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उपचुनाव में परखी जाएगी हैसियत

विधायकों के सांसद बन जाने के बाद से यूपी की एक दर्जन सीटों पर उप चुनाव होने हैं। लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद से भाजपा के हौसले बुलन्द हैं तो दूसरी ओर सपा और बसपा ने भी उपचुनाव के लिए कमर कस ली है। उप चुनाव में सपा-बसपा की यह जंग भाजपा के खिलाफ नहीं बल्कि एक-दूसरे के खिलाफ ही होने वाली है। उपचुनाव के नतीजे ही तय करेंगे कि मायावती जो आरोप लगा रही हैं वह सही हैं या फिर सपा ने बसपा के साथ दोस्ती करके गलती की। इस उपचुनाव को दोनों ही पार्टियां ग्रांड रिहर्सल के तौर पर लडेंगी ताकि भविष्य में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप से बचा जा सके। वैसे भी मायावती ने मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के तहत भले ही सपा के खिलाफ जहर उगलना शुरु कर दिया हो लेकिन सपा की तरफ से अभी तक ऐसी कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की गयी है जिससे दोनों दलों के बीच ही आंशिक दूरियां खाई में तब्दील हों। जाहिर है कि सपा प्रमुख अखिलेश यादव वक्त की नजाकत को भांप चुके हैं और चुप्पी साधकर वक्त का इंतजार कर रहे हैं। उपचुनाव नतीजों के बाद ही वे अपने तरकस से तीरों की दिशा तय करेंगे कि आखिर इन तीरों को किस प्रकार से और किस पर इस्तेमाल किया जाए।
ज्ञात हो लोकसभा चुनाव परिणाम आने के छह माह के भीतर उप चुनाव कराए जाने हैं। हालांकि अभी तक चुनाव आयोग की तरफ से तारीख की घोषणा नहीं की गयी है लेकिन राजनीतिक दलों ने जिस तरीके से तैयारियों को अंजाम देना शुरु किया है उससे तो यही लगता है कि जल्द ही उप चुनाव सम्पन्न करा दिए जायेंगे। इस उप चुनाव में सपा-बसपा के साथ ही भाजपा भी अपना दमखम दिखायेगी। भाजपा ने भी अपनी तैयारियों को अमल में लाना अभी से शुरु कर दिया है। रही बात कांग्रेस की तो पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी यूपी में पार्टी की बुरी दशा से हतोत्साहित नजर नहीं आ रहीं। उप चुनाव के लिए उनका जोश देखते बनता है। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से मीटिंग के दौर इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी हैं कि प्रियंका गांधी ने पार्टी की हार से सबक लेकर आवश्यक कदम उठाने शुरु कर दिए हैं।
इधर खासतौर से सम्मान की लड़ाई के लिए सपा ने अपनी रणनीतियों में काफी बदलाव किए हैं। प्रथम तो वह बिना किसी दल के साथ समझौता किए मैदान में उतरेगी। रही बात रणनीति की तो इस उप चुनाव में रणनीति अखिलेश की नहीं बल्कि सपा के भीष्म पितामह मुलायम सिंह यादव की लागू की जायेगी।
मुलायम की नीतियों का अनुसरण करते हुए सपा एक बार फिर से मुस्लिम तुष्टिकरण नीति के आधार पर ही चुनाव मैदान में उतरेगी, यानि उपचुनाव में अपनी हैसियत दिखाने के लिए एक बार फिर से हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगला जायेगा। दलितों की बात तो होगी लेकिन भाव कम ही दिया जायेगा। टिकट भी मुसलमानों को अधिक दिए जाने की बात कही जा रही है। मुल्ला-मौलवियों के साथ ही धर्मगुरुओं को भी मनाए जाने की प्रक्रिया जल्द प्रारम्भ होगी। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की फौज में भी अधिक से अधिक मुसलमानों की भर्ती किए जाने के संकेत मिलने लगे हैं। स्पष्ट है कि सपा इस उपचुनाव को किसी प्रकार से हल्के में नहीं लेना चाहती। सपा नेताओं का भी मानना है कि ये उप चुनाव ही आगामी विधानसभा चुनाव की दशा-दिशा तय कर देंगे। यदि मुसलमानों का साथ रंग लाया तो निश्चित तौर पर वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव भी मुलायम की मुस्लिम रणनीति के आधार पर ही लड़ा जाना है। यदि सपा को उप चुनाव में सफलता मिलती है तो बसपा के खिलाफ सपा प्रमुख को अपनी भड़ास निकालने का अवसर भी मिल जायेगा जो अभी तक उनके भीतर ही दबी हुई है। रही बात शिवपाल यादव की तो अभी उनकी इंट्री के कोई संकेत नहीं हैं। यदि सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो निश्चित तौर पर पार्टी अपनी इसी रणनीति के साथ ही शिवपाल को भी अपने साथ लेकर चलेगी। शर्त क्या होगी? प्रसपा की क्या भूमिका होगी? शिवपाल की पार्टी में हैसियत क्या होगी? ये चन्द सवाल ऐसे हैं जिनका उत्तर उपचुनाव के नतीजे ही तय करेंगे।
जिन दर्जन भर सीटों पर उपचुनाव होने हैं उनमें से रामपुर और अम्बेडकरनगर सीट को छोड़कर समस्त सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों ने ही बाजी मारी है। ज्ञात हो यूपी के प्रतापगढ़, हमीरपुर, रामपुर, जलालपुर, इगलास, जैतपुर, मानिकपुर, लखनऊ कैण्ट, फिरोजाबाद, गोविन्दनगर कानपुर, सहित दर्जन भी सीटों पर उपचुनाव होने हैं।
स्पष्ट है कि मान-मर्यादा से जुड़े होने के कारण इन उपचुनावों को मुख्य चुनाव की भांति ही लड़ा जाना है जिसमें सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपना दम-खम दिखायेंगे।

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