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पीएम केयर फंड इतने विवादों में क्यों?

देश में कोरोना कहर से जब पहली बार यकायक लाॅकडाउन की घोषणा हुई तब सबसे ज्यादा किसी वर्ग को नुकसान हुआ तो वे थे मजदूर। मजदूरों ने कई दिनों तक सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय की। उनमें कई बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे आदि थे। कितनी मौतें हुईं, पूरे देश ने भूख से चीखती आवाजें सुनी, भूख से हाहाकार मची थी। इसी दौरान 27 मार्च 2020 को ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ के भी गठन की घोषणा हुई, जबकि पहले से ही मौजूद थे ‘पीएम नेशनल रिलीफ फंड’ उसे दरकिार कर नए ‘पीएम केयर्स फंड’ बना। जिसमें दानवीरों ने जमकर जन सेवा में करोड़ों रुपए जमा किए। लेकिन ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ सुर्खियों में जितनी तेजी से आया उतनी ही तेजी से उसकी पारदर्शिता भी गायब होने लगी। कई मीडिया संस्थानों ने सूचना अधिकार के तहत जब इस बाबत जानकारी मांगी गई तो उसमें भी टाल-मटोल कर दिया गया। जिस दिन पीएम केयर्स फंड का गठन हुआ था, उसी दिन भारत में एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया था। पहले तो ये माना गया कि सरकार इस फंड की कुछ राशि उन लोगों पर खर्च करेगी, जो शहर से पलायन करने को मजबूर हो गए थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी वजह से एक विपक्षी सांसद ने तो पीएम केयर्स फंड के बारे में यहां तक कह दिया कि पीएम वास्तव में केयर नहीं करते

 

देश में कोरोना कहर की वजह से जब पहली बार यकायक लाॅकडाउन की घोषणा हुई तब सबसे ज्यादा किसी वर्ग को नुकसान हुआ तो वे थे मजदूर। मजदूरों ने कई दिनों तक सैकड़ों मील की दूरी तय की। उनमें कई बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे आदि थे। इन मजदूरों में कई ऐसे परिवार थे जो काफी गरीब थे। कितनी मौतें हुईं, पूरे देश ने भूख से चीखती आवाजें सुनी, खून से लाचारी, हाहाकार कर रही थी। उन चित्कारों की भी तस्वीरें हमने पूरी बेशर्मी से देखी जिसमें गर्भवती महिलाएं चिलचिलाती धूप में सिर पर बोझा लादे, अपने पति के पीछे-पीछे हिम्मत बांधे, घर की ओर बढ़ा रही थीं। बहुत से लोगों ने लंबी-लंबी दूरियां पैदल तय की, कुछ हार गए। इस दौरान 100 से ज्यादा मजदूरों की जान चली गई।

उसी बीच 27 मार्च 2020 को ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ के भी गठन की घोषणा हुई, दानवीरों ने जमकर जन सेवा में करोड़ों रुपये जुटाए। लेकिन ‘प्रधानमंत्री केयर्स फंड’ सुर्खियों में जितनी तेजी से आया उतनी ही तेजी से उसकी पारदर्शिता भी गायब होने लगी। कई मीडिया संस्थानों ने सूचना अधिकार के तहत जब इस बाबत जानकारी मांगी गई तो उसमें भी टाल-मटोल कर दिया गया।

जिस दिन पीएम केयर्स फंड का गठन हुआ था, उसी दिन भारत में एक बड़ा मानवीय संकट पैदा हो गया था। पहले तो ये माना गया कि सरकार इस फंड की कुछ राशि उन लोगों पर खर्च करेगी, जो शहर से पलायन करने को मजबूर हो गए थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसी वजह से एक विपक्षी सांसद ने तो पीएम केयर्स फंड के बारे में यहां तक कह दिया कि पीएम वास्तव में केयर नहीं करते।

