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मध्यप्रदेश में पहले होगा फ्लोर टेस्ट या राज्यपाल का अभिभाषण?

मध्यप्रदेश में पहले होगा फ्लोर टेस्ट या राज्यपाल का अभिभाषण?

मध्यप्रदेश में फिलहाल भाजपा और कांग्रेस में अपनी-अपनी ताकत दिखाने का ट्रायल चल रहा है। जिसमें दोनों दल एक दूसरे को शिकस्त देने के लिए हर दांव पेंच आजमा रहे हैं। फ़िलहाल, दोनों दल एक दूसरे को और मात देने के लिए कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते हैं। भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीति की असली कुश्ती 16 मार्च को होगी। इस दिन मध्यप्रदेश विधानसभा का पहला सत्र आयोजित होगा। जिसमें दोनों पार्टियों की अलग-अलग रणनीति बन गई है।

विधानसभा के सत्र में जहां कांग्रेस पहले राज्यपाल का अभिभाषण कराने को लेकर रणनीति बना रही है तो वहीं दूसरी तरफ भाजपा की योजना यह है कि विधानसभा में पहले फ्लोर टेस्ट हो। क्योंकि फिलहाल की स्थिति को देखें तो आंकड़ों के हिसाब से मध्यप्रदेश में भाजपा के पक्ष में ज्यादा विधायक दिखाई दे रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ भाजपा में जाने के साथ ही बीजेपी को एक के साथ 22 विधायक फ्री में मिल गए हैं।

इन 22 विधायकों का भाजपा पूरा उपयोग करना चाहती है। हालांकि, दल-बदल कानून के तहत कांग्रेस के बागी बने 22 विधायकों को सदस्यता जानी तय है। जबकि कॉन्ग्रेस उन्हें अपने पाले में लाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अगर अपने 22 विधायकों को घर वापसी में कामयाब नहीं होती है तो ऐसे में वह विधानसभा सत्र के दौरान बड़ा खेल खेल सकती है।

चर्चा है कि अगर फ्लोर टेस्ट होगा तो कांग्रेस की रणनीति यह है कि वह हार के कगार पर पहुंचने के बाद अपने सभी विधायकों से सदस्यता का इस्तीफा दिलवा देगी। इस तरह विधानसभा तो भंग होगी ही साथ ही कांग्रेस भाजपा की सरकार को न बनने देने में कामयाब जरूर होगी। इसके बाद मध्यप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा। राष्ट्रपति शासन कितने दिन तक रहेगा और उसके बाद मध्यावधि चुनाव कब होंगे यह तो समय ही बताएगा।

कहा जा रहा है कि भाजपा की पूरी रणनीति राज्यपाल के अभिभाषण के पहले ही फ्लोर टेस्ट कराने पर टिकी है। भाजपा राज्यपाल लालजी टंडन से इसकी मांग भी करेगी। जबकि दुसरी तरफ भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस सरकार अल्पमत में है, तो फिर अभिभाषण कैसा? भाजपा की चली तो सबसे पहले फ्लोर टेस्ट ही हो सकता है।

अब यदि पहले फ्लोर टेस्ट होता है, तो भाजपा के पास 107 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास सिंधिया खेमे के 22 विधायक हटाकर केवल 92 विधायक हैं। यदि 4 निर्दलीय को भी मिला लें तब भी कांग्रेस के पास 96 विधायक होते हैं। तीन विधायक बसपा-सपा के हैं। यदि उन्हें भी मिला लें, तब भी कांग्रेस के पास अधिकतम 99 विधायक होंगे। इसलिए ऐसे में फ्लोर टेस्ट भाजपा के हक में जा सकता है। इस कारण भाजपा पहले फ्लोर टेस्ट चाहती है।

वही दूसरी तरफ कांग्रेस की पूरी रणनीति सदन में पहले राज्यपाल का अभिभाषण करने पर टिकी है। सरकार होने के कारण विधानसभा अध्यक्ष के निर्देश पर इसकी तैयारी भी शुरू हो गई है। विधानसभा सचिवालय पहले अभिभाषण के लिए तैयारी कर रहा है। कांग्रेस की रणनीति है कि यदि पहले राज्यपाल का अभिभाषण होगा तो फ्लोर टेस्ट के पहले ही उसे अपने दांव खेलने का मौका मिलेगा।

अभिभाषण के पहले उस दौरान या बाद में भाजपा का कोई भी हंगामा होता है या कांग्रेस हंगामा कराती है तो भाजपा विधायकों को निलंबित करने का अधिकार विधानसभा अध्यक्ष के पास रहता है। विधानसभा अध्यक्ष इस अधिकार का उपयोग करके भाजपा विधायकों को निलंबित कर देते हैं तो संख्या बल का पूरा गणित बदल जाएगा। एक दर्जन विधायक यदि निलंबित हो गए तो फ्लोर टेस्ट में कांग्रेस पास हो जाएगी। गौरतलब है कि कर्नाटक में यह दांव सत्तारूढ़ दल के लिए फायदेमंद साबित हो चुका है। इसलिए यहां भाजपा को भी इसी दांव का खौफ है।

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