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हरियाणा कांग्रेस का इतिहास गवाह, अलग बनाई पार्टी तो रसातल में चले जायेंगे हुड्डा 

हरियाणा में कांग्रेस की कलह निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा आज कोई राजनितिक फैसला ले सकते है। लेकिन इससे पहले वह आज अपनी 38 सदस्यीय कमेटी से गहन वार्ता कर रहे है। जिनमे वर्तमान में कांग्रेस के 11 विधायक भी उनकी 38 सदस्यीय कमेटी में शामिल है। प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर को हटाने और आगामी विधानसभा चुनावो में अपने आपको मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कराने के लिए हुड्डा ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ दवाब की राजनीती चली है। जिसमे वह फिलहाल तो कामयाब होते दिखाई नहीं दे रहे है।

कांग्रेसी सूत्रों का कहना है की सोनिया गांधी पर दवाब बनाने की निति के चलते ही हुड्डा ने गत 18 अगस्त को रोहतक में रैली की थी। जिसमे राहुल गांधी और सोनिया गांधी के फोटो तक होर्डिंग में नहीं लगाए गए थे। तब हुड्डा को उम्मीद थी की आलाकमान उनके सामने आत्मसमर्पण कर देगी। तब एक सुनियोजित राजनीती के तहत यह भी कहा गया की हुड्डा कांग्रेस को छोड़ देंगे और नई पार्टी का ऐलान कर देंगे। लेकिन तब उनके समर्थको  ने ऐसा करना जल्दबाजी कहा। इसके बाद रोहतक रैली के मंच से ही 38 सदस्य कमिटी के गठन की घोषणा की गई और कहा गया की यह कमेटी ही निर्णायक फैसला लेगी की हुड्डा कांग्रेस में ही रहेंगे या अलग पार्टी बनाएंगे। बहरहाल अंतरिम अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार सोनिया गांधी के समक्ष परीक्षा की घडी पैदा हो गई है। 

हरियाणा में यह कोई पहला मामला नहीं है। वर्ष 1966 में हरियाणा गठन से लेकर आजतक कांग्रेस हाईकमान को कई बार परीक्षा के दौर से गुजरना पड़ा लेकिन हाईकमान कभी भी दबाव बनाने वाले नेताओं के आगे नहीं झुकी। पंजाब से अलग होने के बाद एक नवंबर 1966 को कांग्रेस पार्टी ने भगवत दयाल शर्मा को हरियाणा का पहला मुख्यमंत्री नियुक्त किया था। भगवत दयाल सरकार में ही स्पीकर बने राव बीरेंद्र सिंह ने कुछ समय बाद बगावत का झंडा उठा लिया। स्वर्गीय राव बीरेंद्र सिंह ने हाईकमान पर दबाव बनाने के लिए विधायकों को भी तोड़ा लेकिन कांग्रेस हाईकमान ने उनकी एक नहीं सुनी।
इसके बाद उन्होंने हरियाणा विशाल पार्टी का गठन किया और सत्ता में आ गए। कुछ समय बाद हरियाणा विशाल पार्टी का कांग्रेस में विलय हो गया। इसके बाद कांग्रेस हाईकमान ने लंबे समय तक गांधी परिवार के करीबी रहे स्वर्गीय बंशीलाल के दावों को खारिज करते हुए जब भजनलाल को हरियाणा की राजनीति में उभारना शुरू किया तो बंशीलाल ने कांग्रेस से बगावत करते हुए 1996 में हरियाणा विकास पार्टी का गठन कर डाला और सत्ता में आ गए। बंशीलाल हरियाणा की राजनीति में कुछ समय ही अकेले चले और उसके बाद उन्होंने भी अपनी पार्टी का दोबारा कांग्रेस में विलय कर लिया।
बंशीलाल के बाद हरियाणा में कांग्रेस की तरफ से बगावत का झंडा उठाया पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय भजनलाल ने। वर्ष 2005 में कांग्रेस ने भजनलाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और पूर्ण बहुमत में आ गई लेकिन जब मुख्यमंत्री बनाने का समय आया तो सोनिया गांधी ने ऐन मौके पर भजनलाल को एक तरफ करके हरियाणा की बागडोर हुड्डा के हाथ में सौंप दी। जिससे गुस्साए भजनलाल ने पहले तो कांग्रेस हाईकमान पर दबाव बनाया लेकिन जब दबाव काम नहीं आया तो 2007 में उन्होंने हरियाणा जनहित कांग्रेस (बीएल) का गठन कर दिया। हजकां हरियाणा में कोई करिश्मा नहीं कर पाई और भजनलाल की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके बेटे कुलदीप बिश्नोई ने हजकां का कांग्रेस में विलय कर लिया।

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