फिलहाल सरकार की दिन-प्रतिदिन नई घोषणाएं हो रही हैं। आॅक्सीजन एक्सप्रेस ट्रेन चलाने, वायु सेना की ओर से आॅक्सीजन टैंकर एयरलिफ्ट किए जाने के बाद अब देशभर के जिला मुख्यालयों पर सरकारी अस्पतालों में आॅक्सीजन जनरेशन प्लांट होंगे। पीएम केयर्स फंड से 551 अस्पतालों में आॅक्सीजन जनरेशन प्लांट्स लगाए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बाबत कहा है कि इन प्लांट्स को जल्द से जल्द शुरू कराया जाएगा।
इन आॅक्सीजन जनरेशन प्लांट्स से जिले के अस्पतालों में आॅक्सीजन की अबाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी। पीएम केयर्स फंड की ओर से इन आॅक्सीजन जनरेशन प्लांट्स की स्थापना के लिए धनराशि आवंटित करने को सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई है।

पीएम केयर्स फंड क्यों?

हाल ही में आईपीएल 2021 में कोलकाता नाइट राइडर्स की ओर से खेल रहे आॅस्ट्रेलियाई तेज गेंदबाज पैट कमिन्स इस नेक काम के लिए आगे आए हैं। कमिंस ने भारतीय अस्पतालों में आॅक्सीजन की आपूर्ति के लिए ‘पीएम केयर्स फंड’ में 50000 डाॅलर यानी करीब 37 लाख रुपए दिए हैं। कमिंस ने ये मिसाल ऐसे वक्त पर पेश की है जब कई खिलाड़ी आईपीएल छोड़कर जाने की तैयारी में हैं।

पीएम केयर्स फंड के गठन के कुछ दिनों के अंदर ही ये सवाल भी उठने लगे कि किस तरह इस फंड को बनाया गया है और इसे कैसे मैनेज किया जा रहा है, कितना पैसा अभी तक इकट्ठा हुआ है और ये किसके लिए और कैसे इस्तेमाल होगा? लेकिन पीएम केयर्स की वेबसाइट पर इन सवालों के कोई जवाब नहीं हैं।

इस फंड को मैनेज करने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय ने किसी तरह की सूचना देने से इनकार कर दिया। अब विपक्षी नेता, कई कार्यकर्ता और पत्रकार ये सवाल पूछ रहे हैं कि क्या सरकार कुछ छिपा रही है? पीएम केयर्स फंड शुरू से ही विवादों में रहा है। कई लोगों ने इस पर सवाल उठाया कि जब 1948 से ही पीएम नेशनल रिलीफ फंड (पीएमएनआरएफ) मौजूद है तो नए फंड की क्या आवश्यकता थी?

18 मई 2020 को प्रधानमंत्री के सलाहकार भास्कर कुल्बे ने स्वास्थ्य मंत्रालय को एक चिट्ठी लिखी जिसमें पीएम केयर्स फंड से दो हजार करोड़ की रकम से 50 हजार ‘मेड इन इंडिया’ वेंटिलेटर्स का आॅर्डर दिए जाने की जानकारी दी थी। इसमें एचएलएल ने टेक्निकल फीचर्स की लिस्ट जारी की जो इन वेंटिलेटर में होनी चाहिए। इस लिस्ट को समय-समय पर बदला गया और कुल नौ बार संसोधन किए गए। 18 अप्रैल, 2020 को नौवीं बार कुछ नए फीचर जोड़े गए यानी कंपनियों को दिए गए फीचर्स में बदलाव होता रहा।

सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज की साल 2020 की एक आरटीआई पर दिए गए जवाब से पता चला कि सरकारी उद्यम भारत इलेक्ट्राॅनिक्स लिमिटेड (बीईएल) को तीस हजार वेंटिलेटर बनाने का काॅन्ट्रैक्ट मिला है।इसके लिए बीईएल ने मैसूर की कंपनी स्कैनर से मदद ली।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, नोएडा की कंपनी ‘एग्वा हेल्थकेयर’ को दस हजार वेंटिलेटर बनाने का आॅर्डर मिला। इससे पहले एग्वा के पास
वेंटिलेटर बनाने का कोई अनुभव नहीं था। आंध्र प्रदेश सरकार की एक कंपनी ‘आंध्र प्रदेश मेडटेक जोन’ यानी एएमटीजेड को साढ़े तेरह हजार वेंटिलेटर बनाने का आॅर्डर मिला।

 

