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भारतीय अंटार्कटिक बिल महत्वपूर्ण क्यों है ?

अंटार्कटिका में जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण यहां के ग्लेशियर और नदियां पिघल रही हैं। इन परिवर्तनों के वैश्विक पारिस्थितिकी संतुलन पर दूरगामी और गंभीर प्रभाव पड़ने की संभावना है। इसके लिए दुनिया भर से चर्चाएं और तरह-तरह के समाधान मांगे जा रहे हैं। भारतीय लोकसभा ने हाल ही में ‘इंडियन अंटार्कटिक बिल’ पारित किया है। इसने भारत के लिए अंटार्कटिक महाद्वीप के संवेदनशील और खतरे वाले पर्यावरण की रक्षा के लिए उपाय करने का मार्ग प्रशस्त किया है। 

क्या है इस बिल का मकसद?


ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों को रोकने के लिए 22 दिसंबर 2015 को संयुक्त राष्ट्र सभा में ‘पेरिस समझौता’ प्रस्तुत किया गया था। 195 देशों ने इसे स्वीकार किया। यह आधिकारिक तौर पर 4 नवंबर 2016 से लागू हुआ। इसका क्रियान्वयन 2021 से शुरू हो गया है। भारत 3 अगस्त 2016 को पेरिस समझौते का एक पक्ष बन गया। भाग लेने वाले देश इस समझौते के उद्देश्यों का अनुपालन कर रहे हैं। जिसको देखते हुए भारत ने अंटार्कटिका के नाजुक पर्यावरण की रक्षा के लिए जलवायु परिवर्तन उपायों के लिए ‘भारतीय अंटार्कटिक विधेयक 2022’ पारित किया। इसके तहत अंटार्कटिका में तेजी से बदलते पर्यावरण को बचाने के उपाय किए जाएंगे। बिल के पीछे का उद्देश्य अंटार्कटिका में खनन और अन्य अवैध गतिविधियों पर अंकुश लगाने सहित महाद्वीप को विसैन्यीकृत करना है। इस बिल को पेश करते हुए केंद्रीय भूविज्ञान मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि भारत अंटार्कटिका में परमाणु परीक्षण विस्फोटों को रोकने की कोशिश करेगा।

क्या है ये बिल ?


अंतर्राष्ट्रीय अंटार्कटिक संधि और अंटार्कटिक समुद्री जीवन और प्राकृतिक संसाधनों (मैड्रिड प्रोटोकॉल) के संरक्षण पर समझौते के तहत निर्धारित पर्यावरण संरक्षण संकेतों के अनुसार सरकार द्वारा ‘इंडियन अंटार्कटिक बिल 2022’ बिल एक महत्वपूर्ण कदम है। इसके पीछे का उद्देश्य अंटार्कटिक महाद्वीप में भारत द्वारा लागू किए गए विभिन्न उपायों में एक समान और सुसंगत नीति और विनियम बनाना है। अंटार्कटिक संधि पर पहली बार 1959 में वाशिंगटन में 12 देशों द्वारा हस्ताक्षर किए गए थे। बाद में 42 अन्य देश इसमें शामिल हुए। इस बीच 1980 में कैनबरा में अंटार्कटिक समुद्री जीवन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए गए थे। भारत ने 1985 में इसकी पुष्टि की।

कैसे होगा इस बिल का इस्तेमाल?


यह विधेयक अंटार्कटिक कार्यक्रम के तहत भारत द्वारा नियोजित उपायों और मिशनों के प्रभावी कार्यान्वयन में मदद करेगा। यह विधेयक अंटार्कटिका में भारत के हितों की भी रक्षा करेगा। यह इस संदर्भ में मिशनों में भारत की सक्रिय भागीदारी को सुविधाजनक बनाने में मदद करेगा। केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने कहा कि बिल भारत को अंटार्कटिका के बढ़ते अंटार्कटिक पर्यटन और समुद्री मत्स्य पालन के सतत विकास के प्रबंधन में भाग लेने में मदद करेगा। लोकसभा में डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि एक बार विधेयक के कानून बनने के बाद भारतीय अदालतों को अंटार्कटिका के कुछ हिस्सों में किए गए किसी भी विवाद या अपराध का फैसला करने की शक्ति होगी। यह कानून नागरिकों को अंटार्कटिक संधि की नीतियों के लिए बाध्य करेगा। यह निश्चित रूप से विश्वसनीयता और विश्व स्तर पर निर्माण में मदद करेगा।

‘अंटार्कटिक अथॉरिटी ऑफ इंडिया’ क्या है?


विधेयक में भूविज्ञान मंत्रालय के तहत ‘भारतीय अंटार्कटिक प्राधिकरण’ (IAA) स्थापित करने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित ‘आईएए’ निकाय को इस अधिनियम के तहत नियोजित अंटार्कटिक अनुसंधान अभियानों के संगठन-प्रायोजन और पर्यवेक्षण में नीतिगत स्थिरता और पारदर्शिता के साथ पूर्ण अधिकार होंगे। यह निकाय विधेयक के तहत अधिकृत अभियानों के उचित क्रियान्वयन की निगरानी करेगा। इसके पीछे का उद्देश्य अंटार्कटिका महाद्वीप के पर्यावरण की रक्षा और संरक्षण करना है। यह संगठन सुनिश्चित करेगा कि अंटार्कटिक अभियान के तहत विभिन्न प्रयोगों और शोधों में शामिल भारतीय नागरिक अंटार्कटिका से संबंधित नियमों और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करें। केंद्र सरकार ने एक बयान में कहा कि संगठन की अध्यक्षता भूविज्ञान मंत्रालय के सचिव करेंगे और अन्य आधिकारिक सदस्यों को संबंधित मंत्रालयों से नियुक्त किया जाएगा।

भारतीय अंटार्कटिक कार्यक्रम का इतिहास क्या है?


भारत के अंटार्कटिक कार्यक्रम का चार दशकों का इतिहास है। भारत अंटार्कटिक क्षेत्र में चालीस वर्षों से भी अधिक समय से सक्रिय है, जिसमें तीन शोध केंद्र ‘दक्षिण गंगोत्री’, ‘मैत्री’ और ‘भारती’ हैं। शोध केंद्र ‘मैत्री’ और ‘भारती’ वर्तमान में कार्य कर रहे हैं। इसके जरिए यहां के वैज्ञानिक सूचनाओं के संग्रह को नियमित कर रहे हैं। भारत का अंटार्कटिक कार्यक्रम 1981 में शुरू हुआ था। यह कार्यक्रम नेशनल सेंटर फॉर पोलर रीजन एंड ओशन रिसर्च (एनसीपीओआर), गोवा द्वारा चलाया जा रहा है। भारत ने इस साल जनवरी में 43 सदस्यों के साथ अंटार्कटिका में अपना 40वां वैज्ञानिक अभियान शुरू किया। 39वें अभियान दल ने अंटार्कटिक में जलवायु और तापमान परिवर्तन, भूमि की सतह के विकास, ध्रुवीय प्रौद्योगिकी, पर्यावरण प्रक्रियाओं और पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्र में तटीय पारिस्थितिक तंत्र से इसके संबंध पर 27 वैज्ञानिक परियोजनाओं को अंजाम दिया। इस संबंध में विभिन्न शोध-टिप्पणियों की सूचना दी गई है। अब इस टीम की जगह 40वीं रिसर्च टीम ने ले ली है।

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