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राजकुमार भाटी की ‘दिल की आवाज’ सुनकर जागेगा जनता का जमीर?

“उनकी आवाज जो बोलते नहीं”। देहात मोर्चा का यह स्लोगन आज से दो दशक पहले हर किसी की जुबान पर था। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश और यहां के जिला गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद में तो मोर्चा दबे कुचले और मुजलिमो की आवाज बन गया था। इसका ही असर था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग हर शोषण, भ्रष्टाचार और जुल्मों सितम के खिलाफ हल्ला बोल देते थे। क्योंकि तब इन लोगों के पीछे देहात मोर्चा हुआ करता था।

तब देहात मोर्चा के “थिंकटैंक” हुआ करते थे राजकुमार भाटी। राजकुमार भाटी देहात मोर्चा में रहकर आंदोलन का पर्याय बन गए थे। सत्ता प्रतिष्ठान के खिलाफ जब भी कोई आवाज उठती तो उस आवाज को बुलंद करने वाले भाटी ही होते थे।

दादरी के विधायक रहे पश्चिम उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेता महेंद्र भाटी के प्रिय शिष्य रहे राजकुमार भाटी चाहते थे कि यह आवाज लखनऊ विधानसभा में गूंजे। इसके चलते ही वह तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़े। लेकिन दादरी क्षेत्र की जनता ने उन्हें नकार दिया।

 

जनता द्वारा बार – बार नकार दिए जाने के चलते वह आंदोलन आदि से दूरी बनाकर टीवी चैनल की डिबेट में रच बस गए। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उनकी इस प्रतिभा को पहचान कर उन्हें पार्टी का प्रवक्ता बना दिया। अपने तथ्यात्मक विवरण और तीखे तेवर से डिबेट में वह विपक्षियों को परास्त करते हुए नजर आते हैं।

एक बार फिर वह नए जोश में पूरे होश के साथ ‘पथिक विचार केंद्र’ के जरिए पुराने लिबास में आ रहे हैं। धीरे-धीरे वह फिर से जनता के दिलों दिमाग में छा रहे हैं इसी दौरान उनके द्वारा लिखा हुआ एक गीत “अखिलेश आ रहे हैं” बहुत चर्चित हुआ है। एक आंदोलनकारी नेता, पत्रकार और प्रोफेसर अब गीतकार के रूप में सामने आए हैं। इसके चलते ही कुछ लोगों को भाटी से जलन हो उठी है। वह भाटी के प्रति राजनीतिक द्वेष भाव फैला रहे हैं। इसके मद्देनजर राजकुमार भाटी ने अपने ‘दिल की बात’ कुछ यूं बयां की है –

 

 

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शानदार नेता और दादरी क्षेत्र के लोकप्रिय व बहुचर्चित विधायक स्व. महेंद्र सिंह भाटी के आखिरी दो-तीन वर्षों में मै बहुत अधिक उनके सानिध्य में रहा था l स्वाभिमान, जनसेवा और संघर्ष की राजनीतिक शैली मैंने उन्ही से सीखी l 1992 में भाटी जी की दुःखद हत्या के बाद इस क्षेत्र में राजनीतिक शून्यता की स्थति पैदा हो गईं थी l मुझे लगा कि इस शून्यता को समाप्त करने के लिए कुछ करना चाहिए l इसी सोच के तहत मैंने 1995 में देहात मोर्चा का गठन कर फिर से संघर्ष की राजनीती का प्रारम्भ किया l

हमारे क्षेत्र में नेताओं की संख्या बहुत थी किन्तु संघर्ष की राजनीती का अभाव था l लोग धन कमाकर, चापलूसी करके और पैर छूकर राजनीती में आगे बढ़ना चाहते थे l इनसे अलग हटकर मैंने संघर्ष की राजनीती का रास्ता चुना जोकि कठिन तो होना ही था l

