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क्या गुल खिलाएगी जयंत – चंद्रशेखर की जोड़ी

ऐसे में जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव निपट चुके हैं। सूबे में योगी की सरकार – टू बन चुकी है। तब भीम आर्मी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और आजाद समाज पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण सक्रिय हो उठे हैं । वह राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी से मिले। दोनों की मुलाकात को सियासी नफा नुकसान से जोड़कर देखा जा रहा है।
 हालाकि यूपी में अब 2024 से पहले इनके लिए कुछ बचा नहीं है।  2024 में लोकसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट और जाटवो का गठबंधन नए राजनीतिक परिदृश्य पैदा कर सकता है।
 जिस तरह से इस विधानसभा चुनाव में दलितों की मसीहा कहीं जाने वाली पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को इस समाज के मतदाताओं ने  अस्वीकार किया है उससे चंद्रशेखर को दलितों में पैठ बनाने की संभावनाएं नजर आ रही है।
 हालांकि चंद्रशेखर के इस विधानसभा चुनाव का आकलन करें तो वह दलितों का एक परसेंट वोट भी नहीं ले पाए।  गौरतलब है कि चंद्रशेखर आजाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने गोरखपुर शहर में चुनाव लड़े थे। सहारनपुर से जाकर गोरखपुर चुनाव लड़ने के पीछे उनका क्या मकसद था यह तो समझ से परे था। लेकिन जिस तरह गए वहां जाकर अपनी जमानत गवा बैठे वह राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया।
 इस विधानसभा क्षेत्र में चुनाव लड़ने से पहले ही चंद्रशेखर आजाद ने कहा था कि गोरखपुर की जनता 1971 के इतिहास को दोहराएगी। उन्होंने यह बयान इस संदर्भ में दिया था कि 1971 में कांग्रेस नेता त्रिभुवन नारायण सिंह यहां से हार गए थे।
त्रिभुवन नारायण सिंह को कांग्रेस ने अक्टूबर 1970 में यूपी का मुख्यमंत्री बनाया था। तब वह विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं थे। इसके बाद उपचुनाव हुए। वह गोरखपुर की मणिराम विधानसभा सीट से चुनाव लड़े। लेकिन 1971 के इस चुनाव उपचुनाव में वह हार गए थे।
 चंद्रशेखर आजाद भी कुछ ऐसा ही सपना पाले हुए थे। वह अपरोक्ष रूप से कह रहे थे कि इस बार गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ चुनाव हार जाएंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। योगी यहां से एक लाख से भी ज्यादा मतों से विजयी हुए। उन्होंने अपनी मुख्य प्रतिनिधि सपा की सुभारती उपेंद्र शुक्ला को 1 लाख 2000 वोटों से हराया।
 मजे की बात यह रही कि यहां के मतदाताओं ने चंद्रशेखर आजाद को चौथे स्थान पर पहुंचा दिया । जिस समाज से चंद्रशेखर आजाद आते हैं उनकी भी यहां 50000 वोट हैं।  लेकिन उसका एक परसेंट वोट भी आजाद को नहीं मिला।
 वहीं दूसरी तरफ अगर जयंत चौधरी को देखे तो वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर विधानसभा चुनाव में भाजपा का सफाया करने का दावा कर रहे थे। तब लोगों को इस पर यकीन भी था। इसका कारण था कि किसान आंदोलन की सरजमीं पश्चिम उत्तर प्रदेश ही था।  पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों ने ही भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ था।
 लेकिन चुनाव होने तक भाजपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पासा ही पलट दिया। जो मतदाता खासकर जाट उनके खिलाफ था उसे भाजपा ने अपने पक्ष में कर लिया और इस तरह राष्ट्रीय लोक दल को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में महज 8 सीटों पर ही सिमटा दिया।
 विधानसभा चुनाव के बाद चंद्रशेखर आजाद और जयंत चौधरी की मुलाकात के मायने कई निकाले जा रहे हैं । कहा यह भी जा रहा है कि दोनों राजस्थान में 2 साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर गठबंधन बना रहे हैं। यहां जाट और जाटव मिलकर अच्छा समीकरण बना सकते हैं। इसके मद्देनजर ही दोनों 3 अप्रैल को राजस्थान में पहुंचे थे। मामला था जितेंद्र मेघवाल हत्याकांड की जांच कराने का।
 पिछले विधानसभा चुनाव में जाटों के बल पर मायावती ने राजस्थान में सात विधानसभा सीट जीती थी। हालांकि यह सातों विधायक बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। इसके मद्देनजर ही चंद्रशेखर आजाद अब राजस्थान में दलितों को अपने पाले में लाने का ख्वाब पाले हुए हैं।
इसी के साथ ही चंद्रशेखर आजाद जयंत चौधरी को लेकर जाट और जाटव का गठबंधन बनाने की तैयारी में जुटे हुए हैं। हालांकि यूपी विधानसभा चुनाव में चंद्रशेखर ने समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन में शामिल होने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन अखिलेश यादव ने उन्हें गठबंधन में शामिल होने के लिए सहमति नहीं दी थी।
 फिलहाल, देखना यह होगा कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में फ्लॉप हो चुके चंद्रशेखर और जाटों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरे जयंत चौधरी अब किस तरह से अपनी राजनीतिक नैया को आगे बढ़ाते हैं।

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