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बारहवीं की परीक्षा हो सकती है तो दसवीं की परीक्षा क्यों नहीं?  

UP: लॉकडाउन खत्म होते ही 4 मई से होगी कॉपी चेकिंग, 20 से 25 मई के बीच रिजल्ट

महाराष्ट्र में 10वीं की बोर्ड परीक्षा रद्द कर छात्रों को प्रमोट करने के मामले पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कई अहम सवाल उठाए हैं। हाईकोर्ट ने इस फैसले के लिए राज्य सरकार को फटकार लगाई और यहां तक कहा कि राज्य सरकार ने शिक्षा का मजाक उड़ाया है। आप कोरोना के नाम पर किसी छात्र के शैक्षणिक भविष्य को खराब नहीं कर सकते। यदि आपने मैट्रिक परीक्षा रद्द करने का निर्णय लिया है, तो आप इसे कब लेने जा रहे हैं? क्या आप कह रहे हैं कि 10वीं कैंसिल कर 12वीं लेंगे?  इस बीच पीठ ने गुरुवार को सभी प्रतिवादियों के वकील को लिखित में अपनी-अपनी दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया और सुनवाई स्थगित कर दी।

महाराष्ट्र सरकार ने कोरोना की पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र राज्य माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की मैट्रिक परीक्षा रद्द कर दी है। सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के पूर्व सीनेट सदस्य धनंजय कुलकर्णी ने परीक्षा रद्द करने के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है। गुरुवार को मुंबई हाई कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। उस समय कोर्ट ने राज्य सरकार को परीक्षा रद्द करने का निर्देश दिया था।

छात्रों के लिए स्कूली शिक्षा के बाद मैट्रिक की परीक्षा सबसे महत्वपूर्ण होती है। जस्टिस शाहरुख कथावाला और जस्टिस सुरेंद्र तावड़े की बेंच ने इसे रद्द करने के लिए राज्य सरकार को फटकार लगाई और कहा कि आप शिक्षा प्रणाली को नुकसान पहुंचा रहे हैं। मई के अंत में राज्य सरकार ने लगभग 14 लाख छात्रों के साथ मैट्रिक परीक्षा आयोजित करने का फैसला किया, फिर उसने लगभग 16 लाख छात्रों के साथ मैट्रिक की परीक्षा क्यों रद्द कर दी? ऐसा भेदभाव क्यों?

सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड ने 10वीं का रिजल्ट कैसे निकाला जाए, इसे लेकर कुछ तैयारियां की हैं। उन्होंने कहा कि पहली से नौवीं तक का मूल्यांकन, दसवीं का आंतरिक मूल्यांकन, विशेषज्ञों की रिपोर्ट जैसे कुछ मानदंडों के आधार पर गुणांक का सूत्र बना रहा है। लेकिन महाराष्ट्र का एसएससी बोर्ड इसके लिए तैयार नहीं है। परीक्षा रद्द कर दीया और चुपचाप बैठ गए। पीठ ने छात्रों पर विचार नहीं करने के लिए राज्य सरकार को फटकार लगाई।

राज्य सरकार इस तथ्य को देखते हुए निर्णय ले सकती है कि सीबीएसई बोर्ड ने कम दिनों के कारण पाठ्यक्रम को घटाकर 30 प्रतिशत कर दिया है। हालांकि जनहित याचिकाकर्ता धनंजय कुलकर्णी की ओर से एड. उदय वारुंजीकर ने प्रस्तुत किया।

पीठ ने एसएससी बोर्ड, सीबीएसई, आईसीएसई और अन्य शिक्षा बोर्डों के अधिवक्ताओं को लिखित में अपनी दलीलें दाखिल करने का निर्देश दिया और सुनवाई स्थगित कर दी।

नई शिक्षा नीति- एक बड़ी पहल

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