मैंने क्षेत्र में दर्जनों सफल आंदोलन किये l इनमें 19 बार मै जेल गया l दसियों मुकदमे झेले l आर्थिक अभाव झेले l किन्तु कभी सिद्धांतो से समझौता नही किया l मैंने कोई आंदोलन बीच में नही छोड़ा और जितने आंदोलन किये उनसे क्षेत्र को सीधे सीधे लाभ हुए l

 

मेरी बढ़ती लोकप्रियता से उन लोगों को चिंता होनी ही थी जो सुविधाभोगी राजनीती कर रहे थे l वैध अवैध श्रोतो से पांच वर्ष तक धन इकट्ठा करो, थैली देकर या पैर छूकर टिकट हासिल करो और चुनाव में शराब व रूपये बांटकर जीत जाओ l इससे ज्यादा आसान और आरामदायक रास्ता क्या हो सकता था? संघर्ष की राजनीती में तो सड़क पर बैठना पड़ता है, पुलिस की लाठियां खानी पड़ती हैं, जेल जाना पड़ता है l

जो संघर्ष के रास्ते में मेरा मुकाबला नही कर सकते थे उन्होंने मुझे परास्त करने का दूसरा रास्ता निकाला l वे आरोप लगाने लगे कि राजकुमार तो पैसे के लिए आंदोलन करता है और पैसा लेकर आंदोलन समाप्त कर देता है l मेरे हर आंदोलन के बाद इस तरह के आरोप हवा में उड़ाये जाते l मैंने कभी इनकी परवाह इसलिए नही की और सफाई इसलिए नही दी कि मुझे अपनी ईमानदारी पर गर्व था और ईमानदारी की ताकत पर भरोसा था l लेकिन आज मुझे लगता है कि मेरे चुप रहने से मुझे नुकसान हुआ l आरोप लगाने वालों के हौसले बढ़ते गए और वे इन्हें और फैलाते गए l इसलिए आज पहली बार मैं इन आरोपों पर बोलने के लिए विवश हुआ हूं l

 

 

 

जो लोग ईर्ष्या वश और राजनीतिक प्रतिद्वंदिता में आरोप लगाते हैं उनकी मुझे कतई परवाह नहीं किंतु जब कोई आम आदमी इनके बहकावे में आकर मुझ पर उंगली उठाता है तो मुझे बहुत पीड़ा होती है l मैंने मान सम्मान और पहचान के अलावा राजनीती से अभी तक कुछ और हासिल नही किया है l धन दौलत तो बिलकुल भी नही l मेरा पूरा संघर्ष क्षेत्र के मान सम्मान, पहचान और अधिकारों के लिए रहा है l मुझ पर आरोप लगाकर आप सिर्फ मेरा नही उस संघर्ष का रास्ता भी रोकते हैं l इसलिए कृपया गंभीरता से सोचना कि मेरा विरोध करके आप कहीं अपने बच्चों के भविष्य निर्माण की लड़ाई को ही तो कमजोर नही कर रहे हैं l

मैंने संघर्ष के बल पर यहां की बहुराष्ट्रीय कम्पनियों होंडा, एल. जी., न्यू हालैंड, मोजर बेयर मे करीब दो हजार स्थानीय युवाओं को रोजगार दिलाया l कोई एक लड़का ढूंढ़कर ला सकता है जो यह कह दे कि उसने नौकरी के लिए पैसे दिये l

 

 

जब मै दो हजार लड़कों को नौकरी दिला सकता था तो किसी कम्पनी मे ठेका भी ले सकता था जैसे कि कई नेताओं ने ले रखे हैं l क्या कोई ढूंढ़कर बता सकता है कि मेरा किसी कम्पनी में ठेका हो l फिर आप इन झूठे आरोपों पर गौर क्यों करते हैं?

संघर्ष के बल पर स्कूल कालेजों में सैंकड़ो बच्चों के दाखिले कराये l क्या इसके लिए हमें किसी ने पैसे दिये?