पीएमओ ने 13 मई 2020 को 3100 करोड़ रुपए के खर्च की जानकारी दी थी। इसके अनुसार, 2 हजार करोड़ रुपए से 50 हजार मेड इन इंडिया वेंटिलेटर खरीदने की बात हुई। उस वक्त देश में सबसे ज्यादा वेंटिलेटर की कमी थी। महामारी से पहले तक हर साल महज 3360 वेंटिलेटर बन रहे थे। पीएम केयर्स के तहत कितने वेंटिलेटर बनाए गए ये जानने के लिए बीबीसी ने आरटीआई के जरिए और मैन्युफैक्चर कंपनियों के मालिकों से बात करके स्थिति का पता लगाने की कोशिश की। 7 सितंबर, 2020 के आरटीआई आवेदन के जवाब में एचएलएल ने बताया कि बीईएल ने 24332, एग्वा ने 5000 और अलाइड मेडिकल ने 350 वेंटिलेटर और बीपीएल ने 13 वेंटिलेटरों की सप्लाई की है। इसके बाद से वेंटिलेटर सप्लाई नहीं किए गए हैं। एक साल बाद 29695 वेंटिलेटरों की सप्लाई हुई है, जबकि जरूरत डेढ़ लाख से अधिक वेंटिलेटरों की थी

गुजरात के राजकोट की कंपनी ज्योति सीएनसी को पांच हजार वेंटिटेलर का ठेका मिला, ये वही कंपनी है जिसके धमन-1 वेंटिलेटर को लेकर अहमदाबाद के डाॅक्टरों ने सवाल खड़े किए थे लेकिन इसके बावजूद कंपनी को आॅर्डर दिया गया। गुरूग्राम की कंपनी अलाइड मेडिकल को 350 मशीनों का आॅर्डर मिला। 7 सितंबर, 2020 के आरटीआई आवेदन के जवाब में एचएलएल ने बताया कि बीईएल ने 24332, एग्वा ने 5000 और अलाइड मेडिकल ने 350 वेंटिलेटर और बीपीएल के 13 वेंटिलेटरों की सप्लाई की है। इसके बाद से वेंटिलेटर सप्लाई नहीं किए गए हैं। एक साल बाद 29695 वेंटिलेटरों की सप्लाई हुई है, जबकि जरूरत डेढ़ लाख से अधिक वेंटिलेटरों की थी। नोएडा की कंपनी एग्वा हेल्थकेयर को दस हजार वेंटिलेटर बनाने का आॅर्डर मिला। इससे पहले एग्वा के पास वेंटिलेटर बनाने का कोई अनुभव नहीं था। आंध्र प्रदेश सरकार की एक कंपनी आंध्र प्रदेश मेडटेक जोन यानी एएमटीजेड को साढ़े तेरह हजार वेंटिलेटर बनाने का आॅर्डर मिला।

गुजरात के राजकोट की कंपनी ‘ज्योति सीएनसी’ को पांच हजार वेंटिटेलर का ठेका मिला, ये वही कंपनी है जिसके धमन-1 वेंटिलेटर को लेकर अहमदाबाद के डाॅक्टरों ने सवाल खड़े किए थे लेकिन इसके बावजूद कंपनी को आॅर्डर दिया गया। गुरूग्राम की कंपनी अलाइड मेडिकल को 350 मशीनों का आॅर्डर मिला। पीएम केयर्स के तहत कितने वेंटिलेटर बनाए गए ये जानने के लिए बीबीसी ने आरटीआई के जरिए और मैन्युफैक्चर कंपनियों के मालिकों से बात करके स्थिति का पता लगाने की कोशिश की।

7 सितंबर, 2020 के आरटीआई आवेदन के जवाब में एचएलएल ने बताया कि बीईएल ने 24332, एग्वा ने 5000 और अलाइड मेडिकल ने 350 वेंटिलेटर और बीपीएल ने 13 वेंटिलेटरों की सप्लाई की है। इसके बाद से वेंटिलेटर सप्लाई नहीं किए गए हैं। एक साल बाद 29695 वेंटिलेटरों की सप्लाई हुई है, जबकि जरूरत डेढ़ लाख से अधिक वेंटिलेटरों की थी। इस बीच स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से मार्च महीने के अंत में ही वेंटिलेटर खरीदने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी थी। 5 मार्च 2020 को स्वास्थ्य मंत्रालय के उद्यम एचएलएल ने वेंटिलेटर्स की सप्लाई के लिए एक टेंडर
निकाला।

