हैया कुमार स्टार बने रहे। उनके साथ गुजरात के दलित नेता जिग्नेश भी थे। कन्हैया कुमार बिहार के लेनिनगार्ड कहे जाने वाले बेगूसराय से
लोकसभा का चुनाव भी लड़ने जा रहे हैं। जेएनयू के प्लेटफार्म से आगाज हुआ। कन्हैया कुमार की राजनीतिक यात्रा बिहार के लेनिनगार्ड तक पहुंच गई है। कन्हैया कुमार इस समय मोदी विरोध के कारण चमकते युवा सितारे हैं।
भले ही बिहार में सीपीआई ने अपनी चमक खो दी है। लेकिन कभी बिहार में उसकी काफी अच्छी स्थिति थी। प्रदेश में जातिवादी और अपराध की राजनीति हावी होने पर भी बेगूसराय में आज भी वामपंथ का जनाधार है। फिलहाल बिहार में सीपीआई की राजनीति के केंद्र में कन्हैया कुमार ही दिखाई दे रहे हैं। उनकी राष्ट्रीय पहचान है जिसका राजनीतिक लाभ आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव में मिल सकता है। अरसा हो गया बिहार में वामपंथ लोकसभा चुनाव नहीं जीता।
सीपीआई के नेता कहते आ रहे हैं कि राजद और लालू प्रसाद भी कन्हैया के चुनाव लड़ने पर सहमत हैं, लेकिन अभी इस दिशा में औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है। कहा जा रहा है कि भूमिहार सामाजिक आधार में सकरात्मक संदेश देने के अलावा कन्हैया के माध्यम से चुनावी सामाजिक समीकरण में भूमिहारों के एक हिस्से को खींच लाने की कोशिश में लालू यादव कन्हैया को महागठबंधन का उम्मीदवार बना सकते हैं। जब जेएनयू घटनाक्रम के बाद कन्हैया कुमार बिहार लौटने पर लालू प्रसाद से मिले थे तो उनकी टिप्पणी थी-‘ब्रहमर्षि समाज का होकर भी कन्हैया दबे कुचलों की भाषा बोलता है।’
लेकिन लालू पुत्र तेजस्वी यादव भीतर से कन्हैया कुमार को अपने लिए एक चुनौती के तौर पर देख रहे हैं। कन्हैया के बेगूसराय और बिहार में सक्रियता बढ़ने के साथ ही यह साफ दिखाई दे रहा है कि तेजस्वी यादव ने कन्हैया कुमार से एक दूरी बना ली है। अभी पटना से लेकर बेगूसराय तक कन्हैया कुमार पर हुए हमलों के बाबत तेजस्वी यादव ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
कन्हैया कुमार भाजपा विरोध के साथ-साथ युवाओं के भी प्रतीक बन रहे हैं जो तेजस्वी को खल रहा है। दोनों के बीच एक कोल्ड वार सा ठन गया है। दोनों ही युवा हैं। दोनों को राजनीति के भविष्य के चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है। तेजस्वी की चिंता की वजह भी यही है।
वैसे भी अगर राष्ट्रीय फलक पर देखे तो युवा दस्तक दे रहे हैं। वे पुरानी पीढ़ी की तुलना में ज्यादा  ईमानदार और ऊर्जा से भरे हैं। लोगों को भरोसा भी युवा राजनेताओं पर ज्यादा है। कन्हैया कुमार के अलावा तेजस्वी भी बिहार में तेजी के साथ लोकप्रिय हो रहे हैं। खास बात यह है कि बिहार में लालू प्रसाद को कई कारणों से नापसंद करने वाले भी तेजस्वी यादव को पसंद करते हैं।
बिहार से सटे उत्तर प्रदेश में भी मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव को जनता ज्यादा पसंद करती है। उत्तर प्रदेश को भी लगता है कि उन्हें भविष्य का राजनेता मिल गया। अखिलेश बेहद संतुलित स्वभाव में रह कर राजनीति करते हैं। जिस तरह से अखिलेश ने बसपा प्रमुख मायावती को महागठबंधन के लिए राजी किया है वह काबिले तारीफ है। अखिलेश जोड़ने की दिशा में लगातार सक्रिय दिखाई देते हैं।
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया एक भरोसेमंद युवा हैं। वह कांग्रेस का भावी चेहरा हैं। प्रदेश का एक बड़ा भाग उनके पसंद करता है। बहुत संभव है उनको कांग्रेस मुख्यमंत्री का चेहरा भी घोषित कर दे।
मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान में भी राजेश पायलट के पुत्र सचिन पायलट काफी मेहनत कर रहे हैं। बेशक राज्य में पुराने कांग्रेसी दिग्गज अशोक गहलोत का खासा प्रभाव है। मगर सचिन पायलट का भी अच्छा जनाधार है। एक बड़ा तबका इनको प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहता है। गुजरात के त्रिदेव युवा पिछले गुजरात विधानसभा चुनाव में अपना रंग दिखा चुके हैं। जिग्नेश पूरे देश में दलित युवा के रूप में अपने पहचान बनाने की दिशा में सक्रिय हैं।
रही बात राहुल गांधी की तो वह युवा हैं और कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। मोदी के मुकाबिल हैं। वह कितना कमाल करते हैं और देश की जनता के साथ-साथ युवाओं को अपनी तरफ कितना आकर्षित करते हैं। यह आगामी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में पता चल जाएगा। मगर इतना तय है कि जनता को अब युवा राजनेताओं पर ज्यादा भरोसा है जैसा कि दिल्ली के केजरीवाल पर।

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