देहात मोर्चा से पहले नोएडा के गाँवो मे आये दिन बुलडोजर चलते थे l सौ सौ साल पुरानी आबादी बिना नोटिस दिये गिरा दी जाती थीं l वहां बुलडोजर को रोकने का काम केवल देहात मोर्चा ने किया l बरौला की कश्यप बस्ती को बचाने के लिए हमें तीन बार जेल जाना पड़ा l पुलिस की लाठियां खानी पड़ी l लेकिन वह बस्ती अपनी जगह क़ायम है l सोचो, क्या इसके बदले हमें किसी ने पैसे दिये होंगे?

 

नोएडा के बरौला, निठारी, गिझोड़, सदरपुर, छलेरा में हजारों करोड़ मूल्य की किसानो की जमीन हमारे कारण बची l क्या आपको लगता है कि इसके लिए हमें किसी से पैसे मिले होंगे?

अपने लोगों के मान सम्मान की खातिर रिश्वतखोरी पर अंकुश लगाने के लिए हमने दो रिश्वतखोर अधिकारीयों के मुंह काले कर दिये थे जिसके बदले हमें एक सप्ताह जेल मे रहना पड़ा l क्या इस काम के लिए हमें पैसे मिले थे l

 

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गोल्फ कोर्स मे ठेकेदारी मे काम करने वाले करीब 300 लड़के जिन्हे न्यूनतम वेतन तक नही मिलता था उनकी यूनियन बनवाकर लड़ाई लड़ी l उन्हें स्थाई कराया l न्यूनतम वेतन व अन्य सुविधाएं दिलवाई l स्थाई होते ही उन्होंने अपनी यूनियन हमसे अलग कर ली l बाद में वह कम्पनी भाग गईं और गोल्फ को जेपी ने खरीद लिया l क्या इसके लिए हम जिम्मेदार हैं?

बझेड़ा के किसान आंदोलन मे वहां के किसानो का पूरी निष्ठा से साथ दिया l जेल गए, पुलिस उत्पीड़न झेला किन्तु किसानों का साथ नही छोड़ा l लड़ाई जीती ओर किसानो की जमीन उन्हें वापस मिल गईं l क्या उस कम्पनी ने हमें पैसे दिये होंगे जो हमारी वजह से बर्बाद हो गई?

रिश्वतखोर व भ्रष्ट पुलिस वालों के खिलाफ थानो के घेराव कर दर्जनों पुलिस वालों को सस्पेंड व लाइन हाजिर कराया l क्या इसके लिए कहीं से पैसे मिले?

 

समाजवादी पार्टी में शामिल होकर भी मैंने तो समाज की पहचान और मान सम्मान बढ़ाने का काम ही किया l मुख्यमंत्री माननीय श्री अखिलेश यादव जी से विजय सिंह पथिक स्टेडियम और मिहिर भोज पार्क का नामकरण कराया l क्या इसके लिए मुझे कहीं से पैसे मिले होंगे?

मुद्दों से भटक चुकी जिले की राजनीती को एक बार पुन: मुद्दों और एजेंडा पर लाने की कोशिश कर रहा हूं l क्या इस कार्य के लिए कोई पैसे दे जायेगा?

 

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मैने कुछ दिन के लिए संघर्ष विराम कर दिया था तो हालत यह हो गईं कि कम्पनियो के गेट पर बोर्ड लग गए कि 200 किमी तक के व्यक्ति को नौकरी नही दी जाएगी l क्या आरोप लगाने वाले इन फर्जी नेताओं में से एक भी बोला कि ऐसा अन्याय हम क्षेत्र के साथ नही होने देंगे?

क्या किसी एमएलए एमपी ने आवाज उठाई? मैंने पथिक विचार केंद्र के माध्यम से आवाज उठानी शुरू की है तो बिलों से निकलकर फिर आ गए हैं झूठे आरोप लगाने l यदि आप क्षेत्र के सच्चे शुभचिंतक हैं और चाहते हैं कि अधिकारों की लड़ाई शुरू हो तो इन फर्जी लोगों को मुहतोड़ जवाब दो और पथिक विचार केंद्र का साथ देकर इस लड़ाई को मजबूत करो l

यश वैभव सुख की चाह नही,
परवाह नही जीवन न रहे l
यदि इच्छा है तो यह है जग में,
स्वेच्छाचार दमन न रहे l

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