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क्या खत्म होगा दिग्गी राजा का राजनीतिक वनवास

दिग्गी राजा यानी कि दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के राधौगढ़ राज परिवार से आते हैं। जिनको अभी भी राजा कहा जाता है। वही दिग्विजय सिंह कभी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। तब मध्य प्रदेश के बारे में कहा जाता था कि यह प्रदेश कांग्रेस का गढ़ होता था।
हालत यह थी कि 12 जनवरी 1998 को बेतूल गोलीकांड में 19 लोगों की मौत के बाद भी दिग्विजय सिंह दोबारा से जीत गए थे। तब दिग्गी राजा का जादू जनता के सर चढ़कर बोलता था। हालांकि 1993 से 2003 तक मुख्यमंत्री रहने के बाद वह फिर से मध्य प्रदेश के सीएम नहीं बन सके।
इसके बाद एक समय ऐसा आया जब वह न‌केवल सत्ता से दूर हुए बल्कि कांग्रेस के राजनीतिक केंद्र 10 जनपथ से भी दूरी उनकी मजबूरी बन गई । पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे तब उन्हें अपने सत्ता बल और राजनीतिक पैंतरों पर इतना यकीन था कि उन्होंने कह दिया था कि 2003 में भी फिर से कांग्रेस की सरकार बनेगी। साथ ही उन्होंने कहा था कि अगर मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं बनी तो वह 10 साल तक राजनीति से दूर रहेंगे।
यानी उनका अपने ही ग्रह प्रदेश से वनवास होगा।उनका यह वनवास हुआ। वह कांग्रेस की केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो गए। उनकी केंद्र में सक्रियता कांग्रेस के लिए दिनोंदिन विवाद का विषय बनती गई। कारण था दिग्विजय सिंह आए दिन किसी ना किसी विषय पर विवादास्पद बयान देकर पार्टी की जगह भदद पिटवाते रहते।
 इसके बाद एक बार फिर 2017 में दिग्विजय सिंह का राजनीतिक वनवास हुआ। तब उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव पद से इस्तीफा दिया‌ इसके बाद वह 10 जनपद से दूर हो गए।
 तब वह गोवा के प्रभारी थे। राष्ट्रीय महासचिव से दिग्विजय सिंह का इस्तीफा देने का कारण बना कांग्रेस की गोवा में हार। गोवा में सरकार न बनने का कारण मानते हुए दिग्विजय सिंह ने इस्तीफा दिया। इसी के बाद से ही दिग्विजय सिंह कांग्रेस के किसी भी बड़े फैसले में शामिल नहीं रहे।
10 जनपद से दूरी का मतलब कांग्रेस के नेताओं को दरकिनार करना होता है । राजनीतिक पंडित अच्छी तरह जानते हैं कि अगर देश में कांग्रेस की राजनीति करनी है तो दस जनपथ का आशीर्वाद होना जरूरी है। पिछले 5 साल से दिग्विजय सिंह को यह आशीर्वाद नहीं मिल रहा था। लेकिन अचानक उन पर 10 जनपद की महर दिखाई दे रही है।
 दिग्विजय सिंह को 10 जनपथ से आखिर बुलावा आ गया। हालांकि उन्हें आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हो रही पीके यानि प्रशांत किशोर के प्लान प्रशांत से उनके विचार जानना है ।
ऐसे में जब कॉन्ग्रेस अहमद पटेल के निधन के बाद और जी 23 गुट बनने के बाद अपने विश्वासपात्रो की कमी महसूस कर रही है ऐसे में कांग्रेस हाईकमान के पास पुराने और भरोसेमंद नेताओं की कमी है। बहरहाल, इसका फायदा दिग्विजय सिंह को मिलता दिख रहा है।

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