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क्या पंजाब कांग्रेस के पंचों को एक मंच पर ला पायेंगे नए सरपंच हरीश रावत

केंद्र सरकार के नए किसान बिलो के विरोध में मौन धारण करके विरोध प्रदर्शन कर रहे उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत पर अब सबकी नजर है। खासकर पंजाब कांग्रेस के सरदारों की। वह सरदार जो कभी पंजाब कांग्रेस का अहम हिस्सा हुआ करतें थे। लेकिन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के तानाशाहीपूर्ण रवैये के चलते आज वह सरदार हाशिए पर हैं। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के पंजाब प्रांत का प्रभारी बनने के बाद अब हाशिए पर पडे सरदारों को नई उम्मीद जगी है। ऐसे में पंजाब कांग्रेस के कभी पंच रहे यह सरदार फिर से पार्टी की मुख्यधारा में सक्रिय हो सकते है।
गौरतलब है कि पंजाब कांग्रेस में उत्तराखंड की तरह ही कई धड़े बने हुए हैं। जिसमें फिलहाल सबसे मजबूत धड़ा मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह का माना जा रहा है । यही वजह है कि अमरिंदर सिंह की मजबूती के चलते नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेता रहस्यमय चुप्पी साधे हुए हैं । एक तरह से कहा जाए तो वह पंजाब कांग्रेस में नेपथ्य  में चले गए हैं ।
नवजोत सिंह सिद्धू कभी कांग्रेस में पंजाब की रीड कहे जाते थे। लेकिन आजकल वह एक निष्क्रिय नेता के रूप में जाने जाते हैं । कारण यह है कि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से उनकी नहीं पटती है । कहने को तो वह पंजाब प्रांत के ऊर्जा मंत्री है। लेकिन पिछले दो साल के कार्यकाल में शायद ही वह कभी ऊर्जा मंत्रालय के कार्यालय में गए हो।
पिछले साल कैप्टन से मनमुटाव के बाद जुलाई में कैबिनेट मंत्री का पद छोड़ने के बाद सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए हुए नवजोत सिद्धू अचानक कृषि विधेयकों के खिलाफ खुलकर किसानों के पक्ष में उतर आए हैं। यह भी पता चला है कि हरीश रावत अपने पंजाब दौरे के दौरान नवजोत सिद्धू से भी मिलेंगे। सिद्धू के अचानक सक्रिय होने और हरीश रावत के उनके प्रति रुख को एक ही रणनीति की कड़ियों के रूप में देखा जा रहा है।
कहा जाने लगा है कि जब से पंजाब के प्रभारी हरीश रावत बने हैं , तब से नवजोत सिंह सिद्धू में ऊर्जा का संचार हुआ है। अब तक केंद्र सरकार के खिलाफ चुप रहने वाले सिद्धू किसान बिलों के विरोध में जमकर खड़े हो गए हैं । सिद्धू की यह सक्रियता कई मायनों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि इसके पीछे हरीश रावत जैसे सौम्य और सहनशील नेता का उनको आगे करने का संकेत देना है।
हालांकि हरीश रावत को पंजाब का प्रभारी बने हुए एक सप्ताह से ज्यादा हो चुका है। लेकिन अभी तक वह पंजाब नहीं गए हैं।  लोग कह रहे हैं कि पंजाब से ज्यादा चिंता उन्हें अपने गृह प्रदेश उत्तराखंड की है।  जहां वह 2022 में प्रदेश का नेतृत्व संभालने के लिए सक्रिय है। इस दौरान उन्होंने  उत्तराखंड की स्थाई राजधानी देहरादून में 18 सितंबर को दो घंटे का मौन धारण करके केंद्र सरकार का विरोध किया हैं । इस मौन प्रदर्शन के बाद अब उनका कदम पंजाब की तरफ होगा । कांग्रेस को उम्मीद है कि अलग-थलग पड़ी पंजाब कांग्रेस में एका करने के लिए रावत पूरी जान लगा देंगे ।
कहा जा रहा है कि इसके लिए रावत सबसे पहले नवजोत सिंह सिद्धू को सक्रिय कर उन्हें महत्व देने के मूड में हैं। इसके पीछे वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव है। पिछले 3 साल के कार्यकाल में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह से नाराज होने वाले नवजोत सिंह सिद्धू अकेले नेता नहीं है। बल्कि इसके साथ ही पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा और शमशेर सिंह दूलो का एक गुट भी है।
गौरतलब है कि पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार की कार्यप्रणाली पर जो कांग्रेस नेता सबसे ज्यादा सवालिया निशान लगाते हैं, उनमें पहले नंबर पर प्रताप सिंह बाजवा है। प्रताप सिंह बाजवा पूर्व में पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं । लेकिन वर्तमान में वह मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के सताए हुए नेता के तौर पर चर्चित हैं। बाजवा अपनी ही सरकार के खिलाफ समय-समय पर उंगली उठाते रहते हैं। इसके अलावा शमशेर सिंह दूलो भी कांग्रेस के एक बड़े नेता है। इन सभी नेताओं को एक मंच पर लाने की जिम्मेदारी नए प्रभारी हरीश रावत की होगी । क्योंकि हरीश रावत एक खाटी नेता है। वह बखूबी जानते हैं कि विरोधियों को एक मंच पर कैसे लाया जा सकता है । 40 साल की राजनीति का अनुभव हरीश रावत प्लस प्वाइंट रहा है।
कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार की कार्य प्रणाली पर लगातार उंगली उठाने वाले पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा और शमशेर सिंह दूलो से भी हरीश रावत की मुलाकात होना तय है। यह मुलाकात भी ऐसे समय होगी जब सुनील जाखड़ के नेतृत्व में पंजाब कांग्रेस ने पार्टी आलाकमान से बाजवा और दूलो को पार्टी से हटाए जाने का आग्रह किया हुआ है। इस तरह देखा जाए तो कैप्टन समर्थक जहां बाजवा व दूलो को हटाने की मांग उठा रहे हैं, वहीं हरीश रावत इन दोनों वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से जोड़े रखने के लिए दांवपेंच आजमाएगे। कहा भी जानें लगा है कि हरीश रावत पंजाब कांग्रेस को तोड़ने नही बल्कि जोडने का काम करेंगे।

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