पीएम केयर्स फंड के तहत अदालतों में याचिकाएं हैं दायर

 

अदालतों में सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत याचिकाएं दायर की गईं कि इस मामले में और पारदर्शिता लाई जाए। लेकिन अभी तक यही कहा गया है कि पीएम केयर्स फंड एक पब्लिक अथाॅरिटी नहीं है। इसका मतलब ये है कि न ही सरकार की ओर से इसे पर्याप्त वित्तीय मदद मिलती है और न ही इस पर उसका नियंत्रण है। इसलिए ये आरटीआई के दायरे में नहीं आता। इसका मतलब ये भी हुआ कि इसकी जांच सरकारी आॅडिटर्स भी नहीं कर सकता।

पर यह क्या बिल्कुल अजीब सी बात नहीं है कि पीम केयर्स पब्लिक अथाॅरिटी नहीं है। लाखों लोगों ने ये सोचकर इस फंड में योगदान नहीं किया है कि ये एक प्राइवेट ट्रस्ट है। प्रधानमंत्री के नाम पर इस फंड में पैसा जमा किया गया है। एक जानकारी के अनुसार, कुंडकुरी उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने आरटीआई के तहत पीएम केयर्स फंड के बारे में जानकारी मांगी थी।

एक अप्रैल को दायर अपनी याचिका में उन्होंने उन दस्तावेजों की मांग की थी, जिससे ये पता चले कि ट्रस्ट का गठन कैसे हुआ और ये कैसे काम करता है। उन्होंने इस पक्ष में कई दलीलें दी कि क्यों इस फंड को पब्लिक अथाॅरिटी होना चाहिए। पहला तो ये कि सरकार इसका नियंत्रण करती है, क्योंकि पीएम इसके अध्यक्ष हैं, उनकी कैबिनेट के तीन सहयोगी इसके ट्रस्टी हैं और बाकी के तीन ट्रस्टियों का चयन पीएम ने किया है। इसके साथ ही पीएम केयर्स की वेबसाइट में हवअण्पद का इस्तेमाल होता है, तो आधिकारिक रूप से सरकारी डोमेन है। साथ ही इस फंड में राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का इस्तेमाल होता है, जिसका इस्तेमाल सिर्फ सरकारी संस्थाएं ही कर सकती हैं।

उनकी ये भी दलील है कि इस फंड को सरकार से पर्याप्त वित्तीय मदद मिलती है। बीजेपी के सभी सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्र के फंड से एक करोड़ रुपए देने को कहा गया है। संसदीय क्षेत्र फंड संवैधानिक रूप से गठित फंड है। सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने भी करोड़ों रुपए पीएम-केयर्स फंड में दान दिया है, इन कंपनियों पर भी सरकार का ही नियंत्रण है। साथ ही सैनिकों, सिविल सेवा कर्मचारियों और जजों ने इस फंड में अपने एक दिन का वेतन अनिवार्य रूप से डोनेट किया है।

एक सप्ताह में 65 अरब रुपये हो गए थे इकट्ठा

 

एक दिन के बाद पीएम मोदी ने सभी भारतीयों से इसमें दान देने की अपील की। मोदी ने ट्वीट पर कहा, ‘मेरी सभी भारतीयों से अपील है कि वो पीएम केयर्स फंड में योगदान दें।’ उन्होंने ये भी कहा कि उनके डोनेशन से कोरोना के खिलाफ भारत की लड़ाई और मजबूत होगी और स्वस्थ्य भारत बनाने की दिशा में ये एक लंबा रास्ता तय करेगा।

पीएम मोदी की अपील के बाद कई क्षेत्रों से डोनेशन आने शुरू हो गए। उद्योगपति, सेलिब्रिटीज, कंपनियां और आम आदमी ने भी इसमें अपना योगदान किया। रिपोर्टों के मुताबिक एक सप्ताह के अंदर इस फंड में 65 अरब रुपए इकट्ठा हो गए। माना ये जा रहा है कि अब ये राशि बढ़कर 100 अरब रुपए हो चुकी है। विपक्षी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सलाह दी कि पीएम केयर फंड में जमा राशि को पीएमएनआरएफ में ट्रांसफर कर देना चाहिए। कांग्रेस ने ये भी कहा कि इस फंड का इस्तेमाल प्रवासी मजदूरों के कल्याण के लिए करना चाहिए। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने हाल ही में एक ट्वीट में पीएम केयर्स फंड पर सवाल उठाया। उन्होंने लिखा, ‘न टेस्ट हैं, न हाॅस्पिटल में बेड, न वेंटिलेटर हैं, न आॅक्सीजन, वैक्सीन भी नहीं है, बस एक उत्सव का ढोंग है। ‘पीएम केयर्स’ इसके बाद ट्विटर पर रुच्डब्ंतमे टाॅप ट्रेंड में आ गया। इसमें सोशल मीडिया यूजर्स दो हिस्सों में बंटे और जमकर बहस की।

क्यों बना था पीएम केयर्स फंड?

 

27 मार्च 2020 को भारत सरकार ने कोविड-19 से निपटने के लिए पीएम केयर्स फंड बनाया था। इसमें आम लोग अपनी इच्छा के मुताबिक डोनेट कर सकते हैं। इसमें चार सदस्य हैं- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृहमंत्री अमित शाह और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण। इस फंड को खर्च करने की जिम्मेदारी इन्हीं पर होती है।

 

कितना पैसा आया?

 

पीएम केयर्स फंड में अब भी डोनेट किया जा सकता है। इसको लेकर सरकार ने कोई आंकड़ा अब तक जारी नहीं किया है। यह फंड सूचना के अधिकार यानी आरटीआई के दायरे में भी नहीं आता। लेकिन 28 मार्च को पीएम मोदी की ओर से ट्वीट के बाद डोनेट करने वालों ने इसका सार्वजनिक ऐलान करना शुरू कर दिया था। 4 जून तक जिन लोगों ने अपने डोनेशन सार्वजनिक किए, वे पैसे कुल 9,690 करोड़ रुपए थे।

कहां-कहां खर्च हो रहे हैं पीएम केयर्स के पैसे

 

पीएमओ ने 13 मई 2020 को 3100 करोड़ रुपए के खर्च की जानकारी दी थी। इसके अनुसार, 2 हजार करोड़ रुपए से 50 हजार मेड इन इंडिया वेंटिलेटर खरीदने की बात हुई। उस वक्त देश में सबसे ज्यादा वेंटिलेटर की कमी थी। महामारी से पहले तक हर साल महज 3360 वेंटिलेटर बन रहे थे। महामारी की दूसरी सबसे बड़ी समस्या प्रवासी मजदूरों को घर पहुंचने को लेकर हुई। इसलिए एक हजार करोड़ रुपए प्रवासी मजदूरों की सहायता के लिए तय किए गए। सबसे बड़ी चुनौती वैक्सीन थी। तब 100 करोड़ रुपए वैक्सीन की रिसर्च पर खर्च करने की बात की गई। 2 फरवरी 2021 को पीएम केयर्स फंड के खर्चों के सचिव टीवी सोमनाथन ने बताया कि पीएम केयर्स फंड से कोरोना वैक्सीन लगाने के पहले चरण का 80 प्रतिशत खर्च निर्वहन किया जा रहा है। इसके तहत 2,200 करोड़ खर्च होने का अनुमान था। असल में साल 2020 के बजट में कोरोना वैक्सीन लगाने के लिए कोई बजट नहीं आवंटित नहीं किया गया था। इसलिए जनवरी से लेकर मार्च 2021 के बीच कोरोना वैक्सीन लगाने का जो खर्च आया उसे पीएम केयर्स फंड से दिया गया। यूपी में पीएम केयर्स फंड से पांच सौ से भी ज्यादा वेंटिलेटर्स दिए गए थे लेकिन ज्यादातर वेंटिलेटर आज भी अस्पतालों में पड़े हैं और मरीज वेंटिलेटर्स के अभाव में दम तोड़ रहे हैं।

 

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